कमल जोशी
उत्तराखण्ड की खूबसूरत पहाड़िसों में बसे अल्मोड़ा के निवासी प्रभात जोशी (68) करीब पांच दशकों से निरंतर चित्रकारी कर रहे हैं। वह पांच हजार से अधिक चित्र बना चुके हैं। उनकी बनायी अधिकांश पेंटिंग्स मिनिएचर (लघु चित्रों) के रूप में हैं। एक-डेढ़ इंच आकार के छोटे कैनवास पर मीलों लंबा और चौड़ा लैंडस्केप, वह भी गहराई व बारीकियों के साथ, गागर में सागर भरने जैसा है। इन्हें देख दर्शक हैरान हुए बिना नहीं रह सकते। उत्तराखण्ड में मिनिएचर पेंटिंग का इतिहास मुख्य रूप से गढ़वाल चित्रकला से जुड़ा हे जिसकी शुरुआत 17वीं शताब्दी में मुग़ल राजकुमार सुलेमान सिकोह के साथ आये चित्रकारों द्वारा हुई तथा जिसे मौलाराम जैसे कलाकारों ने विकसित किया।
प्रभात का पैतृक मकान जाखनदेवी मंदिर के नजदीक रानीखेत मोटर रोड के नीचे स्थित गल्ली मोहल्ले में है। उनके स्वर्गीय पिता राम चन्द्र जोशी एक वकील थे जो विधायक भी रहे। प्रभात नौवीं कक्षा में पढ़ते थे जब उनके सिर में गंभीर चोट आयी और 18-20 टांके लगाने पड़े। उन दिनों अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड) कस्बे में सीटी स्कैन, एम.आर.आई. जैसी आधुनिक सुविधायें नहीं थीं। डाक्टर ने उन्हें छः महीनों तक बिस्तर पर आराम की सलाह दी तो उन्होंने पूछा कि क्या मैं खाट पर बैठे-बैठे कुछ कर सकता हूं। चिकित्सक की अनुमति मिलने पर उन्होंने जीव विज्ञान के चित्र बनाने के काम आने वाले आर्ट पेपर मंगवाये और चित्र बनाना शुरू कर दिया। इस काम में आनन्द आने लगा और प्रयोग के तौर पर प्रभात कागज़ का आकार क्रमशः छोटा करते गये। इस तरह मिनिएचर पेंटिंग की। हांलांकि चित्रकारी का शौक बचपन से था लेकिन जीवन में अकस्मात् घटी एक दुर्घटना ने शौक को जुनून में बदल दिया। इसके बाद, प्रभात बताते हैं कि उन्होंने 1981 में अल्मोड़ा के महाविद्यालय में विजुअल आर्ट की क्लास में प्रवेश लेकर बी.ए. पास किया। उनका मन मास्टर्स की डिग्री लेने का था लेकिन तब अल्मोड़ा में इसकी सुविधा नहीं थी और स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से वह बाहर भी नहीं जा पाये। ऐसे में उन्होंने घर पर ही निरंतर अभ्यास जारी रखा।
प्रभात रोजाना ही चित्रकारी करते हैं लेकिन इसके लिये कोई समय निर्धारित नहीं है। ’’जब मूड आया बैठ गये,’’ वह हंसते हुए बताते हैं। आम तौर पर एक दिन में एक पेंटिंग बनाते हैं लेकिन कभी दो-तीन या चार भी बन जाती हैं। उनके सारे ही चित्र, जिनमें अधिकांश प्राकृतिक लैंडस्केप हैं, उनकी अपनी कल्पना पर आधारित हैं। वह देख कर चित्र नहीं बनाते। उनके चित्रों में हिमालय पर्वत शिखरों, बुग्यालों, वनों के साथ ही वसंत और पतझड़ आदि प्रकृति के विविध रूप भी दिखते हैं।
