रमदा
सवाल है कि इस समय 1994 के जन सैलाब के असल हिस्सेदार कहाँ हैं ? अनिश्चितताजनित संज्ञाहीनता में या चिन्तन में (ईश्वर करे कि चिन्तन में हों)?
वे अखबारों की ताजा सुर्खियों में नहीं हैं– अखबारों की सुर्खियों में राजनीति के वही पेशेवर खिलाड़ी हैं। वही पेशेवर खिलाड़ी, जिन्हें अपनी तमाम समस्याओं के निदान का पूरा दायित्व, वह भी पाँच-पाँच सालों तक लगातार सौंपे जाने की लम्बी सजा हम भारतीयों ने आज तक काटी है। ये पेशेवर लोग आज मुख्यमंत्री पद की दौड़ में हैं……. विधायकों के रूप में स्वयं को निहारना इन्होंने शुरू कर दिया है…….. राजधानी के सवाल पर राजनैतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं….. जनता की आकांक्षायें इनके एजेण्डे में नहीं हैं। उनके लिये यह अपनी गोटियाँ फिट करने का दौर है।
उत्तरांचल के लागों को यदि उत्तराखण्ड चाहिये तो सबसे पहले यह समझ लेना जरूरी है कि राजनैतिक-आर्थिक गठजोड़ों में बदलाव, राजनैतिक सत्ता के पुनर्वितरण, विशेषाधिकार प्राप्त निजी स्वार्थी-माफियाओं के उन्मूलन और आर्थिक-सामाजिक विकास की जनोन्मुखी परिभाषा का जो बृहद कार्य भारत जैसे विशाल देश या उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में कर पाना दुष्कर था, उत्तराखण्ड जैसा लघु प्रदेश उसकी प्रयोगशाला बन सकता है। अवसर उनके सामने है। ठीक वैसा ही अवसर, जैसा कि पहली और दूसरी आजादी के तत्काल बाद भारत के सामने था। दोनों बार राजनैतिक नेतृत्व इसका उपयोग नहीं कर पाया। तीसरा अवसर आज नवसृजित राज्यों के सामने है। क्या एक बार फिर हम पेशेवर राजनीतिज्ञों यह कह कर यह अवसर सौंप दें कि हमारे लिये कुछ अच्छा करो या फिर इस बार बागडोर हम अपने ही हाथों में रखें ?
हमें इस सच्चाई का सामना करना होगा कि अंतरिम विधान सभा-सरकार एवं चुनाव के बाद आने वाली विधान सभा के बीच की अवधि में यदि हम जन समस्याओं के लिये प्रतिबद्ध एक नव नेतृत्व आम लोगों के बीच से विकसित नहीं कर पाये तो उत्तराखण्ड भारत के शेष राज्यों जैसा ही होगा। हम ‘उत्तरांचल’ में होंगे, ‘उत्तराखण्ड’ में नहीं।
उत्तराखण्ड का सपना देख रही आँखों को समझना चाहिये कि हमारा नियंत्रण हमारे विधायकों पर यदि नहीं होता है तो उत्तराखण्ड के नागरिक के तौर पर हमारा स्थानाधिकार-हस्तक्षेपाधिकार ही क्या है ? हमें तय करना है (अभी चुनाव से पूर्व ही) कि हम अपने समकालीन राजनैतिक इतिहास की गंदी नाली के कीड़ों में से किसी एक को चुनेंगे या फिर उन्हें लात मार कर जनता के लिये प्रतिबद्ध, जनता के बीच से निकले नये चेहरों में अपने प्रतिनिधि तलाशेंगे ?
हमें अपने आप से यह सवाल पूछना चाहिये कि एक पाँच सितारा राजधानी की कवायद में जुटे ब्यूरोक्रेट क्या वही नहीं हैं, जिन्होंने पर्वतीय क्षेत्र की पोस्टिंग को हमेशा ‘पनिशमेंट’ समझा और यह पर्वतीय क्षेत्र पचास सालों तक एक जनोन्मुखी प्रशासन और विकास को तरसता रह गया?
