राजीव लोचन साह
गणतंत्र के 76 सालों में देश ने अनेक तरह के संकट देखे। बाहरी आक्रमण झेले, अन्दरूनी उलझनें सुलझायीं और देश कभी तेज तो कभी धीमी रफ्तार से अपने रास्ते पर आगे बढ़ता गया। मगर एक असंतोष का भाव हमेशा बना रहा कि जब हम आकाश की ऊँचाइयाँ छूने लगे हैं, समुद्र की गहराइयों तक गोते लगा सकते हैं, तब हम कतार के आखिरी आदमी को उसका न्यूनतम क्यों नहीं दे पा रहे हैं ? क्यों देश की सारी सम्पत्ति कुछ प्रतिशत लोगों के हाथ में सिमटती जा रही है और क्यों आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को बुनियादी सहूलियतें भी नहीं मिल पा रही हैं ? यह शिकायत आज भी बनी हुई है। मगर अब कुछ अन्य चिन्तायें भी सर उठाने लगी हैं। इधर हम देख रहे हैं कि धार्मिक असहिष्णुता बहुत तेजी से बढ़ रही है। देश का सबसे बड़ा धार्मिक समूह इस गलतफहमी में आ गया है कि यह देश उसकी मनमर्जी के अनुसार चलना चाहिये। उसका धर्म ही देश का एकमात्र धर्म है। जो इस धर्म को नहीं मानता, उसे देश में रहने का हक नहीं है। या उसे अगर इस देश में रहना है तो वह बहुसंख्यक धर्मावलम्बियों की इच्छानुसार रहेगा, उनका दबैल बन कर रहेगा। यह गलतफहमी क्यों आयी और क्यों दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, यह हाल के सालों में बहुत बड़ी चिन्ता का विषय बन गया है। 76 वर्ष पहले हमारे पूर्वजों ने जो संविधान अंगीकृत किया था, उसमें स्पष्ट लिखा गया था कि देश के हर नागरिक को अपने धर्म के अनुसार उपासना का अधिकार है। पाठ्य पुस्तकों में यही पढ़ाया जाता है, ताकि हर बच्चा इस तथ्य से परिचित हो जाये। सारे कानून इसी आधार पर बनाये जाते हैं, ताकि संविधान की इस मूल भावना का अनादर न हो। मगर आज व्यवहार में न यह शिक्षा काम आ रही है और न ये कानून। पाठ्य पुस्तकों में पंथ निरपेक्षता का पाठ पढ़े लोग क्रिस्मस पर गिरिजाघरों के आगे हनुमानचालीसा पढ़ने चले जाते हैं। संविधान की शपथ लेने वाले अधिकारी मजारों पर बुलडोजर चलाने लगते हैं। 76 साल बाद संविधान अनाथ हो गया है।

































