राजीव लोचन साह
(आज से सत्तर साल पहले मेरे पिता किशोरी लाल साह ने अपने अनन्य मित्र देवी लाल साह के साथ बद्रीनाथ-केदारनाथ की यात्रा की थी। अभी कुछ दिनों पहले मेरे मँझले बड़े भाई उमेश चन्द्र, जो मित्रों-परिचितों में ‘मालिक साहब’ के नाम से ख्यात हैं, ने 3 अगस्त 1956 से 17 अगस्त 1956 के बीच लिखे गये उनके कुछ पत्र मुझे सौंपे। आधी सदी से वे इसे कंजूस के धन की तरह छिपाये हुए थे। इनमें से अधिकांश डेढ़ आने के अन्तर्देशीय में लिखे गये हैं और एक दो पाई के पोस्ट कार्ड पर। तीन पेज का एक पत्र शायद लिफाफे के भीतर रहा होगा। लिफाफा मुझे नहीं मिला। यात्रा सीजन चल रहा है। मुझे लगा कि इन पत्रों को प्रकाशित करना सामयिक होगा।
मुझे अपने पिता की याद लगभग नहीं के बराबर है। 1 मई 1959 को मात्र 44 वर्ष की अवस्था में जब उनका देहान्त हुआ, तब मेरी आयु आठ साल की भी नहीं थी। मुझे उनका इस तरह लिखा हुआ भी इससे पहले पढ़ने को नहीं मिला था। इन पत्रों की भाषा से मैं चकित रह गया। मुझे लगा कि ऐसी भाषा तो मेरे पास भी नहीं है। मैंने इनमें कोमा, चार विराम के अलावा कुछ भी जोड़ा-घटाया नहीं है। जीर्ण-क्षीण, कटे-फटे कागजों में जो नहीं पढ़ा जा सका, उसे मैंने छोड़ दिया। -राजीव लोचन साह)
श्री हरि
हरिद्वार
तारीख 3-8-56
प्रिय पुत्र महेश, आशीष
आज सुबह 7.30 बजे हम भगवान की कृपा से यहां पहुंच गए और यहां धर्मशाला में ठहरे हुए हैं। आशा है कि आज रात यहां रहने के बाद कल को आगे के लिए प्रस्थान करेंगे। यहां मौसम अधिक गर्म नहीं है और नहाने में आनंद आया। गंगा बरसात के कारण अपने पूरे यौवन में है और पानी काफी चढ़ा हुआ है। गर्मी की धारा में बड़ा वेग है और हम किसी को भी इसमें तैरते हुए नहीं पाते। इससे अनुमान होता है कि इसे इस समय तैर कर पार करना दुष्कर है। हर की पैड़ी में जहां गंगा की धारा का वेग शायद दशांश भी ना हो, उसे पार करने में डर लगता है। लेकिन यहां पर बच्चे भी पार कर लेते हैं। कुछ दिन बाद यहां सोमवती का पर्व है इसलिए देश के विभिन्न प्रांतो से धार्मिक भावना से ओतप्रोत नर नारी अपार संख्या में भरे हुए हैं। लेकिन पहाड़ी प्रदेशों के लोग नहीं हैं। काफी भीड़भाड़ है। उमेश, राजीव और प्रमोद को आशीष। अपनी आमा को मेरा सादर प्रणाम कहना व अपने शुभ समाचार बद्रीनाथ के पते पर भेजना। अपने भाइयों की पढ़ाई का ध्यान रखना, परंतु मारने और डांटने-फटकारने के साधनों का प्रयोग भूल कर भी ना करना। जहां तक संभव हो प्यार व दुलार से काम लेना।
किशोरी लाल साह
ओम नमः शिवाय
देवप्रयाग
तारीख 5-8-56
प्रिय महेश उमेश, राजीव, प्रमोद, आशीष।
मैं यहां कुशल पूर्वक हूं और आशा करता हूं कि परमपिता परमात्मा की कृपा से तुम सब लोग कुशलपूर्वक होगे। हम लोग अपने पितरों का श्राद्ध करने के बाद तारीख 4 को हरिद्वार से रवाना हुए और उसी दिन ऋषिकेश पहुंच गए। आज लक्ष्मण झूला, स्वर्ग आश्रम, गीता आश्रम आदि देखकर और ऋषिकेश में स्नान करने के बाद देव प्रयाग को रवाना हुए व 7 बजे शाम यहां पहुंच गए। यहां की प्राकृतिक सुंदरता को देखकर मन गदगद हो गया। एक तरफ कलकल करती हुई मंदाकिनी