चारू तिवारी
उन दिनों हम बग्वालीपोखर में रहते थे। यह 1980 की बात है। यहीं इंटर कालेज में दसवीं कक्षा में पढ़ते थे। बग्वालीपोखर में तब न तो सड़क थी और न बिजली। देश में आपातकाल के बाद आई जनता पार्टी की सरकार गिर गई थी। इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी भी हो गई थी। बाद में मई-जून के महीने में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव हुए। बग्वालीपोखर में प्रो. डीडी पंत, जसवंत सिंह बिष्ट और बिपिन त्रिपाठी को पहली बार देखा। उनके भाषण सुने। उस उम्र में भाषण तो ज्यादा कुछ समझ में नहीं आये, लेकिन बाद में कई वर्षो तक इन तीनों को बहुत नजदीक से देखने और उनके साथ काम करने का मौका मिला। इनमें से जसवंत सिंह बिष्ट जी के ऊपर लगे नारे ने हमें सुचिता, समर्पण और प्रतिबद्धता के साथ समाज के साथ खड़े होने का मंत्र दिया। वह नारा था- ‘टूटी चप्पल फाटी कोट जसूका कैं दिया वोट।’ इस दौर में जब हम जसवंत सिंह बिष्ट जी को याद कर रहे हैं, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में इतनी विकृतियां आ चुकी हैं कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि विधायक रहते कोई नेता खेतों में हल लगा सकता है। कोई विधायक रहते ट्रक के टूल में 85 किलोमीटर का सफर करता हो। ऐसा नेता जिसके पास नामांकन भरने के लिए पैसा न हो, वह ‘एक नोट और एक वोट’ के नारे के साथ उत्तर पद्रेश की विधानसभा में पहुंच गया हो। वहां जाकर उसने 7500 से अधिक सवाल पूछकरर इतिहास रच दिया हो।
इससे पहले कि जसवंत सिंह बिष्ट जी के जीवन संघर्ष के बारे में बात हो पहले उनके बहुत निकट रहे और उत्तराखंड के जनसरोकारों से जुड़े हमारे अग्रज श्याम सिंह रावत की जुबानी जसवंत सिंह बिष्ट जी के जीवन से जुड़े कुछ बहुत ही प्रेरक प्रसंग-
‘1980 में लोकसभा चुनाव के बाद मैंने बसंत पंचमी के दिन मुनि की रेती (ऋषिकेश) में आयोजित पार्टी की समीक्षा बैठक में जसवंत सिंह बिष्ट जी को उत्तराखंड क्रांति दल की सदस्यता दिलाई। फिर मई 1980 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के जबरदस्त धनबल और बाहुबल को मात दी। जसंवत सिंह बिष्ट जी के इस चुनाव का नामांकन करने से एक दिन पहले की घटना पर कोई बहुत मुश्किल से ही यकीन करेगा, लेकिन स्व. बिष्ट जी को जानने वालों के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं। हुआ यह कि पर्चा दाखिल करने 120 किमी. दूर अल्मोड़ा जाने से पहले उनके पास गांव की एक दलित महिला ने आकर कहा कि उसके चैथी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे से स्कूल से गरीब बच्चों को दी जाने वाली दो पुस्तकें खो गई हैं और अध्यापकों का कहना है कि या तो पुस्तक जमा करो या उनकी कीमत। बिष्ट जी ने पूछा कि किताबों का मूल्य कितना है तो उस महिला ने बताया कि चार रुपये। बिष्ट जी ने अपनी जेब में रखे छः रुपयों में से चार उसे दे दिये और हाथ में पार्टी का बड़ा-सा झंडा व कंधे में थैला लटका कर चल दिये।’
