(कश्मीर के पहलगाम की घटना ने ऐसा स्तब्ध किया कि हम पत्रकारिता करना भी भूल गये। तब कोई सक्रिय कलमकार नजदीक न होने के कारण GROK को ही जिम्मा सौंपा। हमारा प्रश्न और कश्मीर में आतंकवादी हमला, गोदी मीडिया और GROK का विश्लेषण का उत्तर हम यहाँ अविकल रूप से प्रकाशित कर रहे हैं। –सम्पादक।)
हे GROK, पहलगाम में पाक समर्थित आतंकवादियों द्वारा निर्दोष पर्यटकों की जघन्य हत्या पर भारत के गोदी मीडिया की दृष्टि किस तरह की रही ? कितने टी.वी. चैनलों और अखबारों ने ‘धर्म पूछ कर गोली मारी‘ वाले नैरेटिव को प्राथमिकता दी और कितनों ने कश्मीर के अवाम द्वारा स्वतःस्फूर्त ढंग से शोक प्रकट करने, बाजार बन्द करने, पर्यटकों की जान बचाने और उनकी हर संभव मदद करने जैसी घटनाओं को ज्यादा महत्व दिया? आपकी नजर में ऐसे राष्ट्रीय संकट के वक्त मीडिया को कैसा व्यवहार करना चाहिए? बगैर हिचकिचाहट के विस्तार से अपनी राय दीजिये.
पहलगाम आतंकी हमले (22 अप्रैल, 2025) के बाद भारतीय मीडिया की कवरेज एक जटिल और ध्रुवीकृत तस्वीर प्रस्तुत करती है। इस हमले में 26-28 पर्यटकों की हत्या हुई, जिसमें आतंकियों ने कथित तौर पर धर्म पूछकर निशाना बनाया, और इसकी जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े द रेजिस्टेंस फ्रंट ने ली। मैं आपके प्रश्न के तीनों हिस्सों को क्रमबद्ध तरीके से संबोधित करूंगा। गोदी मीडिया की दृष्टि, ‘धर्म पूछकर गोली मारी’ नैरेटिव को प्राथमिकता देने वाले चैनलों, अखबारों की संख्या बनाम कश्मीरी अवाम के सकारात्मक योगदान को उजागर करने वालों की संख्या, और राष्ट्रीय संकट में मीडिया के आदर्श व्यवहार पर मेरी राय।
1. गोदी मीडिया की दृष्टि
‘गोदी मीडिया’ शब्द का इस्तेमाल अक्सर उन मीडिया संस्थानों के लिए किया जाता है, जो सरकार या सत्तारूढ़ दल के प्रति पक्षपातपूर्ण रुख अपनाते हैं। पहलगाम हमले की कवरेज में, कुछ प्रमुख टीवी चैनलों और अखबारों ने इस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की, जिसे एक्स पर कई यूजर्स ने ‘हिंदू-मुसलमान’ नैरेटिव के रूप में आलोचना की।
सांप्रदायिक नैरेटिव पर जोर: कई चैनलों और अखबारों ने ‘धर्म पूछकर गोली मारी’ को अपनी हेडलाइंस और डिबेट्स का केंद्र बनाया। उदाहरण के लिए, आज तक ने अपनी रिपोर्टिंग में आतंकियों द्वारा हिंदुओं को निशाना बनाने के दावे को प्रमुखता दी, और एंकर मीनाक्षी जोशी ने इस कोण को अपने सेगमेंट में हाइलाइट किया। इसी तरह, नवभारत टाइम्स ने अपने लेख में आतंकियों द्वारा धर्म पूछकर हत्या करने और हिंदू पहचान की जांच (जैसे पैंट उतारना) पर जोर दिया।
पाकिस्तान पर आरोप: गोदी मीडिया ने हमले के लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज तक, इंडिया टीवी, और प्रभात खबर जैसे आउटलेट्स ने इसे पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के रूप में चित्रित किया, हालांकि कुछ ने सबूतों की कमी की ओर इशारा किया।