आती है और दूसरी तरफ से वेगवती अलकनंदा नदी आती है और दोनों का संगम होता है। संगम की शोभा देखते ही बनती है, क्योंकि ठीक इसके ऊपर दीवार के समान सीधा पहाड़ है। इसलिए इसकी शोभा देखते ही बनती है। जिस प्रकार अलकनंदा का व मंदाकिनी का जल वेग से लहर मारता है, उसी तरह की आनंद की लहरें हृदय में भी होती हैं। यहां दो पुल भी हैं। शहर अल्मोड़ा-बागेश्वर की तरह का है। अभी-अभी पण्डा बही लेकर आया था व तुम्हारी आमा (तुलसी देवी) व कैलाश, शंकर व मोहन की ईजा के नाम व बसंत लाल जी, ठुल बाबू का नाम बही में दिखा रहा था। तुम्हारे मलकोट के बुजू बहुत पहले आए थे इसलिए पुरानी बही में ढूंढ कर दिखाएगा। कल यहां से रुद्रप्रयाग की ओर प्रस्थान करने का विचार है। कुली का बंदोबस्त अभी तक नहीं हुआ है, लेकिन शायद कल तक हो जाएगा। एक नैनीताल के डोटियाल से आज भेंट हुई है। लेकिन अभी सौदा पक्का नहीं हुआ है। अपने शुभ समाचार व कारबार के हाल बताए हुए पते में फौरन लिखना। अपनी आमा जी को मेरा सादर प्रणाम कह देना। उमेश और राजीव पढ़ते हैं या नहीं, लिखना। प्रमोद के समाचार देना। बाकी दूसरे स्थान से।
चिट्ठी देने का पता
किशोरी लाल साह
मार्फत श्री बिहारी लाल साह, जनरल मर्चेंट्स
बद्रीनाथ धाम, पोस्ट ऑफिस बद्रीनाथ
जिला गढ़वाल
तुम्हारा स्नेही पिता
किशोरी लाल साह
ऊँ नमः शिवाय
रुद्रप्रयाग
7-8-56
प्रिय पुत्र महेश, शुभाशीष
आगे मैं यहां कुशलपूर्वक हूं और तुम्हारी कुशल दयामय प्रभु की कृपा से नेक चाहता हूं। मैं एक पत्र हरिद्वार से व एक देवप्रयाग से तुम्हें भेज चुका हूं और आशा करता हूं कि तुम्हें मिल गए होंगे। इस बीच कोई ऐसा अवसर नहीं मिला कि मैं विस्तार से तुम्हें समझा सकूं कि इतने दिन हमने क्या किया और क्या देखा। हरिद्वार पहुंचने पर हमने एक पहाड़ी पंडित की खोज की जो कि हमें श्रद्धापूर्वक शास्त्रोक्त रीति से हमारे पूर्वजों का श्राद्ध कर सके। बड़ी कोशिश के बाद हमें एक काशी पठित गढवाली ब्राह्मण मिला, जिसने बड़ी अच्छी तरह एक एकांत व स्वच्छ स्थान पर पवित्र गंगा के किनारे हमें श्राद्ध कराया और हमने भी अपने पितरों को यानी दादा, दादी, पिता, परदादा, परदादी, ससुर, नाना, नानी को पिंडदान दिया। इसके बाद हम हरिद्वार के नए बने मुख्य स्थानों का दर्शन करने गए। पुराने स्थान तो मैंने पहले ही चार बार देखे हैं और नए बने स्थान में गंगा के ऊपर एक विशाल सीमेंट का पुल है, जिसमें लक्ष्मी की मूर्तियां बनी हंै। जिनके ऊपर हाथीे अपने संूडों से जलधारा छोड़ते हैं और नीचे मगर हैं, जिनमें बिजली फिट की हुई है और रात को उनकी आंखें जलती हैं। दिल्ली के नमूने का बिड़ला मन्दिर भी दर्शनीय है।
