कविता पांडे
मेरा नैनीताल वह है,जहां मैं बाइस वर्ष माता-पिता ,भाई बहनों के साथ रही,उसके बाद बीस वर्ष पति,और बेटी के साथ।यहीं मैंने अड़तीस बरस डीएसबी राजकीय महाविद्यालय तथा बाद में जब यही विद्यालय कुमायूँ विश्वविद्यालय का संघटक कालेज हो गया ,इसके भौतिकी विभाग में पढ़ाया ।इनकी अलग ही यादें हैं मेरी स्मृतियों में,इस सबका अलग ही अस्तित्त्व मेरे व्यक्तित्व निर्धारण में है ।
कभी बैरन ने उन्नीसवीं शताब्दी के शुरू के सालों में अकस्मात् इसे देखा और यहाँ नगरबसाने की ओर आकर्षित हुआ होगा, इसी शताब्दी के अस्सीवें साल में एक बड़े भूस्खलन के चलते यहाँ एक समतल खेल का मैदान बना होगा,वह सब मेरा सरोकार नहीं है,मेरा सरोकार यह भी नहीं है कि इसी शताब्दी के नब्बे के दशक में एक बहुत ही खूबसूरत स्काटिश कासल यहाँ की पहाड़ियों में बना जो आज तक राजभवन के नाम से जाना जाता है, और दर्शकों के लिए कभी-कभी खोला जाता है।देश के राष्ट्रपति या अन्य बड़े मेहमान जो यहाँ की ख़ूबसूरती का जायज़ा लेने आते हैं,यहीं ठहरते हैं।हमारे आने तक तो यह सब था,कुछ बातें और भी थीं जो अब नहीं हैं।हम जब चाहते थे,तब(गवर्नर के नहीं होने पर) कालेज के फ़्री पीरियड में यहाँ गोल्फ ग्राउण्ड में,घूमने निकल लेते थे,यहाँ राज मिस्त्री का कार्य करने वाले एक कर्मचारी पुनीराम,जो हमारे घर के क्वार्टर्स में रहता था,हमारे यहाँ काम भी करता था, के साथ ,अन्दर बाहर,बिना रोक-टोक के देख आते थे।
पतझड़ के बाद नंगी शाखाओं पर बैठा कौव्वा सचमुच सुन्दर लगता था और बट्रेस कासल के कोने वाले पेड़ पर बैठा परीक्षा के लिए जाते हुए दीख ही जाता था।
“तरू की नग्न डाल पर बैठे लगते हो चिर सुन्दर
कोविदार के शकुनि,पार्श्वमुख,सांध्य कपिश नभ पट पर
कृष्णकुहू में तुम जन्मे तरुकोटर में लुकछिप कर
तारों की ज्यों छाँह गले पड़ गयी नीड़ से छन कर।”
मैं पंत की कविता गुनगुनाने लगती ।परीक्षा देने सुबह छ:बजे जब जाते तो दो उँगलियों को गोल कर तीसरी से कट करके बैड-लक हटाना भी नहीं भूलते थे क्योंकि एक सिटौला (मैना) कभी कभी बिना साथी के दाना चुगता दीख जाता था। ‘वन फ़ार सारो…..’