सनसनीखेज कवरेज: कुछ चैनलों ने वायरल वीडियो और पीड़ितों की दर्दनाक कहानियों (जैसे नवविवाहित जोड़े की तस्वीर) को सनसनीखेज ढंग से पेश किया, जिससे भावनात्मक उत्तेजना बढ़ी।
हालांकि, सभी मीडिया संस्थानों ने इस दृष्टिकोण को नहीं अपनाया। कुछ ने तथ्यात्मक और संतुलित कवरेज की कोशिश की, जिसे मैं अगले हिस्से में विस्तार से बताऊंगा।
2. ‘धर्म पूछकर गोली मारी’ बनाम कश्मीरी अवाम के सकारात्मक योगदान को प्राथमिकता
मैंने उपलब्ध स्रोतों और एक्स पोस्ट्स के आधार पर प्रमुख टीवी चैनलों और अखबारों की कवरेज का विश्लेषण किया। नीचे दोनों नैरेटिव्स को अपनाने वाले आउटलेट्स की सूची और तुलना दी गई है। ध्यान दें कि कुछ आउटलेट्स ने दोनों पहलुओं को कवर किया, लेकिन प्राथमिकता अलग-अलग थी।
‘धर्म पूछकर गोली मारी’ नैरेटिव को प्राथमिकता देने वाले टीवी चैनल:
आज तक: इसने ‘हिंदू-मुसलमान’ कोण को हाइलाइट किया और आतंकियों द्वारा धर्म पूछने की खबर को प्रमुखता दी। इंडिया टीवी: धर्म आधारित हत्याओं और पाकिस्तानी कनेक्शन पर फोकस। न्यूज 18 हिंदी: आतंकियों द्वारा कलमा पढ़वाने और पैंट उतारने की खबरों को विस्तार से कवर किया। एबीपी न्यूज: पीड़ितों के परिवारों की कहानियों के साथ धर्म आधारित हमले को उजागर किया। टोटल टीवी: आतंकियों द्वारा मजहब पूछकर गोली मारने और सैन्य वर्दी पहनने की खबर पर जोर।
अखबार-वेबसाइट:
नवभारत टाइम्स: धर्म पूछकर हत्या और हिंदू पहचान की जांच पर केंद्रित लेख। आज तक (वेबसाइट): आतंकियों द्वारा हिंदुओं को निशाना बनाने और GoPro कैमरों का इस्तेमाल करने की खबर। प्रभात खबर: ‘कश्मीर से हिंदुओं का पलायन पार्ट-2’ जैसे सांप्रदायिक सवाल उठाए। इंडिया न्यूज: आतंकियों की तस्वीरों के साथ हिंदुओं की पैंट खोलने की खबर को सनसनीखेज बनाया। मनी कंट्रोल: कलमा पढ़वाने और ID चेक करने की खबर पर फोकस।
कुल: कम से कम 5 टीवी चैनल और 5 अखबार-वेबसाइट ने इस नैरेटिव को प्राथमिकता दी।
कश्मीरी अवाम के सकारात्मक योगदान को प्राथमिकता देने वाले:
टीवी चैनल: द हिंदू (वेबसाइट, टीवी कवरेज का उल्लेख नहीं): TRF के दावे और NIA जांच पर ध्यान, सांप्रदायिक कोण से परहेज।
अल जजीरा (अंतरराष्ट्रीय, हिंदी में उपलब्ध): आतंकवादी हमले और वैश्विक प्रतिक्रियाओं पर फोकस, कश्मीरी अवाम के शोक और मदद को उजागर किया।
अखबार-वेबसाइट:
हिंदी न्यूज18: कश्मीर घाटी में 35 साल बाद बाजार बंद होने और हर वर्ग के समर्थन को प्रमुखता दी। वन इंडिया: स्थानीय लोगों द्वारा घायलों को पोनी पर अस्पताल पहुंचाने और कश्मीरी अवाम के शोक को हाइलाइट किया।
जागरण: आतंकी हमले के विरोध में विभिन्न संगठनों द्वारा बंद के आह्वान और स्थानीय समर्थन पर जोर।
बीबीसी हिंदी: कश्मीरी लोगों के दुख और मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के बयान को प्रमुखता दी।
कुलरू कम से कम 2 टीवी चैनल (या उनके संबद्ध वेबसाइट) और 4 अखबार/बसाइट ने कश्मीरी अवाम के सकारात्मक योगदान को प्राथमिकता दी।
