विनीता यशस्वी
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है, लेकिन पहाड़ में रहने वाले आम आदमी के लिए गंभीर बीमारी आज भी किसी परीक्षा से कम नहीं। गांव के नजदीक स्वास्थ्य केंद्र है तो वहां डॉक्टर नहीं, डॉक्टर है तो विशेषज्ञ नहीं, विशेषज्ञ है तो जरूरी जांच की सुविधा नहीं और जांच हो भी जाए तो गंभीर मरीज को जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज के लिए रेफर कर दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में बीमारी के साथ-साथ मरीज के परिवार की जेब पर भी बोझ बढ़ता जाता है।
उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि राज्य में अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों का नेटवर्क लगातार बढ़ा है, लेकिन इलाज की उपलब्धता और उसकी गुणवत्ता अभी भी भौगोलिक स्थिति और अस्पताल में मौजूद मानव संसाधन पर निर्भर है। मैदानी क्षेत्रों में बड़े अस्पतालों और विशेषज्ञ डॉक्टरों की अपेक्षाकृत बेहतर उपलब्धता है, जबकि पर्वतीय जिलों में प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पतालों तक विशेषज्ञों की कमी बनी हुई है।
स्वास्थ्य विभाग की ओर से अप्रैल 2026 में जिला-वार पीएमएचएस डॉक्टर कैडर के स्वीकृत और रिक्त पदों की जानकारी जारी की गई। दूसरी ओर 2026 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को मेडिकल ऑफिसर और विशेषज्ञ चिकित्सकों के 47 रिक्त पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया चलानी पड़ी। इनमें 27 मेडिकल ऑफिसर और 20 विशेषज्ञ चिकित्सक शामिल थे। विशेषज्ञ पदों में स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और एनेस्थेटिस्ट जैसे महत्वपूर्ण पद भी शामिल रहे। यानी समस्या केवल डॉक्टरों की संख्या की नहीं, बल्कि सही विशेषज्ञ को सही जगह उपलब्ध कराने की है।
कुमाऊं की स्थिति इसका स्पष्ट उदाहरण है। सितंबर 2025 की उपलब्ध जिला-स्तरीय रिपोर्ट के अनुसार मंडल में चिकित्सकों के 1,039 स्वीकृत पदों में 432 खाली थे। यानी करीब 42 प्रतिशत पद रिक्त थे। विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थिति इससे भी चिंताजनक रही है। 2023 के उपलब्ध आंकड़ों में कुमाऊं के छह जिलों में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 500 स्वीकृत पदों में केवल 180 पर तैनाती थी और 320 पद खाली थे।
नैनीताल, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत के पुराने उपलब्ध आंकड़े ही स्थिति की गंभीरता समझने के लिए पर्याप्त हैं। नैनीताल में विशेषज्ञों के 173 स्वीकृत पदों में 72 पर तैनाती और 101 पद रिक्त थे। अल्मोड़ा में 110 में से 40 पद भरे थे और 70 खाली थे। पिथौरागढ़ में 63 में से केवल 18 पदों पर विशेषज्ञ उपलब्ध थे और 45 रिक्त थे। बागेश्वर में 35 में से 12 पद भरे और 23 खाली थे, जबकि चंपावत में 13 में से आठ पदों पर तैनाती थी और पांच रिक्त थे।
इन आंकड़ों को 2026 की वर्तमान स्थिति का आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा, क्योंकि बाद में नियुक्तियां और स्थानांतरण हुए हैं। लेकिन ये आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि पर्वतीय क्षेत्रों में विशेषज्ञों की कमी कोई नई समस्या नहीं है, बल्कि लंबे समय से चली आ रही संरचनात्मक समस्या है।
