नैनीताल समाचारक् आदरणीय संपादक ज्यू ,नैनीताल समाचार दगै जुड़ी देश-विदेश .में बैठी आपु मिट्टी दगड़ प्यार करणी, हजारों हजार पाठक गण आपु सबू ते म्यर पैलाग, प्रणाम, सैमन्या।
आज हरियावक चिठ्ठी लिखण बखत मैं थोड़ा भावुक छन, किलै कि नैनीताल समाचार थैं पैली पैली म्यर जुड़नौक कारण लै यह हरयाव अंक रौ। यो बात 1980-81 की हुनेलि, जब पैल बार बिपिन त्याड ज्यू दुकान में मंैल य हरयावक् तिनड़ लागी अखबार लटकी देखौ। मैंल सोचो यो ले के बात भै। उत्सुकताल पढ़ो। भल लागो। तब बटी करीब-करीब नैनीताल समाचार दगै जुड्या रंई। आज जब सूचना्क इतु साधन मौत साधन है गईं, डिजिटल क्रांति हैगे, तब ले हम सबुकें नैनीताल समाचारक् इंतजार रूं, कीलेकि ययी ऊ अखबार छू जो हमार गर्भ नाल दगै जुड़ी, एक धाग छू, बंधन छू, और समाचारक् हरेला, होली और उतरैणी खास अंक हम सबन्के और ज्यादा मजबूतील समाचार दगै जोड़नी…!
आज यो चिट्ठी हरियावक् मौक में लिखणई और ययी साल हमारी उत्तराखंड राज्य बणी बेर हरियालक् ले 25 साल हुणई। राज्य गठनक् य 25 साल्क यात्रा हरियाली जस त कतई नि भै। भीतर रूढ़िक् जस औसाण एरो भ्यार कूंहूं हरियाव है रो…..।
लेकिन य मौक आशीषक् छू। संपादक ज्यू आपु तथा आपुण सब पाठकन्ते की य हरयाव भौत मुबारक हो। आशीष पूजो, ‘जी रय्या जाग रय्या, लाख हरियाली, लाख दशें, लाख बग्वाल, जी रम्या जाग रय्या, धरती जै चाकल भ्या, आकाश जस उच्च, सूरज जस त्राण हो तुम्मै, स्यावक जसी बुद्धि हो, दुब जस फलिया, सिल पिसी भात खाया, जांठि टेक बेर झाड़ जाया…।’
उत्तराखंड राज्य के इन 25 सालों में हताशा इतनी गहरी है कि हम अपनी बोली भाषा में भी लड़खड़ा रहे हैं। आगे की चिठ्ठी हिंदी में जारी रखते हुए मैं कहना चाहूँगा कि जितने कठिन संघर्ष से यह राज्य बना उतनी ही आसानी से इसके स्वप्न का गर्भपात हो गया…।
बच्चों की अच्छी शिक्षा और घर के दरवाजे पर स्वास्थ्य की सुविधा उपलब्ध हो, ऐसी उम्मीद के साथ नौजवान और बुजुर्ग राज्य आंदोलन के निर्माण में जुटे थे। लेकिन राज्य गठन के बाद पर्वतीय क्षेत्रों में 4,500 से अधिक प्राथमिक विद्यालय, 197 माध्यमिक विद्यालय और 50 से अधिक आईटीआई बन्द हों गए या मर्जर हो गए।
स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो। चारपाई और डोली में अस्पताल जाते हुए प्रसूता बच्चों को जन्म न दे, सड़क पर किसी की मौत न हो। इस उम्मीद के विपरीत राज्य गठन के बाद ढाई सौ से अधिक अतिरिक्त प्राथमिक केंद्र बंद और मर्जर के शिकार हो गए। प्रदेश में कुल मिलाकर डॉक्टरों की संख्या तो बढ़ी है, लेकिन उच्च पर्वतीय जनपदों में उत्तर प्रदेश के अनुपात से डॉक्टर कम हो गए। ए.एन.एम., जो गाँव-गाँव जाकर स्वास्थ्य का धागा बाँधती थीं, नई भर्तियाँ न होने के कारण उनकी संख्या में तेजी से कमी आ रही है.।
