गोविंद पंत ‘राजू’
ओवर टूरिज्म हिमालयी इलाकों की एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है।प्रत्यक्ष रूप में तो इससे इन क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था में सुधार दिखाई देता है लेकिन इसके दूरगामी परिणाम बहुत चिंता दायक हैं। यूरोप के कुछ देशो में इस समस्या के खिलाफ स्थानीय जनता लगभग 10 वर्ष पहले आवाज उठा चुकी है और उसके बाद से वहां पर्यटकों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के लिए कुछ उपाय भी किये जा रहे हैं। लेकिन अपने भारत में इस बारे में अभी कोई काम होना तो दूर, किसी को इस दिशा में सोचने की जरूरत भी महसूस नहीं हुई है।
सरकारें बढ़ती भीड़ के आंकड़े प्रदर्शित कर फूल कर कुप्पा हुई जा रही हैं और अपनी वाहवाही करवा कर मुग्ध हुई जा रही हैं।इस वर्ष जम्मू कश्मीर में श्रीनगर में डल झील के किनारे दो तीन घंटे तक के ट्रैफिक जाम बहुत आम हो गए थे। गुलमर्ग केबल कार के लिए पर्यटकों को चार पांच घंटे तक लाइन में खड़ा होना पड़ा था। हिमाचल में किसी सड़क का नाम ले लीजिए वहां वाहनों की लंबी कतारें ही दिखती हैं। उत्तराखंड में मसूरी – नैनीताल हो या बद्रीनाथ – केदारनाथ हर जगह भीड़ का हाहाकार है। कैंची धाम ने अल्मोड़ा की दिशा में आने जाने वालों की मुसीबत कर रखी है।
इस भीड़ ने स्थानीय संसाधनों से लेकर स्थानीय ईकोसिस्टम तक हर चीज का संतुलन खत्म कर दिया है।पेयजल संकट, निष्कृष्ट कूड़ा प्रबंधन,ध्वनि और वायु प्रदूषण,अत्यधिक और अनियंत्रित निर्माण कार्य, वाहन और मानव दबाव से विश्व के सबसे नए पहाड़ यानी हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में लगातार बिगड़ता भूगर्भीय परिदृश्य सब इसी अति पर्यटन के प्रभाव हैं। राजनीति के लिये यह भीड़ अपनी जेबें भरने का सुनहरा अवसर बन गया है,इस लिए वहाँ से कोई उम्मीद करना बेकार है। एनजीटी या न्याय पालिका भी छोटे मोटे हस्तक्षेप के अलावा सरकारों को सही काम करने के लिए बहुत कुछ कह पाने की स्थिति में दिखती नहीं है।आल वैदर रोड के मामले में इसका प्रमाण पहले ही मिल चुका है।औली बुग्याल में जालसाज गुप्ता बंधुओं के परिवार की अत्यधिक महंगी शादियों वाले प्रकरण में उत्तराखंड हाईकोर्ट के निर्णय की बेचारगी न्याय पालिका की सीमाओं को बता चुकी है ।
उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल में होने वाले बटर फेस्टीवल के में भीड़ कम रखने का फैसला शायद इसलिये आ पाया क्योंकि उसमें कोई मोटी पार्टी बीच में नहीं थी। डेढ़ शताब्दी से भी अधिक समय तक अपने सवालों पर आंदोलित होती रही उत्तराखंड की जनता भी फिलहाल इस मुद्दे पर किसी संगठित प्रतिरोध के साथ सामने आती नहीं दिखाई दे रही।हालांकि इस बढ़ती जा रही भीड़ से पीड़ित स्थानीय जनता अपने स्तर पर अब छिटपुट आवाज उठाने लगी है। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर इलाके के कुछ गांवों में इस बार स्थानीय लोगों ने पर्यटकों से अपने इलाके में न आने का अनुरोध किया था ।इसके लिए साइन बोर्ड लगाकर चेताया भी गया था। उत्तराखंड में भी इस तरह की छिटपुट कोशिश हुई थी।
लेकिन इस मामले में अब तक की सबसे बड़ी पहल और संगठित कोशिश चमोली जिले के चोपता के पास स्थित तुंगनाथ और चंद्रशिला इलाके में हुई है।