नैनीताल जिला स्वास्थ्य सुविधाओं के लिहाज से दूसरे पर्वतीय जिलों से बेहतर स्थिति में दिखाई देता है। हल्द्वानी में मेडिकल कॉलेज और बड़े अस्पताल हैं, लेकिन यही स्थिति दूसरी समस्या भी पैदा करती है। कुमाऊं के कई जिलों के गंभीर मरीज अंततः हल्द्वानी पहुंचते हैं। इसका अर्थ है कि एक बड़े चिकित्सा केंद्र पर पूरे मंडल का दबाव बढ़ता जाता है।
नैनीताल शहर का बीडी पांडे जिला अस्पताल भी इस दबाव से अछूता नहीं है। 2026 में अस्पताल से विशेषज्ञ डॉक्टरों के तबादलों को लेकर मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा। छह विशेषज्ञों के तबादले और उनके स्थान पर सामान्य चिकित्सकों तथा एक विशेषज्ञ की तैनाती को लेकर सवाल उठे। इससे यह प्रश्न सामने आया कि विशेषज्ञों की कमी से जूझ रहे पर्वतीय जिला अस्पतालों में उपलब्ध विशेषज्ञों को हटाने की नीति कितनी प्रभावी है।
नैनीताल जिले में भी 2026 की एनएचएम भर्ती के दौरान मेडिकल ऑफिसर और बाल रोग विशेषज्ञ जैसे पदों की जरूरत सामने आई।
अल्मोड़ा लंबे समय से कुमाऊं के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण चिकित्सा केंद्र रहा है। लेकिन जिले की सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था में विशेषज्ञों की कमी लगातार चिंता का विषय रही है।
2025 की रिपोर्ट के अनुसार जिले की नौ सीएचसी में विशेषज्ञ चिकित्सकों के 47 पद रिक्त थे। कई केंद्रों में महिला और बाल रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं थे। भिकियासैंण सीएचसी तक संविदा डॉक्टर के भरोसे चलने की स्थिति सामने आई।
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए विशेषज्ञों की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण है। 2022 के उपलब्ध आंकड़ों में अल्मोड़ा में स्त्री रोग विशेषज्ञों के 18 स्वीकृत पदों में केवल सात पर तैनाती थी। इसका सीधा असर उन महिलाओं पर पड़ता है जिन्हें प्रसव या गर्भावस्था की जटिल स्थिति में स्थानीय स्तर पर विशेषज्ञ सेवा की आवश्यकता होती है।
पिथौरागढ़ में डॉक्टरों की कमी का असर भौगोलिक परिस्थितियों के कारण और गंभीर हो जाता है। सीमांत गांवों से जिला अस्पताल तक पहुंचना ही कई परिवारों के लिए कठिन है। इसके बाद यदि विशेषज्ञ उपलब्ध न हो तो मरीज को हल्द्वानी या किसी अन्य बड़े चिकित्सा केंद्र का रास्ता पकड़ना पड़ता है।
2023 के उपलब्ध आंकड़ों में पिथौरागढ़ में विशेषज्ञ डॉक्टरों के 63 स्वीकृत पदों में 45 रिक्त थे। यानी लगभग 71 प्रतिशत पद खाली थे। 2026 की एनएचएम भर्ती में भी जिले में मेडिकल ऑफिसर और बाल रोग विशेषज्ञ के पदों की आवश्यकता सामने आई।
यहां डॉक्टर की एक रिक्ति का अर्थ केवल एक खाली कुर्सी नहीं है। इसका अर्थ कई बार मरीज के लिए घंटों की अतिरिक्त यात्रा और परिवार के लिए हजारों रुपये का अतिरिक्त खर्च है।
चंपावत में 2025 की रिपोर्ट के अनुसार जिला अस्पताल, उप जिला अस्पताल लोहाघाट, टनकपुर और अन्य स्वास्थ्य संस्थानों में 111 स्वीकृत पदों के मुकाबले केवल 60 डॉक्टर तैनात थे। 51 पद खाली थे। जिला अस्पताल में 36 में से 11 और लोहाघाट में 21 में से 10 पद रिक्त बताए गए।
जिले में हृदय रोग, न्यूरो सर्जरी, यूरोलॉजी, मानसिक रोग और माइक्रोबायोलॉजी जैसी विशेषज्ञ सेवाओं की कमी भी सामने आती रही है।
इसका मतलब है कि अस्पताल का भवन मौजूद होने के बावजूद जटिल बीमारी का इलाज स्थानीय स्तर पर संभव नहीं है।
बागेश्वर जिला अस्पताल पर स्थानीय आबादी के साथ आसपास के क्षेत्रों के मरीजों का भी दबाव रहता है। 2025 की रिपोर्ट में अस्पताल में ईएनटी विशेषज्ञ की कमी सामने आई थी। अस्पताल करीब तीन लाख की आबादी की स्वास्थ्य जरूरतें संभालता है और सीमावर्ती क्षेत्रों से भी मरीज यहां पहुंचते हैं।
