प्रमोद साह
9 नवंबर 2000 को भारत के 27 वें राज्य के रूप में उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया, उत्तराखंड राज्य का गठन न तो प्रशासनिक निर्णय था, और ना ही किसी आयोग की संस्तुति के आधार पर यह राज्य अस्तित्व में आया. 1897 से 2000 तक के कालखंड में अलग-अलग सतत जन संघर्षों के परिणाम तथा 42 शहीदो की शहादत से उत्तराखंड राज्य गठन हुआ। कैसा हो शहीदों के सपनों का उत्तराखंड यह सवाल लगातार इन बीस सालो में प्रसांगिक बना रहा।
राज्य गठन के जो बुनियादी कारण थे. वह जल जंगल ,जमीन का दुरुपयोग और सड़क, शिक्षा और स्वास्थ के क्षेत्रों का पिछड़ापन तो मुख्य कारण थे ही , वहीं विकास की दौड़ में उत्तराखंड की उपेक्षा भी एक प्रमुख कारण था। जनता ने अपने सपनों के जिस उत्तराखंड राज्य की कल्पना की, वह उत्तराखंड के जल, जंगल जमीन के संसाधन का यहां की स्थानीय जीवन के उत्थान के लिए उपयोग के साथ सड़क ,शिक्षा और स्वास्थ्य कि बेहतर सुविधाओं के साथ पर्यावरण और विकास के संतुलन को साधते हुए एक आदर्श राज्य की स्थापना का स्वपन था ।
उत्तराखंड की पिछले 20 सालों की विकास यात्रा के बाद जिस प्रकार का असंतुलित विकास उत्तराखंड मे हुआ है, उसने उत्तराखंड राज्य गठन के सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया है ।
चमकदार आंकडे : यद्यपि आंकड़ों में तो उत्तराखंड की तस्वीर बहुत चमकदार है लेकिन वास्तव में जो पर्वतीय क्षेत्र है , जो असली उत्तराखंड है , उसके हालात उत्तर प्रदेश के जमाने से भी अधिक खराब हो गए हैं. असंतुलित विकास की मार से पीड़ित उत्तराखंड की आवाम के पास, इससे उभरने का कोई सीधा रास्ता भी अब नजर नहीं आ रहा है। जिस कारण एक गहरी हताशा का भाव उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में तेजी से पसर रहा है ।
आंकडों का माया जाल : आंकड़ों की नजर से पिछले 20 सालों में उत्तराखंड की तस्वीर बहुत खूबसूरत हुई है . राज्य गठन के दिन जहां उत्तराखंड राज्य का गठन 3640 करोड रुपए के ऋण के साथ प्रारंभ हुआ ,कर्ज में डूबे उस राज्य की प्रति व्यक्ति आय 2001 में रुपये 14932 थी. जो 2019 -20 में 198738, यानी राष्ट्रीय औसत 152000 से लगभग 30% अधिक है । वही बजट की दृष्टि से उत्तराखंड की तरक्की को देखें तो 2730 करोड़ रुपए के 2001 में राजस्व प्राप्ति के सापेक्ष 2020 -21 में 52430 करोड रुपए की राजस्व प्राप्ति हुई है । जबकि हमारा कुल बजट 53526 करोड़ का हो चुका है ।अर्थ के आकार में हमारी यात्रा लगभग 18 गुना बडी है ।बजट का राजकोषीय घाटा भी 612 करोड़ से बढ़कर 7549 . 74 करोड हो गया है . यहां बृद्धि लगभग 12 गुना है । राजस्व के स्रोत और व्यय की प्राथमिकताएं हमारे राज्य की बीमार अर्थव्यवस्था को को बखूबी दर्शाते हैं .