….. वहाँ से हमने देवप्रयाग की ओर प्रस्थान किया और मार्ग में लक्ष्मण झूला नामक स्थान के दर्शन किए। यहां गीता प्रेस गोरखपुर वालों की तरफ से एक सुंदर आश्रम बना हुआ है जिसमें बड़े-बड़े संत व ज्ञानी निवास करते हैं। यहां गीता भवन, सत्संग भवन आदि स्थान दर्शनीय हंै। पर के साल यहां राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद भी कुछ दिन ठहरे थे। इस आश्रम का नाम स्वर्ग आश्रम है। यहां एक स्थान पर गंगा की धारा को हमने नाव द्वारा पार किया। नाव में करीब 80 आदमी सवार थे। हमने इस अवसर पर दो फोटो भी खींचे। हरिद्वार से 41 मील जाने के बाद हमें देवप्रयाग मिला। यहां पहुंचने पर हमारे मन को अपार हर्ष हुआ और हमने अपनी यात्रा में आने का पुण्य फल प्राप्त किया। जब हमने अपनी माता भागीरथी व वेगवान अलकनंदा का संगम देखा तो उसकी धाराओं की तरह हमारा हृदय भी तरंगित होने लगा और हम तृप्त हो गए। वैसे तो मार्ग भर मां गंगा के दर्शन होते रहे। अलकनंदा से मिलने से पहले गंगा का नाम भागीरथी कहा जाता है। देवप्रयाग अल्मोड़ा के नमूने का 5,000-7,000 आबादी वाला छोटा शहर संगम के ऊपर बसा हुआ है। यहां पर हमने अपने पंडित द्वारा फिर दोबारा सोमवती के पुण्य पर्व के दिन ठीक संगम पर जहां पर दोनों जल धाराओं का पवित्र मिलन होता है श्राद्ध किया और सबके नाम लेते हुए पितरों का पिंडदान किया और संगम में जलधाराओं में बहाया। इससे दिवंगत आत्माओं को शान्तिलाभ होगा।
……. यहां से शिवजी विष्णु जी के मंदिरों का दर्शन कर हम श्रीनगर की ओर रवाना हुए जो कि हरिद्वार से 68 मील की दूरी पर स्थित है। रास्ते में कीर्ति नगर नामक एक बस्ती मिली। श्रीनगर कभी गढ़वाल के राजाओं की राजधानी थी और बड़े प्राचीन समय से चली आई थी। क्योंकि यह शहर एक घाटी में बसा हुआ है, एक तालाब जो कि इसके 8-10 मील उत्तर में था और उसके टूट जाने से यह प्राचीन नगर भीषण जलधारा में समाप्त हो गया और बह गया। यह नगर डेढ़ मील लंबा और एक मील चैड़ा था। 300 मंदिरों के भग्नावशेष आज भी इसकी गौरव गाथा सुनाने को मौजूद हैं। यह शहर अलकनंदा के तीर पर बसा है। 1851 सन में यह पुराना शहर बहा और उससे कुछ ही ऊपर अंग्रेज सरकार ने सन 1854 में दूसरा श्रीनगर बसाया जो आज हम देखते हैं। यह समुद्र की सतह से 1,800 फीट की ऊंचाई पर है। जलवायु उष्ण है। देवप्रयाग से यहां तक आने तक तमाम मार्ग अलकनंदा नदी के किनारे किनारे ही आता है। श्रीनगर से आगे रुद्रप्रयाग की ओर चले।
…… एक तरफ से आ रही थी पुण्य सलिला तेज धार वाली, अल्हड़ता व मादकता से भरी अलकनंदा और दूसरी ओर से आ रही थी शांत, अविचल, गंभीर जलमग्न मंदाकिनी। दोनों का मिलन हृदय में एक ऐसा स्पंदन, झंकार पैदा करता है जो वाणी में से वर्णन नहीं हो सकता केवल अनुभव ही होता है। हृदय में केवल एक अपार आनंद का अनुभव होता है। यहां भी अपने पितरों को तिलांजलि दी और उनकी याद में एक तीन दिन के भूखे बैरागी को भोजन करवाया, ताकि हमारे पूर्वजों की आत्मा तृप्त हो। यहां रुद्र महादेव का मंदिर है। यह स्थान समुद्र से 2,000 फीट ऊंचा है। यहां को रास्ता श्रीनगर से अलकनंदा के किनारे किनारे जाता है। रुद्रप्रयाग 1,000-1,500 आबादी वाला एक छोटा नगर है।
