ईश्वरी दत्त जोशी ’ईश्वर’
इन दिनों उत्तराखंड अपनी स्थापना की रजत जयंती मनाने में मशगूल है। सत्ता पक्ष तथा उसके आनुसांगिक संगठन सरकार की उपलब्धियां गिनाते नहीं थक रहे हैं। उनकी मानें तो उत्तराखंड विकास के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच चुका है। विपक्ष हर सकारात्मक काम को अपना काम बताने में जुटा है।
आंदोलनकारी ताकतें यहां अपनाये गये विकास के मांडल को ही चुनौती दे रही हैं। उनका कहना है, विकास की जिस दिशा मे हम चल पड़े हैं उसने राज्य की मूल अवधारणा को ही समाप्त कर दिया है। आम जनता असमंजस में है। उसके लिए यह तय करना कठिन हो रहा है कि सही क्या है। उसके गांव में तो विकास सड़क लेकर पहुंच ही गया है, यदि गांव की आधी आबादी पहले ही पलायन कर गयी तो उसमें विकास की क्या गल्ती। पानी के नल भी घर घर लग गये हैं, पानी रोज नहीं तो कभी कभार तो आ ही जाता है। जंगली जानवरों के कारण खेती बंजर हो भी गयी तो क्या हुआ, कंट्रोल की दुकान में मुफ्त राशन तो मिल ही रहा है। ऊपर से बिना किसानी किये किसान सम्मान निधि का साल का छः हजार रूपया अलग। परिवार के हर सदस्य के पास मोबाइल आ चुका है, जिसने हर हाथ को दिन-रात काम दे दिया है। राज्य में 2600 सरकारी स्कूल बंद होने से क्या फर्क पड़ता है, उनके गांव में प्राइवेट स्कूल तो खुल ही गया है। सरकारी अस्पताल की बिल्डिंग भी नयी और बड़ी बन गयी है। यह अलग बात है कि प्रसव व अन्य छोटी मोटी बिमारी के मामले भी जिला अस्पताल या उससे आगे रैफर कर दिये जा रहे हैं। लोग सी.एच.सी. के मानकों के अनुसार सुविधाएं मांग रहे हैं तो सरकार उससे कई कदम आगे बड़कर वहां उप जिला चिकित्सालय खोल दे रही है। खैर छोड़िये। यहां हमारा मकसद विकास के इस बहस में पडना नहीं है। आज हम न तो स्थाई राजधानी के सवाल पर बात करेंगे और न ही हेलंग जैसी घटना पर। अंकिता हत्या कांड के वी.आई.पी. का नाम भी आज हम नहीं पूछेंगे और न ही नानीसार या जाॅर्ज एवरेस्ट स्टेट की बात करेंगे। वैसे भी जब पहाड़ियों ने खुद ही अपनी सारी जमीनें बेच दी हैं तो सरकार के बेचने पर क्यों हो हल्ला मचाना। मानव वन्य जीव संघर्ष तो पहाड़ियों की नियति बन चुकी है, इस विषय पर भी क्या बात करना। यहां तो हम सिर्फ अपने गांव ताकुला-बसौली क्षेत्र के दो-चार लोगों की ब्यथा बताना चाहते हैं। जब भी शासन/प्रशासन के नुमाइंदों को रजत जयंती मनाने से फुर्सत मिले, ग्रामीणों के इस दर्द को भी जरूर सुन लें। हो सके तो कोई रास्ता सुझा दें, ताकि वे भी रजत जयंती की खुशी मंे आपके साथ शामिल हो सकें।
एक – 13 जून 2024 को बिनसर में वनाग्नि की भीषण दुर्घटना घटित हुई थी। इस हृदयविदारक घटना में वनाग्नि नियंत्रण करते हुए 6 लोगों की मृत्यु हो गयी, जबकि 2 वन कर्मी गंभीर रूप से घायल हो गये थे। जन दबाव के चलते मृतकों के परिजनों को दैनिक मजदूर के रूप में नियुक्ति तो दे दी गयी, लेकिन सरकार द्वारा उन्हें दस दस लाख रूपये का मुआवजा देने का वादा भुला दिया गया। दुर्घटना के घायलों की तो और भी अधिक अनदेखी की गयी। घायल कैलाश भट्ट 1 सितंबर 1994 से वन विभाग में दैनिक श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं। वह पिछले तीन दशक से वन विभाग में इस उम्मीद के साथ कार्य