जिस उत्तराखंड राज्य में “नशा नहीं रोजगार दो” के नाम से शराबबंदी का विश्व प्रसिद्ध आंदोलन शराब के विरुद्ध सामाजिक चेतना जागृत करने में सफल रहा , उस राज्य की अर्थव्यवस्था में वर्ष 2001 में आबकारी से प्राप्त राजस्व 77 करोड़ से 2020 -21 में बढ़कर 33 05 करोड़ हो चुका है । खनन के नाम से पीड़ित जिस राज्य में खनन का राजस्व 65 करोड़ से बढ़कर 800 करोड़ के आसपास पहुंच चुका है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि राज्य की वित्तीय निर्भरता शराब और खनन के राजस्व पर केंद्रित है।
इसी प्रकार का असंतुलन हमारे बजट के ब्यय में भी साफ- साफ दिखाई देता है । राज्य के 254257 कर्मचारी राज्य की एक बड़ी आर्थिक जवाबदेही है .जिनके वेतन, पेंशन और ऋण के ब्याज के एवज में कुल 57.26% बजट की राशि खर्च की जाती है जिसमें वेतन में रुपये 16960करोड, पेंशन में रुपये 11759 करोड,ब्याज पर 7271 करोड रूपये खर्च होने का अनुमान है । राज्य को इस त्रिकोणीय दल – दल से उभारने के लिए बहुत बड़ी दृष्टि सम्पन्न और योजनाकार की आवश्यकता है ।जो राज्य की सबसे बड़ी चुनौती है ।
यहां विकास और निर्माण कार्यों के लिए मात्र 13.35 प्रतिशत बजट ही शेष रहता है।इस छोटी राशि से आपदा ग्रस्त इस राज्य के विकास की कल्पना को पंख लगाना बहुत कठिन काम है ।
विकास का असंतुलन: 2001 में उत्तराखंड के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि 28.5% उद्योग 21.3 और सेवा 50.2% का योगदान कर रही थी ।जो 2020 -21 में कृषि 9 .2 प्रतिशत, उद्योग 36.5 प्रतिशत सेवा क्षेत्र का योगदान 54 . 3% हो गया है। पहाड़ों में खेतों के बंजर होने मैदानी क्षेत्रों में कृषि जोत के कम होने के कारण कृषि क्षेत्र के योगदान में बड़ी गिरावट दर्ज हुई है ।
राज्य में 5 विशेष औद्योगिक क्षेत्रों के विकास के कारण राज्य में लगभग 57000 करोड़ का निवेश आकर्षित हुआ, जिसका शत प्रतिशत हिस्सा मैदान के 4 जनपदों तक ही सीमित रहा , अर्थव्यवस्था में उद्योगों के योगदान के बड़े उछाल के कारण ही, असंतुलित विकास का प्रभाव दिन प्रतिदिन व्यापक होता जा रहा है। जिसके परिणाम स्वरूप पलायन राज्य की एक बड़ी आपदा के रूप में सामने आया है । राज्य के पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार” सन 2000 के बाद 35% आबादी ने पलायन किया है, इसमें 32 लाख लोग और 60% आबादी शामिल हो जाती है। राज्य के 17 00,गांव भुतहा हो गए हैं, 1000 गांव 100 कम आबादी के हैं ।कुल 3900 गांव से व्यापक पलायन हुआ है। पौड़ी और अल्मोड़ा जैसे बडे पर्वतीय जनपदों की 2001 से 2011 के मध्य आबादी में कमी आई है । पलायन ने राज्य में भौगोलिक और आर्थिक संकट के साथ ही राज्य में राजनीतिक नेतृत्व का असंतुलन भी पैदा कर रहा है।
आंकड़ों की नजर से देखें तो देश में बहुत तेजी से प्रगति करने वाले राज्यों में उत्तराखंड शामिल है। यहां की सांख्यिकी तस्वीर बहुत सुंदर है। जब हम इन आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं तो हम पाते हैं राज्य का पर्वतीय क्षेत्र जिसकी उपेक्षा के कारण ही उत्तराखंड अलग राज्य के रुप में अस्तित्व में आया ।आज असंतुलित विकास की की मार झेल रहा है. परंपरागत कृषि को राज्य में संरक्षण नहीं है .वहीं उत्तराखंड की आर्थिकी का प्रमुख आधार बागवानी को सरकार ने जान बूझकर नष्ट कर दिया है ।
1823 के 80 साला भूमि बंदोबस्त के बाद कमिश्नर ट्रेलर ने उत्तराखंड की आर्थिकी को सहारा देने वाले बागानों का विकास किया, अंग्रेजों के प्रयासों से पूरे उत्तराखंड में बागवानी का विकास हुआ . रामगढ़, चौबटिया , दूनागिरी, ग्वालदम,जोशीमठ, हरसिल उत्तरकाशी , जैसी फल पट्टियां विकसित हुई
1860 में चौबटिया गार्डन की स्थापना हुई, जिसने पूरे भारत में सेव की विभिन्न प्रजातियों को विकसित कर पहुंचाया, चौबटिया गार्डन की तरह हरसिल में फैडरिक विल्सन ने सेव की उन्नत प्रजाति की पैदावार प्रारंभ की। 18 72 में रामगढ़ में सरकारी प्रयासों से आडू,पलम सेव के मिश्रित बागान विकसित किए जिसने इस पूरे क्षेत्र की आर्थिकी का विकास किया ।