‘गांव से नीचे उतरे तो वहां ग्राम देवता के मंदिर में जेब के शेष दो रुपये भी चढ़ा दिये। अब उनकी जेब पूरी तरह खाली थी। अल्मोड़ा कैसे जायेंगे और नामांकन का शुल्क कैसे जमा करेंगे कुछ नहीं मालूम। कुछ खेत नीचे उतरे तो गांव का एक किसान कंधे में हल टांगे और हाथों मे बैलों की रास पकड़े हुए मिले। उन्होंने पूछा कि नेताजी आज कहां का दौरा हो रहा है। बताया कि अल्मोड़ा जा रहा हूं चुनाव का पर्चा दाखिल करने। सहृदय किसान ने कहा, यार नेता जी, कैसे आदमी हो, पहले घर पर बताते तो कोई सहायता करता, यहां मेरे पास बीड़ी-माचिस के लिए दो रुपये हैं, आप ले जाओ। मैं काम चला लूंगा। ना-ना करते हुए भी उस भले आदमी ने वे दो रुपये उनके हाथ में धर दिये। गांव के नीचे सड़क पर पहुंचे तो वहां एक छोटी-सी दुकान पर बैठे। दुकानदार ने भी वही उलाहना दिया कि पहले क्यों नहीं बताया। कल शाम ही रामनगर से वसूली को आये लाला को जो कुछ था, सब दे दिया। बातें हो ही रही थी कि दूसरे गांव के दो ग्राहकों ने कुछ सामान लिया। उनसे मिले 20 रुपये उस दूकानदार ने बिष्ट जी को थमा दिये।’
‘थोड़ी देर में देघाट से रामनगर जाने वाली बस आ पहुंची। उसमें बैठे तो कंडक्टर की सीट पर मौजूद बस मालिक के बेटे ने भी वही सवाल पूछा कि नेताजी कहां जाना हो रहा है। बताने पर उसने कंडक्टर को हांक लगाई, अरे नेताजी हमारे साथ भतरौंजखान तक जायेंगे, इनका टिकट मत काटना।’
‘नेताजी का भतरौंजखान (हमारे गांव) में तिलक लगाकर श्रीमती जी ने स्वागत किया और उनके विजयी होने की शुभकामना के साथ दो सौ रुपये उनके लाख मना करने के बाद भी जबरदस्ती उनकी वास्कट की जेब में घुसा दिये। यहां घट्टी के घनश्याम वर्मा भी आकर मिल गये। फिर तीनों लोग पहुंचे रानीखेत। केमू बस अड्डे से बाजार की तरफ जाते हुए रास्ते में बिष्ट जी के हमउम्र खांटी कांग्रेसी नेता और विधान परिषद सदस्य (….) मिल गये। उन्होंने धीरे से मेरे कान में कहा, ‘जसवंत के पास पर्चे के भी पैसे हैं कि नहीं?’ मैंने संकेत में उत्तर दिया। तब उन्होंने कहा कि शाम को वापसी में घर आना। आगे चलकर बुक सेलर धरम सिंह जी की दुकान पर पहुंचे तो वे नामांकन शुल्क और खर्चे लायक पैसों व एक अन्य मित्र के साथ तैयार मिले। हम पांचों बस से अल्मोड़ा पहुंचे और बिष्ट जी का नामांकन कराया। 1980 का वह बेहद संघर्षपूर्ण चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी पूरन सिंह माहरा को 256 वोटों से पराजित करके जीता।’
‘बिष्ट जी की सादगी और सीधे-साधेपन को समझने के लिए सिर्फ एक ही उदारण काफी है―एक बार उन्हें भिकियासैंण से रामनगर जाकर लखनऊ वाली ट्रेन पकड़नी थी, लेकिन जाने का कोई साधन नहीं था। बाजार में किसी से मालूम हुआ कि लाला बहादुर मल का ट्रक रामनगर जाने वाला था। लाला के घर जाकर पता चला कि उसमें तो उनके परिवार की महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे रामनगर जाने को तैयार बैठे हैं और उसमें जरा भी जगह बाकी नहीं है। इस पर बिष्ट जी बोले कि वे ऊपर टूल बॉक्स में बैठ जायेंगे। सचमुच उन्होंने 94 किमी. की वह यात्रा उसी टूल बॉक्स में बैठकर पूरी की जिसमें से 80 किमी. पूरी तरह पहाड़ी है।’
