गजेन्द्र रौतेला
दुनियां की सबसे युवा पर्वत श्रृंखला और दुनियां की छत कहे जाने वाला हिमालय आज दुनियां का सबसे संवेदनशील और नाजुक स्थिति में है | एक ओर जहाँ हिमालय दुनियां की एक चौथाई आबादी को पानी देता है वहीं दूसरी ओर आज ये दक्षिण एशिया के मुख्यतः पाँच देशों पाकिस्तान ,भारत ,नेपाल ,भूटान और चीन (तिब्बत) तक लगभग 2500 किमी0 की लम्बाई और लगभग 400 किमी0 चौड़ाई में फैले हिन्दूकुश हिमालय सहित दुनियां की 2 अरब की जनसंख्या का संकट भी बनता जा रहा है | यह चुनौती सिर्फ समय-समय पर आने वाली बाढ़ जैसी आपदाओं से नुकसान का नहीं है बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र की मानव सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा है | सिर्फ बाढ़ ही नहीं बल्कि इस पूरे क्षेत्र में भूकंप जैसी चुनौतियाँ भी लगातार अपनी दस्तक देती रहती हैं | वैज्ञानिक और विशेषज्ञ इन तमाम चुनौतियाँ को क्लाइमेट चेंज का प्रभाव जरूर मानते हैं लेकिन अन्ततः यह पूरी दुनियां के मानव समाज की एक अंतहीन भोगवादी पिपासा का ही परिणाम है जिसका सबसे ज्यादा असर दुनियां की सबसे युवा और संवेदनशील पर्वतश्रृंखला हिमालय को भोगना पड़ रहा है |
संवाद की जरुरत-
वैज्ञानिकों के अनुसार हिमालय में प्रारंभिक मानव सभ्यता की उपस्थिति लगभग 20000 से 10000 वर्ष पूर्व की बताई जाती है | हजारों वर्षों के इस कालखंड में इस बड़े भू-भाग में बहुत सी सभ्यताओं का क्रमिक विकास हुआ | आज लगभग 2 अरब की आबादी वाला यह सिर्फ एक भू-खंड नहीं है बल्कि यह वैश्विक जलवायु, जैव विवधता,पानी और समुद्र के जल स्तर को बढ़ाने का भी एक प्रमुख कारक है | एशिया के वाटर टावर कहे जाने वाले हिमालय का प्रभाव सिर्फ हिमालयी क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके विशाल ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र किनारे बसने वाले कई देशों के तटीय इलाकों के अस्तित्व और वहाँ की मानव सभ्यता के डूब जाने का खतरा भी लगातार बढ़ता जा रहा है | जैव विवधता की दृष्टि से देखें तो वैज्ञानिक पूरे हिन्दूकुश हिमालय में लगभग 81000 प्रकार की वनस्पतियां और 15000 प्रकार के जीव-जंतुओं का आवास मानते हैं | नेपाल के काठमांडू स्थित ICIMOD के एक आंकलन के अनुसार पिछली एक सदी में इतने बड़े भू-भाग की 70 प्रतिशत जैव विवधता खतरे के दायरे में आ चुकी है | जाहिर सी बात है कि जैव विवधता पर आये इस संकट से मानव समाज भी अछूता नहीं रह सकता है| आज अतिवृष्टि ,बाढ़,भूस्खलन,ग्लेशियरों का पिघलना और टूटना साफ़-साफ़ सामने दिखाई दे रहा है | चीन और नेपाल की घोटेकोशी नदी की बाढ़ इसके जीवंत उदाहरण हैं | आज हिमालय पर संकट सिर्फ हिमालय और वहाँ के रहवासियों पर संकट का विषय नहीं रह गया है बल्कि एशिया सहित पूरी दुनियां पर मंडरा रहे एक बड़े खतरे का सवाल है | इसलिए जरुरी है की हिमालय से संवाद किया जाए ताकि एक मानव सभ्यता को इस संकट से बचाया जा सके |
सन 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद विकास की दिशा –