पुराने आंकड़ों में बागेश्वर में विशेषज्ञों के 35 स्वीकृत पदों में केवल 12 पर तैनाती थी। 23 पद रिक्त थे। 2026 की भर्ती प्रक्रिया में भी जिले में मेडिकल ऑफिसर और बाल रोग विशेषज्ञ की जरूरत सामने आई।
बागेश्वर में किसी विशेषज्ञ की कमी का असर सिर्फ बागेश्वर के मरीज पर नहीं पड़ता। आसपास के जिलों के मरीजों को भी दूसरे चिकित्सा केंद्रों की ओर जाना पड़ सकता है।
पौड़ी की स्थिति कुछ अलग है। श्रीनगर में मेडिकल कॉलेज होने के कारण उच्च चिकित्सा का महत्वपूर्ण केंद्र मौजूद है। इसके बावजूद जिला और उपजिला अस्पतालों में डॉक्टरों और विशेषज्ञों की उपलब्धता एक चुनौती बनी हुई है।
2025 में जिला अस्पताल पौड़ी को पीपीपी मॉडल से सरकारी व्यवस्था में वापस लेने के बाद 18 डॉक्टरों, जिनमें सात विशेषज्ञ शामिल थे, की तैनाती की जानकारी दी गई। नर्सिंग और पैरामेडिकल कर्मचारियों की भी नियुक्ति हुई।
लेकिन श्रीनगर उपजिला अस्पताल में बाद में स्वीकृत पदों के मुकाबले डॉक्टरों की कमी की खबर सामने आई। कई विभागों में एक ही डॉक्टर होने के कारण उसके अवकाश पर जाने पर पूरी सेवा प्रभावित होने की स्थिति बनी।
यानी नियुक्तियां जरूरी हैं, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है नियमित और स्थायी उपलब्धता।
चमोली में स्वास्थ्य व्यवस्था की चुनौती को केवल रिक्त पदों से नहीं समझा जा सकता। यहां दूरी, मौसम, सड़क और दुर्गमता डॉक्टरों की उपलब्धता को प्रभावित करते हैं।
जुलाई 2026 में गोपेश्वर जिला अस्पताल में बाल रोग विशेषज्ञ, ईएनटी सर्जन और नेत्र रोग विशेषज्ञ की सेवाएं प्रभावित हुईं। अलग-अलग कारणों से विशेषज्ञों के पद खाली हुए। इससे पहले भी विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती में देरी की खबरें सामने आई थीं।
हालांकि 2025 में जिले के विभिन्न सरकारी अस्पतालों के लिए 20 नए डॉक्टरों की तैनाती के आदेश भी हुए थे। इससे पता चलता है कि सरकार नियुक्तियां कर रही है, लेकिन दुर्गम क्षेत्रों में डॉक्टरों को लंबे समय तक रोकना अभी भी चुनौती है।
उत्तरकाशी में स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का असर स्थानीय आबादी के साथ चारधाम यात्रियों पर भी पड़ता है। नौगांव सीएचसी में 2025 में विशेषज्ञ डॉक्टरों के आठ पद रिक्त बताए गए थे। एक समय वहां एक भी विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध न होने की रिपोर्ट सामने आई।
रिपोर्ट के अनुसार सामान्य बीमारी के लिए भी मरीजों को करीब 150 किलोमीटर तक जाना पड़ सकता था। 2026 में भी नौगांव सीएचसी में विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी की समस्या सामने आई।
चारधाम यात्रा मार्ग पर यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है। यह राज्य की पर्यटन व्यवस्था और आपातकालीन चिकित्सा क्षमता से भी जुड़ा प्रश्न है।
उत्तराखंड में रेफरल व्यवस्था जरूरी है। हर अस्पताल में हर विशेषज्ञ और हर सुविधा उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब रेफरल व्यवस्था इलाज की सामान्य प्रक्रिया बन जाए।
गांव से पीएचसी, पीएचसी से सीएचसी, सीएचसी से जिला अस्पताल और फिर मेडिकल कॉलेज—इस पूरी श्रृंखला में मरीज के साथ उसका परिवार भी चलता है।
हर चरण पर यात्रा का खर्च जुड़ता है। गंभीर बीमारी में एंबुलेंस या टैक्सी का खर्च, साथ आए परिजन का भोजन और रहने का खर्च, बाहर की जांच, दवा और काम से छुट्टी के कारण होने वाली आय का नुकसान—ये सभी खर्च मिलकर सरकारी इलाज को भी परिवार के लिए महंगा बना देते हैं।