तुलना और विश्लेषण:
प्रमुखता: ‘धर्म पूछकर गोली मारी’ नैरेटिव को अधिक टीवी चैनलों और अखबारों ने प्राथमिकता दी, खासकर गोदी मीडिया से जुड़े आउटलेट्स ने। यह नैरेटिव सनसनीखेज और भावनात्मक रूप से उत्तेजक था, जिसने टीआरपी और क्लिक्स बढ़ाने में मदद की। दूसरी ओर, कश्मीरी अवाम के सकारात्मक योगदान को कम आउटलेट्स ने कवर किया, और यह कवरेज मुख्य रूप से लिखित मीडिया (वेबसाइट्स-अखबार) तक सीमित रही।
संतुलन की कमी: कुछ आउटलेट्स (जैसे आज तक, इंडिया टीवी) ने दोनों पहलुओं को छुआ, लेकिन धर्म आधारित नैरेटिव को ज्यादा समय और हेडलाइंस दीं। वहीं, द हिंदू और अल जजीरा जैसे आउटलेट्स ने सांप्रदायिक कोण से बचते हुए तथ्यात्मक रिपोर्टिंग की।
एक्स पर प्रतिक्रियाएं: एक्स यूजर्स ने गोदी मीडिया की आलोचना की, यह दावा करते हुए कि वे इस्लामोफोबिया को बढ़ावा दे रहे हैं और समाज को बांटने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ ने स्थानीय कश्मीरियों के शोक और मदद को नजरअंदाज करने पर नाराजगी जताई।
3. राष्ट्रीय संकट में मीडिया का आदर्श व्यवहार: मेरी राय
राष्ट्रीय संकट, जैसे पहलगाम आतंकी हमला, में मीडिया की भूमिका समाज को एकजुट करने, सटीक जानकारी देने, और रचनात्मक संवाद को बढ़ावा देने की होनी चाहिए। मेरा मानना है कि मीडिया को निम्नलिखित सिद्धांतों का पालन करना चाहिए:
तथ्यात्मक और संतुलित रिपोर्टिंग:
मीडिया को केवल सत्यापित जानकारी साझा करनी चाहिए। पहलगाम हमले में, आतंकियों द्वारा धर्म पूछने की खबरें चश्मदीदों और सूत्रों पर आधारित थीं, लेकिन कुछ आउटलेट्स ने इसे बिना पुष्टि के सनसनीखेज बना दिया। ऐसी स्थिति में, मीडिया को NIA जांच जैसे ठोस तथ्यों पर फोकस करना चाहिए।
सांप्रदायिक कोण को बढ़ावा देने से बचना चाहिए। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, और इसे हिंदू-मुसलमान के चश्मे से देखना समाज में विभाजन पैदा करता है, जैसा कि एक्स पर कई यूजर्स ने बताया।
जिम्मेदार नैरेटिव निर्माण:
आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता दिखाने के लिए, मीडिया को कश्मीरी अवाम के सकारात्मक योगदान (जैसे बाजार बंद, घायलों की मदद) को प्रमुखता देनी चाहिए। इससे कश्मीरियों के प्रति विश्वास बढ़ता है और अलगाव की भावना कम होती है।
सनसनीखेज हेडलाइंस और वायरल वीडियो का अंधाधुंध इस्तेमाल करने से बचना चाहिए, क्योंकि यह भय और गुस्से को बढ़ाता है, जैसा कि नवभारत टाइम्स और इंडिया न्यूज की कवरेज में देखा गया।
राष्ट्रीय एकता को प्राथमिकता:
पहलगाम हमला भारत की संप्रभुता और एकता पर हमला था, न कि किसी एक धर्म पर। मीडिया को इसे राष्ट्रीय त्रासदी के रूप में पेश करना चाहिए, जैसा कि राहुल गांधी और राष्ट्रपति मुर्मू ने अपने बयानों में किया।
कश्मीर के स्थानीय लोगों को दुश्मन के रूप में चित्रित करने के बजाय, उनके दुख और एकजुटता को दिखाना चाहिए। उदाहरण के लिए, 35 साल में पहली बार कश्मीर घाटी में बाजार बंद होना एक ऐतिहासिक कदम था, जिसे अधिक कवरेज मिलनी चाहिए थी।
