कुसुम रावत
‘‘संन्यास एक पहेली’’ नामक सर्वकालिक पुस्तक 7 जुलाई 1925 को डलहौजी में हुए ‘ब्रहम साक्षात्कार’ के बाद अमृतवाणी सत्संग भक्तिधारा द्वारा राम-नाम का प्रसाद बांटने वाले एक अनूठे संत ‘स्वामी सत्यानंद जी महाराज’ (07.04.1968-13.11.1960) एवं उनके पहले तीन शिष्यों में एक लेखिका के गुरू ‘श्री प्रेम जी महाराज’ की (01.10.1920-29.07.1993) की अद्वितीय जीवन यात्रा और समकालिन हिंदू धर्म पर उनकी क्रांतिकारी व विलक्षण सोच पर लिखी भारतीय प्रशासनिक सेवा की 1971 बैच की अधिकारी नीरू नंदा जी की कलम से निकली एक बेजोड़, उम्दा, अपने में ही खास ऐसी कालजयी कृति है, जो किसी भी कालखंड में कोई लेखक सिर्फ किसी अदृश्य ताकत के वशीभूत ही अंतःप्रेरणा से लिपिबद्ध कर सकता है। नहीं तो 1963 में 15 वर्ष की नाजुक उम्र में ‘अमृतवाणी भक्तिधारा’ से जुड़कर 77 वर्ष की उम्र में खराब स्वास्थ्य के बावजूद लेखिका इस ऐतिहासिक किताब को कभी न लिख पाती। यह सनातन धर्म और वैदिक संस्कृति के मूल तत्वों को समेटते हुए यह लीक से हटकर लिखा एक शैक्षणिक एवं अध्यात्मिक दस्तावेज है, जो कल हिंदू धर्म के मर्म को समझने के लिए देश-विदेश की लाइब्रेरियों एवं विश्विद्यालयों का हिस्सा बनेगा। आध्यात्म क्या है? आम जन को यह समझने-समझाने की प्रक्रिया में यह पुस्तक महत्वपूर्ण कुंजी साबित होगी। यह मेरी दृढ़ मति पुस्तक पढ़कर बनी। मैंने 40 सालों में मिस नंदा को एक बहुमुखी प्रतिभावान, कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, आम लोगों की सेवा के लिए तत्पर सुंदर दिल-दिमाग वाले नौकरशाह और ईश्वर परायण लेखिका के तौर पर तो जरूर देखा-परखा था, लेकिन उनकी विद्वता व साधना की जो ऊॅंचाईयां और गहराईयां पुस्तक में अभिव्यक्त हुई हैं, उसने मुझे निःशब्द, स्तब्ध, अवाक और विस्मित कर दिया है।
जूना अखाड़ा के आचार्य श्रद्धेय स्वामी अवधेषानंद गिरि जी ने पुस्तक का कवर ही अचानक देख जिस तत्परता से स्वामी सत्यानंद जी, डलहौजी ब्रहम-साक्षात्कार, अमृतवाणी सत्संग, उनके प्रथम तीन शिष्यों, 100 सालों में भक्तिधारा पुष्ट करने में श्रीराम शरणम् के खामोश योगदान और इसे लिपिबद्व करने वाली लेखिका नीरू नंदा जी की प्रशंसा में जो अचंभित करने वाली धाराप्रवाह टिप्पणियां कीं, उसने हरिहर आश्रम, हरिद्वार में मौजूद सुधीजनों को हतप्रभ कर दिया। वो ऐसे बोल रहे थे जैसे चलचित्र पर सब सामने चल रहा हो। स्वामी जी की जीवन यात्रा उन्होंने यूं ही चुटकियों में बता दी, गोया जैसे ये कल की ही बात हो। अंत में वह बोले-‘स्वामी जी की विलक्षण सोच साधक को मर्यादा व विवेक से ‘स्वधर्म’ का पालन करते हुए जीने की कला सिखाती है। यह पुस्तक एक मार्गदर्शिका है कि वैदिक संस्कृति के अनुसार जीवन कैसा हों? इस विलक्षण सोच का प्रचार-प्रसार जरूरी है।