इन उदाहरणों से समझा जा सकता है कि जसवंत सिंह बिष्ट होने का मतलब क्या होता है। जसवंत सिंह का जन्म अल्मोड़ा जनपद के स्याल्दे विकास खंड के तिमली गांव में 19 नवंबर, 1929 में हुआ था। उनके पिता का नाम त्रिलोक सिंह बिष्ट था। उनके पिता बहुत मुफसिली में जी रहे थे। स्याल्दे से 1938 में चैथी पास करने के बाद वे मंबई चले गये। वहां उन्हानें दो रुपए मासिक पर नौकरी की। बाद में उनके पिता उन्हें गांव ले आये। तेरह वर्ष की उम्र में पिता का निधन हो गया। दो बहनों और मां के साथ बेहद गरीबी में जीवन काटना मुश्किल था तो वे 16 वर्ष की उम्र में ग्वालियर चले गये और वहां काॅटन मिल में काम करने लगे। वहां श्रमिक कानूनों के प्रभावी न होने के कारण श्रमिकों को 16 से 18 घंटे तक काम करना पड़ता था। श्रमिक छुट्टी जैसे अधिकारों से भी वंचित थे। कुछ श्रमिक संगठनों का इन मुद्दों पर चल रहे आंदोलनों में जाने से वह अपने को नहीं रोक पाये। और श्रमिक आंदोलनों में सक्रिय हो गये। वहीं उनके अंदर राजनीतिक समझ ने जन्म लिया।
श्रमिक आंदोननों में सक्रियता के कारण ही उन्हें राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव और जयप्रकाश नारायण जैसे समाजवादी नेताओं से मिलने और समाजवाद को समझने का अवसर मिला। श्रमिक आंदोलन में लगातार भागीदारी करने के कारण पहले वे यूथ कांग्रेस और बाद में 1948 में नासिक में ‘प्रजा सोशलिस्ट पार्टी’ में शामिल हो गये। बिष्ट जी 12 साल तक पार्टी की कार्यकारिणी के सदस्य रहे। वहां श्रमिक संगठन मजदूर पंचायत और मजदूर सभा के सदस्य रहे। यहां उन्होंने नौ दिन का अनशन भी किया। वहां आंदोलन में भाग लेने के कारण नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
इस बीच पिता की बीमारी के कारण जसवंत सिंह बिष्ट 1954 में अपने गांव वापस आ गये। उनके परिवार की आर्थिक हालत बहुत खराब थी। ग्रामीण क्षेत्रों में उन दिनों किसी प्रकार की सुविधाएं भी नहीं थी। यातायात की सुविधाएं तो ना के बराबर थी। लोग अपना सामान खच्चरों से लाते थे। उन्हें उनके श्रम के मुताबिक पैसा नहीं मिलता था। इसे देखते हुए उन्होंने यहां उन्होंने लीसा ढोने वाले खच्चर वालों की यूनियन बना दी। इस आंदोलन में उन्हें झूठे केस में जेल हो गई। बाद में यह केस खारिज हुआ। लेकिन जसवंत सिंह अब एक जननेता के रूप में उभरने लगे थे। उन्होंने भूमि से बेदखल किये गये 35 शिल्पकार परिवारों के लिए बागेश्वर जनपद के गढ़सेर गांव में लंबी लड़ाई लड़ी। यहां पुलिस के दमन में उन्हें बहुत चोटें आईं और उन्हें अल्मोड़ा जेल भेज दिया गया।
