शीशपाल गुसाईं
कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका परिचय उनके पुरस्कारों से नहीं, बल्कि उनके कर्मों से मिलता है। कुछ लोग इतिहास लिखते हैं, कुछ लोग इतिहास बनाते हैं और कुछ ऐसे विरले होते हैं जो प्रकृति के साथ मिलकर भविष्य का इतिहास रचते हैं। पद्मश्री डॉ. कल्याण सिंह रावत ‘मैती’ ऐसे ही व्यक्तित्व हैं। उनका जीवन यह प्रमाणित करता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल वृक्षारोपण का कार्यक्रम नहीं, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच टूटते हुए भावनात्मक संबंधों को पुनः स्थापित करने का सतत प्रयास है।
दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में गुरुवार शाम को आयोजित “पर्यावरण संरक्षण के कुछ अभिनव प्रयोग और अनुभव” विषयक व्याख्यान वस्तुतः किसी औपचारिक भाषण से कहीं अधिक था। यह एक ऐसे साधक की जीवनयात्रा थी जिसने अपने अनुभवों, संघर्षों, सफलताओं और असफलताओं को समाज के सामने अत्यंत सहजता से रखा। मंच पर कोई प्रसिद्ध पर्यावरणविद नहीं, बल्कि पहाड़ का एक विनम्र शिक्षक बोल रहा था, जिसने जीवनभर यह सिद्ध किया कि यदि संकल्प सच्चा हो तो बिना सत्ता, बिना संसाधन और बिना प्रचार के भी समाज में बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।
डॉ. रावत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पर्यावरण को विज्ञान की शुष्क भाषा में नहीं, बल्कि भावनाओं की भाषा में समझते हैं। उनके लिए जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक स्मृति है। नदी केवल जलधारा नहीं, बल्कि सभ्यता की धड़कन है। मिट्टी केवल धरती नहीं, बल्कि पीढ़ियों की विरासत है। यही कारण है कि उनके हर प्रयोग में विज्ञान और संवेदना का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
उनके व्याख्यान का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह था कि उन्होंने बार-बार एक बात दोहराई—”पेड़ लगाना बड़ी बात नहीं है, पेड़ को जीवित रखना बड़ी बात है।” आज जब सरकारी आंकड़ों में करोड़ों पौधे लगाने की घोषणाएँ होती हैं, तब डॉ. रावत का यह वाक्य उन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी खड़ा करता है। वृक्षारोपण तब तक अधूरा है, जब तक उसके साथ मनुष्य का भावनात्मक रिश्ता नहीं जुड़ता।
इसी विचार ने 1995 में “मैती आंदोलन” को जन्म दिया। यह आंदोलन केवल पर्यावरण संरक्षण की योजना नहीं, बल्कि भारतीय पारिवारिक संस्कृति का अद्भुत पुनर्पाठ है। बेटी जब विवाह के बाद मायके से विदा होती है तो वह अपने पीछे एक पौधा रोपकर जाती है। वह पौधा उसकी स्मृतियों, उसके बचपन, उसके स्नेह और उसके मायके का जीवंत प्रतीक बन जाता है। माँ उस पौधे की देखभाल वैसे ही करती है जैसे अपनी बेटी की यादों की करती है। बेटी जब वर्षों बाद मायके आती है तो उस वृक्ष में अपना अतीत खोजती है।
शायद विश्व के किसी भी पर्यावरण आंदोलन ने प्रकृति को इतनी गहरी भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं दी होगी। यही कारण है कि मैती आंदोलन ने लाखों पौधों को केवल रोपा ही नहीं, बल्कि उन्हें जीवित भी रखा। पाँच लाख वृक्ष आज भी विभिन्न स्थानों पर फल, फूल और छाया दे रहे हैं। वे केवल वृक्ष नहीं हैं; वे लाखों परिवारों की जीवित स्मृतियाँ हैं।
डॉ. रावत के व्यक्तित्व का दूसरा अत्यंत प्रेरणादायक पक्ष उनका शिक्षक जीवन है। उन्होंने विद्यालय को केवल शिक्षा देने का स्थान नहीं माना, बल्कि समाज परिवर्तन की प्रयोगशाला बना दिया। उत्तरकाशी के राजगढ़ी में जब इंटर कॉलेज की भूमि पर अतिक्रमण होने लगा, तब उन्होंने प्रशासनिक आदेशों का इंतजार नहीं किया। उन्होंने उसी भूमि पर चालीस हजार पौधों की नर्सरी तैयार कर दी। जहाँ लोग भूमि पर कब्ज़ा करना चाहते थे, वहाँ हरियाली उग आई। विरोध करने वाले लोग भी अंततः उसी अभियान के सहभागी बन गए।