अगस्त की बरसात में जब केवल कुहरा हो ,साथ चलती बहन भी न दिखाई पड़ रही हो ,तो बालों के ऊपर कुहरे की बूँदें मोतियों सी जमा हो जातीं और हम अपनी सुन्दरता पर स्वयं ही रीझ जाते थे।नैनीताल में सभी स्कूलों में शीतावकाश होता,अंग्रेज़ी स्कूलों में दिसम्बर से मार्च तक तीन माह,सरकारी स्कूलों और कालेज में दिसम्बर आख़ीर से फरवरी मध्य तक ।हम गाँव जाते,पर जिस दिन वापस आते,लालकुंआ स्टेशन से ही ,जब पहाड़ दिखने लगते,होंठों पर मुस्कान बरबस थिरकने लगती।लगता कि काठगोदाम से बस से ऊपर जाते हुए हर वृक्ष,हर पौधा,हर झरना हमारे लौटने की ख़ुशी में गीत गुनगुना रहा है।नैनीताल बस स्टैंड पर पहुँचते न पहुँचते नेपाली कुलियों का’शाब लम्मर,हामरा,छोटा कुल्ली होगा?,दो कुल्ली लेलो शाब’कहते कहते बच्चों को भी अपने नम्बर पकड़ा देने वाले नेपाली कुली हृदय आह्लादित करने वाला स्वागत ही तो करते थे।
घर पहुँचते ही सबसे पहले घर के चारों ओर, खेल के मैदान में, घूमते,तब अपना कमरा ठीक करते।नीचे बार बार झील को ज़रूर देख लेते,वहीं,वैसी ही मनोहर जितनी छोड़ कर गए थे, है कि नहीं, बीच बीच में ’कितनी काली-हरी लग रही है?’कहना भी नहीं भूलते।
कभी बर्फ़ पड़ती तो ताजी बर्फ़ में चीनी-मलाई मिला,आइसक्रीम खाना भी कभी नहीं भूले,धूप होने पर,छत से सरक कर फिसलती बर्फ़ के ढेर पर कोट और गर्म कपड़े पटक पटक कर ड्राईक्लीनिंग भी हम कर लेते थे।पोस्टआफिस की चढ़ाई बहुत थकाने वाली थी पर वहाँ से थोड़ा ही ऊपर एक पहाड़ी स्रोत का ठंढा पानी जन्म-जन्म की प्यास बुझा देता था।यह था हमारा नैनीताल।डफ़रिन लाज के सामने वाले बरामदे से या सामने की रेलिंग से, बस झील देख लो, चाइनापीक , केमल्सबैक और टिफिनटाप का दीदार कर लो,डूबते सूरज की आख़िरी ,और आख़िरी किरणों को पहाड़ के पीछे छिपते देखने का अलौकिक आनन्द कैसे किसी और को बताया जा सकता है?
पूर्णिमा की चाँदनी में नौकायन,नौकाचालक को ‘दाजू,बस आज ही एक बार राउण्ड लगाएँगे ‘कहते कहते हम सब चाँद वाले सारे फिल्मी गाने दुहरा लेते,अब नहीं कर सकते ,क्योंकि बहुत सख़्ती है,पर दिन में नौकायन,वह भी तरह तरह की कश्तियों में,का लुत्फ़ अब भी उठा सकते हैं।यह शौक़ भीमताल, नौकुचियाताल ,सातताल की झीलों में भी उठा सकते हैं,हर झील अलग सौंदर्य से भरी ,अलग तरह की कश्तियों वाली,इस सबका अपना आनन्द है।
लबालब भरी झील की छाती पर तैरती पाल वाली सफेद(रंगीन तो बाद में आईं) नौकाएँ देख कर कभी खुश होना हो , नैनीताल से बेहतर कुछ नहीं।।नैनीताल वसन्त ऋतु में ,जब पहाड़ों पर हरे रंग के अनेक संयोजन पर दृष्टि ठहरे- symphony of green! एक ही जगह,अलग-अलग ऋतुओं में प्रकृति यहाँ कैसी अलग अनोखी छटा बिखेरती है,आकाश में बादल कैसे तरह-तरह की आकृतियों का नाटक ,कभी भी ,किसी मौसम में भी ,दिखा सकते हैं,यह भी सब स्मृतियों में सँजोया हुआ है।