राज्य गठन से पूर्व, बागवानी को उत्तराखंड की कृषि का मुख्य स्रोत इंगित किया जाता था । लेकिन राज्य गठन के बाद सरकार के संरक्षण में जो कुल 104 सरकारी बागान उत्तराखंड में थे। उन बागानो को एक-एक करके सरकार ने निजी हाथों को लीज पर दे दिया, एक दौर में चौबटिया गार्डन में 500 -600 टन सेव का उत्पादन होता था जो अब मात्र 20 -30 टन तक सीमित रह गया है . इन सब सरकारी उपेक्षा के कारण हुआ है। ऊर्जा प्रदेश की अधिकांश विद्युत परियोजनाओं के राजस्व में हमारी सीधे हिस्सेदारी नहीं है।
क्या हो रास्ता ? 20 साल के उत्तराखंड में जिस तेजी से उत्तराखंड राज्य गठन का उद्देश्य विफल हो रहा है वह बेहद चिंताजनक है । दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में जूनियर व हाई स्कूल बड़ी संख्या में बंद किए जा रहे हैं ,पॉलिटेक्निक बंद हो रहे हैं, आए दिन मां बहनो के सड़क पर प्रसव के समाचार प्राप्त हो रहे हैं ।तमाम सरकारी अस्पताल रेफरल सेंटर बन गए हैं। तमाम प्रयासों के बाद भी राज्य में एक हजार से अधिक सरकारी डॉक्टरों के पद रिक्त हैं। दूरस्थ क्षेत्र के अस्पताल डाक्टर विहीन है. हांलाकि हमारे पास 13 जिला अस्पताल ,21 उप जिला अस्पताल, 80 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, केंद्र 52 प्राथमिक उपचार केन्द्र और 526 अतिरिक्त स्वास्थ्य केंद्र हैं । स्वास्थ्य सेवाओं का इतना बड़ा ढांचा अनुपयोगी साबित हो रहा है. इस संपत्ति को प्राइवेट पब्लिक पार्टनरशिप मोड में दिए जाने के भी परिणाम नकारात्मक ही आ रहे हैं । उत्तराखंड राज्य के तरक्की की जो तस्वीर दिखाई देती है वह मात्र 4 जनपदों तक सीमित है ।शेष नौ पर्वतीय जनपद घनघोर उपेक्षा और असंतुलित विकास के शिकार हैं । इन विकास के आंकड़ों का विश्लेषण करते ही हमें उत्तराखंड के समग्र विकास की राह भी मिल जाती है ।
राजस्व का पुनर्गठन: एक राज्य के रूप में जिस प्रकार शराब और खनन के राजस्व पर हमारी निर्भरता बढ़ गई है । राज्य निर्माण के बाद शराब का राजस्व 45 गुना बढ़ गया है । उसी प्रकार खनन का बजट भी राज्य के समक्ष पर्यावरण के सवालों को पैदा कर रहा है । हमें अपने बजट में नकारात्मक पक्ष की भागीदारी को सामूहिक कृषि ,बागवानी और सहकारिता विकास, समेकित पर्यटन,ऊर्जा ,सामाजिक वानिकी की योजनाओं को बल देकर इन क्षेत्रों के राजस्व योगदान को बढ़ाकर बजट में संतुलन पैदा करना होगा।
बागवानी और पर्यटन और पर्यटन को वैज्ञानिक संरक्षण और विस्तार उत्तराखंड की आर्थिकी को विशेष बल दे सकता है। जिस प्रकार प्रकार हिमाचल में यशवंत परमार गांव के पलायन को रोकने के लिए पंचायत स्तर पर बागवानी के विकास की योजनाएं तैयार की. उसी प्रकार हमें पर्वतीय क्षेत्र के लिए अपने विकास के मॉडल को ब्लॉक से हटा कर पट्टी पर केंद्रित करना होगा ब्रिटिश काल से पर्वतीय क्षेत्र में 700 से अधिक पट्टी व्यवस्थाएं विद्यमान है। जिसको आधुनिक किसान एवं कृषि सहायता केंद्रों के रूप में विकसित कर विकास की नई तस्वीर खींची जा सकती है। हमारे प्रत्येक पट्टी क्षेत्र में परंपरागत कृषि जैसे अदरक, हल्दी, मटर, मडुआ, झुंअरा तथा दलहन के साथ ही बागवानी की विशेषताओं पर केन्द्रित कृषि मॉडल की परंपरा विद्यमान है उसे विकसित और संरक्षित करने की आवश्यकता है।
सहकारिता और ग्रामीण विकास के लिए छत्तीसगढ़ सरकार की “गोधन न्याय’ योजना से प्रेरणा ली जा सकती है. जिसमें सामूहिक रूप से सहकारिता केआधार पर गांव में गाय पालन उद्योग से डेरी को बढ़ावा दिया जा रहा है और गाय के गोबर को सरकार खरीद कर किसानों को तत्काल अतिरिक्त लाभ प्रदान कर रही है ।
बागानों की चिंता : एक समय में चौबटिया ,दूनागिरी, भर सार रामगढ़, सरीखे 104 जो सरकारी उद्यान उत्तराखंड में आर्थिकी का आधार थे. उन्हें फिर से बागवानी की आर्थिक क्रियाओं तथा किसान शोध एवं साहयता का केंद्र बनाना होगा ।
कुल मिलाकर 20 वर्ष बाद असंतुलित विकास से जिस बेहाल उत्तराखंड की तस्वीर उभर रही है उसमें जनता का विश्वास बहाली के लिए सबसे पहला कदम संतुलित विकास का ही हो सकता है । संतुलित विकास की रूपरेखा तैयार करने के लिए हमें बेहद विचारशील नेतृत्व की आवश्यकता है . जिसका विश्वास उत्तर प्रदेश की कट कॉपी पेस्ट की विकास नीतियों पर ना होगा जो उत्तराखंड के संसाधनों के अनुरूप और आत्मनिर्भर विकास का खाका खींच सके।

