तुमको शायद आश्चर्य होगा कि बाबू ने अपने व्यक्तिगत जीवन के बारे में कुछ लिखा ही नहीं सो विश्वात्मा बद्रीनाथ जी की असीम कृपा से बिल्कुल घर की ही तरह का आराम हो रहा है। रुद्रप्रयाग तक आ गए हैं लेकिन अभी तक जमीन पर सोने की जरूरत नहीं पड़ी। दरियां मिल गयीं, बर्तन मिल गये। जिसे ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ी। ………..हर जगह पहचान वाले मिल जाते हैं जो सब कुछ प्रबंध कर देते हैं। घर बार, कारबार तो सब यहां आकर आदमी भूल जाता है। इस तपोभूमि ऋषियों की क्रीड़ास्थली की यही महिमा है। ना मालूम कितने युगों से मानव के चरण इन रास्तों पर पड़ते रहे, कितने लोगों ने इन अगम मार्गों में अपने प्राणों की आहुति दी है। आजकल हमारा काम है दफ्तर की कलम चलाना नहीं, बल्कि अपने सहयात्रियों की सेवा सुश्रूषा करना, जो कि हजारों की संख्या में देश के विभिन्न प्रांतो से हमारे साथ चल रहे हैं। उनकी कठिनाइयों को सुलझाते हैं, बीमारों को दवा बांटते हैं। थके हुओं को स्थान दिलाने में सहायता करते हैं। उनके सुख-दुख अपना सुख-दुख समझते हैं। आए थे बद्रीनाथ जी के दर्शन करने, लेकिन हो रहे हैं भारतीय आत्मा के दर्शन। इन विभिन्न देशवासियों के रूप में विश्वात्मा के दर्शन। इन विशाल दीवार सदृश पर्वतमालाओं व हृदयग्राही संगमों, जलधाराओं के रूप में स्वर्गीय सुख का आनंद मिल रहा है। स्वास्थ्य बिल्कुल ठीक है। कल से केदारनाथ के 11,000 फीट ऊंचे शिखर की ओर हम प्रस्थान करेंगे। ……..अपनी आमा को मेरा सादर प्रणाम कह देना व घर के शुभ समाचार बताये हुए पते पर भेजते रहना।
तुम्हारा स्नेही पिता
किशोरी लाल साह
केदारनाथ धाम
तारीख 10 अगस्त 1956
प्रिय पुत्र महेश, आशीष,
मैं यहां कुशलपूर्वक हूं और आशा है कि आप सब लोग कुशलपूर्वक होगे। आज हम करीब 11 बजे केदारनाथ धाम पहुंच गए और इस तरह आज हमारी यात्रा का एक अंग पूरा हुआ। यहां आने के लिए 9 मील की विकट चढ़ाई पार करनी पड़ी और एक-एक कदम एक फर्लांग मालूम पड़ता था। रास्ते में कठिन चढ़ाई की वजह से व हवा पतली होने की वजह से जगह-जगह विश्राम करना पड़ा। इस समय हम 11,725 फीट की ऊंचाई पर हैं यानी चीना पीक से भी 3,225 फीट अधिक ऊंचाई पर। हमारे चारों ओर बर्फ के पहाड़ हैं, जहां से जलधाराएं निकल कर अलकनंदा में मिल रही हैं। अलकनंदा का उद्गम भी यहीं है और 55 मील नीचे जिस अलकनंदा में सैकड़ांे हाथी बह जाते हैं, यहां केवल एक गधेरा मात्र है। केदारनाथ जी का मंदिर बहुत प्राचीन है और बड़ा विशाल है। पहाड़ों में इतना बड़ा मंदिर मैंने अभी तक नहीं देखा। यह शिल्प कला का उत्कृष्ट नमूना है। पत्थरों, दीवारों और छतों पर बड़ी पच्चीकारी की गई है। मंदिर पत्थर का बना है। बर्फ के पहाड़ हैं। मंदिर की स्थिति ऐसी है जैसे बाजार की ओर बर्फ के पहाड़ों की, जैसे मल्लीताल के पीछे चीना पीक की। शायद कल या परसों तक हम यहां पूजा पाठ करके वापस लौटेंगे और श्री बद्रीनाथ की ओर प्रस्थान करेंगे। यहां से बद्रीनाथ 101 मील है। बाकी समाचार सामान्य हंै। आमा को पैलाग कह देना। उमेश, राजीव, प्रमोद को आशीष। मल्लीताल की आमा को भी पैलाग कह देना।
तुम्हारा स्नेही पिता
किशोरी लाल साह
श्री हरि
ग्वालिया बगड़ चट्टी
तारीख 13-8-56
प्रिय महेश,
