ब्रजमोहन जोशी
उत्तराखण्ड में एक ही त्यौहार भिन्न-भिन्न स्थानों मेें भिन्न-भिन्न स्वरूप ग्रहण कर लेता है। ऐसा ही महापर्व दीपावली के साथ भी हैै। उत्तराखण्ड के कुमाऊँ अंचल में दीपावली का त्यौहार अपने आप में बहुत अधिक विविधता समेटे हुए हैैै। इसका स्वरूप देश भर में मनाई जाने वाली दीपावली से तो भिन्न है, परन्तु देश के कु्र्र्र्रछ अन्य क्षेत्रों से कुछ मामलों में अद्भुत साम्यता भी देखने को मिलती हैै। यह त्यौहार कुमाऊँ में भिन्न-भिन्न रूपों में लगभग एक माह तक मनाया जाता है।
दिवाई (दीपावली) मनाने का कुमाऊँ अंचल में अपना अलग ही ढंग है। कार्तिक मास को ‘दीप पर्व’ कहा जाता है और एकादशी को ‘राम एकादशी’ कहा जाता है। कार्तिक मास में कोजागरी (नानि दिवालि) से हरिबोध्निी (टकटकु) एकादशी तक आंगन में अगासदिया (आकाश दीप) जलाया जाता है, जिसे हवा से बचाने के लिये चारों ओर से लाल वस्त्र से घेर दिया जाता हैै। कोजागरी (शरद पूर्णिमा) से ‘दिवाई’ का आगाज हो जाता है। किन्तु अब कई जगहों पर आकाश दीप का स्थान जीरो वाट के बल्ब ने ले लिया है।
बुजुर्गो के अनुसार दीपावली का पर्व महालक्ष्मी की तीन अवस्थाओं को इंगित करती हैै। 1, नानि दिवाई (कोजागरी या शरद पूर्णिमा) बाल अवस्था; 2, ठुलि दिवाई (महालक्ष्मी पूजन) यौवनावस्था और 3, बुढ़ि दिवाई (हरिबोधिनी एकादशी या टकटकु एकादशी) वृद्धावस्था।
लक्ष्मी पूजन का सम्बन्ध आत्मा से जोड़ा गया है। हमारे पूर्वजों ने इसे रुपये-पैसे की पूजा तक ही सीमित नहीं रखा। गाय-बैल का महत्व उनके लिये रुपये-पैसे से अधिक रहा। क्योंकि गोधन उनकी खेती का प्राण है, इसलिये गाय-बैलों का पूजन सर्वप्रथम किया जाता हैै। गोधन का त्योहार सचमुच हमारी सांस्कृतिक परम्परा का द्योतक है। गांव के युवक रात्रि में एक स्थान में एकत्र हो कर, हाथों में मशाल अथवा ‘छिलुक’ (रांख) ले कर विभिन्न प्रकार के करतब करते हैं तथा हुड़के की थाप पर उनमुक्त हो कर नाचते गाते हुए गांव के सभी घरोें में जाते हैं।
‘बग्वाई‘ को दीपावली कहने का प्रचलन मैदानी भागों से आए आप्रवासीजनोें के संसर्ग से हुआ। बग्वाई या बग्वाल शब्द का अर्थ है, पाषाण वर्षा। पर्वतीय योद्धा इस दिन से बग्वाल यानी पाषाण युद्ध का अभ्यास किया करते थे। इसलिए इसे बग्वाई कहा जाने लगा।
करवाचैथ (कार्तिक कृष्ण चतुर्थी) का व्रत देश में अन्यत्र हिन्दू स्त्रियों के लिये अखण्ड सुहाग देने वाला माना जाता है। जबकि हमारे पर्वतीय अंचल में महिलाएं ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन अखण्ड सुहाग की कामना के साथ ‘बट सावित्री’ का व्रत करती हेैं।
