पंकज उप्रेती
होली का जब भी प्रसंग छिड़ता है तो हम कुमाउँनी होली के स्वरूप पर बात करते हैं और खड़ी होली, बैठी होली के राग गिनाने लगते हैं। बीच में महिला होली के उत्साह पर भी चर्चा कर लेते हैं। लेकिन होली की बुनियाद को याद रखना भी जरूरी है। आजकल तो सोशल मीडिया की चकाचैंध में धूम-धड़ाम को ही होली मान लिया गया है। आश्चर्य होता है कि जिस गीत-संगीत, राग-फाग ने समाज को सँवारा हो, अब वह बाजार का हुल्लड़ मात्र बन कर रह गया है।
कुमाउँनी होली के लोक रंग दुनिया में अपनी तरह के हैं। हिमालय की प्रकृति के साथ इसका रंग गाढ़ा होता दिखाई देता है। कुमाऊँ में भी होली के लिये कुछ स्थान उल्लेखनीय हैं। जैसे खड़ी होली के लिये काली कुमूँ, गंगोली, सतराली तो बैठकी होली के लिये अल्मोड़ा, गंगोली, नैनीताल। इन्हीं शैलियों का धीरे-धीरे विकास हुआ और रानीखेत, बागेश्वर, लोहाघाट, हल्द्वानी तथा अन्य शहरों की ओर इसकी बढ़त दिखाई दी।
खड़ी होली के रंग तो हमारे ग्राम्य अंचल के चोखे हैं ही। पधान के घर पर होली के लिये जुटते ग्रामीण फिर मुख्य देवालय में चीरबन्धन के साथ होली शुरू करते हैं। तीन-चार दिन की होली के बाद, छरड़ी खेल, आशीष और भनारा (प्रसाद वितरण) के साथ समापन होता है। इससे घनी परम्परा बैठकी, यानी नागर होली की है, जिसमें अल्मोड़ा तो जड़ ही है लेकिन उसकी शाखायें सर्वत्र, यहाँ तक कि भाबर में भी फैलीं।
इस क्रम में हमें पहाड़ की होली की फसल भाबर में लहलहाने वाले कपिल दम्पत्ति को याद रखना चाहिए। भुवन चन्द्र कपिल और श्रीमती ज्ञानू कपिल का नाम भाबर में होली को सींचने में अग्रणी है। जंगल और मच्छरों के भँवर में जब लोग भाबर में बसने से डरते थे, उस दौर में कपिल परिवार हल्द्वानी आकर बस गया। बड़ा सा परिवार था। मुखानी चैराहे पर इनका परिवार रहता था।
पचास साल पहले तक मुखानी का क्षेत्र दादाओं का अड्डा माना जाता था और खुले में बहने वाली बरसाती नहर का वेग भयंकर दिखाई देता था। उस माहौल में भी मुखानी पर होने वाली पर्वतीय रामलीला की जड़ जमाने वालों में इस कपिल परिवार की अग्रणी भूमिका थी। लोग बैलगाड़ियों में तक बैठ कर रामलीला देखने चकलुआ, गैबुआ, कालाढूँगी इत्यादि से मुखानी आते थे। वर्तमान का मुखानी क्षेत्र देखकर पता ही नहीं चलता है कि कभी यहाँ पर मैदान भी हुआ करता था। सब कुछ निपट और सिमट गया…….क्यों और कैसे उस विषय पर चर्चा करना व्यर्थ है।