जून 2000 में ‘ई.पी० डब्ल्यू.’ में प्रकाशित अपने एक आलेख में प्रख्यात जनांकिकीविद आशीष बोस ने उत्तराखण्ड में पिछले 15 वर्षों से कार्यरत अशित मित्रा को यह कहते हुए उद्धृत किया है कि यदि इस पर्वतीय भूभाग में पानी लाना पूरी तरह महिलाओं का कर्तव्य नहीं, मर्दों का काम होता तो समस्या का समाधान खोजा जा चुका होता। मेरे हिसाब से ऐसे कि मर्द दबाव समूह बना सकते हैं। इस आलेख में पीने के पानी को ‘जैण्डर इशू’ कहा गया है। मैं इस संकेत को विस्तार देना चाहता हूँ। इस पर्वतीय भूभाग में आर्थिकी की रीढ़ में स्त्रियाँ ही हैं। उत्तराखण्ड गाँवों में बसता है और वहाँ महिलायें ही अधिसंख्य हैं। समस्याओं और कठिनाइयों का बोझ भी उन्हीं के सर है। निकट इतिहास में आन्दोलनों के केन्द्र में भी स्त्रियाँ ही रही हैं। मुझे तो पूरा मामला ही जैण्डर इशू नजर आता है। मगर सचमुच ऐसा है तो 60-70 सदस्यीय विधानसभा में 20-25 स्त्रियाँ ही होनी चाहिये। विधानसभाओं और संसद में एक तहाई आरक्षण के तर्क का इस प्रस्ताव से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये वह स्त्रियाँ नहीं हैं जो नगरपालिकाओं-पंचायतों व ग्रामसभाओं में मर्दों के रबर स्टैंप की तरह इस्तेमाल की जा रही हैं। यह ‘मेम साब’ लोग भी नहीं होंगी। निजी राजनैतिक महत्वाकांक्षायें इनकी जीवनी शक्ति नहीं होगी। ये वे औरतें होगी जो एक दौर में पेड़ों पर चिपकी थीं, शराब के प्राचुर्य के खिलाफ संघर्षरत रहीं थीं, और 94 के जनउभार के दौरान खेत-खलिहान को जिन्दा रखते हुए सक्रिय थीं। बिना इनकी मौजूदगी के विधानसभा से ऐसा कुछ निकल पाना सम्भव नहीं है जो इस जमीन से ईमानदार वास्ता रखता हो। राजनैतिक सत्ता सूत्रों के विकेन्द्रीकरण की जो ईमानदार, संघर्षशील तो हैं, यह एक महत्वपूर्ण शुरूआत हो सकती है। किन्तु अज्ञात कारणों से एक बड़ी ताकत (मुझे उत्तराखण्ड की विधानसभा के ‘वैल’ में दराँती नचाती और विशिष्ट पर्वतीय अंदाज में व्यवस्था को गरियाती एक ठेठ/खाँटी पहाड़ी औरत की कल्पना से गुरेज नहीं है। जूते चलाते और माईक तोड़ते विधायकों से तो यह बेहतर दृश्य है।
‘उत्तरांचल’ में ‘उत्तराखंड’ का सपना देख रहे आम आदमी को यह समझाने की जरूरत है कि यह समय लाल-हरे झण्डों में से किसी एक के चयन का नहीं है। यह ऐसे आदमियों को चुनने का समय है, जो जनता के हों और उसी के होकर रहें। वैसे यह जरूरी नहीं कि ये लोग बाद में अपना चरित्र न बदलें। यदि ऐसा हुआ भी तो हम भी इतने ताकतवर होंगे कि अगली बार उन्हें हम लातों से वोट देंगे।
इसके बाद भी प्रश्न यदि रास्ता दिखाने के दायित्व का है तो यह जिम्मेदारी उन छोटी-छोटी शक्तियों एवं समूहों की है, जिनकी आँखों में ‘उत्तराखंड’ का सपना है, जिनकी आँखों में बेईमानी के जाले नहीं हैं…….जो ईमानदार, संघर्षषील तो हैं, किन्तु अज्ञात कारणों से एक बड़ी ताकत बन पाने में अब तक असफल रहे हैं। इन शक्ति समूहों को समझ लेना चाहिये कि अपने कंधे पर बैठे शिखंडी से इन्हंे मुक्ति पानी ही होगी। अन्यथा सही समय पर संघर्ष से अनुपस्थित रहने के अपराध बोध से वे कभी मुक्त नहीं हो पायेंगे।
(यह लेख राज्य गठन के दौरान नैनीताल समाचार के 1 नवम्बर 2000 के अंक में पहली बार प्रकाशित हुआ था)

































