हूबनाथ
मसखरे ने सोचा !
अनपढ़ राजा ने
मसखरे को
विश्वविद्यालय का
कुलपति बना दिया
मसखरे ने
विश्वविद्यालय को
विदूषकों का कोठा बना दिया
विदूषकों ने
राजा की बेवकूफ़ियों को
पाठ्यक्रम में शामिल किया
इस तरह
अनपढ़ राजा
पढ़े-लिखों की पांत में
सबसे ऊपर आन बैठा
आर्य चाणक्य ने कहा
कि अनपढ़ होना
कोई बुरी बात नहीं
बुरी बात है
अपने अनपढ़पन को
नंगेपन से ढांपने की
असफल कोशिश
मसखरे ने
अपनी मूर्खता को
अकादमिक नंगेपन से
ढंकने का प्रयास तो किया
किंतु इस प्रयास में
पूरा विश्वविद्यालय
नंगा हो गया
पूरी शिक्षा व्यवस्था
नंगी हो गई
आगे चलकर
यहां से निकलने वाले
नंगे स्नातक
कल जब
कपड़ों का व्यापार करेंगे
तब देख लेना बटुको!
दुनिया भर के कपड़े
पूरी निर्लज्जता से
नंगे हो जाएंगे
तब कपड़ों को
कपड़े कौन पहनाएगा
यह तुम सोचो
क्योंकि
सोचने की कूवत
न राजा में है
न मसखरे में
न विदूषकों में
ए शरीफ इंसानों
(शाहिर लुधायनवी की रचना का हिंदी में दिनेश उपाध्याय द्वारा भावानुवाद)
खून अपना हो या पराया हो
खून इंसान का ही तो है आखिर
युद्ध पूरब में हो या पश्चिम में
कत्ल दुनिया की शांति का ही तो है आखिर
बम घरों पर गिरें कि सीमा पर
भविष्य की रचनाओं की आत्मा घायल होती है
खेत अपने जलें या या औरों के
जिंदगी भुखमरी से तिलमिलाती है
टैंक आगे बढ़ें या पीछे हटें
गोद धरती की बांझ होती है
जीत का उत्सव हो या हार का दुख
जिंदगी लाशों पर रोती है
युद्ध तो खुद ही एक समस्या है
युद्ध क्या समस्याओं का हल करेगा
वर्तमान को खून और आग देगा
भविष्य को विरोध और भूख देगा
इसलिए ए सीधे-सादे ईसानों
युद्ध टलता रहे तो बेहतर है
आप और हम सभी के आंगन में
दीया जलता रहे तो बेहतर है