हम तो अक्सर नैनीताल में ही एक जगह से दूसरी जगह कभी शौक़िया तो कभी थकान के कारण घोड़े पर आते जाते,पर अब यहाँ घुड़सवारी का आनन्द लेने लैंड्सएंड जाना पड़ता है।अब डांडी भी नहीं चलती,न ही हाथ रिक्शा,अच्छा है,वह मुझे लगता था मनुष्य के श्रम का अपमान, पर कुछ के लिए आजीविका तो थे ही।फ्लैट्स पर नानखटाई वाला अब नानखटाई नहीं बेचता,पर बेकरी के खाद्य पदार्थ अब भी अच्छे बनते हैं।यहाँ छोले भटूरे, डोसा- इडली का बाज़ार सत्तर के दशक में बना ।टिकिया-समोसे या मामू की मिठाइयाँ ,लोटे वाले की जलेबी या सुरजी साह का जलेबा सबका ही प्रिय बहुत पहले से ही था।तिब्बती विस्थापितों के साठ के दशक में यहाँ आकर बस जाने के बाद, मोमो, आदि तिब्बती व्यंजनों का का चलन भी शुरू हो गया।आल्प्स होटल के एक हिस्से में एक चीनी व्यवसायी की जूते बनाने की बहुत उमदा दुकान थी, खूब अच्छी फिटिंग के मज़बूत सैंडिल्स मैं नौकरी में आने के बाद वहीं से बनवाती।मिस्टर लिसन ,समय तो लेते पर सन्तुष्टि पूरी देते थे।उन्होंने ही अपनी दुकान के आगे, सत्तर के दशक के प्रारम्भ से ,बराम्दे में दो तीन मेज़-कुर्सियाँ लगा कर नूडल्स-चावल आदि ख़ालिस चीनी व्यंजनों का रेस्तराँ सा खोल दिया था।
ट्राली से स्नोव्यू जाकर बर्फ़ ढकी पर्वत श्रृंखलाओं का विवरण पढने की सुविधा ,डूबते सूरज की आभा में नहायी पंचचूली,त्रिशूल,नन्दा खाट पर्वत मालाओं का सौंदर्य आँखों में समेट लेने के उद्देश्य को पूरा तो अवश्य करता है, पर चढ़ाई चढ़कर चोटी तक पँहुचने का आनन्द अलग ही था।
नैनीताल में अब वेधशाला का बहुत विस्तार हो गया है तथा उच्चस्तरीय शोध-सुविधा के साथ-साथ ,नैनीताल से लगभग पचास किलोमीटर की दूरी पर ,देवस्थल, में ,एशिया की सबसे बड़ी दूरबीन लग गई है ।
नैनीताल के स्कूल,सुन्दर ,स्वच्छ वातावरण के साथ आज भी अच्छे स्तर के है।पैदल नैनापीक जाने का चलन कम सा है ,क्योंकि कार द्वारा व्यू-प्वाइंट जाकर वहीं से मनोहारी बर्फ़ की चोटियों का दर्शन हो जाता है।
नवम्बर के आख़िरी दिनों में ,जब शेर का डाँडा पहाड़ी चटक पीली धूप से लबरेज़ होती और अयारपाटा अंधेरे में डूबा लगता तो ,कालेज से बस स्टैंड के बीच की सड़क से झील ,पिघले सोने से लबालब भरी दिखाई देती, ओह ,वह नैसर्गिक दृश्य ! मैं कुछ पल ठहर कर आँखों में स्मृतियों में समेटना कभी नहीं भूली। उन दृश्यों को पल-दो-पल आज भी जी लेने की हार्दिक इच्छा है।
यहाँ मन्दिर,गुरुद्वारा और मस्जिद कैसी शान से एक दूसरे को पूर्ण करते आज भी खडे हैं, नन्दाष्टमी में मंदिर के साथ पूरे शहर का श्रृंगार होता है और पतझड़ में भी फ्लैट्स के पापलर के पेड़ ,सुन्दर लगते हैं, अब तो माल रोड पर चिनार के भी कुछ पेड़ लगा दिए गए हैं, पर पहले के से फूल नहीं खिलते।फ्लैट्स पर भीड़ में वह आभिजात्य, पहाड़ी स्थान के लिए सम्मान ,प्रकृति के लिए दुलार से भरा ,नहीं मिलता।
मेरी तो हर साँस में वही पुराना नैनीताल अभी भी घुमड़ता है।

