आतंकवाद के मूल कारणों पर चर्चा:
मीडिया को आतंकवाद के सामाजिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक कारणों पर गंभीर चर्चा करनी चाहिए। उदाहरण के लिए, नवभारत टाइम्स ने सवाल उठाया कि क्या यह हमला पाकिस्तान की रणनीति का हिस्सा था, लेकिन ऐसी चर्चा तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, न कि अनुमानों पर। कश्मीर में लोकतांत्रिक व्यवस्था और पर्यटन के बढ़ने जैसे सकारात्मक पहलुओं को भी उजागर करना चाहिए, ताकि यह संदेश जाए कि आतंकवाद स्थानीय विकास के खिलाफ है।
संवेदनशीलता और नैतिकता:
पीड़ितों की तस्वीरों और वीडियो का इस्तेमाल संवेदनशीलता के साथ करना चाहिए। नवविवाहित दुल्हन की तस्वीर को बार-बार वायरल करना (जैसा कि नवभारत टाइम्स और आज तक ने किया) पीड़ितों के परिवारों के लिए अतिरिक्त दुख का कारण बन सकता है।
आतंकियों की तस्वीरों या GoPro फुटेज को ग्लोरिफाई करने से बचना चाहिए, क्योंकि यह उनके प्रचार को बढ़ावा दे सकता है।
वैश्विक और स्थानीय संदर्भ:
विश्व नेताओं (जैसे डोनाल्ड ट्रम्प, व्लादिमीर पुतिन) की एकजुटता और वैश्विक मीडिया (जैसे बीबीसी, अल जजीरा) की कवरेज को शामिल करना चाहिए, ताकि यह दिखे कि यह हमला वैश्विक स्तर पर निंदनीय है। स्थानीय नेताओं (जैसे उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती) और संगठनों (जैसे नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी) के बयानों को प्रमुखता देनी चाहिए, जो एकजुटता और शांति की अपील कर रहे थे।
मेरी स्पष्ट राय:
पहलगाम हमले की कवरेज में गोदी मीडिया ने ज्यादातर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सनसनीखेज नैरेटिव को बढ़ावा दिया, जो राष्ट्रीय संकट में गैर-जिम्मेदाराना है। यह देखकर निराशा हुई कि कश्मीरी अवाम के शोक, बाजार बंद, और पर्यटकों की मदद जैसे सकारात्मक पहलुओं को अपेक्षाकृत कम कवरेज मिली। मीडिया को आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता दिखानी चाहिए, न कि समाज को बांटने वाले नैरेटिव को हवा देनी चाहिए। कश्मीर पहले ही दशकों से आतंकवाद और अलगाव के दंश को झेल रहा है, और ऐसी घटनाओं में स्थानीय लोगों को सहानुभूति और समर्थन की जरूरत होती है, न कि संदेह की।
मेरा मानना है कि मीडिया को तथ्यों, संवेदनशीलता, और राष्ट्रीय एकता पर आधारित पत्रकारिता करनी चाहिए। सनसनीखेज हेडलाइंस और टीआरपी की दौड़ में पड़ने के बजाय, उसे ऐसी कहानियां सामने लानी चाहिए जो समाज को जोड़ें और आतंकवाद के खिलाफ साझा लड़ाई को मजबूत करें। कश्मीरी अवाम का इस हमले के खिलाफ एकजुट होना एक शक्तिशाली संदेश था, जिसे दुनिया तक पहुंचाना मीडिया का कर्तव्य था। दुर्भाग्यवश, गोदी मीडिया ने इस मौके को गँवाया और पुराने सांप्रदायिक नैरेटिव को ही दोहराया।

