प्रभात के चित्रों की प्रदर्शनी ललित कला अकादमी द्वारा दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कला मेले के अलावा नागपुर, लखनऊ, मुरादाबाद आदि जगहों पर भी लगी हैं। लेकिन वह स्वभाव से प्रकृति प्रेमी होने के साथ ही एकांत प्रिय भी हैं और प्रचार-प्रसार से दूर ही रहे हैं। प्रभात ने अपनी पेंटिंग नाना पाटेकर, जावेद अख्तर, डा. कर्ण सिंह, डा. मुरली मनोहर जोशी, पद्म-विभूषण बी डी पाण्डे, मृणाल पाण्डे सहित कई हस्तियों को भेंट की हैं। पहले वह अपने चित्रों की बिक्री भी करतें थे। उनकी पेंटिंग भारत ही नहीं फ्रांस, कनाडा, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, अमेरिका, दक्षिण कोरिया आदि देशों में कलाप्रेमियों के घरों व संग्रह की शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमें से अनेक ने उनके चित्रों की सुन्दरता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इनकी डिटेल्स को आश्चर्यजनक बताया हैं। विख्यात चित्रकार व पुरातत्वविद् डा. यशोधर मठपाल (पद्मश्री) ने इन मिनिएचर चित्रों को सूक्ष्मतम कलेवर में और बेमिसाल बताते हुए लिखा है कि प्रभात ने प्राचीन पहाड़ी लघुचित्र कला को समय के अनुरूप परिवर्तित और परिमार्जित कर सूक्ष्म रूप में अभिव्यक्ति दी है।
प्रभात रोजाना ही चित्रकारी करते हैं लेकिन इसके लिये कोई समय निर्धारित नहीं है। ’’जब मूड आया बैठ गये,’’ वह हंसते हुए बताते हैं। आम तौर पर एक दिन में एक पेंटिंग बनाते हैं लेकिन कभी दो-तीन या चार भी बन जाती हैं। उनके सारे ही चित्र, जिनमें अधिकांश प्राकृतिक लैंडस्केप हैं, उनकी अपनी कल्पना पर आधारित हैं। वह देख कर चित्र नहीं बनाते। उनके चित्रों में हिमालय पर्वत शिखरों, बुग्यालों, वनों के साथ ही वसंत और पतझड़ आदि प्रकृति के विविध रूप भी दिखते हैं।
प्रभात के चित्रों की प्रदर्शनी ललित कला अकादमी द्वारा दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कला मेले के अलावा नागपुर, लखनऊ, मुरादाबाद आदि जगहों पर भी लगी हैं। लेकिन वह स्वभाव से प्रकृति प्रेमी होने के साथ ही एकांत प्रिय भी हैं और प्रचार-प्रसार से दूर ही रहे हैं। प्रभात ने अपनी पेंटिंग नाना पाटेकर, जावेद अख्तर, डा. कर्ण सिंह, डा. मुरली मनोहर जोशी, पद्म-विभूषण बी डी पाण्डे, मृणाल पाण्डे सहित कई हस्तियों को भेंट की हैं। पहले वह अपने चित्रों की बिक्री भी करतें थे। उनकी पेंटिंग भारत ही नहीं फ्रांस, कनाडा, आस्ट्रेलिया, जर्मनी, अमेरिका, दक्षिण कोरिया आदि देशों में कलाप्रेमियों के घरों व संग्रह की शोभा बढ़ा रहे हैं। इनमें से अनेक ने उनके चित्रों की सुन्दरता की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इनकी डिटेल्स को आश्चर्यजनक बताया हैं। विख्यात चित्रकार व पुरातत्वविद् डा. यशोधर मठपाल (पद्मश्री) ने इन मिनिएचर चित्रों को सूक्ष्मतम कलेवर में और बेमिसाल बताते हुए लिखा है कि प्रभात ने प्राचीन पहाड़ी लघुचित्र कला को समय के अनुरूप परिवर्तित और परिमार्जित कर सूक्ष्म रूप में अभिव्यक्ति दी है।
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