कपिल दम्पत्ति के होली के लिये त्याग की चर्चा करें उससे पहले उस दौर के भले लोगों के बारे में दो बातें कर लेते हैं। चूँकि भुवन कपिल मधुर गायक थे और इनकी दीवानगी संगीत के लिये थी तो एक अधिकारी ने इन्हें नौकरी के लिये कहा और बाकायदा इनकी नियुक्ति स्थानीय प्राइमरी स्कूल में हो गई। वे एकमात्र संगीत शिक्षक बने और यह पद इनके सेवानिवृत्त होते ही सिमट गया। इसी प्रकार इनके बड़े भाई स्व. चन्द्रशेखर कपिल की अदाकारी और कलाकारी पर एक अधिकारी ने उनकी नियुक्ति भारत सरकार के सौंग एण्ड ड्रामा डिवीजन दिल्ली में में कर दी। कलाकार की रोटी का जुगाड़ हो जाए तो वह और महकेगा। यही महक इन लोगों में थी। ऐसा नहीं कि नौकरी तो मिल चुकी है अब अपने रास्ते हो लें, समाज जाये एक तरफ। चन्द्रशेखर कपिल ने ड्रामा डिविजन की नौकरी में अथाह नाम कमाया और यात्राएँ कीं।
दूसरी ओर भुवन कपिल अपनी लौ में लगे रहे। स्कूल जाना और फिर घर (मुखानी) आकर धुनों में रम जाना। रामलीला के दिनों में रामलीला और शेष समय होली। यानी पूरा जीवन होली के रागों और महफिलों में बीता। इनके आवास में नीचे एक कमरा था, जिसे ‘गोल कमरा’ नाम से जाना जाता था। उसमें ठसाठस लोग भर जाते और होली की महफिल जमती। शहर के सयाने और मौजी लोगों का पूरा अखाड़ा था यह गोल कमरा, जिसमें अतरिये-चरसिये भी आते और बूटी लगाकर मस्त हो जाते। लेकिन कोई घपला नहीं। भीमताल, नैनीताल, भवाली के सुरीले कलाकार भी रात यहाँ बिताते। पौष के प्रथम रविवार से होली के टीके तक नियमित रूप से होली बैठक होती। होली के गवैयों और सुनने वाले रसिकों की महफिल लखनऊ के नवाब वाजिद अली के दरबार से कम न होगी। महफिल में बाजे-तबले की लड़न्त-भिड़न्त के साथ अपने फन का जादू बिखेरने वालों के बीच स्व. जगन्नाथ वर्मा भी नियमित रूप से रहते। वे महफिल में आने वालों के लिये सिगरेट-पान की व्यवस्था करते। सेठ जी (जगन्नाथ) ने होली को अन्तिम साँस तक जिया। जब वे अस्वस्थ हो गये और चारपाई पकड़ बैठे, उन्हें होली सुनाने भुवन कपिल, मैं और मेरा छोटा भाई धीरज एक बार उनके मुखानी चैराहे स्थित घर पर गये। होली के ऐसे ही एक और भस्सी थे स्व. केशवदेव वशिष्ठ। अपने समय में हल्द्वानी के सौ से अधिक व्यापारियों के मुनीम रहे वशिष्ठ जी को शास्त्रीय संगीत सुनने का जुनून था। वे पहाड़ की होली को जान से ज्यादा प्यार करते थे। सौ साल की उम्र पूरी करने के बाद वह ही वे हमसे विदा हुए।
