शुभनीत कौशिक
आज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि है. वे लगभग 16 साल, 9 महीने और 12 दिन तक इस देश के प्रधान रहे. उनके कार्यकाल में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एआईआईएमएस), राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), राष्ट्रीय डिज़ाइन संस्थान (एनआईडी), राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी), केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई), केंद्रीय विद्यालय संगठन, भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र और वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों की स्थापना हुई और उनका विस्तार हुआ. कहने की आवश्यकता नहीं कि ये संस्थान आज देश की प्रगति की नींव हैं. नेहरू जी ने वैज्ञानिक चेतना, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के महत्व को बहुत पहले समझ लिया था. इस आलेख में युवा इतिहासकार शुभनीत कौशिक ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों के निर्माण में नेहरू की भूमिका और तकनीकी शिक्षा के प्रति उनकी दूरदर्शिता को रेखांकित किया है. उनकी स्मृति को नमन करते हुए यह आलेख प्रस्तुत है।
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आधुनिक भारत में तकनीकी शिक्षा का विधिवत आरम्भ वैसे तो उन्नीसवीं सदी में ही हो चुका था. जब 1847 में रुड़की में टॉमसन कॉलेज ऑफ़ सिविल इंजीनियरिंग की स्थापना हुई. इस कॉलेज में सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा के साथ ही ओवरसियर और ड्राफ़्ट्समैन का कोर्स भी कराया जाता था. औपनिवेशिक काल में स्थापित हुए रुड़की के इंजीनियरिंग कॉलेज जैसे संस्थानों की अपनी सीमाएँ थीं, उनकी पाठ्यचर्या का विकास अंग्रेज़ी राज की ज़रूरतों के मुताबिक़ हुआ था. इसलिए जब बीसवीं सदी के चौथे-पाँचवें दशक में हिंदुस्तान ने आज़ादी की दहलीज़ पर कदम रखना शुरू किया तो आज़ाद हिंदुस्तान की ज़रूरतों के मुताबिक़ उच्च तकनीकी संस्थानों की ज़रूरत भी महसूस की जाने लगी. उस समय इस दिशा में दो महत्त्वपूर्ण प्रयास हुए. एक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा बनाई गई राष्ट्रीय योजना समिति द्वारा और दूसरा ब्रिटिश भारत की सरकार द्वारा गठित समिति द्वारा. ग़ौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय योजना समिति के अध्यक्ष थे. |
एक पराधीन देश के राष्ट्रवादी नेतृत्व ने देश के तमाम क्षेत्रों के विशेषज्ञों के साथ मिलकर किस तरह आज़ादी मिलने से पहले ही देश के नवनिर्माण की योजना का विस्तृत खाका तैयार किया और कितनी गहराई से उसमें देश और उसके निवासियों से जुड़े तमाम मुद्दों पर विचार किया गया (जोकि हमें राष्ट्रीय योजना समिति की रिपोर्टों के रूप में दिखाई पड़ता है), वह उपनिवेशवादविरोधी आंदोलन के वैश्विक इतिहास का एक अद्वितीय अध्याय है.
तकनीकी शिक्षा का सवाल और राष्ट्रीय योजना समिति
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अक्तूबर 1938 में ‘राष्ट्रीय योजना समिति’ के गठन की घोषणा की. नेताजी सुभाष चंद्र बोस उस समय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे. 19 अक्तूबर 1938 को ख़ुद सुभाष चंद्र बोस ने जवाहरलाल नेहरू को खत लिखकर उन्हें राष्ट्रीय योजना समिति का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा. बाद में, सुभाष चंद्र बोस की मंशा के अनुरूप जवाहरलाल नेहरू योजना समिति के अध्यक्ष बने.[1]

