कर रहे थे कि कभी न कभी उन्हें स्थायी नियुक्ति मिलेगी। उनकी उम्र 55 वर्ष हो चुकी है। अब सेवानिवृत्ति का समय भी नजदीक है। आग की चपेट में आने से उनके हाथ, पैर तथा गला बुरी तरह से झुलस गया, जिस कारण अब वह रोजमर्रा के कार्य भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। बेटा बेरोजगार है। उनके ऊपर पत्नी व बेटा सहित मां के भरण पोषण की जिम्मेदारी है। यही स्थिति दूसरे घायल भगवत सिंह भोज की है, जो वन विभाग में पिछले एक दशक से दैनिक श्रमिक के रूप में वाहन चालक का कार्य कर रहे हैं। वनाग्नि से बुरी तरह झुलस जाने के कारण अब वह वाहन चालक का कार्य भी ठीक से नहीं कर पा रहे हैं। उनके ऊपर भी तीन छोटे छोटे बच्चों सहित पूरे परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी है। दोनों ही घायलों को एम्स दिल्ली में निःशुल्क ईलाज के सिवा अन्य कोई सहायता राशि नहीं मिली। आर्थिक सहायता के नाम पर उन्हें केवल वन कर्मियों द्वारा दिये गये एक दिन का वेतन से सैंतालीस हजार पांच सौ रूपया ही मिला है। दोनों घायलों को प्रत्येक तीन माह में चेकअप हेतु दिल्ली जाना होता है। एक बार जाने में तकरीबन आठ से दस हजार रूपया खर्च आ रहा है, जिसे उन्हें स्वयं वहन करना पड़ रहा है। आर्थिक संकट के चलते वे समय पर जांच भी नहीं करवा पा रहे हैं। स्वयं उनके तथा क्षेत्रीय सामाजिक संगठनों द्वारा वन विभाग एवं जिला प्रशासन से उनके यात्रा ब्यय की व्यवस्था किये जाने की गुहार कई बार लगाई जा चुकी है, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। आज ग्लोबल वार्मिग व क्लाइमेट चैंज देश व दुनिया की प्रमुख चिंता है, लेकिन इसके लिए धरातल पर जान जोखिम में डाल काम करने वाले इन वन कर्मियों के लिए एक अदद टिकट की व्यवस्था करने में भी हम नाकाम हैं।
दो – भेटुली निवासी गोपाल राम अनुसूचित जाति से है, जो बिनसर में एक रिसोर्ट में काम करता है। 7 जुलाई 2024 को हुई अतिवृष्टि के दौरान उसके मकान तथा उससे लगे उनके छोटे भाई हरीश राम के घर के पीछे भूस्खलन होने के कारण मकान को भारी खतरा पैदा हो गया था, जिसकी सूचना तत्काल राजस्व विभाग तथा आपदा कन्ट्रोल रूम में दे दी गयी। राजस्व उप निरीक्षक ने स्थलीय निरीक्षण के बाद अत्यधिक भू धंसाव की स्थिति को देखते हुए भू गर्भीय निरीक्षण को आवश्यक बताया। उन्होंने इस संदर्भ में आवश्यक कार्यवाही हेतु अपनी आख्या 12 जुलाई 2024 को तहसीलदार अल्मोड़ा को सौंप दी। इधर राजस्व उप निरीक्षक की सलाह पर गोपाल राम अपने परिवार सहित गांव में ही अपने चचा मोहन राम के घर चला गया, जबकि उसका छोटा भाई हरीश अपने परिवार को लेकर अपने ससुराल कोट्यूड़ा चला गया। तत्पश्चात् समय समय पर हुई बारिश से भूस्खलन बढ़ता गया और दिनांक 12 सितंबर 2024 को हुई अतिवृष्टि से यह भूस्खलन काफी अधिक हो गया। इस बीच गोपाल राम भूगर्भीय सर्वेक्षण करवाये जाने हेतु विभागों के चक्कर काटता रहा, लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं हुई। सामाजिक संगठनों के दबाव के चलते कहीं जाकर 27 अक्टूबर 2024 को भूतत्व एवं खनिकर्म विभाग द्वारा भूगर्भीय सर्वेक्षण कर आपदा प्रभावित परिवारों को विस्थापन की संस्तुति के साथ अपनी रिपोर्ट उप जिलाधिकारी अल्मोड़ा को सौंप दी।
