राजीव लोचन साह
अगर आज ‘नैनीताल समाचार’ है तो उसके पीछे कहीं न कहीं ज्ञानरंजन भी हैं। मैं तो एक निमित्त हूँ ही।
साल था 1971 का, अक्टूबर का महीना। बटरोही जी ने कहा कि ज्ञानरंजन नैनीताल आना चाहते हैं। तुम अपने होटल में ही उनके रहने की व्यवस्था कर दो। मैंने सैवाॅय होटल में व्यवस्था कर दी। उससे अगले वर्ष कमलेश्वर भी सैवाॅय में ठहरे। वे तो बगैर मेरी जानकारी के सीधे आ गये थे। शाम को विजिटर्स रजिस्टर टटोल रहा था तो उनके हस्ताक्षर पहचाने। ‘सारिका’ का नियमित पाठक था ही।
ज्ञानरंजन को नैनीताल पसन्द रहा होगा। उससे पहले वे गेठिया में अपने मित्र पांडे जी के साथ लम्बे समय तक रहे थे। उनकी बहुचर्चित कहानी ‘पिता’ गेठिया में ही लिखी गयी। 1971 में वे अपनी पत्नी सुनयना तथा दो या तीन साल के पुत्र पाशा (शान्तनु) के साथ आये थे। ज्ञान मस्त आदमी, उनकी तुलना में सुनयना भाभी मुझे काफी रिजव्र्ड लगीं। उनका प्रेम विवाह हुआ था। मैं बीस साल का अनुभवहीन युवा, सोचता कि प्रेम विवाह करने वाली औरत इतनी रिजव्र्ड क्यों होगी!
हमने खूब मस्ती की। नैनीताल तब आजकल की तरह भीड़, शोरगुल और गन्दगी से भरा नहीं, एक शान्त और खूबसूरत शहर था। गर्मियों के सीजन के बाद दशहरे के दौरान होने वाला ‘बंगाली सीजन’ भी निपट गया था। मालरोड लगभग निर्जन रहती थी। साहित्य में रुचि थी ही। अमृतराय के सम्पादन में इलाहाबाद से निकलने वाली ‘नई कहानियाँ’ में दो-तीन कहानियाँ छप चुकी थीं और मुझे कथाकार होने का मुगालता हो गया था। निर्मल वर्मा और ज्ञानरंजन मेरे प्रिय कथाकार हुआ करते थे। इन दोनों के बीच का फर्क तो मैं महसूस नहीं कर पाता था। मगर एक ओर निर्मल वर्मा की जादुई भाषा थी और दूसरी ओर ज्ञानरंजन का बाँध लेने वाला शिल्प। मैं उनसे ‘घंटा’ और ‘बहिर्गमन’ जैसी उनकी कहानियों की रचना प्रक्रिया के बारे में पूछता और वे मुझे समझाने की कोशिश करते कि किस तरह अब कहानी में कंटेंट पर शिल्प हावी होने लगा है। साहित्य को लेकर समझदारी बननी शुरू ही हुई ही थी। आज भी बनी कहाँ है ? धुरंधर समीक्षकों की जटिलतायें सिर के ऊपर से गुजर जाती हैं! मगर मैं अपने प्रिय लेखक के अपने साथ होने में मगन था। क्या-क्या चर्चायें होती थीं, अब किसे याद है? ऐसी चर्चायें बाद के वर्षों में सिर्फ शैलेश मटियानी के साथ हुआ करती थीं। कई साल बाद निर्मल वर्मा के साथ महादेवी साहित्य संग्रहालय के एक कार्यक्रम में मुलाकात हुई थी। मगर जब उनसे बातचीत करने का मौका मिला, नैनी रिट्रीट के उद्यान के एक अंधेरे कोने में गगन गिल के साथ गंभीर गुफ्तगू में व्यस्त थे। मैं चुपचाप लौट आया।
मैं एम.ए. हिन्दी के अन्तिम वर्ष में था और काॅलेज के बाद का मेरा अधिकांश वक्त ज्ञानरंजन के साथ ही गुजरता था। उसी बीच दीवाली भी आयी। हमारे हिन्दी के अध्यापक केशव दत्त रुवाली लंघम हाउस छात्रावास के वार्डन थे। हम फल्लास खेलने के लिये लंघम हाउस पहुँच गये। उस साल की दीवाली वैसे भी यादगार रही। मेघ लगातार इतना बरसे कि महालक्ष्मी पूजा के ठीक पहले दिन ही बिजली की माला टाँगने की मोहलत मिल पायी। ठीक उसी के आसपास नैनीताल के एक हर दिल अजीज युवा ‘स्वीटी’ की हत्या ने शहर में सनसनी पैदा कर दी थी।
