विनोद पांडे
दुनियां भर में लगातार बढ़ती जा रही पर्यावरण समस्याऐं के मद्देनजर जंगलों का महत्व बढ़ता जा रहा है। जंगलों के सबसे अधिक पर्यावरण समृद्ध इलाकों को कानूनी रूप से राष्ट्रीय पार्क, रिजर्व और अभयारण्य का दर्जा दे दिया जाता है। इन इलाकों में हक हकूक से लेकर अन्य सामान्य मानवीय गतिविधियां भी प्रतिबंधित कर दी जाती हैं। जिस कारण निकटस्थ गांवों के ग्रामीण भी प्रभावित होते हैं। कार्बेट पार्क इसी तरह के प्राकृतिक रूप से समृद्ध इलाकों में है। इसमें बाघ व अन्य वन्यजीवों को सुरक्षा देने के लिए इसके नजदीकी वन प्रभागों को जोड़ कर टाइगर रिजर्व बनाया गया है। ये संरक्षित क्षेत्र संरक्षण की दृष्टि से शीर्षस्थ श्रेणी में आते हैं। उत्तराखण्ड में वनक्षेत्र कुल भूभाग का 66 प्रतिशत से भी अधिक होने के कारण यहां के वन विभाग की जिम्मेदारी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। लेकिन वन विभाग ने कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के लैंसडॉन वन प्रभाग में जिस तरह मनमाने तरीके से इलाके में संरक्षण के विरूद्ध काम करने व धन के दुरूपयोग का जो काम किया है उसे राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने अवैध कार्य बताया है। संरक्षित क्षेत्रों में ऐसी गतिविधियां बेहद चिंताजनक हैं।
ये मामला सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया के 19 सितम्बर 2021 में समाने आया। जिसके बाद इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई। दिल्ली हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को इसकी जांच करने के आदेश दिये। इस प्राधिकरण की रिर्पोट में गड़बड़ियों की पुष्टि हुई है। ये मामला कालागढ़ वन विश्राम भवन व पाखरो रेंज के आसपास एक ईको पार्क, पुलें, भवन, रोड और जल कुंड बनाने का है। जिसके अंर्तगत इस इलाके में टूरिस्ट कॉम्पैक्स, 4 डबल डीलक्स कमरे, डाईनिंग रूम, किचन, डारमेटरी, पानी के फव्वारे, तथा इसी तरह के कई निर्माण किये हैं। कालागढ़-पाखरो के कंडी रोड को सिंगल लेन हाईवे जैसा बनाने के लिए करीब 5 फिट ऊंचा कर ताकि इसे बाद में पक्की सड़क बनाये जा सके। इस बनाने में भारी मशीनों का प्रयोग किया जा रहा है और जंगलों से मिट्टी खोदकर व बोल्डर निकालकर वन्य प्राकृतवास को क्षति पहुंचायी है। एक निरीक्षण बटिया को इतना चौड़ा करना औचित्यहीन तो है ही साथ ही यह इलाका कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में होने के कारण इसके लिए भारतीय वन अधिनियम 1927 के अलावा वन संरक्षण अधिनियम 1980 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अंर्तगत भारत सरकार और प्रदेश सरकार से अनुमति लेने के साथ ही धनराशि की विभागीय रूप से तकनीकी और वित्तीय स्वीकृति ली जानी जरूरी थी। प्रभागीय वनाधिकारी का कहना है इसके लिए कॉर्बेट पार्क के फील्ड डाईरेक्टर के कार्यालय में आवेदन किया है लेकिन फील्ड डाईरेक्टर के कार्यालय ने एनटीसीए को बताया कि उनके कार्यालय में इस तरह का कोई आवेदन नहीं किया है।
दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले में जनहित याचिका करने वाले गौरव बंसल का आरोप है कि इस प्रकरण में अब तक 150 करोड़ रूपये खर्च किये जा चुके हैं। उस इलाके में एक जलकुंड जिसे जंगल में वन्यजीवों के लिए पानी पीने के लिए बनाया जाता है, का भी निर्माण हुआ है। जिसके लिए साथ ही उन्हांने कहा था कि इस ईको पार्क की सफारी को बनाने के नाम पर 10000 पेड़ काट डाले गये हैं। हांलाकि पता चला है कि इसके लिए 163 पेड़ों का काटने की स्वीकृति ली गई थी।
इस कांड के कई दिलचस्प पहलू भी हैं जैसे कि जिस इलाके में ये काम हो रहा था वे लैंसडॉन वन प्रभाग का है लेकिन इस सारे काम को करवाने की जिम्मेदारी कालागढ़ वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी किसन चन्द को सौंपी गई है। सारे काम की मौके पर जिम्मेदारी जिस एसीएफ को दी गई है वही वहां का रेंज आफिसर भी है। एनटीसीए की जो टीम मौके पर जांच के लिए वहां पहुंची थी, तो प्रभागीय वनाधिकारी ने उन्हें कई निर्माणाधीन भवनों को स्टाफ क्वाटर बताया गया। जबकि इनकी बनावट टूरिस्टकॉम्पलैक्स की थी। जब इनका नक्शा मांगा गया तो प्रभागीय वनाधिकारी कालागढ़ ने गलत नक्शे पेश किये। इस तरह की श्रंखलाबद्ध गतिविधियां किसी सरकारी विभाग में अत्यन्त गंभीर किस्म के अपराध की श्रेणी में आते हैं। परन्तु अब तक वन विभाग के द्वारा की गई कार्यवाही से लगता है कि इसे अब तक बहुत सामान्य तरीके से लिया जा रहा है। उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय ने इस मामले का स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई शुरू की तो उन्होंने सरकार को इसकी जांच करने का आदेश दिया। तो प्रदेश के वन विभाग के तत्कालीन मुखिया राजीव भरतरी ने इस मामले की जांच मुख्य वन संरक्षक संजीव चतुर्वेदी को सौंपी। संजीव चतुर्वेदी अब तक कई भ्रष्टाचार के मामलों का भंडाफोड़ करने वाले अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं। कई वनाधिकारियों ने इसे कार्यक्षेत्र का मामला उठाकर उनके जांच अधिकारी के पद पर नियुक्ति पर आपत्तियां उठा दी। यह एक तय नीति के अंर्तगत किया गया लगता है क्योंकि इस तरह की टिप्पणियों के बाद संजीव चतुर्वेदी बिना वजह विवादों में फंसना नहीं चाहते और उन्होंने इसी आधार पर जांच अधिकारी का पद अस्वीकार कर दिया। इसके बाद खानापूरी के लिए अपर प्रमुख वन संरक्षक वी के गागटें को यह जिम्मेदारी दी गई, उन्होंने ने भी तकनीकी कारणों से जांच करने से इंकार कर दिया। इस तरह विभागीय जांच भी विवादों में फंस गई। हालांकि समाचार मिला है कि मामले को सर्तकता विभाग को दे दिया गया है। लेकिन वन विभाग से सहयोग न मिलने की दशा में क्या होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। जाहिर है कि जांच में देर करना, मामले को उलझा देना जैसे हथकंडों से मामले को रफा दफा करने में मदद मिलती है। किसी मामले की जांच को भटकाने के ये पुराने सरकारी हथकंडे हैं।
अपनी जांच रिर्पोट में एनटीसीए ने स्पष्ट रूप से लिखा है कि मोटर रोड बनाने के लिए जिस तरह मिट्टी खोदी गई है, उससे स्पष्ट है कि ये अनिमियतता ‘भारी विवेकहीनता के साथ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को क्षति पहंचाने का काम है’। यह भी कहा गया है कि यह एक प्रबंधकीय व प्रशासकीय असफलता है और ऐसा करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जाय। इस रिर्पोट में प्रभागीय वनाधिकारी कालागढ़ द्वारा प्रस्तुत किये गये फर्जी दस्तावेजों की जांच करने को भी कहा गया है। रिर्पोट में सारा काम रोक कर पर्यावरण बहाली करने और इसका खर्चा दोषी अधिकारियों से वसूलने को कहा गया है। पेड़ों की अवैध कटाई के लिए रिमोट सैंसिंग का सहारा लेने का निर्देश दिया गया है।