भू गर्भ वैज्ञानिक द्वारा यह भूमि आवाश योग्य न बताये जाने के बाद गोपाल राम पूरी तरह भूमिहीन हो गया। सन् 1970 में उसके दादा को सरकार द्वारा 01 नाली (.02हेक्टेयर) भूमि ग्रांट द्वारा उपलब्ध कराई गयी थी, जिसमें वर्तमान में अब उसके चचा, भाई सहित 04 परिवार अपना अपना मकान बनाकर रह रहे हैं। भूमि उपलब्ध कराये जाने हेतु गोपाल राम द्वारा जिला प्रशासन के कई चक्कर लगाये जा चुके हैं, लेकिन उन्हें मकान के लायक भूमि नहीं मिल पाई। उसने गांव में भूमि खरीदनी चाही। सवर्ण परिवार उसे भूमि देने को तैयार नहीं थे और दलितों के पास अपने लिए ही भूमि नहीं। एक दलित परिवार भूमि बेचने को तैयार हुआ तो पता चला वह बेनाप भूमि है। आखिर थक हार कर गोपाल राम व उसका भाई हरीश अपने अपने परिवारों के साथ फिर से अपने उसी पुराने मकान में रहने लगे हैं, जहां न रहने की राजस्व विभाग की सलाह पर वह उसे छोड़ गये थे। अब हर पल भय की आशंका में जी रहे इन परिवारों की सुनने वाला कोई नहीं है।
तीन – पनेरगांव निवासी कीड़ी देवी का आवासीय मकान 17 अक्टूबर 2025 को भरभराकर गिर गया। गोठ में बंधी गाय दबकर मर गयी। गनीमत रही दिन का समय होने के कारण परिवार के सदस्य घर से बाहर थे, जिससे जन हानि होने से बच गयी। घटना की सूचना तत्काल राजस्व विभाग तथा आपदा कंट्रोल रूम में दी गयी। राजस्व उप निरीक्षक द्वारा स्थलीय जांच की गयी। मृत गाय का मेडिकल करा लिया गया। जब आर्थिक सहायता की बात आई तो उसे बताया गया कि घटना के दिन न तो बारिश हुई थी और न ही भूकंप आया था इसलिए आपदा राहत के मानकानुसार उसे कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल सकती। मकान पुराना व जीर्णक्षीर्ण हो चुका था। आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि वह मकान की मरम्मत कर पाती। कीड़ी देवी अनुसूचित जाति की काफी गरीब महिला है। परिवार में बेटा, बहू सहित 03 नाती-पोते हैं। बेेटा मजदूरी करता है, वह भी नियमित नहीं मिलती। आवास की मांग ग्राम पंचायत में की थी, लेकिन नहीं मिल पाया। इस वर्ष सरकार द्वारा कराई गयी आवास विहीन परिवारों की सर्वे के दौरान उसके परिवार का भी सर्वे किया गया था, लेकिन पता चला कि जारी आवास विहीनों की सूची में भी उसका नाम शामिल नहीं है, जबकि मकान टूटने के बाद उसका परिवार पड़ोसी के घर शरण लिए हुए है।
चार – बीना देवी डोटियालगांव में रहती है। वह अनुसूचित जाति की गरीब महिला है। गत वर्ष अतिवृष्टि से उसका मकान ढह गया। राजस्व उपनिरीक्षक ने स्थलीय निरीक्षण में पाया कि उसका मकान बेनाप भूमि में बना है। इस कारण उसे कोई आर्थिक सहायता नहीं मिल पाई। वह भूमिहीन है। साथ में भतीजी रहती है। भतीजी के तीन बच्चे है। जमीन नाम पर न होने के कारण बच्चों के स्थाई निवास प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहे हैं। जिस कारण उन्हें छात्रवृत्ति व अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
उक्त घटनांए सिर्फ चार घटनाएं नहीं हैं, बल्कि पहाड़ के उन हजारों लोगों की जीवन से जुड़ी हैं, जो उन नीतियों की मार झेल रहे हैं, जिनका हल पाने की उम्मीद में ही पृथक राज्य की लड़ाई गयी थी। रजत जयंती वर्ष में तो इनकी सुन लीजिए सरकार।





