भारत के संदर्भ में देखें तो सन 1947 में आज़ादी के बाद देश के सामने बहुत सी चुनौतियाँ अलग-अलग रूप में खड़ी थी | शुरूआती दौर में एक ओर जहाँ विभाजन की क्रूर विभीषिका से जूझना था तो दूसरी तरफ गरीबी,अशिक्षा और भुखमरी जैसी बड़ी समस्याएं थी | शुरूआती डेढ़ दशक या लगभग सन 1960 तक देश की आंतरिक बड़ी समस्याओं की उलझनों के साथ हिमालय के इन दुर्गम क्षेत्रों तक ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया | इन डेढ़ दशक में न ही इतने संसाधनों की उपलब्धता थी और न ही किसी योजना को क्रियान्वयन करने के लिए कोई प्रशासनिक व्यवस्था | यदि एक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा से कोई योजना बनी भी तो योजनाकारों ने मैदान की सामजिक और भौगोलिक संरचना के अनुरूप ही इन योजनाओं को बनाया और क्रियान्वयन करने पर जोर दिया | जबकि हिमालयी भू-भाग की सामजिक और भौगोलिक पृष्ठ्भूमि बिल्कुल भिन्न थी | बल्कि ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत के सम्पूर्ण हिमालयी क्षेत्र को बाकी देश की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किये गए | इस युद्ध के बाद ही देश का ध्यान सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इस हिमालयी क्षेत्र पर गया और प्रशासनिक व्यवस्था,सड़क,संचार,सैन्य सुरक्षा आदि जैसे कार्यों को किया जाने लगा | हिमांचल ,मणिपुर ,मेघालय त्रिपुरा ,सिक्किम ,अरुणाचल, मिजोरम,नागालैंड और उत्तराखण्ड जैसे राज्यों के गठन या पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने के मूल में कहीं न कहीं एक कारण उनका सामरिक दृष्टि महत्वपूर्ण होना भी रहा ताकि सामजिक-आर्थिक विकास के कार्यों को राज्य सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था देखे और सुरक्षा की केंद्र सरकार | इस दौरान इन सभी राज्यों में ‘ विशेष पर्वतीय क्षेत्र ‘ के रूप में पहचान के साथ कई विकास योजनाओं को लागू किया गया | जो पर्वतीय क्षेत्र कभी विकास की दृष्टि से दूर था वो अब ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का प्रमुख विषय बन गया था | यही वजह रही की इस अवधि में पर्वतीय राज्यों से भारतीय फ़ौज में बहुतायत में सैनिक भर्ती हुए | जिससे न सिर्फ भारतीय सेना की संख्या और ताकत बढ़ी बल्कि हिमालय की इन दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों का भी फ़ौज के माध्यम से बाहरी दुनियां से साक्षात्कार हुआ और ‘मनीऑर्डर प्रणाली’ से आर्थिकी और शिक्षा का प्रसार भी हुआ | प्रसिद्ध साहित्यकार राहुल सांकृत्यायन सन 1953 में इलाहाबाद से प्रकाशित अपनी पुस्तक हिमालय परिचय भाग 1 गढ़वाल में कुल 52 छोटी-बड़ी सभी प्रकार की सड़कों के होने का उल्लेख करते हैं जिनकी कुल लम्बाई 1788 मील दर्ज की गई है | इसी प्रकार पी0 डब्ल्यू0 डी0 के डाक बंगले जो तब की प्रशासनिक व्यवस्था के मुख्य केंद्र होते थे उनकी संख्या 34 और 115 डाकघर जिनमें से सिर्फ 10 डाकघरों में तार की व्यवस्था उपलब्ध थी | शिक्षा व्यवस्था का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि सन 1921-22 में इस क्षेत्र में कुल 8 हाई स्कूल थे 413 छात्र थे और 261 प्राइमरी स्कूल थे जिनमें 11345 छात्र और कुल 75 छात्राएं पंजीकृत थे | इसी प्रकार जन्म मृत्यु दर को दर्शाते हुए लिखते हैं कि सन 1921 में गढ़वाल जिले की प्रति 1000 की जनसंख्या पर 34.42 जन्म दर और मृत्यु दर 50.07 थी | मृत्यु के कारण के आंकड़ों पर यदि नजर डालें तो सं 1921 में हैजा से 5512 ,चेचक से 1 , ज्वर से 14786 ,पेट की बीमारी से 2845 और 845 अन्य कारणों से मौत हुई |इन आंकड़ों से ब्रिटिश काल के इस भू-भाग की स्थिति भी समझ आती है कि आजादी के बाद यहाँ के विकास कार्यों की प्राथमिकताएं क्या रही होंगी |
