राहुल कोटियाल
बीता पखवाड़ा उत्तराखंड के लिए फिर से सरकारी चकाचैंध से भरा रहा। हमारी इवेंट प्रेमी सरकार ने 19 जुलाई को एक भव्य आयोजन किया, जिसमें केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हुए। दावा यह था कि दो साल पहले हुए इन्वेस्टर समिट में हुए साढ़े तीन लाख करोड़ रुपये के एम.ओ.यू. में से एक लाख करोड़ रुपये का निवेश धरातल पर उतार लिया गया है। सरकार की इस कथित बड़ी उपलब्धि का श्रेय हम छीनना नहीं चाहते। मगर निवेश के इन आँकड़ों की हकीकत हम आपको बतायेंगे, लेकिन उससे पहले ये समझिए कि ऐसेे आयोजनों की चकाचौंध से सरकार कैसे अपनी नाकामियों पर पर्दा डालने का काम करती है। रुद्रपुर में जब इस भव्य आयोजन की तैयारियाँ की जा रही थीं, ठीक उसी वक्त पहाड़ में न जाने कितने जिंदगियाँ सड़क दुर्घटनाओं और ध्वस्त हो चुकी स्वास्थ्य सेवाओं के चलते दम तोड़ रही थीं। ऐसी ही दो जिंदगियाँ थीं उत्तराखंड के लोकगायक गणेश मर्तोलिया की छोटी बहन और उनकी नानी की।
मुन्स्यारी इलाके के धापा गाँव में गणेश मर्तोलिया का ननिहाल है। 11 जुलाई को उनकी नानी और छोटी बहन दिया ने गलती से जहरीला मशरूम खा लिया। पहाड़ में जंगली च्यूँ की कम से कम 20 प्रजातियाँ खाई जाती हैं। जहरीले जंगली मशरूम भी कई प्रकार के होते हैं, जिनमें से कुछ की पहचान बेहद कठिन होती है और इसीलिए कई लोग इसका शिकार हो जाते हैं। लेकिन मौत की परिस्थिति अक्सर विषैले मशरूम खाने से नहीं, बल्कि समय पर सही उपचार न मिल पाने से बनती है। मशरूम खाने से दिया और उसकी नानी की तबियत बिगड़ने पर रात के करीब 1 बजे दिया को मुन्स्यारी अस्पताल ले जाया गया। उस रात वहाँ किसी की मौत होने के कारण डॉक्टर मौजूद थे। यह मालूम होने के बावजूद कि यह जहर का मामला है, जो पूरे शरीर में फैल सकता है, सिर्फ एक इंजेक्शन लगाने के बाद दिया को वापस वापस घर भेज दिया गया। जबकि ऐसे मामलों में रोगी को गहन निगरानी में रख कर लगातार हाइड्रेटेड रखा जाता है।
तबियत बिगड़ने पर 12 जुलाई की सुबह दिया और उनकी नानी फिर से अस्पताल पहुँचे। इस पूरे दिन न तो उन्हें प्रभावी उपचार मिल सका और न ही पहाड़ के तमाम अस्पतालों की तरह ‘रेफरल सेंटर’ बन चुके मुन्स्यारी के इस अस्पताल से उन्हें आगे भेजा गया। 12 तारीख की रात सिर्फ एक सफाई कर्मचारी के भरोसे दोनों लोगों को छोड़ दिया गया। डॉक्टर के होने की बात तो दूर, वहाँ उनकी ड्रिप चेक करने के लिये कोई नर्स तक नहीं थी। 