यह घटना केवल पर्यावरण संरक्षण की नहीं, बल्कि सामाजिक नेतृत्व की उत्कृष्ट मिसाल है। एक शिक्षक ने समाज की सोच बदल दी। उन्होंने संघर्ष को टकराव नहीं बनने दिया; उसे जनभागीदारी में बदल दिया। यही नेतृत्व की वास्तविक पहचान है।
राजगढ़ी का उल्लेख करते समय उनके भीतर इतिहास के प्रति गहरी संवेदना भी दिखाई देती है। टिहरी राज्य के प्रथम महाराजा सुदर्शन शाह द्वारा निर्मित राजमहल के अवशेषों को उन्होंने केवल खंडहर नहीं माना। उन्होंने वहाँ चबूतरे बनवाए, वृक्ष लगाए और कार्यक्रम आयोजित किए। इतिहास और प्रकृति का ऐसा सुंदर संगम विरले ही देखने को मिलता है। यह संदेश भी स्पष्ट है कि विरासत केवल इमारतों से नहीं, बल्कि उनके आसपास जीवित संस्कृति से बचती है।
रवांई घाटी के डख्याट गाँव का जंगल आज यदि हरा-भरा दिखाई देता है तो उसके पीछे केवल पौधे लगाने का श्रम नहीं, बल्कि वर्षों का धैर्य, विश्वास और सामाजिक सहभागिता है। यह जंगल डॉ. रावत की दूरदृष्टि का जीवंत दस्तावेज है। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया कि राजगढ़ी में बिताए गए वर्ष उनके पर्यावरणीय चिंतन के निर्माणकाल थे। वहीं से उनकी सोच परिपक्व हुई और आगे चलकर उसी ने मैती आंदोलन जैसी विश्वविख्यात पहल को जन्म दिया।
उनके व्याख्यान का एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग तिलाड़ी शहीद दिवस से जुड़ा था। उन्होंने शहीदों की स्मृति को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि वृक्षारोपण के साथ जोड़ दिया। सात-सात कन्याओं द्वारा जलकलश लाना, पौधों का अभिषेक करना और पूरे समाज का उसमें सहभागी होना—यह दृश्य किसी धार्मिक अनुष्ठान से कम नहीं था। प्रकृति और संस्कृति का ऐसा समन्वय भारतीय परंपरा की आत्मा को पुनर्जीवित करता है।
उनके कथन में बार-बार यह अनुभूति उभरकर आती है कि प्रकृति स्वयं देवत्व का स्वरूप है। उन्होंने कहा कि उसी कार्यक्रम के बाद उन्हें महसूस हुआ कि “प्रकृति ही देवी-देवता है।” यह वाक्य केवल आध्यात्मिक भाव नहीं, बल्कि पर्यावरण दर्शन का गहन सूत्र है।
टिहरी बाँध के डूब क्षेत्र से जुड़ा उनका प्रयोग भी असाधारण है। जब पूरी दुनिया डूबते शहर की इमारतों को देख रही थी, तब उन्होंने उसकी मिट्टी को बचाने का निर्णय लिया। टिहरी के पैंतीस ऐतिहासिक स्थलों की मिट्टी एकत्र कर बादशाहीथौल में उसी मिट्टी में वृक्ष रोपना केवल वृक्षारोपण नहीं था, बल्कि स्मृतियों का पुनर्जन्म था। यह प्रयोग बताता है कि इतिहास को केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जीवित प्रतीकों में भी संरक्षित किया जा सकता है।
उनकी संवेदनशीलता केवल वृक्षों तक सीमित नहीं है। वन्यजीव संरक्षण के प्रसंगों में भी उनका मानवीय दृष्टिकोण दिखाई देता है। राजगढ़ी क्षेत्र में जंगली जानवरों के शिकार के विरुद्ध उन्होंने बच्चों और ग्रामीणों को साथ लेकर अभियान चलाया। उन्होंने समाज को यह समझाया कि जंगल केवल मनुष्य के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव के अस्तित्व का आधार है।
डॉ. रावत का जीवन इस बात का भी उदाहरण है कि बड़े परिवर्तन के लिए बड़े पदों की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन एक शिक्षक के रूप में बिताया। न उनके पास सरकारी शक्ति थी, न कोई बड़ा संगठन, न आर्थिक संसाधन। फिर भी उन्होंने ऐसे प्रयोग किए जो आज राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उदाहरण बन चुके हैं। यही सच्चे कर्मयोग की पहचान है।
उनके व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक पक्ष उनकी अद्भुत सादगी है। पद्मश्री सम्मान प्राप्त करने के बाद भी वे सामान्य नागरिक की तरह सार्वजनिक बसों में यात्रा करते हैं। उनमें न पद का अहंकार है, न प्रसिद्धि का प्रदर्शन। आज जब समाज में उपलब्धियों का प्रदर्शन सामान्य प्रवृत्ति बन गया है, तब डॉ. रावत की विनम्रता उन्हें और अधिक ऊँचा बना देती है। वास्तव में महानता का सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि व्यक्ति जितना बड़ा होता है, उतना ही सरल होता जाता है।