विकास के मॉडल की प्रमुख कमियां –
सन 1947 में देश की आज़ादी से पहले के आंकड़ों पर यदि गौर करें तो देश की आज़ादी के बाद सरकार की अपने नागरिकों और समाज के प्रति एक अलग तरह की जिम्मेदारी थी जिसमें शिक्षा-स्वास्थ्य और यातायात-संचार आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं को इन दुर्गम क्षेत्रों तक पहुँचाने की एक बड़ी चुनौती थी | जिसमें यहाँ की पारिस्थितिकी और स्थानीय संसाधनों के मुद्दे गौण रह गए | विकास की योजनाओं का मॉडल भी वही रहा जो की मैदानी क्षेत्रों का रहा | और सबसे बड़ी कमी इस मॉडल में जो रही वो यह कि यहाँ के लिए जो भी विकास की योजनाएं बनी वो सभी ‘टॉप टु बॉटम’ रही | जिसमें न यहाँ की पारिस्थितिकी को समझा गया और न ही यहाँ के समाज को | इन योजनाओं में यहाँ के नागरिकों को सक्रिय ‘भागीदार’ बनाने के बजाय सिर्फ ‘लाभार्थी’ बनाने पर ध्यान दिया गया | जिस कारण अधिकांश योजनाएं सिर्फ कागजों पर तो सुनहरी दिखीं लेकिन धरातल पर ये अपना प्रभाव न छोड़ सकी | इसका एक जीवंत उदाहरण सन 1974 का चिपको आंदोलन भी है जब साइमंड कम्पनी को जोशीमठ के रैणी गाँव के जंगलों को काटने का ठेका दे दिया गया इसके प्रतिरोध स्वरुप विश्वविख्यात चिपको आंदोलन का जन्म भी हुआ | दरअसल यहाँ के संसाधनों जल,जंगल और जमीन पर जो स्थानीय लोगों का हक़-हक़ूक़ था उसे सरकारों ने अपने कब्जे में लेने की जो कवायद शुरू की उसने कालांतर में समाज और सरकार के बीच एक अविश्वास के भाव की बुनियाद डाल दी जो धीरे-धीरे एक बड़ी खाई के रूप में तब्दील होती चली गई | जबकि जिन लोगों के विकास के लिए योजनाओं का निर्माण हो रहा था उसमें उनकी भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए थी ताकि वो उसे जिम्मेदारी और अपनेपन के साथ अपना सकें |कालांतर में इन योजनाओं में हितभागियों के भागीदार होने के बजाय पूँजी और बाजार की अर्थव्यवस्था इसकी सबसे बडी भागीदार बन गई | संविधान ने जिस कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को अंगीकार किया था वो धीरे-धीरे पूँजी की अर्थव्यवस्था के चंगुल से घिरती चली गई परिणामस्वरूप आज हिमालय जैसे संवेदनशील और नाजुक भू-भाग में बिना कैरिंग कैपेसिटी/धारण क्षमता को जाने बेहद विशालकाय और गैरजरूरी निर्माणकार्य चल रहे हैं फलस्वरूप इस भू-भाग पर क्लाइमेट चेंज पारिस्थितिकी के असंतुलन का सबसे ज्यादा प्रभाव दिखाई दे रहा है| इसके उदाहरण पिछले कुछ दशकों से हिमालय में हो रही लगातार आपदाओं से भी समझा जा सकता है | वो केदारनाथ की आपदा हो, उत्तरपूर्व की आपदा हो हिमांचल-जम्मूकश्मीर की आपदा हो या चीन,नेपाल ,भूटान या फिर पाकिस्तान की आपदा | इन सबके मूल में मनुष्य और उसके समाज के द्वारा प्रकृति से की गई छेड़छाड़, अवैज्ञानिक दोहन और उसका शोषण ही है |
हिमालय की चेतावनियां-