13 तारीख की सुबह जब गणेश की ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर से फोन पर बात हुई तो डॉक्टर ने स्वीकार किया कि दोनों की स्थिति काफी नाजुक है, इसलिए इन्हें ‘हायर सेंटर’ ले जाना ही सही होगा। डॉक्टर ने ये भी राय दी कि पिथौरागढ़ अस्पताल में समय लगाना ठीक नहीं होगा। इन्हें सीधे हल्द्वानी ही ले जाना ठीक होगा। लेकिन मुन्स्यारी में सिर्फ एक ही एम्बुलेन्स उपलब्ध थी और अब तक दोनों की स्थिति ऐसी हो चुकी थी कि उन्हें किसी सामान्य गाड़ी से भेजना खतरनाक था। गणेश हल्द्वानी से लगातार ये कोशिश कर रहे थे कि किसी नेता-अधिकारी के माध्यम से एयर एम्बुलेंस की व्यवस्था हो जाये, मगर सबने हाथ झाड़ लिये। खराब मौसम में भी, हेलिकॉप्टर सेवाएँ बंद होने के बावजूद सत्ताधारी दल के नेता हेलिकॉप्टर लेकर केदारनाथ पहुँच जाते हैं, लेकिन दो जिन्दगियाँ बचाने के लिए हमारी सरकार हेलिकॉप्टर उपलब्ध नहीं करवा पाती। ऐसे में मुन्स्यारी में मौजूद अकेली एम्बुलेन्स से दिया को पिथौरागढ़ भेजा गया और एक सामान्य आल्टो कार से उनकी नानी को। पिथौरागढ़ में भी आगे रेफर कर देने की औपचारिकता की गई और हल्द्वानी पहुँचने से पहले ही दिया की मृत्यु हो चुकी थी। उनकी नानी हल्द्वानी अस्पताल तक तो जीवित पहुँचीं, मगर जीवन की रेस वे भी नहीं जीत सकीं।
इस घटना की जाँच चल रही है, लीपापोती हो रही है, मगर गणेश कहते हैं कि मैं और मेरा परिवार नहीं चाहते कि किसी का निलम्बन हो या किसी को ट्रांस्फर कर दिया जाये। पूरे पहाड़ की स्थितियों में बदलाव हो और पहाड़ के अस्पतालों में दिया और नानी की तरह कोई असहाय न मरे।
28 साल की दिया की नवम्बर में शादी होनी थी। गणेश ने हाल ही में एक कुमाउनी गीत गाया था ‘पंचाचुली देश’। इस गीत को 17 लाख से ज्यादा लोग देख चुके हैं और खूब सराह रहे हैं। गणेश ने इस हादसे के बाद लिखा है, ‘‘मैं आज तक हिमालय को सुकीली सुंदर कहता आया था। लेकिन अंदर से वह कितना टूटा और बेबस है, वह मैं अब महसूस कर रहा हूँ, जब मैं खुद टूट चुका हूँ, बेबस हो चुका हूँ। मेरी आँखों के सामने हर दिन सफेद पंचाचुली तैरता था। मुझे अब वह बिलकुल काला नजर आ रहा है। गोरी नदी से लाल खून बहता हुआ नजर आ रहा है। मैं डफिया, मुन्याल, न्योलि वन पक्षी के रोने की आवाज सुन रहा हूँ।’’
उत्तराखंड के पहाड़ ऐसी ही त्रासदियों को भोगने के लिए अभिशप्त हैं। स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक लगभग सब चैपट है। सरकार जब अट्टहास के साथ भव्य आयोजन करती है तो ऐसे आयोजन और भी फूहड़ लगने लगते हैं।
खैर, अब इन्वेस्टर समिट की उपलब्धियों पर ही बात करें। सरकार का दावा है कि वैश्विक निवेशक सम्मेलन में से साढ़े तीन लाख करोड़ के एम.ओ.यू. में से एक लाख करोड़ के निवेश की ग्राउंडिंग हो चुकी है। ऊर्जा के क्षेत्र में 40 हजार करोड़, उद्योग में 34 हजार करोड़, आवास में दस हजार करोड़, पर्यटन में 8,500 करोड़, उच्च शिक्षा में 5,116 करोड़, स्वास्थ्य में 2,500 करोड़ और अन्य क्षेत्रों में 3,292 करोड़ की ग्राउंडिंग हो चुकी है। तो स्वास्थ्य में जिस 2,500 करोड़ रुपये के निवेश की ग्राउंडिंग हो चुकी है, क्या उससे मुन्स्यारी जैसे पहाड़ के किसी कस्बे की स्थिति में कोई बदलाव आया है ? या ये सारे निवेश सिर्फ कमीशन का गणित बैठा रहे हैं ?
