कमल जोशी
संयोग से जिस समय हमारे लोकतंत्र की सबसे ऊंची संस्था में महिलाओं के लिये एक तिहाई सीटें आरक्षित करने जैसे बहुत बड़े मसले पर बहस हो रही थी एक स्थानीय नगर निकाय में बहुत ’तुच्छ’ सा मुद्दा बहस का विषय था- सार्वजनिक शौचालय तथा महिलाओं के लिये उपयोग शुल्क में रियायत। लेकिन मुद्दों और चर्चा के मंचों के बीच आसमान-पाताल का अंतर होने के बावज़ूद दोनों का हश्र समान हुआ। धड़ाम!
जैसा कि पूर्व प्रकाशित लेख- ’अल्मोड़ा बाजार में महिला शौचालय का मुद्दा…’ में सवाल उठा था कि हमारे सांस्कृतिक शहर की नाक शौचालय जैसी बुनियादी नहीं होने से कटनी चाहिये या विदेशी महिला पर्यटक द्वारा इस समस्या को प्रकट करने से?
संयोग से नगर में नवनिर्मित हाइटेक शौचालय के पास से गुजरते समय शुल्क के बारे में जिज्ञासावश पूछा तो दरें बहुत ज्यादा होने के साथ ही महिलाओं से पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा शुल्क लेने की बात मन में खटक गई। मन की बात सोशल मीडिया में मित्रों के साथ साझा की तो अन्य नगरों और प्रदेशों मंे रह रहे ’मित्रों’ की भी प्रतिक्रियाएं भी मिलीं। कारण यह रहा होगा कि शौचालय की सुविधा सबके लिये और सबसे ज्यादा ज़रूरी है। भूख-प्यास या नींद को देर तक सहन करने से भी कहीं ज्यादा कठिन काम है मलमूत्र को देर तक रोक पाना। अक्सर अनुभव किया है कि महिलायें सफर के दौरान या अपने कार्य स्थलों में प्रसाधन सुविधा न होने की स्थिति में बहुत कम पानी पीती हैं या पीती ही नहीं ताकि समस्या से बच सकें। मलमूत्र को देर तक शरीर में रोके रखने से असहनीय कष्ट के साथ ही गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।
पिछले अनेक दशकों से देश में चलाये गये स्वच्छता कार्यक्रमों व अभियानों से गांवों, कस्बों और शहरों में व्यक्तिगत व सार्वजनिक शौचालयों की संख्या तथा सुविधा निश्चित रूप से पहले की अपेक्षा काफी सुधरी है। लेकिन अभी भी इसमें सुधार की बहुत गुजाइश है। सोशल मीडिया पोस्ट पर आयी टिप्पणियों और सुझावों को पढ़ कर मन में विचार आया कि इस समस्या को प्रधानमंत्री के पोर्टल पर समाधान हेतु भेजना चाहिये क्योंकि मुद्दा तुच्छ सा भले ही लगता है लेकिन वास्तव में गंभीर होने के साथ ही देश व्यापी है तथा बड़ी आबादी से जुड़ा भी है।
यह घोर आश्चर्य (सुखद) की बात लगी कि प्रधानमंत्री के पार्टल पर 11 अप्रैल को शिकायत भेजी गयी और 12 अप्रैल को, दूसरे ही दिन इस पर विचार करके मुख्यमंत्री हेल्पलाइन होते हुए वहां से कार्यवाही के लिये नगर निगम तक पहुंच गया। दूसरा सुखद आश्चर्य यह था कि नगर निगम ने फोन द्वारा अगले ही कार्य दिवस को संपर्क किया तथा समस्या के व्यावहारिक समाधान के उपायों पर चर्चा भी की जिसमें उच्च अधिकारियों से लेकर सफाई कर्मचारियों (पर्यावरण मित्रों) के टोली नायक तक काफी लोग शामिल हुए। शुल्क में कमी कर इसे वहन करने लायक रखने और शुल्क की दरें लिखित रूप में होने पर सहमति हो गयी। लेकिन एक दूसरा मुद्दा, जो देश में अधिकतर सशुल्क प्रसाधनों में होता है कि मूत्र-विसर्जन के लिये पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं से ज्यादा शुल्क लिया जाता है। अनेक प्रसाधनों में पुरुषों सेे मूत्र-विसर्जन का कोई शुल्क नहीं लिया जाता लेकिन महिलाओं से शुल्क लिया जाता है। चर्चा में उनका कहना था कि पुरुषों के लिये यूरीनल अलग बने होते हैं जो सिर्फ मूत्र विसर्जन के लिये ही बने होते हैं जबकि महिलाओं के लिये अलग यूरीनल नहीं होते और वे इसके लिये शौचालय कक्ष का ही इस्तेमाल करती हैं। तर्क था कि महिलाओं के मामले में निजता का ध्यान रखना होता है जिस कारण यह पता नहीं लगा सकते कि बंद शौचालय कक्ष में उनके द्वारा मूत्र विसर्जन किया जा रहा हे या मल त्याग! संभवतः देश में अन्यत्र भी यही समस्या रहती होगी। लेकिन मुझे यह तर्क जितना हास्यास्पद लगा उतना ही निराशाजनक भी। जब पुरुषों के लिये अलग यूरीनल की व्यवस्था हो सकती है तब महिलाओं के लिये क्यों नहीं? यदि अलग यूरीनल कां इंतजाम नहीं है तो उनके लिये जो शौचालय कक्ष बने होते हैं उनके उपयोग पर शुल्क को अधिकतम की जगह न्यूनतम क्यों नहीं किया जा सकता? बंद शौचालय कक्ष का इस्तेमाल यदि कोई मूत्र विसर्जन की बजाय शौच के लिये कर भी दे तो इससे क्या पहाड़ टूट जायेगा? प्रलय हो जायेगा? महिलाओं से जुड़ी एक अन्य समस्या यह बतायी गयी कि कई बार उनके द्वारा इस्तेमाल किये गये सैनिटरी पैड इत्यादि सार्वजनिक शौचालयों में फ्लश कर दिये जाते हें जिससे शौचालय काम करना बंद कर देते हैं और बंद पाइपों को साफ करना पड़ता है। इस समस्या का हल वैकल्पिक इंतजाम- शौचालय कक्ष में ऐसे कचरे को फैंकने के बिन रख कर तथा इनके इस्तेमाल के प्रति जागरूक करके किया जा सकता है।
देश में आम तौर पर जो सार्वजनिक शौचालय/मूत्रालय मुफ्त हैं उनमें से ज्यादातर की हालत इस्तेमाल लायक नहीं रहती और जो साफ-सुथरे हैं उनका शुल्क ज्यादा होने के कारण सबके लिये सुलभ नहीं हैं। सुलभ का आशय सिर्फ सुविधा का होना नहीं है अपितु लोगों की सुविधा तक पहुंच होना भी आवश्यक है अन्यथा होने या न होने में क्या अंतर हैं? सरकार वर्तमान में राशन से लेकर वाई फाई तक तमाम तरह की सुविधायें तो निःशुल्क दे रही है, सरकारी/सत्तारूढ़ राजनीतिक दल के प्रचार-प्रसार व विज्ञापनों पर करोड़ों रुपयों का खर्च हो रहा है। ऐसे में नागरिकों के स्वास्थ, गरिमा और निजता के अलावा पर्यावरण की दृष्टि से मल/मूत्र विसर्जन की सुविधाओं के निर्माण और रखरखाव के वास्ते स्थानीय निकायों को वित्तीय सहयोग के बारे में सोचा जा सकता था।

