इस प्रकरण से सबसे पहले यह सवाल उठता है कि आज पूरी दुनियां में पर्यावरण संरक्षण के नाम पर जहां एक वनवासी या ग्रामवासी के कानूनन प्राप्त अधिकारों को भी रद्द कर दिया जाता है। विचारणीय प्रश्न है कि वहां पर वन विभाग प्रकृति को निरंकुश तरीके से बर्बाद करने और घोटाला करने की छूट कैसे हासिल कर लेता है। आमतौर पर ये मामले सामने नहीं आते क्योंकि वन विभाग को असीमित कानूनी अधिकार दिये गये हैं। मामला प्रकट होने यहां तक कि दो-दो उच्च न्यायालयों के संज्ञान में आने के बाबजूद भी ढीढपना में सरकारी निर्ल्जता प्रदर्शित होती है। यह काम बिना राजनीतिक व उच्च नौकरशाही के सहयोग व संरक्षण के संभव नहीं है। अभी तक आरोपी अधिकारियों जिन्हें हालांकि एनटीसीए ने अपनी रिर्पोट में दोषी घोषित भी कर दिया है, के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की है। 25 नवम्बर को वन विभाग में तबादलों की एक लंबी चौड़ी सूची जारी हुई है। जिसमें राज्य में वन विभाग के मुखिया राजीव भरतरी को उनके पद से हटा कर अध्यक्ष जैवविविधता बोर्ड के पद पर भेज कर बलि का बकरा बना दिया गया लगता है क्योंकि उनका इस मामले से सीधा वास्ता नहीं था। हां उन्हें इस पद से हटाने की कोशिशें लंबे समय से चल रही थी क्योंकि उनकी नियुक्ति कईयों को रास नहीं आ रही थी। खानापूरी के लिए जे.एस. सुहाग से मुख्य वन जीव प्रतिपालक का पद वापस ले लिया गया है और कालागढ़ के प्रभागीय वनाधिकारी किशन चन्द्र को कार्यालय से संबद्ध कर दिया गया है। कॉर्बेट पार्क के फील्ड डाइरेक्टर को बदल दिया गया है। इससे किशन चन्द को छोड़कर किसी की पद प्रतिष्ठा में कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। जबकि इतनी बड़ी अनियमितता में वे अकेले शामिल नहीं हो सकते हैं।
इस तरह के घोटाले वन विभाग की भ्रष्ट कार्यप्रणाली को उजागर करते हैं। वन विभाग के भीतर इस तरह के घोटालों को बहुत गंभीरता से लेने की आवश्वकता है। चिपको आंदोलन वन विभाग की भ्रष्ट कार्यप्रणाली को बदलने का आंदोलन था, जिसे बीच राह से भटकाकर एक पर्यावरण संरक्षण का आंदोलन प्रचारित कर दिया गया। इस आंदोलन के बाद वन विभाग जिसके कुप्रबंध के कारण आंदोलन जन्मा था बदली परिस्थितियों में वन संरक्षण के नायक की तरह प्रचारित किया जाने लगा। जबकि उसकी कार्यप्रणाली दिनों दिन निरंकुश और भ्रष्ट होते चली गई।
चिपको और पर्यावरण के नाम पर कई लोग हालांकि बड़े-बड़े पुरस्कार, पद प्रतिष्ठा, उपलब्धियां हासिल कर चुके हैं पर जब सरकार से टकराव का प्रश्न आता है तो ये लोग गोलामोल बातें कर मामलों को रफा दफा करने का ही काम करते हैं। इस तरह के व्यवहार आम जनता हताश होती है और वनों के संरक्षण से जुड़े मुद्दे पराजित होते हैं। इसलिए जरूरी है कि ऐसे मुद्दे जनता के बीच ले सही तरह ले जाये जांय ताकि अधिकारियों और राजनीतिज्ञों और तथाकथित पर्यावरणविदों के बीच बनी दुरभि संधि को तोड़ा जा सके और पर्यावरण के सरोकारों के लिए व्यापक जन समर्थन हासिल हो सके।

