एक् भुक्तभोगी निवेशक की आपबीती से कुछ समझिए। 2023 में गुजरात की ‘के.के. नेशर प्रोजेक्ट्स’ ने उत्तराखंड सरकार के साथ एम.ओ.यू. साइन किया था। कम्पनी उत्तराखंड की 100 ग्राम सभाओं में दो-दो मेगावॉट के सोलर प्लांट और कोल्ड स्टॉरिज लगाने के लिये 1,400 करोड़ का निवेश करने वाली थी। जिस ग्राम सभा में यूनिट लगनी थी, वहाँ सौ से डेढ़ सौ स्थानीय लोगों को रोजगार भी दिया जाना था। यानी प्रदेश में करीब दस हजार लोगों को इस परियोजना से रोजगार मिलना था। परियोजना से उत्तराखंड सरकार को 384 करोड़ की सीधी बचत होनी थी और अगले 25 साल तक एक हजार करोड़ रुपये आमदनी जी.एस.टी. रूप में होनी थी। आज यह कम्पनी अधिकारियों के आगे-पीछे घूम-घूम कर थक चुकी है। यू.पी.सी.एल. भी यह लिख कर दे चुका है कि वह कम्पनी से साढ़े छः रूपये की दर से बिजली खरीदने को तैयार है। लेकिन मामला अफसरशाही में पिछले दो सालों से लटका हुआ है। कम्पनी के प्रतिनिधियों का कहना है कि प्रदेश के मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री तक इस मामले में आगे की कार्रवाही जल्दी करने के बारे में आदेश कर चुके हैं, लेकिन फाइल आगे ही नहीं खिसकती। जब कम्पनी अधिकारियों को लिखती है तो उन्हें कस्टमर केयर से सम्पर्क करने की हास्यास्पद राय दी जाती है। कम्पनी इससे खिन्न होकर बेहद तल्खी के साथ याद दिलाती है कि हम यू.पी.सी.एल. के कस्टमर नहीं, बल्कि उन्हें ऊर्जा देने वाले विक्रेता हैं।
ये उस ऊर्जा क्षेत्र की हकीकत है, जिसके बारे में दावा किया जा रहा है कि इसमें सबसे ज्यादा निवेश हुआ है और इसमें 81 हजार नये रोजगार सृजित होने का रास्ता साफ हो गया है। कुछ अखबारों ने छाप भी दिया है कि इतने रोजगार मिल चुके है, जैसे कुछ दिनों पहले एक संस्था ने मुख्यमंत्री जी को सम्मानित कर दिया था कि उन्होंने उत्तराखंड को भ्रष्टाचार मुक्त बना दिया है। ये अच्छा तरीका है। सरकार को अब आश्वासन देने की जगह सीधे घोषित कर देना चाहिए कि हमने स्वास्थ्य की समस्याएँ सुलझा दी चुकी हैं, शिक्षा शानदार बन चुकी है और अवैध खनन तो अब कहीं होता ही नहीं। पहाड़ पूरी तरह आबाद हो चुके हैं, बेरोजगार युवा तो खोजने पर भी कहीं नहीं मिलते। घूस तो आखिरी बार कांग्रेस के जमाने में ली गई थी।
पिछले हफ्ते एक वीडियो खूब वायरल हुआ, जिसमें उत्तराखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल कह रहे हैं कि ‘‘अगर हिल में कैपिटल होता तो तो आज उत्तराखंड स्टेट कुछ और होता। गाँव-गाँव में हॉस्पिटल होता, गाँव-गाँव में स्कूल होते और गाँव-गाँव में लाइट होती।’’ राजधानी के मामले पर इतना बोल्ड स्टैंड शायद पहली बार किसी न्यायिक अधिकारी ने लिया है। उनके इस स्टैंड को सराहा जा रहा है। इस छोटी-सी वीडियो क्लिप की पूरी कहानी को समझते हैं। बीती 15 जुलाई को जस्टिस थपलियाल की कोर्ट में गढ़वाल मोटर्स आॅनर्स यूनियन की एम.डी. उषा सजवान की जमानत की सुनवाई चल रही थी। उन पर कम्पनी के पैसों पर हेरफेर का आरोप है। इसी सुनवाई के दौरान कहीं से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के उस बयान का जिक्र आ गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि 2027 में हमें जिताओ। हम गैरसैण में राजधानी बना कर दिखायेंगे। इसी पर प्रतिक्रिया देते हुए जस्टिस थपलियाल ने तीखे अंदाज में कहा कि ‘‘मतलब उत्तराखंड की पब्लिक बिलकुल बेवकूफ हो गई ? जब चाहे बेवकूफ बना दो।’’ इससे आगे उन्होंने कहा कि ‘‘क्यों नहीं पोलिटिकल लोगों के खिलाफ हम एक्शन लें ? झूठा स्टेटमेंट देते हो पेपर में ? मिसगाइड करते हो पब्लिक को ?’’ उनके इतने कहने के बीच जब वकील साहब ने कहा कि ‘‘25 साल हो गए हैं उत्तराखंड बने हुए। अभी गैरसैंण में एक तिनका भी नहीं जुड़ा नहीं है’’ तो जस्टिस थपलियाल बोले, ‘‘तिनका नहीं, जुड़ा बहुत कुछ है। आठ हजार करोड़ की प्रॉपर्टी है वो।’’ इसके आगे उन्होंने लगभग हर पहाड़ प्रेमी की दिल की बात कही कि पहाड़ की राजधानी अगर पहाड़ में होती तो उत्तराखंड की स्थिति कहीं बेहतर होती। उन्होंने इस मामले में ‘सुओ मोटो काॅग्निजेंस’ (स्वतः संज्ञान) लेने की बात भी कही। जस्टिस थपलियाल ने नेताओं के झूठे और भ्रामक वादों और दावों के खिलाफ जो पहल की है, उससे उत्तराखंड ही नहीं बल्कि देश भर के लोगों में उम्मीद जग गई है। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने ही देश के हर नागरिक के खाते में 15-15 लाख रुपये देने का वादा किया था, जो 11 साल बाद भी पूरा नहीं हुआ है।
हम विनम्रतापूर्वक उत्तराखंड हाई कोर्ट के संज्ञान में और भी कुछ मुद्दे लाना चाहते हैं। जिस तरह हरीश रावत ने मुख्य मंत्री रहते हुए राजधानी के मुद्दे को नहीं सुलझाया और अब राजनैतिक बयान देकर जनता को भरमा रहे हैं, ऐसे ही कई मंत्री लगातार ऐसे काम कर रहे हैं। बरसात में हो रही तबाही को ही देखिए। हमारे मंत्री जी कुछ नहीं कर रहे हैं। जबकि वे बयान दे चुके हैं कि बादलों को रिमोट से आगे-पीछे किया जा सकता है, वे चाहंे तो बादलों को आबादी क्षेत्र से दूर ठसका सकते हैं। लेकिन वह रिमोट या तो उन्होंने छुपा दिया है या फिर उन्होंने झूठ बोला था। दोनों ही स्थितियों में उनके खिलाफ कार्रवाही होनी चाहिए। एक और मंत्री हैं, जिन पर आय से अधिक सम्पत्ति का मामला लम्बित है। लेकिन सरकार उनके खिलाफ कार्रवाही करने की अनुमति ही नहीं दे रही है। मिलोर्ड, जब से आपने कहा है कि क्यों