बिष्ट जी का पूरा जीवन जनआंदोलनों में ही गुजरा। जमींदारी उन्मूलन, भूमिहीनों को भूमि अधिकार दिलाने, मजदेरों के आंदोलन में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई। गढ़वाल में टिंचरी के खिलाफ आंदोलन, 1984 में ‘नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन’, ताड़ीखेत ब्रांच फैक्ट्री का श्रमिक आंदोलन, उत्तराखंड राज्य आंदोलन, पहाड़ में वन अधिनियम के कारण रुके विकास कार्यों के खिलाफ आंदोलनों में वह न केवल नेतृत्वकारी भूमिका में रहे, बल्कि जेल यात्राएं भी की। ‘नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन’ में वह अल्मोड़ा जेल में रहे। तेरह दिनों तक तिहाड़ जेल और एक माह टिहरी जेल में रहे। उन्होंने तीन महीने बोगश्वर जेल में भी काटे। पृृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर उन्होंने 1989 में इंद्रमणि बडोनी के साथ सौ दिन की लंबी पैदल यात्रा की। यह यात्रा सुदूर पिथौरागढ़ जिले के तवाघाट देहरादून की यात्रा की।
जनप्रतिनिधि के तौर पर वे 1954 में पहली बार गांव के सरपंच बने। 1960 से 1972 तक स्याल्दे ब्लाक के कनिष्ठ और ज्येष्ठ प्रमुख रहे। 1972 में ब्लाक प्रमुख बने। ब्लाक प्रमुख रहते हुए उन्होंने किसानों को प्रशिक्षण देने के लिए युगांडा और जर्मनी में आयोजित प्रशिक्षण शिविर में क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। सोशलिस्ट पार्टी से दो बार चुनाव लड़े। 1980 में पहली बार और 1989 में दूसरी बार रानीखेत सीट से उक्रांद के विधायक रहे। उन्होंने अपने कार्यकाल में क्षेत्र में बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए बहुत काम किए। स्याल्दे और मानीला में डिग्री कालेज और आईटीआई उन्हीं की देन हैं।
जसवंत सिंह बिष्ट का पूरा जीवन बहुत संघर्षों और अभावों में गुजरा। दो बार विधायक रहने के बावजूद उन्होंने कभी भी अपने परिवार के लिए कुछ भी जोड़ने की नहीं सोची। हमेशा आमजन की भलाई में लगे रहे। पारिवारिक जीवन में भी वह बहुत कष्टों में रहे। उनकी पत्नी की तबीयत लगातार खराब रहने के कारण घर का सारा काम और घास काटने तक का काम विधायक रहते भी वह करते थे। जसवंत सिंह बिष्ट राम मनोहर लोहिया के विचारों से बहुत प्रभावित थे। जब वह अल्मोड़ा जेल में थे तो राम मनोहर लोहिया का अल्मोड़ा आगमन हुआ था। अल्मोड़ा से वापस लौटने के बाद उनका निधन हो गया। बिष्ट जी की इच्छा थी वे अल्मोड़ा में राम मनोहर लोहिया की स्मृति में एक स्मारक बनायें, लेकिन लोगों के विरोध के चलते यह संभव हनीं हो पाया।
जीवन भर गरीबों, पिछड़ों के लिए संघर्षरत रहे, उत्तराखंड राज्य के लिए अपना अमूल्य योगदान देने वाले ऐसे मनीषी के साथ जीवन के अंतिम समय में जो हुआ वह एक राजनीतिक संत की शुुचिता की राजनीति को ध्वंस्त करने की साजिश का हिस्सा बनी। लंबी बीमारी के बाद उनका 4 अक्टूबर, 2005 को उनका निधन हो गया।
संदर्भः
1. क्रिएटिव उत्तराखंड-म्यर पहाड़ पोस्टर, प्रकाशन वर्ष-2010
2. चन्द्रशेखर करगेती के फेसबुक पेज से श्याम सिंह रावत जी के संस्मरण।
3. महेश पांडे जी का लेख, साभारः ‘पहाड़’ स्मृति अंक-दो

