इसलिए स्वास्थ्य खर्च का आकलन केवल अस्पताल के बिल से नहीं किया जा सकता। उत्तराखंड के पहाड़ में मरीज के लिए अस्पताल तक पहुंचने की दूरी भी इलाज की कीमत का हिस्सा है।
निजी अस्पताल : विकल्प से मजबूरी तक
सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ नहीं मिला तो मरीज निजी अस्पताल की ओर जाता है। सरकारी अस्पताल में जांच की सुविधा नहीं मिली तो निजी लैब का सहारा लिया जाता है। गंभीर बीमारी में स्थानीय सरकारी अस्पताल से रेफर होने के बाद निजी अस्पताल कई परिवारों के लिए मजबूरी बन जाता है।
निजी अस्पताल स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और कई जगह उनकी विशेषज्ञ सेवाएं बेहतर भी हैं। समस्या यह है कि जब सरकारी व्यवस्था कमजोर होती है तो निजी अस्पताल विकल्प नहीं, मजबूरी बन जाते हैं।
आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने निश्चित रूप से गरीब परिवारों को बड़ी राहत दी है। लेकिन आयुष्मान कार्ड होने का मतलब यह नहीं कि बीमारी से जुड़े सभी खर्च समाप्त हो जाते हैं। अस्पताल तक पहुंचना, कुछ प्रारंभिक जांच, यात्रा और साथ आए परिजन का खर्च कई बार परिवार को ही उठाना पड़ता है।
स्वास्थ्य सेवा में मरीज सबसे कमजोर स्थिति में होता है। उसे इलाज चाहिए और वह अक्सर अस्पताल की व्यवस्था पर निर्भर होता है। ऐसे में यदि किसी योजना के तहत मुफ्त इलाज का दावा किया गया हो और फिर मरीज से अनधिकृत राशि ली जाए तो मामला और गंभीर हो जाता है।
जून 2026 में आयुष्मान योजना से जुड़े तीन अस्पतालों पर कार्रवाई की गई थी। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार कुछ मामलों में मरीजों से अवैध धनराशि वसूलने की शिकायतें सही पाई गईं।
ऐसी घटनाएं पूरे सरकारी स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े करती हैं। इसलिए मरीज को स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए कि कौन-सी सेवा मुफ्त है, कौन-सी जांच योजना में शामिल है, कौन-सी दवा अस्पताल की जिम्मेदारी है और किस स्थिति में शुल्क लिया जा सकता है।
स्वास्थ्य सेवा में पारदर्शिता केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं है। यह मरीज के अधिकार का सवाल है। कई बार स्वास्थ्य का आर्थिक बोझ किसी एक बड़े ऑपरेशन से नहीं बल्कि छोटे-छोटे खर्चों से बढ़ता है।
सरकारी अस्पताल में डॉक्टर को दिखाया, लेकिन दवा बाहर से खरीदनी पड़ी। अस्पताल में जांच की सुविधा नहीं थी तो निजी लैब जाना पड़ा। एक्स-रे, अल्ट्रासाउंड या दूसरी जांच के लिए दूसरे शहर जाना पड़ा। विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं था तो फिर यात्रा करनी पड़ी। इन छोटे-छोटे खर्चों का कुल योग गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बहुत बड़ा हो सकता है।
यही कारण है कि किसी सरकारी अस्पताल की गुणवत्ता का आकलन केवल यह देखकर नहीं होना चाहिए कि वहां डॉक्टर कितने हैं। यह भी देखना होगा कि मरीज को इलाज के लिए अस्पताल से बाहर कितनी बार जाना पड़ता है।
स्वास्थ्य व्यवस्था केवल डॉक्टरों से नहीं चलती। नर्स, लैब टेक्नीशियन, रेडियोग्राफर, फार्मासिस्ट, सफाई कर्मचारी और एंबुलेंस सेवा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।