बागवानी के विकास में हिमाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री यशवंत सिंह परमार के माॅडल से उन्नति की राह देखने वाला उत्तराखंड बागवानी के मोर्चे पर भी फेल हो गया। बागवानी हाशिए पर चली गई। बागवानी निदेशालय का कृषि के साथ मर्जर हो गया। बागवानी सरकार की प्राथमिकता नहीं रही। नारायण दत्त तिवारी की सरकार और उसके बाद की सरकारों ने प्रदेश में मौजूद 108 सरकारी बागानों को निजी हाथों को देकर खुर्द कर दिया है। उद्यान विभाग में हर वर्ष हरेले के मौके पर अलग-अलग किस्म के दिखने वाले फलों के पौधे अब औपचारिकता में भी वितरित नहीं किये जाते। बीज में नए अनुसंधान नहीं हुए। परिणामस्वरूप पुरानी आड़ू, पुलम, खुमानी की फसलें कमजोर हो रही हैं।
इस पहाड़ी राज्य की पहचान राज्य गठन से पहले ‘नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन’ से भी थी। जिसके परिणामस्वरूप उत्तर प्रदेश सरकार ने पहाड़ के नौ जिलों में पहले पूर्ण नशाबंदी फिर नियंत्रित शराब की नीति अपनाई। अब सरकार की खुली शराब की नीति से इन पर्वतीय जिलों में लगभग 300 शराब की दुकानें हैं और इन 300 दुकानों के साथ 500 से अधिक उप दुकान हैं। यानी हर गांव की उस तोक, जिसकी आबादी 500 है, तक सरकार ने शराब पहुँचा दी है। कहने को इन दुकानों से लगभग 1,500 करोड़ का राजस्व मिल रहा है, लेकिन तस्करी और कालाबाजारी से यह आँकड़ा इससे कई गुना अधिक है।
राज्य गठन के बाद प्रदेश में जगह-जगह चुगान के नाम पर छोटी-छोटी नदियों को खनन के लिए खोल दिया गया है। निजी पट्टों की नीति को खुली बना दिया गया है। हालाँकि चुगान मैन्युअल है, लेकिन शायद ही कोई नदी ऐसी हो, जिसे जेसीबी के पंजे ने न चीरा हो। पर्वतीय क्षेत्र में खनन की सबसे भयावह तस्वीर बेतालघाट और बागेश्वर में देखी जा सकती है।
पर्यटन के नाम पर अति पर्यटन ने इस राज्य की शांति को ही भंग कर दिया है। मई-जून का महीना बद्रीनाथ केदारनाथ का मार्ग हो या खूबसूरत नैनीताल का, जाम में ऐसे फँसा रहता है कि स्थानीय निवासी भी इन महीनो के बीत जाने की प्रार्थना करते हैं। कैंची के नीब करौरी महाराज ने तो साल भर ही पहाड़ के लोगों के लिए एक नई परीक्षा शुरू कर दी है। यह पर्यटन काबू में आए, सरकार इस दिशा में कुछ सकारात्मक करती नजर नहीं आ रही है।
कुल मिलाकर चारों तरफ उदेख ही उदेख है। आप हरेले का तिनड़ा तो भेज रहे हैं, लेकिन भीतर के हालातो से आग जैसी लगी है। राज्य गठन के बाद पैदा होने वाले सौ पहाड़ियों में से 65 पलायन कर रहे हैं। इन 65 में से 47 का विवशता का पलायन है। यानी वह अपना घर, अपनी मिट्टी आँसू बहा कर छोड़ रहे हैं। इन आँसुओं को पोछने का कोई नीतिगत जतन सरकार करती नहीं दिखाई देती।
मगर उमाव और उदेख के बीच हरियाले की उम्मीद फिर बाकी है। आप सबको और नैनीताल समाचार के पाठकों को हरेले की बहुत-बहुत बधाई।
आपका
प्रमोद साह
हल्द्वानी भाबर से

































