अनिल स्वामी
गढ़वाल विश्वविद्यालय आंदोलन की जुलाई 1971 की बात है। श्रीनगर (गढ़वाल) में विश्वविद्यालय की मांग को लेकर आंदोलन जोर पकड़ने लगा। सीमित संसाधनों और बेहद कमजोर तकनीकी सुविधा के बीच जन भावनाएं उद्वेलित और आंदोलित होती चली गईं। गढ़वाल मंडल मुख्यालय पौड़ी में एक ऐसी शख्शियत ने आंदोलन की बागडोर संभाली कि वो कुंज बिहारी नेगी जन आंदोलनों के पूरक बन गए।
इस एतिहासिक और सफल आंदोलन ने पहाड़ों की ह्रदय स्थली श्रीनगर को विश्व विद्यालय के रुप में स्थापित कर गढ़वाल मंडल को ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल करते हुए एक नैसर्गिक रूप में अनवरत विकास की अवधारणा को जन्म दिया। विश्विद्यालय आंदोलन ने गढ़वाल मंडल की एकता और सामाजिक जागरूकता ने जो आयाम स्थापित किए वो लगभग आज के परिदृश्य में असंभव है। और इस एतिहासिक आंदोलन में कुंज बिहारी नेगी जी एक असाधारण प्रतिभा के रुप मे स्थापित हो प्रदेश और पौड़ी के लिए सामाजिक समर्पण के लिए समर्पित हो गए।
कुंजी मामा की पहचान समाज और आंदोलन की सफ़लता के लिए जाने जाना लगा। सन 1978 में मैं पॉलिटेक्निक का छात्र था कालेज की समस्याओं के निदान के लिए पौड़ी जिलाधिकारी को ज्ञापन देने लगभग डेढ़ दो सौ छात्र जलूस की शक्ल में धारा रोड होते हुए कलेक्ट्रेट की ओर बढ़ रहे थे कि पायल होटल के समीप कुंजी मामा ने जलेबियों से भरा पूरा थाल छात्रों के हवाले कर दिया।
कुंजी मामा की फितरत में कभी राजनीति हावी नहीं हो सकी और उनका स्वाभाविक व्यक्तित्व जन हित के लिए समर्पित हो गया। ई टी सी छात्रों का आंदोलन रहा हो या सुमाडी गांव का पानी का विवाद वो हमेशा प्रेरणा स्वरूप एक सच्चे कर्मयोगी के रुप में खड़े मिले। विभिन्न आंदोलनों में उनका योगदान अविस्मरणीय रहा और निस्वार्थ रहा पौड़ी जिला चिकित्सालय में उनकी सेवा से दूर दराज से आते अनगिनित बिमारों और तीमारदारों की बेमिसाल सेवा से उनके एक सच्चे कर्मयोगी होने की बात पर हर कोई मुरीद हो जाता।
कुंजी मामा की यदि निस्वार्थ सेवा भाव और जन आंदोलन की सफ़लता के साथ साथ उनका उपयोग भी चालाक सोच के लोगों द्वारा किया जाता रहा। उनका सामाजिक समर्पण भाव में कभी स्वार्थ हावी नहीं रहा श्रीनगर की समस्याओं के निराकरण के हुए आंदोलनों में उनकी भूमिका और उपस्थिति हमेशा प्रेरणा प्रदान करते हुए संयुक्त चिकित्सालय रोड़वेज डिपो और एन आई टी आंदोलन में सक्रिय रुप से शामिल हों अपनी उपस्थिति,भावनाओं और सक्रियता ने हमेशा ऊर्जा प्रदान की।
एक बार पौड़ी ने उन्हें पालिका अध्यक्ष पद पर आसीन किया लेकिन दो बार विधान सभा चुनाव में वे हारे। इसकी जिम्मेदार जनता और उनकी निश्चल सोच भी थी। वो गलत को गलत और सही को सही कहने वाले शख्शियत थे। उन्होंने सामाजिक जीवन कभी समझौता नहीं किया, समाज के लिए समर्पित कुंजी मामा आंदोलन के आदर्श बन गए थे लेकिन अविवाहित कुंजी मामा समाज सरकार के लिए आदर्श नहीं बन सके।
जीवन के आखरी समय उनकी आंखो में एक शून्य और पीड़ा के भाव थी 25 जून 2025 को उसी भाव के साथ कुंजी मामा हमेशा के लिए नेपथ्य में चले गए।
आपके संघर्षों का इतिहास साक्षी है। नैनीताल समाचार परिवार की श्रद्धांजलि!

































