राजीव लोचन साह
लम्बी प्रतीक्षा के बाद अन्ततः उत्तराखंड में हो रहे पंचायत चुनावों में जनता की भागीदारी उत्साहवर्द्धक है। एक तरह से इन चुनावों में शहरी निकाय चुनावों से भी ज्यादा उत्साह दिखाई दे रहा है। रोजगार के लिये घरों से दूर शहरों में रहने वाले प्रवासी वोट देने छुट्टियाँ लेकर ठठ्ठ के ठठ्ठ वापस गाँवों को लौट रहे हैं। बाहर जाकर बहुत पैसा कमा चुके अनेक लोगों को तो अब अपने गाँवों के विकास का शौक भी चर्राया है और वे चुनावों में अपनी किस्मत आजमाने के लिये खड़े हुए हैं। राजनैतिक दलों, प्रशासन और मीडिया में भी इन चुनावों को लेकर बहुत रुचि दिखाई दे रही है।
लेकिन इस शोर-शराबे भरे उत्सव में जरूरी बातें बिल्कुल छूट गयी हैं। कोई सवाल नहीं कर रहा है कि जिस तरह से ये चुनाव हो रहे हैं और जिस तरह की देश में पंचायती राज व्यवस्था चल रही है, क्या उससे कुछ होना-जाना भी है ? महात्मा गांधी ‘ग्राम गणराज्य’ की बात करते थे, डाॅ. राम मनोहर लोहिया ‘चैखम्भा राज’ की बात करते थे और 73वाँ-74वाँ संविधान संशोधन कानून बन जाने के बाद हम भी यही मानते आये हैं कि इन कानूनों के लागू होने के बाद देश का हुलिया बदल जायेगा। हमारे इस विशाल देश की विशाल समस्याओं का अगर कोई समाधान है तो वह 73वाँ-74वाँ संविधान संशोधन कानूनों से ही पूरी तरह से ही निकल सकता है। मगर वैसा हो कहाँ रहा है ? ये कानून तो सिर्फ हवा में हैं। जब तक पंचायतें राज्य सरकार पर आश्रित रहेंगी और जिला प्रशासन द्वारा नियंत्रित की जाती रहेंगी, तब तक कुछ बदलने वाला नहीं है। जरूरत तो इस बात की है कि संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में शामिल सभी 29 विषयों के अधिकार तत्काल पंचायतों को दे दिये जायें, जिला प्रशासन से विकास की सभी योजनायें छीन ली जायें और जिला प्रशासन के नियंत्रण से मुक्त हो कर पंचायतें जिला नियोजन समिति के माध्यम के अपनी जरूरतें सीधे प्रदेश वित्त आयोग को भेजें। वित्त आयोग, जो एक सांवैधानिक संस्था है, भी प्रदेश सरकार के हस्तक्षेप से मुक्त हो कर बजट सीधे पंचायतों को पहुँचा दे। इस प्रक्रिया में राज्य सरकार या जिला प्रशासन कहीं भी आड़े न आये।
लेकिन इस तरह की चर्चा तो कहीं है ही नहीं। हमारे देश में इस रूप में तो लोकतंत्र सफल हुआ है कि जहाँ-जहाँ चुनाव होते हैं, भले ही वह लोक सभा, विधान सभाओं के हों, पंचायतों के हों या फिर व्यापार मंडलों-टैक्सी यूनियनों के, जनता का उत्साह देखते ही बनता है। मगर मतदान करने में जाति, धर्म, रिश्ते, बिरादरी, दोस्ती आदि ही मुख्य हो जाते हैं। इससे आगे की बातें हो ही नहीं पातीं। यह चर्चा कहाँ होती है कि जिस संस्था में जाने के लिये हम लालायित हैं या किसी को भेजने के लिये जी हलकान कर रहे हैं, वहाँ जाकर होगा क्या ? आम आदमी तो ऐसी बहसों में मुब्तिला रहता है कि वह जीत रहा है, वह हार रहा है वह मेरा रिश्तेदार है। मुझे उसे अपना वोट दे देना चाहिये। ऐसी बेतुकी बहसों से पंचायती राज व्यवस्था का कचूमर निकल गया है।
हमें यह बात समझनी और समझानी चाहिये कि संविधान में हुए संशोधनों के बाद अब पंचायतों की हैसियत केन्द्र और राज्य सरकार से किसी तरह कम नहीं हैं। भारतीय गणतंत्र अनेक प्रदेशों का संघ है और प्रदेश अनेक जिलों के संघ होते हैं। उसी तरह जिले भी अब जिले के भीतर की तमाम ग्राम सभाओं और नगर निकायों के संघ हैं। जिस तरह प्रदेश में एक मुख्यमंत्री होता है, जिसे सरकार चलाने में एक मुख्य सचिव मदद करता है, उसी तरह किसी जिले में जिला पंचायत अध्यक्ष सर्वोपरि होना चाहिये और जिलाधिकारी को उसका सहायक होना चाहिये। जिला पंचायत अध्यक्ष के निर्णयों को जमीन पर उतारने का काम जिलाधिकारी को करना चाहिये। इसी तरह ग्राम सभा में ग्राम प्रधान को सर्वोपरि होना चाहिये और पंचायत सचिव को उसका सहायक।
मगर चूँकि ऐसा हो नहीं रहा है, इसलिये पंचायतों का होना न होना लगभग एक जैसा है। इतना जरूर है कि इनमें जाने वाले लोगों को ठेकेदारी के रूप में छोटा-बड़ा रोजगार मिल जाता है। लोकसभा के चुनाव वक्त पर हो जाते हैं, विधान सभाओं के चुनाव वक्त पर हो जाते हैं, मगर पंचायतों के चुनाव कभी भी वक्त पर नहीं होते और किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। जबकि पंचायतों के चुनाव समय पर न करवाने को सांवैधानिक संकट माना जाना चाहिये।

































