राजीव लोचन साह
6 अक्टूबर को भारत की न्यायपालिका के इतिहास में एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, जब एक व्यक्ति ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की कोशिश की। 71 वर्षीय एडवोकेट राकेश किशोर को मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी ‘सनातन धर्म का अपमान’ लगी थी। मगर इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण यह हुआ कि मीडिया और सोशल मीडिया के एक बड़े तबके में इस अपराधी को हीरो बनाने की कोशिश की जाने लगी। न्यायमूर्ति बी. आर. गवई जन्मना दलित हैं और कुछ इस तरह के वीडियो भी सामने आये, जिनमें उनके दलित होने की खिल्ली उड़ायी गई थी। एक वीडियो में तो गवई साहब को गले में मिट्टी की हाँडी टाँगे दिखाया गया था। पिछली सदियों में महाराष्ट्र में किसी दलित व्यक्ति की पहचान के लिये उसे गले में हाँडी टाँगना अनिवार्य होता था। चिन्ताजनक बात यह है कि पुलिस ने इस मामले में अब तक कोई कार्रवाही नहीं की है। काँवड़ यात्रा में जाने से ज्यादा ध्यान ज्ञान-विज्ञान में लगाने का आग्रह करने वाली एक कविता लिखने पर एक अध्यापक पर ‘धार्मिक भावनायें आहत होने’ का मुकदमा दर्ज कर लेने वाली पुलिस को न तो न्यायालय की अवमानना कुछ गलत लगी और न दलितों के बारे में अनर्गल प्रलाप। यह ठीक है कि न्यायमूर्ति गवई ने बड़प्पन दिखाते हुए दोषी व्यक्ति पर कार्रवाही न करने का आग्रह किया था। मगर इससे पुलिस की जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। न्यायपालिका का अपमान एक बड़ा अपराध है और अनुसूचित जाति के व्यक्ति का अपमान तो भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत अपराध है ही। जब यह अपराध देश के इतने बड़े सांवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का किया जाये तो उसकी गुरुता और अधिक भीषण हो जाती है। यह सनातन को ठेस पहुँचने वाला मामला भी बेहद चिन्ताजनक हो गया है। आज के दौर में अब यह कल्पना करना भी कठिन है कि कभी हिन्दू धर्म में नास्तिकता को भी पूरी मान्यता थी और देवी-देवताओं के बारे में भी खुल कर विचार-विमर्श किया जा सकता था।

