ऐसा नहीं है कि मनुष्य की क्रूरताओं को हिमालय सिर्फ चुपचाप देख रहा है बल्कि पिछले चार दशकों से हिमालय ने अपनी प्रतिक्रिया स्वरूप खूब अच्छी तरह से चेताया भी है | जिसमें पहले बादल फटने और अतिवृष्टि की कुछ चुनिंदा घटनाएं होती थी वहीं आज इनकी आवृति और प्रभाव बहुत बड़े पैमाने पर पहुँच चुका है | वैज्ञानिक दृष्टि से इसका आंकलन करें तो दो तीन दशक पूर्व बादल फटने की घटनाएं अर्थात एक घंटे में 100 मिमी0 बारिश होने की कुछ चुनिंदा घटनाएं दर्ज की जाती थी जबकि आज यह आंकड़ा बहुत सामान्य हो गया है | एक वर्षाकाल में यह आंकड़ा कई-कई बार अपनी सीमा को पार कर जाता है जिससे भूस्खलन और बाढ़ का निरंतर खतरा बढ़ता जा रहा है | उच्च हिमालयी क्षेत्र जो समुद्रतल से 2500-3000 मीटर से अधिक की ऊंचाई वाले क्षेत्र हैं जहाँ अधिकांशतः पहले बारिश सिर्फ हल्की फुहार के साथ देखी जाती थी वहां भी अब बारिश का बेहद तेज गर्जना और बौछार के साथ देखा जाना बहुत सामान्य बात हो गई है | तेज और भारी बारिश की ये बौछारें ट्री लाइन से ऊपर अल्पाइन ज़ोन के लिए बेहद खतरनाक साबित हो रही हैं |पिछले तीन दशकों से हिमांचल और उत्तराखंड की विभिन्न परियोजनाओं में कार्य कर चुके पर्यावरण विशेषज्ञ विशाल रस्तोगी बताते हैं कि “अल्पाइन ज़ोन भारत के संदर्भ में जिसे ट्रॉपिकल और सब ट्रॉपिकल ज़ोन कहा जाता है, की मिटटी और वनस्पति बेहद नाजुक और कमजोर होती है | इस ऊंचाई पर अधिकांशतः मिटटी के नीचे पहाड़ की चट्टान का एक कठोर हिस्सा होता है | ऐसा उच्च हिमालयी क्षेत्र एक वर्ष में जो पहले 8-9 महीने पूरी तरह बर्फ से आच्छादित रहता था और सिर्फ 3-4 महीने के लिए धूप में एक्सपोज होता था उसकी बर्फ से आच्छादित रहने की अवधि अब मात्र 4-5 महीने ही रह गई है जिस कारण चट्टानों के भीतर गर्मी और ऊष्मा का प्रभाव होने लगा है जिस कारण भारी बारिश होने पर मिटटी की ऊपरी परत पानी के साथ बहुत आसानी से छिटक कर बहने लगी है | पर्यावरण की दृष्टि से यह एक बेहद चिंताजनक स्थिति है | ” इसके चलते हमने कई उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ‘गली इरोजन’ की बहुत सी घटनाएं होते हुए देखी हैं| जिसका एक उदाहरण हमारे उत्तराखंड का दयारा बुग्याल भी है | इसके अतिरिक्त हजारों छोटी-बड़ी आपदाएं, बाढ़ और भूस्खलन की बारम्बारता दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है|
हिमालय को बचाने के महत्वपूर्ण प्रयास –
ऐसा नहीं है कि हिमालय पर बढ़ते संकट से बचने के लिए कोई प्रयास नहीं किये गए | इसके लिए सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर भी बहुत से प्रयास किये गए जिनमें गैर सरकारी स्तर पर 1974 का चिपको आंदोलन एक ऐतिहासिक घटना रही है जिसने पूरी दुनिया को स्थानीय जनता के हक़-हकूकों को सुरक्षित रखने का एक सन्देश भी दिया तो पर्यावरण की सुरक्षा को भी एक वैश्विक मुद्दा बनाया| फलस्वरूप एक कठोर वन कानून बना तो फिर उसी चिपको की भूमि से जंगलों पर स्थानीय ग्रामीणों के अधिकारों के लिए झपटो-छीनो आंदोलन के स्वर भी मुखर हुए | यह घटना यह भी दिखती है कि बिना स्थानीय समुदाय की भागीदारी के ऊपर से बनाये और थोपे गए क़ानून जनता कैसे दरकिनार करती है | सरकारी स्तर पर देखें तो वन संरक्षण अधिनियम 1980 सहित विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों के निर्माण के साथ ही राष्ट्रीय पर्यावरण नीति 2006,राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना 2008,राष्ट्रीय हिमालयी पारिस्थितिकी मिशन,ग्रीन इंडिया मिशन,आपदा पूर्व चेतावनी और ग्लेशियर निगरानी सिस्टम सहित कई अन्य कार्यक्रमों को लागू किया गया |