तुंगनाथ और चंद्रशिला के बुग्गी घास के मैदानों अथवा बुग्यालों को बचाने के लिए स्थानीय लोगों, पुजारियों और युवाओं द्वारा चन्द्रशिला-तुंगनाथ बुग्याल बचाव अभियान के तहत व्यापक श्रमदान और संरक्षण कार्य शुरू किया गया है। इस अभियान की शुरुआत जुलाई से हुई । पहले चरण में पर्यटकों से चंद्रशिला आने जाने के लिए निर्धारित मार्ग पर ही चलने का अनुरोध किया गया था। दरसल चंद्रशिला आने जाने वाले पर्यटकों के शॉर्टकट के रास्ते अपनाने की वजह से चंद्रशिला बुग्याल में बड़ी मात्रा में भू कटाव होने लगा था और बारिश के पानी के कारण बुग्याल की मिट्टी बहुत तेजी से कट कर गहरी खाईयों में बदलने लगी थी ।बुग्याल संरक्षण में जुटे लोगों का उद्देश्य पर्यटकों द्वारा शॉर्टकट अपनाने और पानी के कटाव से नष्ट हो रहे बुग्यालों व मिट्टी के बहाव को रोकना है
संरक्षण कार्य में लगे स्थानीय ग्रामीणों व युवाओं द्वारा बुग्यालों में मिट्टी के कटाव को रोकने के लिए विशेष उपाय और जूट की रस्सियों की बैरिकेडिंग का उपयोग किया जा रहा है ताकि लोग तय मार्ग पर ही चलें। ट्रेक पर गलत रास्तों और पानी के बहाव से बन रही गहरी नालियों को ठीक किया जा रहा है ताकि पानी सीधे मंदिर या ढलान की मिट्टी को नुकसान न पहुँचाए। पर्यटकों से शॉर्टकट न लेने, तय ट्रेक पर ही चलने और कूड़ा न फैलाने का अनुरोध करने के साथ स्थानीय स्तर पर जन-भागीदारी बढ़ाई जा रही है। इसमें शिव के सबसे ऊंचे धाम तुंगनाथ में आस्था रखने वाले देश के अन्य इलाकों के लोग भी अपनी अपनी तरह से सहयोग कर रहे हैं।
चंद्रशिला शिखर समुद्र तल से लगभग 3,690 मीटर यानी 12,110 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।यह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में प्रसिद्ध तुंगनाथ मंदिर के ठीक ऊपर स्थित है। तुंगनाथ मंदिर से शिखर की दूरी लगभग 1.5 किलोमीटर है यहां से नंदा देवी, त्रिशूल, और चौखंबा जैसी हिमालय की चोटियों के 360-डिग्री मनोरम दृश्य दिखते हैं। पहले सीमित संख्या में ट्रैकिंग और फोटोग्राफी के शौकीन चंद्रशिला तक आते जाते थे लेकिन अब बढ़ती भीड़ के कारण चंद्रशिला क्षेत्र को अत्यधिक मानवीय दबाव, अनियंत्रित पर्यटन और पर्यावरण असंतुलन के कारण संरक्षण की जरूरत आन पड़ी है।
इस वर्ष 21 अप्रैल को कपाट खुलने के बाद जुलाई की शुरुआत तक ही तुंगनाथ धाम में 1,18,381 श्रद्धालु दर्शन कर चुके थे, इसमें सीधे चंद्रशिला जाने वाले पर्यटक शामिल नहीं हैं। चोपता-तुंगनाथ-चंद्रशिला मार्ग पर पर्यटकों व ट्रैकर्स की भारी भीड़ बढ़ने से प्लास्टिक, कचरा और गंदगी फैल रही है। अल्पाइन घास के मैदानों और देवदार-बुरांश के जंगलों में लगातार आवाजाही से मिट्टी का कटाव और वनस्पतियों को नुकसान पहुंच रहा है।मानव गतिविधियों और शोर-शराबे से स्थानीय वन्य जीवों , मोनाल और अन्य प्रजातियों का प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहा है।
