आशा जोशी
समय हर घाव को नहीं मिटाता, पर जीने की नई वजह ज़रूर दे देता है……
‘झंझावात’ पुस्तक वरिष्ठ लेखक व स्वतंत्र पत्रकार हरीश जोशी जी एवं उनके दोनों बच्चों अचला और अनुराग के संपादन में लिखी गई है। पुस्तक में आदरणीय जोशी जी द्वारा ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिसे पढ़कर पाठक का भावुक होना स्वाभाविक है इसमें वियोग भावनाओं को गहराई से चित्रित किया गया है। भावनात्मकता रूप से कभी-कभी जीवन में अलगाव और विरह के क्षण हमें भीतर तक छू जाते हैं। ‘झंझावात’ पुस्तक भी ऐसी ही भावनाओं को शब्दों में जीवंत करती हुई प्रतीत होती है।
शिक्षा की प्रति समर्पित एक आदर्श शिक्षिका को ऐसा ही होना चाहिए जैसा कि प्रिय अचला द्वारा पुस्तक में बताया गया है मंजू जी में सीखने की ललक ऐसी थी जैसे एक नौसिखिया में हुआ करती है,,,माँ तो माँ होती है,, माँ के बिना जीवन ऐसा है जैसे फूल बिना खुशबू के, दीपक बिना ज्योति के,माँ का होना ही हमारे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।
वात्सल्य प्रेम और गुरु शिष्य प्रेम एक साथ मिल पाना बहुत सौभाग्य की बात है ऐसा सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता,अच्छे लोगों की आवश्यकता हर जगह होती है, तभी तो अल्प समय में ही इस दुनिया से विदा हो गई है। अब बारी आती है बारामासा को पढ़ने की,, विरह, यह शब्द जितना छोटा है, अनुभव उतना ही गहरा। जब कोई अपना अचानक दूर चला जाता है, तो संसार वही रहता है, पर अर्थ बदल जाते हैं। वही रास्ते, वही मौसम, वही चाँदनी — सब कुछ वैसा ही लगता है, बस उसके बिना अधूरा-सा। मनुष्य का जीवन केवल सुख और मिलन से नहीं, बल्कि वियोग और विरह से भी भरा होता है।
कुछ लोग इस दुख को महसूस करके पी जाते हैं या टूट जाते हैं, लेकिन जोशी जी ने इसको अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया,, विधि के विधान को कोई टाल नहीं सकता,,,, मंजू जी की रिक्तता कोई पूरी कर नहीं सकता। जिए तो ऐसे जिए की छाप छोड़ जाए,,यही हुआ भी धार्मिक’सामाजिक’ व्यक्तित्व की धनी समस्त कार्यों में सक्रियता पुस्तक के माध्यम से ही मैं भी इन बातों से अवगत हुई कि दिवंगत मंजू जी का व्यक्तित्व इस प्रकार का था,, जोशी जी द्वारा बहुत ही मार्मिक शब्दों में हर तीज त्यौहार मंजू जी के वियोग में, उनकी हर गतिविधि का जिक्र किया जो अत्यंत हृदय विदारक हैं।
कभी लगता है कि वो मुस्कान अब भी किसी किरण में छिपी है, कभी महसूस होता है कि उसकी आवाज़ अब भी इन पत्तों पर ठहरी है। पर सच्चाई यह है कि वह चली गयी,और पीछे छोड़ गयी — एक अनंत प्रतीक्षा और एक मौन पुकार। जन स्मृतियों में भी आप छाई हुई थीं,,,,आपका मृदुल व्यवहार भुलाना सभी असम्भव बता रहे हैं। अच्छे लोगों की आवश्यकता हर जगह होती है। असमय जाने का दुःख समाज के हर व्यक्ति ने महसूस किया,, क्या कह सकते हैं विधि के विधान के आगे सभी नतमस्तक हैं ‘झंझावात’ पुस्तक के माध्यम से लोगों को जीने का सहारा जरूर मिल सकता है।अस्तु इस तरह का रचनात्मक साहित्य वो भी जो कि वियोग के समय में स्मृतियों को जीवन्त करने के साथ जीने की राह भी दिखाता है, अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।
समीक्षित पुस्तक *”झंझावात”*
संपादक/लेखक *हरीश जोशी,अचला जोशी,अनुराग जोशी*
मुद्रक प्रकाशक *ज्ञानार्जन प्रिंटर्स एंड पब्लिशर्स गरुड़,बागेश्वर*
पुस्तक प्राप्ति संपर्क *स्वाति धाम गरुड़ बागेश्वर।*
































