अनिल जोशी
नैनीताल पर यूं तो बहुत कुछ लिखा जा चुका है परंतु इसके इतिहास,औपनिवेशिक कालीन धरोहरों,सामाजिक संरचना तथा विशिष्ट व्यक्तियों पर एक समग्र अध्ययन कम प्राप्त होता है। नैनीताल के एबट्सफोर्ड में रिहाइश करने वाली सुश्री जाह्नवी प्रसाद द्वारा लिखित पुस्तक जो हाल में ही प्रकाशित हुई है,इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
पुस्तक क्या है एक सफरनामा है। नैनीताल के इतिहास, भूगोल तथा एक औपनिवेशिक हिल स्टेशन के रूप में उसके विकास का ऐसा लेखा जोखा जिसे लेखिका ने अपनी स्मृतियों तथा अपने अनुभवों के ताने बाने के साथ कुशलता से गूंथा है। बैरन द्वारा नैनी झील के किनारे बसासत की शुरुआत (खोज तो शायद कमिश्नर ट्रेल पहले ही कर चुका था) से लेकर नगर की वर्तमान दुर्दशा तक विभिन्न पड़ावों का दस्तावेजीकरण है ।
सभी हिल स्टेशनों की एक खूबी ये रही कि यहां अंग्रेजों के अलावा देश के विभिन्न कोनों से भी लोग आकर बसे,अलग अलग धर्मों और जातियों के । मसलन ,एंग्लो इंडियन, पारसी,यहूदी,सिख ,मुस्लिम, बौद्ध और फिर यहीं के होकर रह गए; या कहें एक समावेशी समाज। नैनीताल भी इसका अपवाद नहीं था। एक तरफ़ राजा,महाराजा,नवाब और ताल्लुकदार जो एकड़ों में फैले बंगलों और कोठियों में ठसक के साथ रहते थे तो दूसरी ओर उन्हीं के अमले में शामिल बावर्ची, साईस,बरेठे,अर्दली आदि। लेखिका ने वृतांत में उनको भी स्थान दिया है -चाहे वो घोड़ों पर सवार,ताल में पाल नौकायन करते, जंगल में तीतर बटेर का शिकार करते रईसजादे हों या रॉयल होटल का बारमैन नैनीराम या अंगीठी पर झुका नानखटाई सेकता हुआ दुबला आदमी ।
नैनी झील के इर्द गिर्द ऊंचाई पर ,विशेषकर अयारपाटा तथा शेर का डांडा में, ब्रिटिश काल में निर्मित अधिकांश बंगलों, स्कूलों,गिरजाघरों के विषय में वृहद जानकारी मिलती है। Ellesmere, Gurney House, Balmoral, Clifton, Aberfoyle जैसे बंगले। उस समय के प्रमुख होटलों जैसे स्विस होटल, ग्रैंड होटल,रॉयल होटल से जुड़ी कथाएं रोचक हैं। पुराने रजवाड़ों के ऐशगाह,बलरामपुर हाउस, आवागढ़ आज भी वैसे ही खड़े हैं।
गो आश्चर्य की बात यह है कि तल्लीताल के छावनी इलाके के बंगलों/भवनों का उल्लेख नहीं है… दिलकुशा हाऊस (अब आर्मी हॉलिडे होम), टेंपलटन, रिचमंड विला,एडवांटेज कॉटेज, सनी डेन,ईस्ट कोट,जोशी विला आदि।लाल टंकी का तो खैर सवाल नहीं। शायद लेखिका के कदम कैंट की ओर कभी पड़े नहीं। प्रमुख व्यापारिक प्रतिष्ठानों जैसे दयाल रेडियोज, बख्शी फोटोग्राफर,मॉडर्न बुक स्टोर,Sakleys,अलीगढ़ डेयरी से तो सभी वाकिफ रहे हैं ।
यदि एक तटस्थ पाठक को पुस्तक में अभिजात्य का पुट दिखे, इलीटिस्ट टिल्ट कह लें,तो आश्चर्य नहीं। बोट हाउस क्लब,पाल नौकायन का वृहद वर्णन जायज़ है मगर दो शब्द न्यू क्लब ,शारदा संघ,हरि संकीर्तन मंडली, नैनी बिलियर्ड्स सैलून आदि पर भी होते तो वृत्तांत समग्र लगता। मॉल रोड और बड़ा बाजार के अलावा जय लाल साह बाजार, नया बाजार, पिछड़ी बाजार आदि की भी एक पहचान है।
ऐसा प्रतीत होता है कि लेखिका की दुनिया से लेकर अयारपाटा की धार तक ही महदूद रही – सेंट मेरीज़, सेंट जोसफ,शेरवुड, ऑल सेंट्स,गवर्नमेंट हाउस । सेंट मेरीज के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। ऐसे में ‘डी.एस.बी के गलियारों से ‘ जैसा कुछ लिखे जाने की अपेक्षा करना व्यर्थ है।