पहले दीप मालाओं का प्रचलन यहां नहीें था। गांवों में घर के बाहर आंगन में ‘खोई’ (दरवाजे) पर तथा छत की दन्यारी (किनारोें) व कार्नसों पर छिलुक (चीड़ की तेजी से जलने वाली लीसायुक्त लकड़ी) व ‘लिख’ (बिरोजा) पंक्तियोें में रख दिया जाता था। इस प्रकाश से सारा वातावरण एक सुंदर व सलोना रूप ले लेता था। घर के भोजन कक्ष में, मंदिर में, आंगन में, पटांगण में, पनाण (बर्तन साफ करने का स्थान) में, खल, ओखल, नौले, देवताओेें के थान में, गोठ में, तुलसी थान में, चौराहे आदि में दीपक जलाये जाते थे। उन दिनों पहाड़ी घरों की शोभा देखते ही बनती थी। वर्तमान में दीपक का स्थान बिजली की मालाओं व मोमबत्ती की रोशनी ने ले लिया है।
टीका (भैया दूज) इस दिन हरेले के बजाय ‘च्यूड़ा’ सर में धारण किया जाता है। यह च्यूड़ा नई फसल के धानों से बनाया जाता है। इस दिन भाई बहनोें के घर जाते हैं। भैया दूज को ‘बग्वाली का त्यार‘ या ‘दुतिया का त्यार’ कहा जाता है। यह टीका रक्षा बन्धन का ही मिलता जुलता रूप है।
दीपावली पर विभिन्न स्थानों को सजाने के लिये उपयोग में लाये जाने वाले एपणों में देली एपण, लछिमी-पौ, लक्ष्मी चैकी, कांसे की थाली में लक्ष्मी अंकन, छाजला (सूप) के अग्र भाग में व पृष्ठ भाग में अंकन, भुईयां चैकी का अंकन, लक्ष्मी-पट्टा, गोवर्धन का पट्टा, ओखल व तुलसी के थान में ऐपण दिये जाते हैं। बाजार की सहूलियत के कारण अब ऐपणों का स्थान स्टिकरों ने ले लिया है।
कुमाऊँ के अधिकांश ग्रामीण क्षेत्रों में महालक्ष्मी के रूप में रिक्खू यानी गन्ने की पूजा की जाती है। परन्तु शहरों में गन्ने की पूजा कलात्मक रूप ले लेती है। गन्ने से लक्ष्मी का निर्माण किया जाता है तथा चूँकि लक्ष्मी का सम्बन्ध धन-सम्पत्ति से है अतः इसे घूँघट में छिपा कर रखा जाता है। यह भी कहा जा सकता है कि महालक्ष्मी की पूजा नारी रूप में की जाती हैं और लज्जा नारी का गहना है, इस कारण भी वह घूंघट में रहती हैं। वर्तमान में लक्ष्मी जी की मूर्ति में बने बनाए मुखौटों का प्रयोग किया जाने लगा हैं।
हरिबोधिनी एकादशी को यहाँ टकटकु एकादशी अथवा बूढ़ी दीपावली कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन भगवान विष्णु निद्रा से जागे थे। इस दिन घर की महिलाएं प्रातःकाल 4 बजे पूजन करती हैं और अपने-अपने घरों से अलक्ष्मी या दरिद्रता भगाने के लिये सूपे मेेें खील, बतासे, खिलौने, अखरोट, दाड़िम आदि रखकर गन्ने के टुकड़े से उसे पीटकर घर के कोने-कोने में जाती हैं तथा घर के पिछवाड़े में बने ओखल में विसर्जित कर देती हैं। यह पूजन को करते समय वे गाती हैं ‘‘आओ लक्ष्मी बैठो नरैणा, निकल भुईयां-निकल भुईया।’’ इन पंक्तियोें को गाते हुए महिलाएं लक्ष्मी और नारायण से बैठने का आग्रह करती हैं और दरिद्रता से दूर भागने को कहती हैं, उसका अनादर करती हैं।
इस प्रकार कुमाऊँ में लगभग एक माह तक मनाए जाने वाले इस प्रकाश पर्व के अनेक रूप हमें देखने को मिलते हैं। कुमाउनी लोक-कला के अनेक पक्ष भी हमें इस त्योहार में दृष्टिगोचर होते हैं। इसका मूल कारण इन पर्वों, त्योहारों और उत्सवों के प्रति यहां के निवासियों की पूर्ण आस्था व विश्वास का होना भी है।

































