तमाम तरह की असुविधाओं के बावजूद उल्लास और उत्साह के सामाजिक संरक्षण के प्रतिबिंब होते हैं हमारे त्यौहार। हमारे समाज में दीपोत्सव जहाँ व्यक्ति के अंतरतम तक को प्रकाशमान कर देने वाला त्यौहार है, वहीं होली उल्लास उत्साह से लबरेज होकर व्यक्ति को बौरा जाने की हद तक पहुँचा देने वाला। यह फागुन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होकर चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तक चलने वाला सबसे लम्बी अवधि का त्यौहार है।
हर वर्ष पूस माह के पहले इतवार से ही बैठकी होली के साथ होली के त्यौहार की शुरूआत हो जाती है, जो छलड़ी के अगले दिन टीके तक, जिसे ‘दंपत्ति टीका’ कहते हैं, के दिन विधिवत पूर्ण होती है। जिस तरह दीपावली में टीका भैया दूज के रूप में मनाया जाता है, बहिन घर आए भाई को टीका लगाती है, उसी तरह होली में छलड़ी के अगले दिन का टीका दंपत्ति टीका के रूप में मनाया जाता है। गुड़, बताशे व रंग का टीका लगा कर, आशीर्वचनों वाली होली का गायन करते हुए (मुख्यतः मंदिरों में) होली की विदाई की जाती है।
रामनगर में ‘पर्वतीय सभा’ नामक सामाजिक संस्था के लिए तो होली ही बुनियाद का पत्थर रही है। सभा के संस्थापकों ने चीर बंधन से लेकर छलड़ी तक घर-घर जाकर होली गीतों का गायन कर आर्थिक सहयोग हासिल कर सभा की स्थापना के संकल्प को साकार किया था। सभा का अपनी स्थापना से लेकर वर्तमान तक होली के प्रति विशेष अनुराग रहा है।
अतीत की बात करें तो रामनगर बसासत के स्तर पर मुख्यतः काशीपुर के वणिक वर्ग व कुमाऊँ-गढ़वाल के पहाड़ियों से अस्तित्व में आया। कालांतर में विवाह आदि सामाजिक कार्यों के लिए सामुदायिक भवनों की स्थापना आर्थिक रूप से अधिक संपन्न वणिक वर्ग द्वारा ‘अग्रवाल सभा’, ‘खत्री सभा’ जैसे भवन बनाकर हुई थी। पर्वतीय समाज को भी इन सामुदायिक भवनों को उपयोग हेतु दिया तो जाता था, लेकिन अपने समाज को प्राथमिकता देने की शर्त के साथ। पर्वतीय समाज के लोगों के लिए अपना सामुदायिक भवन होना आवश्यकता ही नहीं, अपितु सम्मान का भी प्रश्न बन गया। पर्वतीय सभा के तत्कालीन संस्थापकों ने पर्वतीय सभा की स्थापना का संकल्प लिया और आर्थिक सहयोग के लिए होली के त्यौहार को, जो कई दिन तक चलने वाला त्यौहार हुआ, का सहारा लिया। सभा की मातृ संस्था ‘दुर्गा मंदिर’ में सभा की स्थापना के उन शुरूआती वर्षों में फागुन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को, जिसे ‘आँवला एकादशी’ कहा जाता है, गमले में लगाये आँवले के पौधे पर पाँच रंग के कपडों के लंबे टुकड़े बाँध कर और उन पर रंग छिड़क कर होली गायन की शुरूआत होती थी। होल्यार टोली छलड़ी के दिन तक रोज का कार्यक्रम बना कर अपने समाज के गली मोहल्लों में घूमती रहती थी। ढोलक की थाप और चिमटे की झंकार के साथ खड़ी होली के गीत गाकर गले को बिठा देने की हद तक पहुँचा देने वाले सभा निर्माण को समर्पित होल्यारों की टीम एक सांस्कृतिक टीम बनकर समाँ बाँध देती थी और अच्छा आर्थिक सहयोग भी हासिल हो जाता था।
समय गुजरता रहा। बगैर किसी विवाद में फँसे पर्वतीय सभा समाज को बेहतर सेवा देने के लायक बनती चली गई। सभा के संस्थापकों की बनाई होली गायन की परंपरा का वर्तमान में भी सभा संचालकों द्वारा विधिवत होली गायन कर निर्वाह किया जा रहा है। पर्वतीय सभा की होली हालांकि अब थोड़े बदले रूप में होने लगी है। पहले जहाँ घर-घर जाकर धन एकत्र करने के लिए होली गायन होता था, अब होली के सांस्कृतिक पक्ष को जीवंत बनाये रखने के लिए होली गीतों को गा-गा कर होली मनाई जाती है। कुछ वर्षों से छलड़ी से पहले महिला-पुरुषों द्वारा सभा में सामूहिक होली गायन का कार्यक्रम भी अब आयोजित होने लगा है।

