दूसरी ओर भुवन कपिल अपनी लौ में लगे रहे। स्कूल जाना और फिर घर (मुखानी) आकर धुनों में रम जाना। रामलीला के दिनों में रामलीला और शेष समय होली। यानी पूरा जीवन होली के रागों और महफिलों में बीता। इनके आवास में नीचे एक कमरा था, जिसे ‘गोल कमरा’ नाम से जाना जाता था। उसमें ठसाठस लोग भर जाते और होली की महफिल जमती। शहर के सयाने और मौजी लोगों का पूरा अखाड़ा था यह गोल कमरा, जिसमें अतरिये-चरसिये भी आते और बूटी लगाकर मस्त हो जाते। लेकिन कोई घपला नहीं। भीमताल, नैनीताल, भवाली के सुरीले कलाकार भी रात यहाँ बिताते। पौष के प्रथम रविवार से होली के टीके तक नियमित रूप से होली बैठक होती। होली के गवैयों और सुनने वाले रसिकों की महफिल लखनऊ के नवाब वाजिद अली के दरबार से कम न होगी। महफिल में बाजे-तबले की लड़न्त-भिड़न्त के साथ अपने फन का जादू बिखेरने वालों के बीच स्व. जगन्नाथ वर्मा भी नियमित रूप से रहते। वे महफिल में आने वालों के लिये सिगरेट-पान की व्यवस्था करते। सेठ जी (जगन्नाथ) ने होली को अन्तिम साँस तक जिया। जब वे अस्वस्थ हो गये और चारपाई पकड़ बैठे, उन्हें होली सुनाने भुवन कपिल, मैं और मेरा छोटा भाई धीरज एक बार उनके मुखानी चैराहे स्थित घर पर गये। होली के ऐसे ही एक और भस्सी थे स्व. केशवदेव वशिष्ठ। अपने समय में हल्द्वानी के सौ से अधिक व्यापारियों के मुनीम रहे वशिष्ठ जी को शास्त्रीय संगीत सुनने का जुनून था। वे पहाड़ की होली को जान से ज्यादा प्यार करते थे। सौ साल की उम्र पूरी करने के बाद वह ही वे हमसे विदा हुए।
हाँ, तो बात फिर कपिल दम्पत्ति की। भुवन कपिल दिन-रात होली की धुन में रहते। सुर लगाने के उनके अनूठे अंदाज ने सबको उनका दीवाना बना रखा था। मुखानी के उस ‘गोल कमरे’ के अलावा गिने-चुने स्थानों पर जब होली बैठक होती तो जग्गन उस्ताद (स्व. जगदशी उप्रेती), उर्बादत्त जी (पं. ताराप्रसाद जी के बड़े भाई) भी होते। बैठक में गूँजने वाली उन धुनों में पहाड़ सी बात थी। इधर-उधर की बैठक निपटा कर सब लोग फिर अपने अखाड़े यानी मुखानी पर जमा हो जाते। तीन-चार माह तक होने वाली नियमित होली संगीत सभा में भुवन कपिल तो रागी-बैरागी से अपनी धुन में रमे रहते और ‘सिगरेट में माल भरो’ कहने वाले 5-7 दीवाने भी देहरी के बाहर तक बैठे रहते। यानी कमरे के भीतर जितने होते, उतने ही कमरे के बाहर। 50-60 लोग तक हो जाते।
दूसरी ओर अन्दर रसोई में श्रीमती कपिल आने-जाने वालों के लिये चाय बनाने और फिर होली के नजदीक आते-आते चाय के साथ पापड़, आलू के गुटके इत्यादि की तैयारी करतीं। दूर-दराज से आ कर रात को रुकने वाले कलाकारों के लिये भोजन की तैयारी भी। किसी भी महफिल को बनाने और सँवारने के पीछे कितना त्याग करना होता है, यह कपिल दम्पत्ति को देख पता चलता था!