मैं यहां कुशल पूर्वक हूं और तुम्हारी कुशल दयामय भगवान से नेक चाहता हूं। आगे केदारनाथ पहुंचने के दूसरे दिन सवेरे हम बर्फ के ग्लेशियर देखने गए और ग्लेशियर, यानी बर्फ के पहाड़ों के नीचे सरोवर देखा, जिसमें पूज्य गांधी जी की अस्थियां विसर्जित की थीं। अब यह सरोवर गांधी सरोवर के नाम से प्रख्यात है। यहां से आकर हमने श्री केदारनाथ जी का पूजन किया। आरती हमने पिछली रात देख ली थी। कहते हैं कि यह मंदिर पांडवों ने बनाया था, फिर शंकराचार्य जी ने इसकी मरम्मत कराई थी। यहां पर अन्य द्वादश ज्योतिर्लिंगों की तरह शिवजी की ज्योति प्रकट हुई थी। पूजा से आकर हमने खाना खाया और लौट पड़े। अब हम इस समय श्री बद्रीनाथ जी के मार्ग में हैं और आशा है कि 18 या 19 अगस्त तक बद्रीनाथ पहुंच जाएंगे। कल हमने चट्टी रामपुर में विश्राम किया और आज सुबह 6 बजे वहां से प्रस्थान किया। रास्ते में हमने भेटा चट्टी में नारायण कोटि के अनेकों छोटे-बड़े प्राचीन मंदिर व मूर्तियां देखे, जो कि कहते हैं राजा जनमेजय ने बनाए थे। इसके बाद रास्ते में ही नाला चट्टी का प्राचीन मंदिर देखा। फिर आगे बढ़े तो उखीमठ मिला। इसका असली नाम उषा मठ है क्योंकि यहां उषा और अनिरुद्ध का प्राचीन मंदिर है। यहां केदारनाथ जी की जाड़ों की गद्दी है। जब अक्टूबर में केदारनाथ का मंदिर बर्फ से ढक जाता है तब उनकी पूजा यहीं होती है। असली केदारनाथ जी का मंदिर बंद हो जाता है फिर मई के महीने में, जब बर्फ पिघल जाती है, तब फिर खुलता है। केदारनाथ से जब चले चले थे, तब बद्रीनाथ 101 मील दूर था, आज 77 मील ही रह गया है। आशा है स्वतंत्रता दिवस चमोली में मनाया जाएगा। आज 12 दिन हो गए, लेकिन अभी तक तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं मिली। शायद तुम बद्रीनाथ के पते पर भेज रहे होगे। हमने गलती की। शायद 8 तारीख तक मार्फत पोस्ट मास्टर केदारनाथ के पते से मंगाते तो ठीक रहता। खैर अब भगवान ने चाहा तो चार-पांच दिन बाद बद्रीनाथ पहुंच ही जाएंगे। कल को श्री तुंगनाथ जी की भीषण चढ़ाई शुरू होगी। कहते हैं कि यह पर्वत केदारनाथ बद्रीनाथ दोनों से ऊंचा है और इसकी ऊंचाई समुद्र की सतह से 18,000 फीट है। 3 मील की कठिन चढ़ाई बताते हैं। उमेश वं राजीव की पढ़ाई का ध्यान धरना। उमेश, राजीव, प्रमोद को आशीष प्यार कह देना। अपनी आमाओं को मेरा सादर प्रणाम कहना। अपनी ममी से अपना खर्च मांगते रहना। बाकी हाल अपने अगले पत्र में लिखूंगा।
तुम्हारा स्नेही पिता
किशोरी लाल साह
17-8-56
श्री बद्रीनाथ धाम
प्रिय पुत्र महेश, शुभाशीष.
आगे मंगलमय भगवान की असीम कृपा से आज शाम को 6 बजे हम लोग कुशलता पूर्वक यहां पहुंच गए और इस तरह हमारी यात्रा का अंतिम उद्देश्य भी पूरा हुआ। वर्षों से सिंचित अभिलाषा पूर्ण हुई। बाकी पूरा वृतांत मैं फुर्सत के समय कल या परसों तक लिख भेजूंगा। उमेश, राजीव, प्रमोद को आशीष प्यार। अपनी मल्लीताल तल्लीताल की आमाओं को मेरा सादर प्रणाम कहना। तुमने केवल एक चिट्ठी बद्रीनाथ के पते पर भेजी तुम्हारी 11-8-56 की लिखी हुई। वह मुझे मिल गई है। तुम्हारी माता जी की तबीयत ठीक ही होगी। ठुल बाबू, सेक्रेटरी बुजू वगैरा से भी मेरा पैलाग कहना। देबिश चचा के घर भी फौरन जवाब भेज देना। डांठ में उनके सरासियों से भी कह देना।
किशोरी लाल साह

