अलबत्ता कुमाऊं के पारंपरिक व्यंजनों को पर्याप्त स्थान दिया गया है, गो उसमें भी कुछ झोल हैं। नैनीताल की जलेबी और नमकीन का ज़िक्र भी है।
वृतांत में अनेक तथ्यात्मक त्रुटियां हैं.. छकाता हो गया है छता परगना। गोविंद बल्लभ पंत का नमक आंदोलन में शामिल होना । फिएट कार का निर्माण टाटा मोटर्स द्वारा किया जाना। चढ़ाई में कार के इंजिन के गर्म हो जाने पर कार्ब्यूरेटर से खौलते पानी का निकलना (पानी रेडिएटर से निकलता था; कार्ब्यूरेटर में तो पेट्रोल रहता था)। Capri रेस्तरां का नाम Flattis हो जाना,जबकि Flattis तो पहले से था..Capri बाद में खुला। तिथियों में भी गलतियां हैं ,जबकि लेखिका ने अपने श्रोत के रूप में नैनीताल के प्रमुख वाशिंदों जैसे अजय रावत,शेखर पाठक को उद्धृत किया है।
भवनों और नैसर्गिक सौंदर्य से शहर का स्वरूप तो उजागर होता है मगर उसकी आत्मा तो उसके वाशिंदों में बसती है। औपनिवेशिक नगर होने के बावजूद नैनीताल में लोक संस्कृति का अपना एक वजूद था। नंदा देवी का मेला हो या होली.. खड़ी और बैठी…होली के पितामह प्यारे लाल साह,तबला नवाज दिनेश जोशी उर्फ़ कन्नू उस्ताद,वायलिन वादक महेंद्र सिंह नेपाली,सितारवादक देवी राम,लोक संस्कृति के प्रखर ज्ञाता तथा मार्क्सवादी विचारक विश्वंभर नाथ ‘सखा’,जनकवि गिरीश तिवारी गिर्दा,वैद्यराज सीताबर पंत, डाक्टर समुदाय में इंद्र लाल साह,लीलांबर जोशी,पुरुषोत्तम पांडे,चारु चंद्र पांडे…इनका उल्लेख न होना अखरता है। हर शहर के अपने कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व होते हैं…औरों से अलग… जिन्हें देख खीझ भी उठती मगर जिनकी यादें आज भी बाबस्ता हैं… तल्लीताल की एक शख्सियत देवेंद्र लाल साह डी लार्ड… हॉकी खिलाड़ी ललित शाह उर्फ़ लल्लू गवर्नर जिन्होंने एक साल शराब के नशे में ट्रेड्स कप हॉकी का पूरा मैच खिला दिया, जिसमें पंजाब से आई टीम में चार पांच ओलंपिक खिलाड़ी भी थे।
सारा दिन मालरोड में ऊपर नीचे चक्कर काटता देबू लाटा। मल्लीताल के अब्दुल सलाम टेलर जो कई साल बंबई में गुजार कर आए थे।दीवार पर संगीतकार वसंत देसाई के कपड़े सिलने का फ्रेम जड़ित सर्टिफिकेट जिसका प्रमाण था। एक शाम नशे की हालत में हमारे एक मित्र की नाप तो जैकेट की ली मगर सी दी पैंट। ऐसे ही पात्रों से तो निर्मित होता है एक शहर का चरित्र।
दरअसल इस कमी के लिए लेखिका को दोष देना भी उचित नहीं है। उन्होंने साठ,सत्तर और दशक का नैनीताल तो देखा ही नहीं। और इन दशकों के बाद नैनीताल पहले जैसा रहा भी नहीं।
उनका लालन पालन जिस कुलीन परिवेश में हुआ और जिन लोगों में उठना बैठना रहा वहां स्थानीय समाज की भागीदारी सीमित थी ।
आंखों देखी, महसूसी और सुनी सुनाई बातों का वर्णन करने में बहुत अंतर हो जाता है ।वो ऑर्गेनिक फील नहीं आता ।
पर यह भी स्वीकार करना होगा कि मात्र डेढ़ सौ पन्नों की किताब में सभी कुछ समेट लेना मुमकिन भी तो नहीं। कुछ न कुछ तो छूट ही जाना है।
बहरहाल,इन कमियों के बावजूद पुस्तक पठनीय है और नैनीताल के प्रेमियों को रुचिकर भी लगेगी।
Nainital- Through Memory, Stories & History
लेखिका : जाह्नवी प्रसाद
प्रकाशक : रोली
मूल्य : रु.795