समय परिवर्तनशील होता है। हल्द्वानी में सांस्कृतिक हलचल को लेकर 1990 में ‘हिमालय संगीत शोध समिति’ का गठन हुआ। तब तक मुखानी बहुत कुछ बदल चुका था। रामलीला की तालीम क्या होती जब रामलीला ही होना ही बन्द हो गई ? तत्कालीन नगर मजिस्ट्रेट जगत राज त्रिपाठी, उप जिलाधिकारी मोनिका सहगल भी आयोजनों में आने लगे। सिटी मजिस्ट्रेट मधुर कुमार तो होली और ‘गोल कमरे’ के दीवाने ही हो गये। समिति के उपस्थिति रजिस्टर में उन्होंने लिखा- ‘‘होली के इस नशे में कोई भी महक उठेगा।’’ इस कमरे में उठने वाले धुएँ (चरसियों के उड़ाए धुएँ) को भी वह खुश होकर सहन करते, क्योंकि वह महफिल कोई नशेड़ी प्रवृत्ति की जमात नहीं थी। बल्कि कुछ बुजुर्गवार अपने इस शौक को पूरा कर लेते, जिसे हर कोई पचाता और खुश हो रहता। कालाढूंगी रोड स्थित हमारे घर और शक्ति प्रेस में ही हम दोनों भाइयों, मैंने और धीरज, ने संगीत की कक्षाएँ भी शुरू कर दी थीं। ईजा श्रीमती कमला उप्रेती की अध्यक्षता में संस्था का रजिस्ट्रेशन करवाया गया। अब पंजीकृत संस्था के रूप में होली आयोजनों को बृहद स्वरूप देने की पहल हुई। ऐसे में भुवन कपिल के ‘गोल कमरे’ को ‘हिमालय संगीत शोध समिति’ का प्रशिक्षण केन्द्र बनाया गया। कपिल परिवार इस बात से बेहद खुश हुआ कि संगीत की जिस धुन में वह लगा है, उसके लिये अब संगीत विद्यालय भी खुल रहा है।
बरसों तक इसी गोल कमरे में संगीत प्रशिक्षण केन्द्र चला। नयी पीढ़ी के लोग भी महफिल से जुड़ते चले गये और दुनिया-जहाँ की आवत-जावत में पुरानी पीढ़ी की विदाई और नये कलाकारों का आना चलता बना रहा। अब तो होली की नियमित बैठक के अलावा साल भर संगीत की कक्षाओं ने उन बुजुर्गों में जोश भर दिया है, जो इस बात से आशंकित थे कि इस सांस्कृतिक विरासत को आगे कौन संभालेगा।
समय के अन्तराल में हमारा आवास जे.के.पुरम, सेक्टर डी, मुखानी (हल्द्वानी) में बन गया और हिमालय संगीत का प्रशिक्षण केन्द्र यहाँ स्थानान्तरित कर दिया गया। लेकिन होली की महफिलों की पुरानी परम्परा को बरकरार रखा गया। समय के साथ शहर और शहर का मिजाज और बदला। हल्द्वानी की कालाढूँगी रोड की चहल-पहल जाती रही। सड़क पर डिवाइडर होने के बाद लोगों के ठहराव के अड्डे बदल गये। कपिल परिवार भी मुखानी चैराहे से हट कर निकट के मोहल्ले में चला गया। ‘गोल कमरे’ की खूबसूरत यादें सिमट गयीं। भुवन कपिल अस्वस्थ हो चुके थे, लेकिन होली के गिने-चुने पुराने भस्सी तब भी उनके आवास में बराबर जाते। होली बैठकों का मिजाज भी पुराना सा नहीं रहा, तो संस्थागत बैठकों को प्रोत्साहित किया गया। परन्तु होली के टीके की बैठक तो कपिल जी के घर पर ही होती थी।
दो साल पूर्व भुवन कपिल इस जीवन-जगत को छोड़ हमसे विदा हो गये। अभी दिसम्बर 2025 को श्रीमती ज्ञानू कपिल भी अचानक दुनिया से विदा हो गई। मगर उनके सुपुत्र डाॅक्टर मोहित कपिल और पुत्री सीमा अपने परिवार के साथ हमारे अभियान में जुड़े हैं। समझा जा सकता है कि पहाड़ की होली को भाबर में सींचना कितना कठिन रहा होगा। भुवन कपिल जैसे दिलदार और धुन के पक्के कलाकार एवं पर्दे के पीछे श्रीमती ज्ञानू कपिल जैसे उनके सहयोगी। तभी होली बैठकों का स्वर्णकाल हुआ करता था। उन धुरंधर लोगों के बीच रह कर जितना सीखा उसे ही आगे बढ़ाने की कोशिश हम भी कर रहे हैं।
कुमाउनी होली की जोत आजीवन जगाये रखने वाले कपिल दम्पत्ति की स्मृति जी रौ लाख सौ बरीस!

































