अनूप नौटियाल
दोस्तों, सुबह से मन में बार-बार एक ही ख्याल आ रहा है। हमारे राज्य उत्तराखंड सहित उत्तर भारत के अन्य राज्यों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में सर्दियों के दौरान बर्फबारी का न होना और जल स्रोतों का सूखना कितनी गंभीर चिंताओं को जन्म दे रहा है। इसके कारण प्रक्रियाएँ और दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं। खेती, स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोज़गार, लोगों द्वारा लिए गए कर्ज़ और उसके ब्याज की अदायगी, जंगलों और वन्यजीवों पर प्रभाव, नदियाँ, ग्लेशियर, सिंचाई, पेयजल और जल उपलब्धता, न जाने कितनी चुनौतियाँ हमारे सामने खड़ी हैं।
उत्तराखंड की स्थिति यह है कि लोग अब देवी-देवताओं के पास पहुँचकर बारिश और बर्फबारी की गुहार लगा रहे हैं। दूसरी ओर सरकारें मानो इस विषय पर चुप्पी साधे बैठी हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं या हो ही नहीं रहा। न चेहरों पर चिंता दिखती है, न किसी तरह की बेचैनी। हर कोई अपने एजेंडे, अपनी राजनीति, अपनी मीटिंग और अपने-अपने प्रोजेक्ट्स में व्यस्त है जबकि बर्फ और बरसात जैसे जीवनदायी विषय उनके एजेंडे से पूरी तरह गायब हैं।
कायदे से इस समय सिस्टम को दो, तीन समझदार, कर्मठ और रिजल्ट ओरिएंटेड अधिकारियों की एक टीम बनाकर प्रदेश के करोड़ों लोगों पर पड़ने वाले इन हालात के व्यापक असर का गंभीर अध्ययन करना चाहिए था। जब हम कहते हैं कि उत्तराखंड देश की शान और मुकुट है, तो यह भी सच है कि यहाँ की परिस्थितियों का असर दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार तक महसूस किया जाएगा। इसके बावजूद, न राज्य स्तर पर और न ही केंद्र सरकार के स्तर पर उत्तर भारत के सभी राज्यों को एक मंच पर लाकर इस गंभीर स्थिति पर कोई ठोस संवाद, योजना या चिंतन-मनन होता दिखाई देता है।
हम लोग व्यापक वन कटान, विकास के मौजूदा मॉडल, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग पर चर्चाएँ वैसे भी लगातार करते रहते है और ये आगे भी चलती रहेंगी। लेकिन शायद इस समय जब व्यवस्था निष्क्रिय दिखती है और आम नागरिक खुद को बेबस और असहाय महसूस कर रहा है, तब लगता है कि अब सांत्वना और राहत केवल प्रकृति और ईश्वर से ही मिल सकती है। ऐसे में आप सभी से यही आग्रह है कि अगली बार जब आप अपने प्रभु को याद करें तो एक क्षण आँख मूँदकर सच्चे मन से शीघ्र वर्षा और बर्फबारी की मंगल कामना अवश्य करें—शायद यही हमारी सामूहिक प्रार्थना इस कठिन समय में कुछ सुकून दे सके।
फोटो इंटरनेट से साभार

































