‘समकालीन तीसरी दुनिया’ जैसी श्रेष्ठ पत्रिका के संपादक और कई महत्वपूर्ण किताबों का बेहतरीन अनुवाद करने वाले, संघर्षशील पत्रकार आनन्द स्वरूप वर्मा ने 11 जुलाई को अपने जीवन के 83 वर्ष पूरे किये हैं। इस अवसर पर उन्हें शुभकामनाएं देते हुए हम उनके दीर्घ जीवन की कामना करते हैं। – संपादक
आनन्द स्वरूप वर्मा
अभी 11 जुलाई को मैंने उम्र के 83 साल पूरे कर लिए। इस अवसर पर अनेक मित्रों और शुभचिंतकों ने मेरे प्रति अपने जो उद्गार प्रकट किया और जो स्नेह दिया उससे अभिभूत हूं और उन्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिससे मेरे प्रति उनके भरोसे को ठेस लगे। फिलहाल पिछले दो ढाई वर्षो से स्वास्थ्य की समस्याओं से जूझ रहा हूं–शुरू में दिल के ‘माइट्रल वाल्व’ की गड़बड़ी और फिर किडनी से संबंधित ब्याधि जिसकी वजह से अस्पताल जाने- आने का सिलसिला शुरू हो गया। बावजूद इसके मन मस्तिष्क से इतना मजबूत महसूस करता हूं इन व्याधियों की भयावता पर ध्यान नहीं जाता और लिखने पढ़ने का काम बदस्तूर जारी रहता है।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं तो पाता हूं कि यह जीवन तो हमेशा संघर्ष से भरा रहा। निरंतर किसी रणभूमि के योद्धा की तरह सक्रिय रहना पड़ा और इस स्थिति ने ही वह जिजीविषा दी जिससे मन में न तो किसी तरह की निराशा पैदा हुई और न कभी अवसाद से ग्रस्त हुआ। 1966 में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया और लेखन को ही जीवन का अविभाज्य अंग बना लिया।
1974 में आकाशवाणी दिल्ली के हिंदी समाचार प्रभाग से निष्कासन ने जीवन की दिशा ही बदल दी। वह एक ऐसा क्षण था जिसमें कोई भी निर्णय लेना बहुत कठिन होता है। उन दिनों टेलीविजन का अस्तित्व नहीं था और आकाशवाणी का एक ग्लैमर था। देवकीनंदन पांडे, अशोक वाजपेयी, विनोद कश्यप जैसों की आवाज सुनकर बड़ा हुआ था और अब मैं उनका सहकर्मी हो गया था। अच्छे वेतन और ग्लैमर के अलावा मेरे लिए यह अतिरिक्त उपलब्ध थी।आकाशवाणी से निकाले जाने से मेरे आत्म सम्मान को चोट पहुंची थी। मैं स्टाफ के योग्यतम लोगों में गिना जाता था और सभी संपादक मुझे उसे टीम में रखते थे जिसकी जिम्मेदारी ‘लीड स्टोरी’ तैयार करने की होती थी। हिंदी यूनिट के तत्कालीन इंचार्ज ओमप्रकाश केजरीवाल ने मुझे अनौपचारिक तौर पर बताया था कि मेरे तीन वर्ष के कार्यकाल की ‘सी आर’ (कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट) क्रमशः उत्तम, उत्तम और असाधारण है। ऐसे में बिना कारण बताए, बिना कोई नोटिस दिए निकाल दिया जाना मुझे अपमानजनक लगा। मैंने तय किया कि इस अन्याय का प्रतिकार करूंगा। मेरे निष्कासन के मुद्दे पर आकाशवाणी के कर्मचारियों की यूनियन ने, जिसके महासचिव लेखक मित्र मुद्राराक्षस थे, आंदोलन शुरू किया।