न हम पोलिटिकल लोगों के खिलाफ एक्शन लें, प्रदेश भर के हजारों युवाओं की आँखों में चमक आ गई हैं। सरकार इन्हें नियुक्ति नहीं दे रही है और ठीकरा कोर्ट पर फोड़ रही है। आप को इन सब मामलों ‘सुओ मोटो काॅग्निजेंस’ लेना चाहिये मिलाॅर्ड। जल जीवन मिशन से लेकर प्रदेश में खनन, शराब, भ्रष्टाचार जैसे तमाम मुद्दों पर सरकार आए दिन झूठ बोल रही है मिलोर्ड, जनता को बेवकूफ समझ रही है।
अपने पाठकों को बताते चलें कि जिस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस थपलियाल ने ये टिप्पणी की थी, ढाई करोड़ के उस घोटाले में उषा सजवान को उस दिन कोर्ट से जमानत मिल गई थी। पिछले हफ्ते एक खबर हरक सिंह रावत के बारे में भी आयी, जिनके अच्छे दिन तभी तक चले जब तक वे भाजपा में रहे। जब से उन्होंने भाजपा छोड़ी, अच्छे दिन भी उनसे रूठ चुके हैं। उनके कॉलेज की जमीन से जुड़े मामले में प्रवर्तन निदेशालय ने उनके खिलाफ आरोप पत्र दाखिल कर दिया है। मनी लौंडरिंग मामले में अब उनके खिलाफ कोर्ट में केस चलना शुरू होगा। आरोप है कि कॉलेज की जमीन की वास्तविक कीमत 79 करोड़ से ऊपर है, जबकि कागजों में उसे 6-7 करोड़ ही दर्शाया गया है। इसकी खरीद में कई नियमों का उल्लंघन हुआ है। हरक सिंह रावत के साथ उनके परिजनों का भी नाम आरोप पत्र में है। जाँच के दौरान हरक सिंह रावत की बहू अनुकृति गुसाईं को भी ई.डी. ने तलब किया था। लेकिन कांग्रेस के टिकट पर लैंसडाउन से चुनाव लड़ने और हारने के बाद भाजपा में शामिल हो चुकी अनुकृति गुसाईं का नाम अब आरोप पत्र में नहीं है।
इस बीच कथित तौर से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पर बने एक गीत को लेकर भी विवाद होता रहा. गायक पवन सेमवाल ने ‘धामी-रे’ नाम से एक गीत गाया, जो 16 जुलाई को रिलीज हुआ। अगले ही दिन दिल्ली में रहने वाले पवन सेमवाल के घर कुछ पुलिसकर्मी पहुँचे और उन्हें दिल्ली से देहरादून लाया गया। पवन सेमवाल बताते हैं कि उनसे गाना हटाने को कहा गया। उन्होंने गाना तो हटाया तो नहीं, लेकिन दिल्ली वापस जाकर उन्होंने इसके कुछ शब्द बदल दिए। जैसे ‘धामी रे’ की जगह ‘डामी-रे’ कर दिया गया और गाना फिर से अपलोड हुआ। एक बार फिर से उनके आवास पर पुलिस पहुँची और उन्हें फिर से देहरादून लाया गया। उनके खिलाफ एफ.आई.आर. भी दर्ज कर दी गई। हालाँकि फिलहाल पुलिस ने उन्हें फिर से वापस दिल्ली छोड़ दिया है और फिलहाल ये गाना उनके चैनल पर पब्लिक के लिए उपलब्ध नहीं है। आगे की कार्रवाही के लिए 29 जुलाई को उन्हें फिर से देहरादून बुलाया गया है।
यू ट्यूब चैनल ‘बारामासाडाॅटइन’ के ‘एक्स्ट्रा कवर’ पर आधारित
फोटो इंटरनेट से साभार

