व्याख्यान के अंतिम चरण में उन्होंने देहरादून और उत्तराखंड के भविष्य को लेकर जो चिंता व्यक्त की, वह केवल एक पर्यावरणविद की चिंता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति थी। उन्होंने कहा कि शहर फैल रहे हैं, आबादी बढ़ रही है, सड़कें छोटी पड़ रही हैं और पेड़ लगातार कट रहे हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में ऑक्सीजन, जल और हरियाली सबसे बड़ी चुनौती बन जाएँगे।
उन्होंने चीड़ के बढ़ते जंगलों और चौड़ी पत्ती वाले वनों के घटते क्षेत्र पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उनका मानना है कि हिमालय की बरसाती नदियाँ ही इस पर्वतीय प्रदेश की जीवनरेखा हैं और यदि जंगल नष्ट हुए तो ये नदियाँ भी धीरे-धीरे समाप्त हो जाएँगी। यह चेतावनी केवल उत्तराखंड के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए है।
वास्तव में डॉ. कल्याण सिंह रावत का जीवन हमें यह सिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण कानूनों से नहीं, संस्कारों से सफल होता है। पेड़ तब बचते हैं जब वे किसी की स्मृति बन जाते हैं। जंगल तब बचते हैं जब समाज उन्हें अपनी पहचान मान लेता है। और प्रकृति तब सुरक्षित रहती है जब मनुष्य स्वयं को उसका स्वामी नहीं, बल्कि संरक्षक समझता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि डॉ. रावत के प्रयोगों का गंभीर अध्ययन विश्वविद्यालयों, पर्यावरण संस्थानों और नीति-निर्माताओं द्वारा किया जाए। उनके मॉडल को केवल उत्तराखंड ही नहीं, बल्कि पूरे देश में अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने सिद्ध कर दिया है कि यदि पर्यावरण संरक्षण को संस्कृति और संवेदना से जोड़ दिया जाए, तो परिणाम स्थायी होते हैं।
डॉ. कल्याण सिंह रावत केवल एक पर्यावरणविद नहीं हैं; वे प्रकृति के ऐसे तपस्वी हैं जिन्होंने अपने जीवन को वृक्षों की छाया में, समाज की चेतना में और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य में समर्पित कर दिया। उनके लगाए हुए लाखों वृक्ष आने वाले समय में केवल ऑक्सीजन ही नहीं देंगे, बल्कि यह भी याद दिलाते रहेंगे कि एक साधारण शिक्षक भी अपने संकल्प से इतिहास बदल सकता है। उनका जीवन सचमुच इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि पेड़ केवल धरती पर नहीं उगते, वे मनुष्य के हृदय में भी उगते हैं। और जब हृदय में हरियाली बची रहती है, तभी धरती भी हरी-भरी रहती है।
चमोली जिले की पावन धरा कर्णप्रयाग के बैनोली गाँव में 19 अक्टूबर 1953 को जन्मे डॉ. कल्याण सिंह रावत ‘मैती’ को वन-संरक्षण के संस्कार अपने परिवार से ही विरासत में मिले। दादा जी के वन विभाग में रहने से जहाँ प्रकृति के प्रति प्रेम अंकुरित हुआ, वहीं पिता जी के ब्लॉक प्रमुख कर्णप्रयाग रहते हुए समाज-सेवा की प्रेरणा बलवती हुई—और इन्हीं संस्कारों की छाँव में मैती आंदोलन के युगपुरुष का निर्माण हुआ।
कार्यक्रम का संयुक्त संचालन लेखक एवं साहित्यकार डॉ. योगेश धस्माना तथा दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के प्रोग्राम एसोसिएट चंद्रशेखर तिवारी ने किया। इस अवसर पर पर्यावरण कार्यकर्ता एवं लेखक चंदन सिंह नेगी द्वारा लाए गए एक दर्जन फलदार पौधे पद्मश्री डॉ. कल्याण सिंह रावत ‘मैती’ तथा दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के पुस्तकालयाध्यक्ष श्री डी. के. पांडे के करकमलों द्वारा पर्यावरण प्रेमियों को वितरित किए गए। यह पहल पर्यावरण संरक्षण के प्रति सामूहिक जनभागीदारी और हरित भविष्य के संकल्प का प्रेरक संदेश बनकर उभरी।