प्रतिष्ठित हर-आनंद प्रकाशन, दिल्ली द्वारा प्रकाशित कुल 262 पेजों की यह असाधारण पुस्तक अंग्रेजी में है। इसमें कुल 14 अध्याय हैं। पुस्तक के ब्लैक एडं व्हाईट ऐतिहासिक चित्रों ने इसकी महता और प्रमाणिकता को पुष्ट किया है। यह पुस्तक और इसका किंडल एडीशन ‘द रिडिल आॅफ रिननसिएशन’ अमेजाॅन पर उपलब्ध है। मौलिक शोध पर आधारित यह पुस्तक विविधतापूर्ण जानकारियांे एवं भारतीय-पाश्चात्य जगत के दर्शन-चिंतन-मनन की गूढ़ता से भरपूर है। भारतीय-पाश्चात्य दर्शन, वैदिक संस्कृति, प्रचलित धर्मों, पंथों, मत-मतांतरों समेत वेद, पुराण, इतिहास और उपनिषदों के ज्ञान-विज्ञान के साथ ही देश के सामाजिक ताने-बाने की ठोस समझ के साथ इसे पढ़ना सुखद है। यह महज शब्दों एवं सूचनाओं का भंडार न होकर आत्मज्ञान की गंगा सरीखी है। पुस्तक की भाषा बहुत सुंदर, सरल, सहज व लयात्मक है। इसकी छपाई और कागज उत्कृष्ट दर्जे का है। किताब का कवर बहुत जीवंत है। किताब के हर अध्याय की अपनी ही एक कहानी है।
पुस्तक का प्राक्कथन ही पुस्तक सार है। यह प्रभावशाली, स्पष्ट, अन्र्तयात्रा को प्रेरित करने वाला और वर्णित तथ्यों को हथेली में रखे आंवले के माफिक साफ-साफ दिखाता है। पुस्तक हिंदू धर्म की चर्चा पर उभरे आम परिदृश्य- गंगा तट पर डुबकी लगा नदियों का प्रदूषण बढ़ाते साधुओं, गुरूओं, भक्तों की भीड़, भव्य मंदिर निर्माण, पुजारियों के झुंड, सजी-धजी मूर्तियांे, तथाकथित धर्मगुरूओं द्वारा महिलाओं के शोषण, छुआ-छूत, आलीशान आश्रमों की चकाचैंध पर एक सवाल उठाते हुए शुरू होती है कि क्या यही असली हिंदु धर्म है? पुस्तक में औपनिवैशिक काल और उसके बाद के हिंदू धर्म के कई प्रभावशाली संतों- रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, रमण महर्षि, नीम करौली बाबा, राधा स्वामी सत्संग व्यास, शिरड़ी सांई बाबा का आदर से जिक्र है, जिन्होंने प्रचलित पंरपराओं को दरकिनार कर जाति, धर्म, वर्ण, संप्रदाय की दीवारें तोड़ आम जन तक अपनी अलख जगा हिंदू धर्म की नई परिभाषा गढ़ आधुनिक भारत के निर्माण में अहम योगदान दिया है। पुस्तक बताती है कि कैसे इसी परंपरा को आगे बढ़ा स्वामी सत्यानंद जी ने भक्तिमय क्रांतिकारी कविताएं व गद्य लिख राम-नाम का प्रचार किया। उनकी क्रांतिकारी समकालिन हिंदू धर्म की सोच उनके साहित्य में रची-बसी है। पुस्तक सार है-
‘‘सनातन हिंदु संस्कृति का सार जाति, धर्म, संप्रदाय, मजहब, वर्ण, जेंडर, कपड़ों के रंग, मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारों-चर्च आदि की संकीर्ण दीवारों के बंधन से परे हट वही असल सन्मार्ग है, जिसकी बुनियाद वैदिक संस्कृति के मूल उपनिषदों के ज्ञान से निकले इस अमिट लेख पर टिकी है-‘‘सिर्फ एक ही ‘निराकार-र्निगुण-र्निविकार खुदाई-नूर’ सृष्टि के जर्रे-जर्रे में चमक-दमक रहा है। वह ‘अद्वितीय तत्व’ केवल एक ही है। चाहे फिर उसे किसी भी नाम से पुकारो। इसमें कोई भेद-भ्रम-भय नहीं। वह शंखनाद करता है कि सनातन संस्कृति का सच्चा ध्वजवाहक वही है, जो हर तरह के बंधनों से सर्वथा मुक्त सिर्फ ‘बेशर्त प्रेम’ की रंगीली चादर ओढ़े है। उसका बुलंद उद्घोष है कि कोई गेरूआ या खास रंग पहनने वाला ही साधु नहीं, बल्कि खद्दर पहन चुपचाप श्रेष्ठ आचरण से सेवारत बंदगी में लगा कोई साधारण बंदा भी असाधारण संत हो सकता है।’’ यही प्रचार-प्रसार से दूर रहने वाले अनूठे गुरूओं की खामोश यात्रा का सार है और यही संयास की अबूझ पहेली भी है।
