डाॅ. अतुल शर्मा
वाणी विहार में रहते हुए अचानक पैदल चलने का मन हुआ। पुराने दिन याद आ गये। दून घाटी की सड़कों पर पैदल चलते हुए अब लगता ही नहीं कि यह वही देहरादून है। वो सड़क के दोनों तरफ बहती हुई नहरें। वो किसी भी कोने से दिखाई देने वाली मसूरी। खेतों को सींचती छोटी और भरी-भरी नदियों मे गहरा और बहता हुआ पानी। सामने दिखाई देने वाले छोटे-बड़े पहाड़ और जंगल। सहस्त्रधारा रोड के दोनों तरफ आम के पेड़ और डालनवाला में महकते और सपनीले रंगों से भरे फूल।
टीन की छतें। घरों के सामने बाग। दीवारें तो देखी ही नहीं थीं। घनी और मजबूत झाड़ियाँ थीं। पेड़ों-फलों और पेड़ों की सैकड़ों प्रजातियों का अब पता ही नहीं है। गायब हो गये वे तमाम मौसम और लोग। साथ ही रात भर टाइम का आभास दिलाती घंटा घर की घंटा ध्वनि। ये सब पैदल चलने के लिए उकसाया करता था। पैदल चलने का मौसम रोज होता था तब।
दूरियाँ नापतीं रोडवेज की बसें। साइकिल किसी-किसी के पास होती। घरों में पंखा नहीं होता था। बर्फ भी पड़ती थी कभी-कभी। वर्षा तो कमाल करती थी। नीले आसमान पर चीलों की गोताखोरी। शाम को लौटते तोतों के समूह। कितनी प्रकार की चिड़ियाँ थीं यह बताना कठिन है अब।
कभी कहीं महान लेखक राहुल सांकृत्यायन घूमते मिल जाते, तो कभी लेखक भगवत शरण उपाध्याय, कही संपादकाचार्य विशम्भरदत्त चंदोला तो कही ‘युगवाणी’ के संपादक गोपेश्वर कोठियाल, कहीं अध्यापक पूर्ण सिह तो कहीं स्वतंत्रता सेनानी राष्ट्रीय कवि श्रीराम शर्मा ‘प्रेम’, कथाकार शशिप्रभा शास्त्री तो कहीं छायाकार ब्रह्म देव, मनोहर लाल उनियाल श्रीमन, कवि ऋषिराज नौटियाल तो कहीं हिन्दी सिनेमा के खलनायक के. एन. सिह, चित्रकार मूर्तिकार द्विवेदी सेन, सितारवादक उस्ताद विलायत खाँ, विचित्रवीणा वादक अजीत सिंह, प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक देशपांडेय, मानवतावादी एम. एन. राय, क्रांतिकारी विरेंद्र पांडेय, महावीर त्यागी, नरदेव शास्त्री, खुर्शेद लाल, राजा महेंद्र प्रताप, विजय लक्ष्मी पंडित, शर्मदा त्यागी, सत्यव्रत विद्यालंकार, भक्त दर्शन, खान अब्दुल गफ्फार खाँ के साथी अमीर चंद्र बैंबवाल, लोकगायक जीत सिह नेगी और केशव अनुरागी आदि। लम्बी सूची है। और भी बहुत बहुत लोग। ऐसे बहुत सारे लोग या तो देहरादून में रहते थे या अक्सर आते-जाते रहते थे।
बस यह सभी मिल जाते थे। कुछ तो हमारे घर पर भी आते थे। दून घाटी के वे स्वर्णिम दिन हमारे संस्कारों मे बसे हैं।
आज पैदल चलते हुए तो लगता है कि वह एक सपना है जो हमने साकार देखा है। पैदल चलने की प्रेरणा शुद्ध हवा भी देती थी। शांति भी। सब्र और सुकून भी। तो…… थी और है के बीच में गहरा अंतर स्पष्ट दिखाई देता है। सवाल है कि ये अंतर क्यों है ? जरूर अवगत करायें। हमें भी और अपने आप को भी। कुछ अन्य घटनायें और कुछ लोग भी बरबस याद आ जाते हैं।
डांडी यात्रा और नमक कानून तोड़ो आन्दोलन में महात्मा गांधी के आह्वान पर देश भर में लोग आन्दोलन में शामिल हुए थे। इसमें देहरादून से भी लोग शामिल हुए थे। उनमें से एक थे अमर शहीद खड्ग बहादुर सिंह बिष्ट। आन्दोलनकारियों ने बिधोली में नून नदी से नमक निकाला था, जो खाराखेत में है।
इस घटना के वर्षों बाद खड्ग बहादुर की माता जी तुलसा देवी और बहन दुर्गा के साथ हम खाराखेत गये थे। मेरी माता जी श्रीमती रमा शर्मा व बहन रेखा, रंजना, रीता और मैं। हम अपने पिता स्वाधीनता सेनानी व राष्ट्रीय कवि श्रीराम शर्मा प्रेम के कहने पर वहाँ गये थे।