प्रयासों में कमी –
लेकिन इस सबमें सबसे जरुरी था कि इन सब योजनाओं को धरातल पर ठीक से लागू किया जाता और जन जागरूकता के साथ जनता को भी इसका भागीदार बनाया जाता | तुलनात्मक रूप से देखें तो जिस गति और अनुपात में पर्यावरण के संरक्षण की योजनाएं बन रही थी उससे कई तेजी से उन योजनाओं का क्रियान्वयन हो रहा था जो की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति को नुकसान पहुंचा रहे थे | इन दोनों के बीच का अंतर और अनुपात लगातार एक बड़ी खाई का रूप ले रहा है | लगातार बढ़ते औद्योगीकरण और बाजारीकरण ने एक उत्प्रेरक के रूप में भी काम किया | एक समाज के रूप में इस संवेदनशील विषय को चिपको आंदोलन के बाद उस आत्मीयता के भाव से समाज ने नहीं अपनाया | इसका एक कारण यह भी रहा कि जिन वन पंचायतों पर कभी वहां की जनता का परम्परागत हक़ था वो अब सरकारी संयुक्त वन प्रबंधन या जे0 एफ0 एम0 की संपत्ति हो गए | जिन जंगलों के साथ जनता का सहजीवन और सहअस्तित्व टिका था वो अब उन्हीं से दूर होते चले गए | इसके साथ ही हमारी स्कूली शिक्षा में इस विषय पर न कभी गंभीरता से विमर्श हुआ और न ही इसे शामिल किया गया | ज्यादातर ‘पर्यावरण’ स्कूली शिक्षा का एक औपचारिक विषय भर रह गया | जबकि जीवन के अस्तित्व से जुड़े इस विषय पर प्राकृतिक संसाधनों के वैज्ञानिक दोहन और उपयोग का एक गंभीर विषय बनाया जाना चाहिए था जिससे भविष्य के संवेदनशील नागरिक चेतना को विकसित किया जा सकता था | इस सबके चलते यह गंभीर विषय एक सार्वजनिक नागरिक जिम्मेदारी का विषय न बन सका |
हिमालयी विकास की नई दिशा –
वर्ष 2022-23 के सरकारी आंकड़ों पर नजर डालें तो पर्यवरण संरक्षण पर खर्च की गई धनराशि कुल जीडीपी का लगभग 0.02 प्रतिशत रहा है | इससे एक अनुमान लगाया जा सकता है की हिमालयी क्षेत्र की इस विषम वैश्विक परिस्थिति को सरकारी योजनाओं के स्तर पर कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है | यदि हिमालयी क्षेत्र की इस विकराल होती समस्या से लड़ना है तो जरूरी है कि क्लाइमेट चेंज और पर्यावरण के इस मुद्दे पर हिमालय के संरक्षण के लिए एक वैश्विक योजना लागू की जाए और स्थानीय स्तर पर सिर्फ पर्यटकों की संख्या बढ़ जाना,बड़े-बड़े डैम और हाइड्रो प्रोजेक्ट बना देना एक उपलब्धि नहीं है ,बल्कि हिमालय जैसे बेहद नाजुक पारिस्थितिकी वाले भू-भाग में कृषि-औद्यानिकी,नेचर टूरिज्म,अध्यात्म, हैल्थ एंड वैलनेस,स्वाध्याय,फोटोग्राफी आदि जैसे रोजगारपरक उत्पादक कार्यों को भी प्रमुखता से बढ़ाया जाना चाहिए ताकि यहाँ की सामाजिक सांस्कृतिक विरासत भी बची रहे और हिमालय भी |
निष्कर्ष – हिमालय है तो हम हैं
हिमालय को बचाने की लड़ाई सिर्फ हिमालय को बचाने की लड़ाई भर नहीं है बल्कि यह एक समाज और मनुष्यता को बचाने की लड़ाई है | जो न सिर्फ हिमालय बल्कि उन तमाम छोटे-बड़े देशों के समुद्री इलाकों और वहां के समाज को भी बचाने की चिंता है जिनका अस्तित्व समुद्र के जल स्तर बढ़ने से ख़त्म हो जाने की कगार पर खड़ा है | जिनमें भारत के तटीय इलाकों सहित बांग्लादेश ,पाकिस्तान म्यांमार,इंडोनेशिया और चीन का भी एक बड़ा हिस्सा और वहां की आबादी है | दुनियां की छत कहे जाने वाले हिमालय को आज स्वयं एक ऐसे छत की जरूरत है जहाँ वह खुद के वजूद को बचाये रख सके |