अब नैनीताल समाचार की ओर। बी.एससी. कर फिजिक्स न मिलने की नाराजी से मैं हिन्दी में एम.ए. करने लगा था। बटरोही जी की राय थी और मैं सहमत था कि एम.ए. करने के बाद मैं किसी भी विषय में एम.एससी. कर लूँ। लेकिन एम.ए. खत्म होते-होते हिम्मत टूट रही थी। दुबारा कक्षायें जाॅईन करने का साहस नहीं रहा। ज्ञानरंजन के आने से पहले मैं अनिर्णय और हताशा में डूब रहा था। एक शाम सूनी मालरोड पर टहलते हुए मैंने अपनी समस्या ज्ञान के सामने रख दी। उनका सुझाव आया कि एक प्रिटिंग प्रेस शुरू कर दो। आर्थिक पृष्ठभूमि तुम्हारी ठीकठाक है। फिर प्रकाशन के क्षेत्र में आ जाना। उनके पिता रामनाथ ‘सुमन’ स्वयं प्रकाशन से जुड़े थे। शरतचन्द्र की रचनाओं का बांग्ला से हिन्दी का अनुवाद उन्होंने ही किया था। मुझे उनका सुझाव पसन्द आया और कई तरह के पापड़ बेलने और अपनी ईजा और दाज्यू को बड़ी मुश्किल से राजी करने के बाद 1973 में राजहंस प्रेस की शुरूआत हो गयी। मगर जब खूब सोचा तो लगा कि पुस्तक प्रकाशन अपने वश का नहीं है। लिखने का शौक था और नैनीताल की दुर्गा साह लाइब्रेरी में तमाम साप्ताहिक पत्रों को देखता था। उस उम्र में भी यह आत्मविश्वास था कि मैं इनसे बेहतर अखबार निकाल सकता हूँ। मगर प्रेस को इतना मजबूत बनाने की स्थिति आयी कि अखबार का बोझ उठा सके तब तक इमर्जेंसी लग गयी।
खैर इमर्जेंसी खत्म होने के बाद 15 अगस्त 1977 को ‘नैनीताल समाचार’ प्रकाशन शुरू हो गया। ज्ञानरंजन को प्रवेशांक भेजा तो वे बहुत खुश हुए। बाद में जब ‘पहल’ का प्रकाशन शुरू हुआ तो उन्होंने उसका सदस्यता शुल्क लेने से ही इनकार कर दिया, ‘‘तुम इतना सुन्दर ‘नैनीताल समाचार’ मुझे भेज रहे हो। मैं ‘पहल’ भेज रहा हूँ। हिसाब बराबर।’’
फिर ज्ञानरंजन से एक-दो मुलाकातें ही हुईं। उनकी कोई खास याद नहीं। पत्र व्यवहार भी अनियमित हो गया। मगर हमारे बीच में ‘पहल’, ‘नैनीताल समाचार’ और फिर ‘पहाड़’ हमें जोड़ने के लिये काफी थे। अन्तिम बार उनसे अगस्त 2010 में मुलाकात हुई, जब वे वीरेन डंगवाल और त्रिनेत्र जोशी के साथ नैनीताल आये। वही चालीस साल पहले की मस्ती, वही फक्कड़पना। वे रहना चाहते थे मगर वीरेन दा का अलतलाट! उसने ‘चलो-चलो’ की ऐसी हड़बड़ी मचायी कि वे एक रात रह कर ही जाने को मजबूर हो गये। ‘अमर उजाला’ का ‘शिखर सम्मान’ मिलने पर बधाई देने के लिये फोन किया तो उनके मन में उस नैनीताल की छवि और नैनीताल समाचार और पहाड़ के लिये स्नेह बरकरार था।
हम उन्हें याद करते रहे और वे हमें। कल 8 जनवरी को संवेदना प्रकट करने के लिये उनके बेटे पाशा (शान्तनु) को फोन किया तो उसने बताया कि पापा आपको हमेशा याद करते थे। एक बार उत्तराखंड आया था और आप लोगों से बिना मिले लौट गया तो वे बहुत नाराज हुए कि शेखर, राजीव और अशोक पांडे से मिले बगैर क्यों लौट आये!
सलाम ज्ञानरंजन, आप हमारी यादों में तो ताउम्र रहेंगे ही!

