र्निगुण भक्तिधारा, सेवा, वैदिक संस्कृति पर गर्व, ऊंच-नीच, जाति-पाति, हर तरह के भेद-भाव से दूर रहना स्वामी जी का अमर संदेश है। नाम सुमिरण का उनका रास्ता विश्व के सभी धर्मों एवं पंथों में एक सा है। वह गुरू-व्यक्ति पूजा के सख्त खिलाफ थे। वैदिक धर्म का पालन करते हुए उन्होंने अन्य गुरूओं की पंक्ति से हटकर साधकों के लिए एक अलग लकीर खींची। अमृतवाणी भक्तिधारा की खूबी है कि यहां कोई बिचैलिया नहीं। बस गुरू एक शिक्षक व मार्गदर्शक के रूप में साधक की बांह पकड़े हुए है। साधक को सन्मार्ग पर चलते हुए खुद परमेश्वर के दरवाजे पर पहुंचना ही उनका दिया राजमार्ग है। सिर्फ भक्ति प्रचार हेतु शुरू इस धारा की खूबी है-सब एक समान। यहां कोई कर्म कांड, आडंबर, दिखावा, दक्षिणा नहीं। उनका संदेश था-‘उपनिषदों का ज्ञान ही सर्वोच्च ज्ञान है और भक्ति इसका सुलभ रास्ता।’ उनका संदेश था राम-नाम व श्रेष्ठ आचरण द्वारा साधकों का अध्यात्मिक सशक्तीकरण और मोह त्याग, जो साधक को हिंदू धर्म के सर्वोच्च उद्देश्य ‘मोक्ष’ की ओर बढ़ाता है। मन से सशक्त कोई व्यक्ति ही सच्चा राष्ट्र भक्त हो सकता है। स्वामी जी किसी पंथ स्थापना, भवन निर्माण, कार्यकत्र्ताओं की फौज-फटाका, प्रबंधन, प्रचार-प्रसार, अपने किसी स्मारक निर्माण, चंदा लेने के सख्त खिलाफ थे। वह साधकों के सीधे श्रीराम से संवाद के हिमायती थे।
उनकी कालजयी पुस्तकें- अमृतवाणी, भक्ति प्रकाश, वाल्मिकीय रामायण-सार, श्रीमद्भगवद्गीता, एकादशोपनिषद् संग्रह, प्रार्थना और उसका प्रभाव, उपासक का आंतरिक जीवन, स्थितप्रज्ञ के लक्षण, भजन एवं ध्वनि संग्रह हैं। पूजा, आरती, शरणागति, जांति-पांति, छुआछूत आदि पर अद्भुत व्याख्या स्वामी जी के प्रकाशनों में है। अवतरित ‘भक्तिप्रकाश’ एक अद्भुत ग्रंथ है। ब्रहम साक्षात्कार के बाद उन्होंने जाति-संप्रदाय, धर्म, मत-मतांतर की सीमाएं तोड़ करुणावश तारक मंत्र राम-नाम बांटा। राम नाम बंटते-बांटते इन स्वतःस्फूर्त अमृतवाणी सत्संगों की शुरूआत साधकों ने अपने-आप ही देश-विदेश में श्रीराम शरणम् नाम से शुरू की। जहां निर्बाध बिना गुरू के 100 सालों से रोज नियत समय पर अमृतवाणी सत्संग की यह धारा अपनी ही मंथर गति-ताल-लय से चल रही है। इन साधकों की मर्यादा में ही प्रभु श्रीराम चमकते-दमकते दीख पड़ते हैं। 7 जुलाई 2025 इस भक्तिधारा की 100 वीं वर्षगांठ है।
ऐसे अद्वितीय व्यक्तित्व पर आधारित इस पुस्तक के पहले अध्याय ‘द रिडिल आॅफ संन्यास’ में उनके भव्य व्यक्तित्व, आध्यात्मिक यात्रा, ब्रहम साक्षात्कार, अमृतवाणी सत्संग, हिंदू धर्म की विलक्षण सोच, सन्यास की पहेली का नया आयाम, भक्ति धारा के अन्य आंदोलनांे, कबीर-नानक आदि संतों, पंथों, मतों, पाश्चात्य जगत के विद्वानों व समकालिन हिंदू धर्म की समझ का सुंदर समन्वय एवं विश्लेषण है। दूसरे अध्याय ‘द गुरू, टीचर, रिबेल