विनोद पांडे
15 सितम्बर को नैनीताल की एक अजीम शख्सियत अहमद हुसैन का इंतकाल हो गया। वे 91 वर्ष के थे। मल्लीताल की खड़ी बाजार में उनकी दुकान थी, जहां दुकानदारी कम और खिलाड़ियों से लेकर आम आदमी का एक अड्डा ज्यादा हुआ करता था। वहां खेल से राजनीति और सामाजिक मुद्दों पर बहस, बातचीत आदि होती थी। अहमद साहब की पहचान नैनीताल के एक बेहतरीन इंसान और शानदार खिलाड़ी के रूप में थी। अंग्रेजों के समय से ही नैनीताल खेलों में एक खास पहचान रखता था। यहां के लड़कों ने विशेषकर हाॅकी में राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनायी थी। नैनीताल के खेलों को संवारने में अहमद साहब का बहुत बड़ा योगदान था।
अहमद साहब के पिताजी नैनीताल के शुरूआती बांसिदों में से थे। वे दरअसल एक सुनार की दुकान चलाते थे और शहर के खास लोगों के रूप में जाने जाते थे क्योंक वे एक घोर सामाजिक आदमी थे। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था और नैनीताल में कांग्रेस के नेता के रूप में उनकी पहचान थी। वे कई बार नगरपालिका के सदस्य मनोनीत हुए। वे शहर की प्रतिष्ठित संस्था अंजुमन ए इस्लामियां के सदर भी रहे थे। वे एक खिलाड़ी भी थे और एक शायर भी। अपने समय में नैनीताल में शरदोत्सव में मुशायरा का आयोजन उन्हीं के द्वारा किया जाता था। इस तरह के पिता के एक लायक बेटे ने अपने पिता और नैनीताल की आबोहवा से जो भी सीखा उसे भरपूर समाज को दिया।
मल्लीताल में रहने वाले लड़कों मे आमतौर पर फ्लैट्स से नजदीकी के कारण खिलाड़ी बनने की संभावना अधिक रहती थी। अहमद साहब भी हाकी और क्रिकेट के बेहतरीन खिलाड़ी के रूप में निखर गये। क्रिकेट में वे पेस बालिंग के साथ-साथ उतनी ही कुशलता से गंद को स्पिन भी कराते थे। हाकी में तो उनका शुमार एक बेहतरीन फारवर्ड के रूप में होता था। अपनी खेलों की प्रतिभा के कारण उनकी वायरलैस आॅपरेटर की नौकरी लग गयी। पर नैनीताल की “होम सिकनैस” जो नैनीताल वालों की एक खास कमजोरी हुआ करती थी, उन्हें फिर नैनीताल में ही वापस ले आयी और वे मल्लीताल में अपनी पंरपरागत दुकान को चलाने लगे।
अहमद साहब को खिलाड़ी के अलावा एक बेहतरीन रैफरी के रूप में याद किया जाता था। उनका शांत स्वभाव और खेल की बारीकियों की जानकारी के कारण उनका रैफरी की भूमिका निखर कर सामने आयी थी। ट्रेड्स कप के हर किसी रोमांचक और तनावपूर्ण मैच में उन्हें ही रैफरी बनाया जाता था। किसी के लिए पक्षपात न करने के कारण उन्हें बेहतरीन रैफरी के रूप में सम्मानित भी किया गया था। उनके अंदर गजब का स्टैमिना था। एक बार ट्रेड्स कप के क्वाटर फाइनल में उन्होंने एक मैच में रैफरी की भूमिका निभायी और उसके ठीक बाद वाले मैच में वे एक फाॅरवर्ड के रूप में खेले। सत्तर के दशक का वह दौर मन्नू दादा का दौर हुआ करता था। दादा नैनीताल के सारे लड़कों को हाॅकी सिखाते थे और शहर की टीमों से छूट गये सबसे अच्छे खिलाड़ियों की एक टीम ट्रेनीज नाम से टीम बनाते थे। अहमद साहब ने कई बार इस टीम से खेला था। अहमद साहब डी.एस.ए. नैनीताल के वाइस चैयरमैन भी रहे थे।
पिता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने शरदोत्सव में मुशायरे की पंरपरा को जारी रखा। उनकी पिता की सामाजिकता को आगे बढ़ाते हुए उनकी दुकान अपने रंग बदलती रही। सुनार के बाद ड्राईक्लीनिंग और एस.टी.डी. के बाद कम्प्यूटर आ जाने के बाद कम्प्यूटर टाइपिंग और कम्प्यूटर के अन्य कामों के अलावा उन्होंने लड़कियों को कम्प्यूटर की ट्रेनिंग देने का भी काम किया। इतने तरह के काम करने के बाद दरअसल किसी काम में उन्हें विशेष सफलता नहीं मिली, हां कामचलाऊ रोजगार चलता ही रहा। उनकी सामाजिकता और मस्त स्वभाव दुकानदारी में फिट नहीं बैठती थी। बहरहाल उन्होंने अपनी सभी लड़कियों को अच्छी शिक्षा दिलवायी और सभी लड़कियां टीचर बनी।
दरअसल अहमद साहब उस जमाने के नैनीताल की एक खास पहचान थे। जिस जमाने में अंग्रेजियत थी, शिष्टाचार था, नैनीताल से प्यार था, यहां की परंपराओं की संजोकर रख कर आगे बढ़ाने का स्वभाव था। ऐसे लोग एक तरह से नैनीताल की विरासत के प्रतीक थे। उनके जाने से नैनीताल उनकी कमी हमेशा महसूस करता रहेगा। उनकी खड़ी बाजार के ठहाके, ताने, गंभीर चर्चाऐं याद आती रहेंगी। अलविदा अहमद साहब।































