कप्तान सिंह
पुरोला की घटना बताती है कि किसी भी समाज को अपने वर्तमान तथा उस में चल रही गतिविधियों की पड़ताल करनी ही चाहिये।
लेकिन किसी समाज की यह पड़ताल जब उसकी परंपराओं और इतिहास के बिल्कुल विपरीत हो तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि कैसे प्रगतिशील रंवाई घाटी में नागरिक चेतना इस कदर कुंद हो नफरत में बदल गई। कौन हैं वह जिन्होंने इस घाटी, जिसका पूर्व में ब्रिटिश रियासत, टिहरी रियासत के विरुद्ध जनता के बुनियादी सवालों पर आधा दर्जन से अधिक ढंडको (विद्रोह) का इतिहास रहा है। कैसे वह प्रगतिशील समाज आज सब कुछ भूल कर व्यक्ति के धर्म की पड़ताल कर रहा है, और सिर्फ़ धर्म के आधार पर ही अपना भविष्य तय करने पर तुला हुआ है, क्या यह उन्मादी तत्व उस घाटी की वास्तविक आवाज हैं।
रंवाई घाटी की पहचान 30 मई 1930 को अपनी मूलभूत समस्या चारा-पत्ती और घास के लिए तिलाड़ी कांड की शहादत का रहा है। तिलाड़ी से भी पहले 1824-25 में जब नागरिक चेतना के सवाल पर अंग्रेज क्षेत्र को नियंत्रित नहीं कर पाए तो तो उन्होंने इस पूरे क्षेत्र को दोबारा से टिहरी रियासत को सौंप दिया, जहां गोविंद सिंह बिष्ट ने परंपरागत हक-हकूक के लिए टिहरी रियासत से बगावत जारी रखी टिहरी रियासत में उन्हें थोकदार नामित कर क्षेत्र को शांत करने का प्रयास किया। उसके बाद 1882 में लछमू कठैत ने काफिला-बिशाह ढंडक के माध्यम से राजा के चौपाथा कर का विरोध कर उन्हें दो पाथा करने के लिए विवश किया। 1892-93 में जब टिहरी रियासत में जंगलात की पैमाइश के नाम पर इस घाटी में ग्रामीणों से दुर्व्यवहार किया गया तो एक बड़े जन आंदोलन की यहां शुरुआत हुई टिहरी रियासत को जंगलात की पैमाइश का कार्य रोकना पड़ा।
पुरोला अर्थात जिस यमुना घाटी का इतिहास नागरिक चेतना से भरा हुआ है। वह घाटी आज कैसे सिर्फ धर्म के नाम पर विभेद करने पर आमादा है, कैसे एक अपराध में सह अभियुक्त सचिन सैनी के धर्म को छुपा कर दूसरे अभियुक्त के धर्म को उभार कर लव जिहाद के नाम पर घाटी की शांति और प्रगतिशील इतिहास को झुठला रही है।
पुरोला घाटी जहां नागरिक चेतना और तर्क हमेशा से विद्यमान रहा उस घाटी में आखिर कैसे नफरत का बीज और उसकी फसल इतनी फल फूल गई कि वह कानून के शासन और कानून की प्रक्रिया को भी धता बताने पर आमादा है।
आज पुरोला का संदर्भ पूरे उत्तराखंड के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड देश में नागरिक चेतना की भूमि रही है। यहां 1905 के बाद देश में सबसे पहले जंगल पर अधिकार के लिए बन आंदोलन की शुरुआत हुई, यह उत्तराखंड ही है, जहां 1921 में अंग्रेजों की बेगार प्रथा के विरुद्ध सबसे पहले सरयू के तट पर संगठित कुली बेगार के आंदोलन ने जन्म लिया।
उत्तराखंड का इतिहास सहृदयता और सहिष्णुता का इतिहास रहा है, उत्तराखंड के समाज में किसी भी प्रकार के दकियानूसी विचार और नफरत के लिए स्थान नहीं रहा है। प्रेम जो प्रकृति का उपहार है. इसे भी उत्तराखंड ने कभी धर्म और जाति के बंधनों में बांधने की कोशिश नहीं की, इसी का परिणाम है कि अल्मोड़ा की इसाई महिला आयरीन पंत ने पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली खान के साथ बीसवीं सदी के प्रारंभ में ही प्रेम विवाह किया और पूरी दुनिया में पहचानी गई। यह नहीं अंर्तजाति, अंर्तधर्म प्रेम विवाह का उत्तराखंड का पुराना इतिहास है। 1961 में प्रसिद्ध लोक कलाकार मोहन उप्रेती और नईमा खां उप्रेती के प्रेम विवाह को भी समाज ने सहजता के साथ स्वीकार किया। विवाह के उपरांत समाज के लिए किए गए उनके योगदान से भी हम सब परिचित हैं।
यहां अंतर धार्मिक प्रेम विवाह की पैरवी करने का प्रयोजन नहीं है, लेकिन यह पक्ष विचारणीय है कि हमारा समाज जो पूर्व से उदार और तर्कशील रहा है, अचानक कैसे इतना कबीलाई हो गया कि उसे मनुष्य की स्वाभाविक स्वच्छंदता से भी बैर हो गया।
यह सब अचानक हो गया या इसके पीछे कोई संगठित राजनीतिक षडयंत्र है इसका पता किया जाना चाहिये ?
कुल मिलाकर उत्तराखंड के समाज में जिस लव जिहाद से आज भारत में उत्तराखंड की चर्चा हो रही है वह निश्चित रूप से हमारी परंपरा नहीं है। हम नागरिक चेतना से समृद्ध समाज रहे हैं। कानून के शासन और कानून का सम्मान करते रहे हैं।
यदि किसी व्यक्ति द्वारा अपराध किया गया है तो उसे निश्चित रूप से देश के स्थापित कानून से प्रक्रिया सम्मत तरीके से दंडित किया जाना चाहिए लेकिन इस प्रकार एक अपराधी को छोड़ उसके पूरे समाज को चिन्हित करने की जो प्रवृत्ति उभर रही है जिसके आगे चेतना और तर्क विलुप्त हो गया है वह सब बड़ा संकट है। इसे यूं ही एक घटना समझकर भुलाया नहीं जा सकता है।
जागरूक समाज के जो भी सदस्य उत्तराखंड में धार्मिक आधार पर बढ़ रहे इस उन्माद और नफरत से चिंतित हैं, उन्हें सिर्फ चिंता से आगे निकलकर मुखर भी होना पड़ेगा और उत्तराखंड के भविष्य के लिए संगठित होकर संविधान सम्मत संघर्ष भी करना होगा तभी हम अपनी गौरवशाली परंपरा को संरक्षित रख सकते हैं।

