और गाॅड’ में वैदिक मंत्रों, संत कबीर वाणी और स्वामी विवेकानंद के षब्दों का सहारा लेकर स्वामी जी के व्यक्तित्व के अनेक पहलुओं यथा-गुरू, उपदेशक, एक क्रांतिकारी संत और उसकी विलक्षण सोच व ईश्वरीय गुणों के समावेश की जीती जागती प्रतिमूर्ति के रूप में प्रभावशाली वृतांत है कि कैसे उन्होंने साधकों को व्यक्ति-गुरू पूजा से हटाकर र्निगुण ब्रहम की ओर मोड़ने का प्रयास किया। तीसरे अध्याय ‘स्वामी सत्यानंद-हिस लाईफ एंड टाईम में ‘स्वामी जी की लिखी पुस्तकों के अंशों की मदद से हिंदू धर्म को समग्रता में समझाया है। राम नाम अवतरण, 1927 में हुए उन पर हुए हमले सहित जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख के साथ बताया है कि हिंदू धर्म की समग्र सोच क्या है? चैथे अध्याय ‘द अमृतवाणी मूवमेंट’ में लेखिका के गुरू प्रेमजी महाराज का प्रभावी परिचय है। पांचवे अध्याय में बताया है कि कैसे अमृतवाणी का एक-एक शब्द उपनिषदों, कशमीरी शैवायतन, कबीर और गुरूवाणी के करीब है? कैसे सब एक ही र्निगुण सत्ता की ओर इशारा कर रहे हैं?
छटा अध्याय ‘भक्ति और ज्ञान’ का मुखर संदेश है कि कैसे गुरू श्रेष्ठ आचरण से साधक को जीवन की रहनी-सहनी का उपदेश देता है। उनकी रचनाओं के अंशों की समकालीन वैदिक ग्रंथों व पश्चिमी विद्वानों से तुलनात्मक विश्लेषण अध्याय की खूबी है। सातवां अध्याय ‘ए विजन फाॅर कंटेपररी हिंदूइज्म’ इतिहास में भक्ति आंदोलन, हिंदू धर्म के मर्म और दर्शन शास्त्र में उसके अतुलनीय योगदान का उत्कृष्ट दस्तावेज है। इसमें वाल्मिकीय रामायण सार को उद्भृत करते हुए वानर, रावण, जटायु और हनुमान के चरित्रों को पुष्ट उदाहरणों से नए सिरे से परिभाषित कर संदेश दिया गया है कि इन महानायकों को उनके प्रचलित स्वरूप से बाहर ला उनकी पूर्णता में देखने की जरूरत है। एक दिन यह पुस्तक हिंदू धर्म की सही व्याख्या स्वामी सत्यानंद जी के श्रीमुख से कराते हुए पथ प्रदर्शक साबित होगी। कई मर्मज्ञों के अनुभवों से लिखा यह अध्याय वैदिक संस्कृति, हिंदू धर्म और अन्य धर्मों पर एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक शोध है।
आठवां अध्याय ‘द विजन आॅफ वूमन एंड जेंडर न्यूशेंस’ सम्मोहित करने वाला है। इसमें जेंडर समानता, महिला सशक्तीकरण, महिलाओं की गरिमा पर दोनों संतों के क्रांतिकारी विचारों का संकलन है। इसमें लेखिका ने अपने गुरू प्रेमजी महाराज की सेवा व अध्यात्मिक यात्रा लिखते हुए संन्यास की पहेली और उनकी हिंदु धर्म की विलक्षण सोच को नया आयाम दिया है। नवें अध्याय ‘वांडरिंग योगीस्ः द साधु यूनिवर्स’ में घुमंतु योगियों के प्रसंग है। लेखिका के गुरू साधु वेश में न थे। कई सिद्ध योगियों के साथ उनके अनुभवों का संकलन इस अध्याय में है। इसे पढ़कर लगा कि प्रेमजी का जीवन कितनी धन्यता एवं पूर्णता लिए होगा- जो उनके कुर्ते-पायजामें मे छिपे सीधे, सरल, सादगी, नम्र व्यक्तित्व एवं गहरी आंखों में झलकता है। यह पुस्तक पढ़ने के बजाय गुरू ज्ञान को आचरण में उतारने के दृष्टिकोण से