हालांकि चोपता-तुंगनाथ-चंद्रशिला ट्रेकिंग क्षेत्र में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन और ट्रेकिंग के लिए सख्त नियम लागू हैं। इस इको-संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में प्लास्टिक ले जाने पर प्रतिबंध, ‘लीव नो ट्रेस’ (बिना निशान छोड़े यात्रा) सिद्धांत और कचरा वापस नीचे लाने के नियम प्रभावी हैं। केदारनाथ वन्यजीव प्रभाग और जिला प्रशासन द्वारा ट्रेक मार्ग पर सिंगल-यूज प्लास्टिक, पानी की बोतलें, पॉलीथीन और खाद्य सामग्री के रैपर ले जाने पर भी पूर्ण प्रतिबंध है। ‘कैरी इन, कैरी आउट’ नियम के तहत पर्यटकों और ट्रेकर्स को अपने साथ लाई गई प्लास्टिक की हर वस्तु या कचरे को वापस नीचे लाना अनिवार्य है।अल्पाइन घास के बुग्यालों और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए पर्यटकों को केवल तय किए गए ट्रेकिंग मार्ग पर ही चलने की अनुमति है,शॉर्टकट लेने की मनाही है। ट्रैक पर गंदगी फैलाने या कचरा छोड़ने वालों पर जिला प्रशासन और वन विभाग द्वारा कड़ी कार्रवाई और जुर्माने का प्रावधान है।
लेकिन असलियत में यह सब कब है चोपता बाजार से लेकर तुंगनाथ और ऊपर चंद्रशिला तक प्लास्टिक बोतले कचरा भरपूर मात्रा में देखा जा सकता है और अब तो भीड़ के आने जाने की वजह से चंद्रशिला क्षेत्र के समूचे गाल का अस्तित्व ही संकट में आगे गया है ठीक वैसा ही जैसा प्रसिद्ध औली बुग्याल के इलाके में हो रहा है। लेकिन कुछ अपने इलाके के प्रति संवेदनशीलता के कारण और कुछ तुंगनाथ और चंद्रशिला के प्रति आस्था रखने के कारण स्थानीय समाज अब इस इलाके के बचाव के लिए एकजुट हो उठा है।
चंद्रशिला बुग्याल के संरक्षण में प्रमुख रूप से स्थानीय पुजारी अभिषेक मैठाणी, स्थानीय युवा, ग्राम प्रधान तथा चोपता व तुंगनाथ क्षेत्र के व्यापारी जुड़े हैं।इन लोगों ने बांस और रस्सियों की मदद से बाड़ लगानी शुरू की है। भू कटाव वाले इलाकों में श्रमदान के जरिए पत्थर लगाकर पानी का प्रवाह बदलने का प्रयास भी किया जा रहा है।अगर इस वर्ष के पूरे पर्यटन सीजन में आने जाने वाले लोग निर्धारित मार्ग पर ही चलते रहे और मेड़बंदी ठीक-ठाक रही तो निश्चित तौर पर चंद्र शिला बुग्याल को बचाने का प्रयास कुछ हद तक सफल हो सकता है ।
हालांकि इसके पूरे नतीजे आने में अभी कई वर्ष लगेंगे लेकिन कम से कम स्थानीय नागरिकों द्वारा की जा रही इस पहल से एक उम्मीद तो जगती ही है।उत्तराखंड के संवेदनशील लोगों को इस प्रयास की सराहना करनी चाहिए और इसमें हर संभव मदद करनी चाहिए ।इस सिलसिले में एक और चिंताजनक पहलू अगली नंदा राजजात यात्रा भी है क्योंकि जिस तरह सरकार उस नितांत आस्था और परंपरा से जुड़ी यात्रा को एक तमाशे में बदलने का प्रयास करती रही है ,उसके चलते इस बार भारी संख्या में रील बाजों का भी वहां पहुंचना तय है।ऐसे में पहले से ही खतरा झेल रहे बेदनी और आली बुग्याल के इलाके में भारी मानव दबाव बढ़ने से गंभीर पर्यावरणीय क्षति होने की आशंका है ।
वह इलाका पहले से ही कीड़ा जड़ी दोहन की वजह से अनेक समस्याएं झेल रहा है और नंदा जात में कावड़ यात्रा जैसी भीड़ होने से हालात और भी खराब होंगे। पर्यावरण विद् और उत्तराखंड की चिंता करने वाले लोग अगर इस दिशा में कानून का सहारा लेने का प्रयास करें तो शायद रात की अनियंत्रित भीड़ को कुछ हद तक रोका जा सकता है और यह इस हिमालयी क्षेत्र के पर्यावरण संरक्षण के लिए बहुत जरूरी काम होगा।
फोटो इंटरनेट से साभार