2026 में स्वास्थ्य विभाग में विभिन्न पदों पर भर्ती की प्रक्रिया में बड़ी संख्या में वार्ड बॉय और अन्य सहायक कर्मचारियों के पदों का खाली होना भी सामने आया। इसका अर्थ है कि अस्पताल की समस्या केवल डॉक्टरों की कमी तक सीमित नहीं है।
एक विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध हो लेकिन जांच करने वाला तकनीशियन न हो तो विशेषज्ञ की क्षमता भी सीमित हो जाती है। अस्पताल में मशीन हो लेकिन उसे चलाने वाला प्रशिक्षित कर्मचारी न हो तो वह मशीन भी बेकार साबित हो सकती है।
स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। सरकार ने विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्तियां की हैं, नए पदों पर भर्ती प्रक्रिया चलाई है और पर्वतीय जिलों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के प्रयास किए हैं।
2025 में 29 विशेषज्ञ चिकित्सकों की नई तैनाती की गई। 2026 में जिला-वार रिक्त पदों की जानकारी जारी हुई और नए डॉक्टरों की नियुक्ति तथा तबादलों की प्रक्रिया जारी रही। राज्य में विशेषज्ञ डॉक्टरों के लिए अलग कैडर बनाने की चर्चा भी सामने आई है।
लेकिन इन प्रयासों की सफलता का वास्तविक पैमाना कागज पर नियुक्त डॉक्टरों की संख्या नहीं बल्कि यह होगा कि वे दुर्गम अस्पतालों में कितने समय तक टिकते हैं और मरीज को वास्तव में कितने दिन विशेषज्ञ सेवा उपलब्ध रहती है।
उत्तराखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट केवल “डॉक्टर नहीं हैं” कह देने से खत्म नहीं होता। सवाल यह है कि कितने अस्पतालों में डॉक्टर नियमित उपलब्ध हैं? कितने अस्पतालों में विशेषज्ञ हैं? कितने अस्पतालों में जरूरी जांच हो सकती है ? कितने अस्पतालों में ICU और आपातकालीन सेवा वास्तव में 24 घंटे चलती है? कितने मरीजों को केवल इसलिए रेफर किया जाता है क्योंकि स्थानीय अस्पताल में विशेषज्ञ या उपकरण उपलब्ध नहीं है? और सबसे महत्वपूर्ण—इलाज कराने के बाद मरीज का परिवार आर्थिक रूप से कितना कमजोर होता है? पहाड़ में स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा इन्हीं सवालों से होगी।
सरकारी अस्पताल मजबूत होगा तो निजी अस्पताल मरीज के लिए विकल्प रहेगा। सरकारी अस्पताल कमजोर होगा तो वही निजी अस्पताल उसके लिए मजबूरी बन सकता है।
इसी तरह स्थानीय अस्पताल में विशेषज्ञ उपलब्ध होगा तो रेफरल जरूरत के मुताबिक होगा। विशेषज्ञ नहीं होगा तो रेफरल पूरी व्यवस्था का हिस्सा बन जाएगा।
उत्तराखंड में अब स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य केवल हर गांव और कस्बे के पास अस्पताल की इमारत खड़ी करना नहीं होना चाहिए। लक्ष्य यह होना चाहिए कि उस अस्पताल में डॉक्टर हों, विशेषज्ञ हों, जांच हो, दवा हो, तकनीकी स्टाफ हो और जरूरत पड़ने पर मरीज को समय पर उच्च चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाने की भरोसेमंद व्यवस्था हो।
क्योंकि पहाड़ में बीमारी से लड़ाई केवल अस्पताल के बिस्तर पर नहीं लड़ी जाती। मरीज को कई बार सड़क, दूरी, मौसम, रेफरल और पैसे—इन सभी से एक साथ लड़ना पड़ता है।
और अंततः स्वास्थ्य व्यवस्था की सफलता का सबसे बड़ा पैमाना बजट या भवन नहीं, बल्कि वह आम आदमी है जो बीमारी की हालत में अस्पताल पहुंचता है और यह उम्मीद करता है कि इलाज मिलेगा—बिना अपना घर-बार गिरवी रखे।
यही उत्तराखंड के स्वास्थ्य तंत्र के सामने सबसे बड़ा सवाल है—पहाड़ में अस्पताल तो हैं, लेकिन क्या पहाड़ के आदमी को उसके घर के पास इलाज भी मिल रहा है?
(लेख के लिए सभी आंकड़े AI ने उपलब्ध कराए हैं।)
फोटो इंटरनेट से साभार