अहम है। दसवां अध्याय ‘‘प्रेम जी लायलपुर टू दिल्ली में श्री प्रेमजी के जीवन के विभिन्न पड़ावों का रोचक वृतांत है। यह आश्चर्य नहीं सत्य है कि खादी कपड़ों में एक ब्रहमचारी कृषि अधिकारी कैसे स्कूटर पर बैठ चुपचाप सेवा, नौकरी, कर्तव्य कर्म करते हुए आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त करता है? और कैसे एक मर्यादा पुरुष की तरह जीकर अध्यात्म की ऊंचाईयों तक पहुंचा? वह एक अप्रतिम उदाहण है कि जीवन की आपाधापी में कैसे साधनापरक जीवन जिएं? ग्यारवें अध्याय ‘श्री प्रेमजी महाराजः नो फुटप्रिंटस् इन द स्काई’ में गुरू की अध्यात्मिक यात्रा को कंेद्र में रख कहा गया कि-जैसे पंछी आकाश में लकीर नहीं छोड़ता वैसा ही साधु को होना चाहिए। पंछी भोर की पहली किरण के साथ उड़ सांझ ढ़ले लौटता है। उसमें संग्रहवृति नहीं होती। पंछी के माफिक साधु का अपना कुछ नहीं होता- मंदिर, मठ, घर-द्वार कुछ भी नहीं। वह कोई संस्था या ईमारत नहीं बनाता। उसका श्रेष्ठ आचरण ही समाज को राह दिखाता है। अध्याय बताता है कि जो अंधेरे में भी मर्यादा न छोड़े वही साधु है। मेरे गुरूजी स्वामी कैलाशानंद सरस्वती जी बोलते थे कि ईश्वर की कोई मूर्ति नहीं होती। वह अपनी दिव्यता में ही दीखता है। उसे पहचानने को दृष्टि चाहिए। यहां लेखिका की टेलीस्कोपिक आंखों ने अपने गुरू की ओजस्विता, पूर्णता को पहचान सुंदर शब्दों में बांधा कि साधु कैसा हो? और सन्यास की अबूझ पहेली को उनके लीक से हटकर व्यक्तित्व द्वारा नया आयाम दिया। देशभक्ति, कर्तव्य निष्ठा, सैनिकों और महिलाओं के प्रति सम्मान, सेवा, अनुशासन, र्निवैर, निष्पक्षता, निर्भयता, अकेले खड़े होने का साहस, पेड़ों के नीचे सत्संग, माला और सम्मान से दूर, बराबरी की सोच से भरा उनका ओजस्वी व्यक्तित्व एक ईष्वरीय विज्ञापन सरीखा है। गुरूजी जी बोलते थे कि वह सृजनहार चींटी के पैरों में बंधे घुंघरूओं की आवाज भी सुनता है। उसको रिझाने को लाउडस्पीकर के षोर की नहीं समर्पण की जरूरत है। ऐसे ही एक शरणागत, खामोश और सार्वभौमिक नैतिकता के जीवंत विज्ञापन श्री प्रेमजी महाराज हैं। यह झलक दिखाकर लेखिका ने षायद वह मुकाम हासिल कर लिया है, जिसकी चाह में यह पुस्तक लिखी-लिखाई गई होगी।
बारहवें अध्याय द हरिद्वार सत्संगः ए लिविंग मैमोरियल में अमृतवाणी सत्संग व साधना शिविरों का सजीव वर्णन है। इनकी अनुशासित दिनचर्या के संस्मरण पढ़कर कहा जा सकता है कि इसी मर्यादा के चलते ही यह भक्तिधारा 100 साल से बिना किसी गुरूडम के चल रही है सहजता से। मैंने खुद रेसकोर्स सत्संग में यह महसूस किया हैं। कोई गुरू या आधुनिक तकनीक किसी विचार को जिंदा नहीं रख सकती। वह तो सिर्फ बंदों के श्रेष्ठ आचरण से जिंदा रह सकता है। हरिद्वार सत्संग इस भक्तिधारा का यादगार हिस्सा है। अध्याय 13 ‘‘रैमिनिसेंसस्’’ लेखिका-साधक की अपनी आनंददायक यात्रा, अन्तर्मुखता और अन्तर्यात्रा के उस क्षैतिज की तलाश का वर्णन है, जिसकी तलाश में कवि कहता है कि- ‘प्रभु तोड़ दो वह क्षैतिज तो मैं भी देखूं उस पार क्या है?’ एक 15 साल की लड़की के नोट्स को 77 साल की परिपक्व प्रशासकीय अनुभवों से संपन्न विवेकी साधिका के ज्ञान-अनुभव-अनुभूति की परिपक्वता के साथ पढ़ना सुखद है। लेखिका ने अपने कड़वे-मीठे अनुभवों को समाज के यथार्थ को दर्शाते हुए बेबाकी से लिखा है। लेखिका का बहुमुखी व्यक्त्वि उनको अनूठे-विरले लोगों की श्रेणी में रखता है। यह अध्याय लेखिका की उतार-चढ़ाव भरी यात्रा का ईमानदार स्वमूल्यांकन है। साथ ही परम ज्ञान की जिज्ञासु की अन्र्तयात्रा का दस्तावेज भी कि कैसे जीवन की कठिनाईयां एक विवेकी गुरू के सानिध्य में खुद-ब-खुद सुलझती गईं दुनियादारी-प्रशासनिक सेवा की गुरूत्तर जिम्मेदारियों-अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों के साथ। गुरू की छोटी-छोटी बात से पाथेय बटोरने के दिलचस्प अनुभव पठनीय हैं। यह गुरू के मौन, शिष्ट आचरण का अनोखा दस्तावेज है। एनैक्सर में गुरू की उड़ीसा की 3000 साल पुरानी सभ्यता ‘विक्रम खोल’ के बीहड़ जंगलों में भटकती हुइ्र्र साहसिक यात्रा का वष्तांत है। क्या लोग थे वह? और क्या यात्रा वृतांत है यह?
पुस्तक पर सारगर्भित टिप्पणी करतें हुए हां! ‘सौंगस आॅफ कबीर’ के अनुवादक और कवि अरविंद कृष्ण मल्होत्रा ने लिखा- ‘‘इन दो महान गुरूओं और धरातल पर 100 सालों से चल रहे अमृतवाणी सत्संग के बोये उनके बीज सबकी भलाई और समाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समानता के लिए पवित्र राम-नाम के आहवान की उर्वरा भूमि में कहीं गहराई में दबे हैं। राम-नाम की यह भक्ति धारा उत्तरी भारत में भक्ति आंदोलन के समकालिन एक सतत् श्रृंखला के तौर पर उभरी, जिसने समाज को गुरूओं व पंडितों के प्रभाव से सर्वथा मुक्त कर जाति-वर्ग-वर्ण-संप्रदाय-जेंडर भेद-भाव आदि से परे हटाकर परम सत्य के हर साधक को स्वतंत्र रूप से परमेश्वर प्राप्ति का एक सुलभ रास्ता दिखाया है। पूर्णतया मौलिक शोध पर आधारित यह पुस्तक कभी अंग्रेजी में ‘हिंदु धर्म के अध्ययन’ हेतु प्रयुक्त होगी। डा. डेविड निकिल, प्रोफेसर एंड चेयर, डिपार्टमेंट आॅफ रिलिजन, यूनिवर्सिटी आॅफ नार्थ कैरोलिना, पैमब्रूक, यू.एस.ए. की टिप्पणी है- ‘‘मुझे पुस्तक पढ़ने में बड़ा आनंद आया। यह लेखिका की अध्यात्मिक यात्रा के साथ ही उनके जीवन में बदलाव लाने वाले मुख्य किरदारों, उनके कार्यों एवं अनुभवों का एक जीवंत दस्तावेजीकरण है।’’
एक और आयाम खोलते हुए ‘प्ले राइट अवार्ड विजेता’ कवि, लेखिका और फिल्ममेकर सागरी छाबरा टिप्पणी करती हैं-‘‘ यह एक विद्वान, अनुभवी और भारतीय प्रशासनिक सेवा की महिला अधिकारी की अपने दो गुरूओं की अध्यात्मिक यात्रा के साथ ही धार्मिकता और महिलाओं पर उनके व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाती एक आश्चर्यजनक अध्यात्मिक पुस्तक है। इसे अवश्यमेव पढ़ा ही जाना चाहिए!’’ महाभारत के प्रखर विद्वान जेंडर और लैंगिक विशेषज्ञ एस.पीकृएम.