शहीद खड्ग बहादुर की कथा रोचक व महत्वपूर्ण है। उनकी जीवंत कथा पिताजी ने 1952 के ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में लिखी। ( संदभ: गढ़वाल की दिवंगत विभूतियाँ; लेखक: भक्त दर्शन) नेहरू ग्राम आठ नम्बर ग्रांट में रहते थे खड्ग बहादुर। पिताजी रूप सिंह फौज मे थे। खड्ग बहादुर डीएवी कालेज में पढ़े। एक दिन उन्हें खबर मिली कि नेपाल से राजकुमारी मैया को कलकत्ता का सेठ हीरालाल उठा ले गया है। खड्ग बहादुर का खून खौल उठा।
वे इलाहाबाद पहुँचे और खुकरी से हीरालाल का गला काट कर फेंक दिया। अपने को पुलिस के हवाले कर दिया। यह केस बहुत प्रसिद्ध हुआ। जेल में बहनों की राखियाँ आने लगीं। उनको छोड़ देने के लिए अपील हुई। कुछ दिन बाद वे छूटे। लौटे तो उनका जीवन बदल चुका था।
इसी समय डांडी यात्रा का आह्वान हुआ। उन्होंने खून से गांधी जी को पत्र लिखा…..मै डांडी यात्रा में शामिल होना चाहता हूँ। पर मुझे खुकरी चलानी आती है पर चर्खा चलाना नहीं आता। अहिंसा के दर्शन को समझने के बाद वे डांडी यात्रा मे शामिल हुए। फिर गोर्खा जत्था में रहे और साथ ही महान स्वतंत्रता सेनानी अरुणा आसफ अली के साथ भी काम किया।
उन्होंने अनेक लोगों के साथ खाराखेत में स्थित नून नदी मे नमक निकाला। हमारे घर में खड्ग बहादुर की माता जी आती रहती थीं। सम्पूर्णानन्द जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तो माता जी को पेंशन हो गयी थी। वे पिताजी का बहुत सम्मान करती रहीं। उनके बाद उनकी बेटी दुर्गा बहन जी हमारी पारिवारिक सदस्यों की भांति आती रहीं। वे मुझे राखी बाँधती थीं।
एक दिन पता चला कि वे नहीं रही। सुबह उनकी लाश कमरे मे मिली। उनकी मृत्यु रहस्य ही रही। शहीद खड्ग बहादुर बिष्ट अमर सेनानी थे, जिनके स्मारक का पता नहीं है। हाँ, उनके नाम पर फुटबॉल टूर्नामेंट होते हैं। मैंने आकाशवाणी नजीबाबाद के लिए एक रेडियो रूपक लिखा था। अभिनेत्री निवेदिता बैंठियाल ने एक नाटक भी तैयार किया था। मैंने एक लम्बी कविता लिखी थी जो मेरी पुस्तक ‘सींचे नींव’ में छपी है।
पर ये पर्याप्त नहीं है। बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल होना चाहिए ये प्रेरणादायक व्यक्तित्व। ऐसी विलक्षण प्रतिभायें और प्रभावशाली व्यक्तित्व ही देहरादून की पहचान रहे है। लार्ड हार्डिंग पर बम फेंकने के रणनीतिकार, अपने साथियों के साथ इतिहास मे दर्ज हैं महान क्रांतिकारी रास बिहारी बोस। इनका सम्बन्ध घोसी गली से रहा है।
स्वतंत्रता संग्राम के अनेक अमिट पृष्ठ यहीं लिखे गये। यहाँ की जेल में स्वतंत्रता सेनानी जवाहर लाल नेहरू रहे। महात्मा गांधी ने ‘बाल वनिता’ आश्रम की नीव रखी थी और शहंशाही आश्रम मे वृक्ष भी लगाया था। मसूरी की जनसभा अनेक लोगों को याद है। हमारी अम्मा जी श्रीमती रमा शर्मा उस सभा मे शामिल थीं।
बहुत से लोगों ने देहरादून को सृजन के लिए चुना था। यहाँ के देहातों मे यहाँ की संस्कृति उगी। प्रसिद्ध झंडे का मेला गुरु राम राय से जुड़ा है। देहरादून का नाम उनके डेरा डालने से जुड़ा है। ‘डेरादून’ ही कालान्तर में देहरादून हुआ।
कभी मसूरी की ऊँचाई से दखें तो दीपकों का एक थाल नजर आता देहरादून। बस, देहरादून से मसूरी का पैदल रास्ता बंद हो गया है। वह झड़ी पानी और जाॅर्ज एवरेस्ट की याद दिलाता था हमें।
यह विस्तार इसलिए भी कि याद रहे कुछ। सभी को। आज की स्थिति यह है कि हमारी दीदी कवयित्री रंजना शर्मा और कहानीकार दीदी रेखा जब किसी से फोन पर बात कर रही थीं आज की भीड़ की, तो वास्तविकता दिख जाती है। वे कह रही थीं कि कल मंदिर के बाद सामने की दुकान में जाना था तो घंटाघर-पल्टन बाजार से न्यू मार्केट में जाना स्थगित करना पड़ा। तेज रफ्तार, भीड़ की वजह से कुछ ही दूरी पार करना असंभव होता दिखा।
पर मुझे लगा कि इन दोनों के बीच घंटाघर के बाहर स्वतंत्रता सेनानियो के याद में खड़े स्मृति स्तंभ हमें इस पार खड़ा देख रहे थे और हम उन्हें।

