आकाशवाणी से बाहर कवि मित्र पंकज सिंह आदि ने हस्ताक्षर अभियान चलाया और अखबारों तथा दिनमान सहित पत्र-पत्रिकाओं में हम लोगों के अग्रज सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने खुद भी लिखा और दूसरों से लिखवाया। इन सारी बातों का नतीजा यह होता था कि वे मेरी नौकरी बहाल कर देते थे पर 10-15 दिनों बाद फिर मुझे निकाल दिया जाता। कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष थे अशोक वाजपेयी। उन्होंने पता किया कि गृह मंत्रालय की रिपोर्ट मेरे खिलाफ है जिसमें बताया गया है कि नक्सलवाद से मेरे घनिष्ठ संबंध हैं, मैंने चारु मजुमदार को श्रद्धांजलि देने के लिए शोक सभा बुलाई थी, मेरा नाम एक नक्सलवादी नेता कि डायरी में मिला है आदि। फिर हमारा एक प्रतिनिधिमंडल अशोक वाजपेयी और मुद्राराक्षस के नेतृत्व में गृह सचिव निर्मल कुमार मुखर्जी से उनके कार्यालय में मिला। जून 1975 में इमरजेंसी लगने से पूर्व तक मुखर्जी भारत सरकार के गृह सचिव थे। मैंने उनसे कहा कि अगर मैं आकाशवाणी में रहते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा हूं तो आकाशवाणी के बाहर भी खतरा हूं। लिहाजा मेरी मांग है कि या तो मुझे गिरफ्तार कर मुझ पर मुकदमा चलाया जाए या मुझे अपने पद पर बहाल किया जाए। जवाब में मुखर्जी साहब ने चेहरे पर एक सौम्य मुस्कान लिए यही कहा कि मिस्टर वर्मा आपके साथ न्याय किया जाएगा।
मैं पश्चिम दिल्ली के टैगोर गार्डन की एक बरसाती में रहता था। मेरे सहकर्मी आते और मेरी पत्नी की मौजूदगी में ही मुझे समझाते कि सरकार से लड़ने का कोई फायदा नहीं है और एक अंडरटेकिंग देकर कि मैं सरकार विरोधी किसी राजनीतिक गतिविधि में भाग नहीं लूंगा, मामला समाप्त कर दूं। ख़ुफ़िया विभाग के लोग आकर मुझे समझाने कि आंदोलन और हस्ताक्षर अभियान मैं रुकवा दूं। वे पहले समझाते फिर धमकाते। मैं इन बातों से तनिक भी विचलित नहीं होता था। मेरा कहना था कि अगर मैं अपनी ड्यूटी निष्ठापूर्वक कर रहा हूं और अपने निजी जीवन में ऐसे किसी काम में शामिल नहीं हो रहा जिसकी संविधान मुझे इजाजत न देता हो तो मैं सरकार के सामने क्यों झुकूं?
मेरे अंदर यह ताकत आई कहां से? इसका बहुत बड़ा से श्रेय मेरी जीवन संगिनी माधुरी को जाता है जिन्होंने मेरे एक सवाल के जवाब में कहा था कि आप वही करिए जो आपका मन कहता है– मेरी चिंता मत करिए, मैं हर हाल में रह लूंगी। यह बात 1974 की है। इमरजेंसी की छाया मंडरा रही थी। मैं निकाल दिया गया और मेरे जीवन की धारा ने चट्टानों और कंकड़ पत्थरों वाली डगर पकड़ ली। आज माधुरी डिमेंशिया से पीड़ित हैं और उन्हें 24/7 मेरा साथ चाहिए। 50 साल से भी अधिक समय तक उन्होंने पूरी शिद्दत के साथ मेरी देखभाल की–अब यह काम मुझे करना है…
जिंदगी ऐसे ही चलती रहेगी। मेरे मित्रों ने हमेशा मेरा साथ दिया और उनकी शुभकामनाओं के बल पर मैं हंसते खेलते सारी मुसीबत का सामना करता आया हूं और कर रहा हूं। आप सब ने मेरे प्रति अपना स्नेह दिखाया इसके लिए आभार जैसा शब्द हल्का ही पड़ेगा।

