सी. दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक डा. अंजनी शंकर पांडे की यह टिप्पणी पुस्तक की गूढ़ता बताती है- ‘‘नीरू नंदा का यह कार्य मौलिक शोध की पूर्व अपेक्षाओं को उजागर और स्पष्ट करने में बहुत उपयोगी साबित होगा। अपने गुरू द्वारा ‘वाल्मिकीय रामायण सार पर लिखे भाष्य के अंशों का उदाहरण लेकर इस विषयक कई पूर्व प्रस्तुतियों पर अलोचनात्मक टिप्पणी करते हुए वह वाल्मिकीय रामायण सार सरीखे आदि ग्रंथ से की गई छेड़छाड़ को सामने लाई हैं।’ बकौल रामकृष्ण मिशन की साधिका नीलिमा पंडित-‘‘नीरू तुम्हारी किताब बहुत उम्दा और खास एकेडमिक बुक है। यह आम लोगों के लिए न लिखी गई और न वह इसे समझने की कुव्वत रखते हैं। यह कैसे और कब प्रयोग होगी यह समय ही बताऐगा।’
उत्तराखंड से स्वामी जी का नजदीकी रिश्ता है। डा. राजेन्द्र प्रसाद व पंडित नेहरू के मित्र देहरादून के प्रतिष्ठित रायबहादुर जोधामल स्वामी जी के अभिन्न मित्रों में थे। स्वामी जी अक्सर उनके आवास 33 रेसकोर्स, देहरादून में ठहरते थे। अमृतधारा दवा कंपनी के संस्थापक ठाकुर दत्त शर्मा वैद्य जी स्वामी जी के करीबी मित्र थे। पहली वाल्मिकीय रामायण सार का प्रकाषन अमृतधारा लाहौर ने ही सन् 1935 में कराया। देहरादून में श्रीराम शरणम् का सत्संग रोज रेसकोर्स में चलता है। 1935 में स्वामी जी ने साधना सत्संग शिविर शुरू किये। हरिद्वार सत्संग भवन रायबहादुर लाला जोधामल ने ही सन् 1960 में बनवाया। आचार्य विनोबा भावे समेत हर मत-मतांतर के विद्वान, श्रेष्ठ व सुधीजन स्वामी जी के अभिन्न मित्र थे। स्वामी जी का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के आचार्य गोवलकर के साथ आत्मीयता से बैठा एक चित्र भी मैंने देखा।
जब दश्ष सांप्रदायिकता की आग में झुलस रहा था। महात्मा गांधी सहित हर नेता विभाजन रोकने की कोशिश में था। उस वक्त यह साधु भी अपने सामाजिक-सद्भाव के प्रयासों में चुपचाप लगा था। सत्य के इस साधक को किसी से कोई वैर-शिकायत-शिकवा न था। समाज में व्याप्त हर कुरीति और संकीर्णता की दीवार तोड़ने का अदम्य साहस रखने वाले स्वामी सत्यानंद जी के पेट में एक मुस्लिम युवक ने 9 अक्टू. 1927 को उस वक्त चाकू घोंपा, जब वह प्रसिद्ध राजहंस प्रकाशन लाहौर की प्रैस में ‘भक्तिप्रकाश’ के फू्रफ करा रहे थे। घटना की पृष्ठभूमि कुछ यूं है- राजहंस प्रकाशन द्वारा पूर्व प्रकाशित एक पुस्तक ‘रंगीला रसूल’ ने मुस्लिम भावनाओं को बहुत चोट पहुंचाई थी। इसलिए मुस्लिम समाज बदला लेने के लिए लेखक की तलाश में था। आर्य समाज और मुस्लिम संस्थाओं के बीच के विवाद में स्वामी सत्यानंद जी आर्य समाज के वरिष्ठ व अति सम्मानित साधु होते हुए भी इस आपसी स्पर्धा से दूरी बनाए रखते थे। इस अनूठे गुरू की समकालिन हिंदू धर्म की विलक्षण सोच का अप्रतिम प्रमाण है कि वह घायल होने पर भी चुपचाप अकेले बिना शोर-शराबा किये तांगे में बैठे। पेट से निकलने वाले खून के तेज प्रवाह को अंगवस्त्र से रोका। खबर आग की तरह फैली। पुलिस के उच्चाधिकारी अस्पताल दौड़े। स्वामी जी ने यह कह मौन धारण कर लिया कि- ‘‘मेरा किसी से वाद-विवाद नहीं हुआ। साधु का कोई दुश्मन नहीं होता।’’ सोचिए ऐसे महौल में एक लोकप्रिय हिंदु साधु पर मुस्लिम युवा के हमले की पुष्टि होने पर कितनी मार-काट मचती? स्वामी जी के मौन ने इसे टाल दिया। सहिष्णुता, समरसता व सद्भाव का हिमायती यह अद्धितीय संत 13 नवंबर 1960 को रात्रि 10.20 मिनट पर राम-नाम जपते-जपते उसी र्निगुण राम में समा गया, जिसकी अलख 100 साल बाद भी आज बिना गुरू के भारत के कोने-कोने समेत अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, सिंगापुर आदि में प्रज्वलित है।
पुस्तक शोध, रचनात्मकता, साशक्त लेखन, विश्लेषण और हिंदु धर्म को व्यापकता में समझने के दृष्टिकोण से अनमोल कृति है। इसके अध्याय क्रमबद्ध व व्यवस्थित हैं। जिम्मेदारीपूर्वक लेखिका ने दो संतों की जीवन यात्रा को वैदिक संस्कृति व समकालीन हिंदू धर्म के परिदृष्य के साथ एक माला के फूलों की तरह खुबसूरती से गूंथा है। अध्याय-दर-अध्याय इन फूलों की ताजगी व महक बढ़ती ही गई। पुस्तक इन गुरू-शिष्यों की एक साथ कली से प्रस्फुटित हो फूल बनने की सुंदर कहानी है। पुस्तक का अंत रहस्यमयी व प्रभावशाली है, जहां लेखिका गुरू स्वामी सत्यानंद जी को पूर्णता की प्राप्ति और रूमी को अपने मुर्शीद के विछोह में भी अन्र्तयात्रा की पूर्णता पर आनंदित हो नटराज के माफिक नृत्य करते देखती हैं। जहां सृष्टि के सारे दृष्य खत्म हो मन शांत है। वहां मुर्शीद हृदयगुहा में बांह फैलाये अपने शार्गिद के साथ एकाकार है। वहां मैं-मैं नहीं सिर्फ तू ही तू है। वहां मेरा-तेरा नहीं है। न वहां तू बड़ा है और न ही मैं छोटा। वहां पागलपन (पा लिया जिसने) की अवधूती आनंद अवस्था में पहुंच द्वैत का द्वंद ही खत्म हो गया है। पाठकों को उस र्निगुण राम तत्व की झलक दिखा लेखिका ने विस्मय से अवाक खड़ा कर दिया कि अब इससे आगे क्या? सच में कमाल की हतप्रभ करने वाली पुस्तक है। इस अवस्था तक तो कोई पहुंचा योगी, फकीर, जोगी, यति, तपस्वी, ज्ञानी, संत, महात्मा, मस्तमौला ही पहुंचेगा जिसे न कुछ न पाने की चाह है और न कुछ खोने का भान ही। किताब की एक-एक लाईन गहरे चिंतन को उकसाती है।
लेखिका ने दो गुरूओं के जीवन दर्षन द्वारा वैदिक संस्कृति से आज तक इतिहास के अलग-अलग कालखंडों में विशिष्ट भारतीय चिंतन-दर्षन, सनातन धर्म, भक्ति आंदोलन, समकालिन हिंदू धर्म सहित भारत के अलग-अलग मत-मतांतरों, पंथों, धर्म, संप्रदाय के शीर्श ऋषियों-मुनियों-प्रर्वतकों के कालजयी ज्ञान और देश-दुनिया के मूर्धन्य विद्धानों-मनीषियों-चिंतकों के सर्वोच्च ज्ञान-विज्ञान को हाजिर-नाजिर मानकर क्या कुछ लिख डाला है, यह जानने को आपको पुस्तक पढ़नी ही होगी। काश! यह हिंदी में भी होती।
7 जुलाई 2025 इस अनूठे गुरू स्वामी सत्यानंद जी के ‘‘डलहौजी ब्रहम साक्षात्कार’’ की सौवीं वर्षगांठ है। इस खास मौके पर दैवयोग से प्रकाशित यह बेमिसाल पुस्तक लेखिका नीरू नंदा जी की अपने गुरूओं को मौन विनम्र श्रृद्धांजली ही है! ऐसे महान गुरूओं को बार-बार नमस्कार जिनकी प्रेरणा से ही यह अद्वितीय प्रकाशन संभव हो सका।

































