राजीव लोचन साह
अपने प्रकाशन के चैथे साल यानी वर्ष 1981 से नैनीताल समाचार ने अपने पाठकों को छपा हुआ हरेले का तिनड़ा भेजना शुरू किया था और छठे वर्ष यानी 1983 से बाकायदा टोकरियों में उगाया हुआ असली हरेला। इसका बहुत अच्छा असर हुआ। हरेला कुमाऊँ का पारम्परिक लोक पर्व है। हर घर में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। मगर पूरे उत्तराखंड में यह सर्वत्र प्रचलित नहीं है। हालाँकि यह सचेत रूप में पर्यावरण से जुड़ा नहीं है, क्योंकि पर्यावरण तो बहुत हाल में गढ़ा गया शब्द है, मगर प्रकारान्तर में यह व्यक्ति को प्रकृति से तो जोड़ता ही है। हमारी इस पहल से पूरे उत्तराखंड की रुचि हरेले के लोकपर्व में जगी और यही हमारा अभीष्ट भी था। प्रकृति से छेड़छाड़ के नतीजे हम देखने लगे थे और सपना देखते थे कि जब कभी अपना राज्य होगा, हम अपनी किस्मत के स्वयं नियन्ता होंगे तो यह छेड़छाड़ नहीं होगी। हम प्रकृति का सम्मान करेंगे और प्रकृति अपना आशीर्वाद हरेले के तिनड़े के रूप में हमारे सिर पर रखेगी। उत्तराखंड राज्य बना और प्रदेश सरकार ने एक तरह से हरेले को राज्य पर्व के रूप में स्वीकार कर लिया। अनेक संस्थाओं के साथ-साथ सरकार के स्तर पर भी इस अवसर पर कार्यक्रम किये जाने लगे। मगर प्रकृति और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता तो बढ़ी नहीं। इसके विपरीत सरकारें प्रकृति को लेकर और अधिक निर्मम हो गयी। प्रकृति पर अत्याचार से उत्पन्न जलवायु परिवर्तन की विभीषिका हम लगातार देख रहे हैं। हिमालयी राज्य होने के कारण हमें अधिक सावधान रहना है। मगर चार धाम की आॅल वैदर रोड के बाद उत्तराखंड में प्रकृति के विनाश का सिलसिला इतना तेज हो गया है कि हर बरसात अब डरावनी लगने लगी है। जनता ज्यादा जागरूक हुई है। हर जगह भारी संख्या में वृक्षों का कटान किये जाने का विरोध चल रहा है। परन्तु चिपको की जननी गौरा देवी के नाम पर पुरस्कार बाँटने वाली सरकार न केवल इस विरोध को अनदेखा कर रही है, बल्कि कई जगह तो असहमति दबाने के लिये दमन तक कर रही है।
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