योगेश धस्माना
हिमाचल के आर्थिक विकास का पौड़ी कनेक्शन बहुत रोचक और महत्वपूर्ण रहा है। यदि यशवंत परमार की राजनीतिक इच्छा शक्ति ने राज्य को मजबूत नेतृत्व और विकास का विजन दिया तो इसके आर्थिक विकास की मजबूत नींव रखने वाले पौड़ी वासी नलनीधर जुयाल थे। 1960 से 1967 तक सीमांत किन्नौर में जिलाधिकारी रहते हुए 7 वर्ष उन्होंने स्थानीय जनता की सेवा कर कृषि और बागवानी में अभूतपूर्व काम कर देश में हिमाचल को आर्थिक विकास का जो मॉडल बनाया वह आज भी पहाड़ी राज्यों के लिए नजीर है।
दून स्कूल के 1936 में पहले बैच के छात्र नलनीधर जुयाल 1953 में देश के ऐसे पहले फाइटर पायलट रहे जिन्होंने माउंट एवरेस्ट के ऊपर उड़ान भर कर पहली बार दुनिया को लाइव फोटो ग्राफ दिए थे। इनके पिता चंद्रधर जुयाल ब्रिटिश कुमाऊं में अल्मोड़ा के डिप्टी कलेक्टर रहे थे।बड़ी बहिन शाकम्बरी जुयाल उत्तराखंड की प्रथम महिला इतिहासकार और ताऊ दीवान चक्रधर जुयाल थे। मशहूर पर्वतारोही नंदू जुयाल इनके चचेरे भाई थे, जिनके नाम पर पर दार्जलिंग का पर्वतारोहण संस्थान बना है। इनके पिता गजाधर इंदौर के होलकर राजाओं के ज्योतिष और पूर्वज इनके राजगुरु रहे थे। 16 वी शताब्दी में इनके वंशज पौड़ी के कोट ब्लॉक में बस गए थे।
देश में जब 1956 में इंडियन फ्रंटियर एडमिंस्ट्रिव सर्विस की शुरुआत हुई तो नलनीधर जुयाल ने एयर फोर्स की नौकरी छोड़ कर इस सर्विस में जाने का निश्चय किया। नेफा का यह क्षेत्र विदेश मंत्रालय के अधीन आता था। जंगली क्षेत्र के कारण यहां नौकरी करना आसान नहीं था। यहां के भाषा समझने वाले एक व्यक्ति के सहायता से इन्होंने जंगल में ही एक झोपडी डाल कर इन लोगों को देश की मुख्य धारा में शामिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक नौकरशाह ने पॉलिटिकल ऑफिसर के रूप में नेफा जिसे अब अरुणाचल प्रदेश कहा जाता है,बहुत संवेदनशील इलाका था। यहां ऐसे अधिकारियों की जरूरत थी,जो जंगल में झोपडी में रहकर नदियों में नहा कर और पैदल चल कर जनजातियों की समस्याओं को जान कर उनको हल कर सके। जुयाल ने ऑक्सफॉर्ड के शोधार्थी डॉ इरविन के साथ मिलकर इस काम को बखूबी अंजाम दिया। इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने नलनी के इस अभूतपूर्व कार्य पर विस्तार से लिखा है।
दून लाइब्रेरी द्वारा इस विषय पर प्रकाशित पुस्तक में कुसुम रावत लिखती है, कि नेफा के लोग जुयाल के बारे में बताते है कि वह नेक बन्दा आसमानी जहाज से आया था। उसने पहली बार हमारे साथ इंसानों जैसा बर्ताव किया। नेफा की जनजातियों को दिल्ली सरकार के नजदीक लाने और उनके प्राकृतिक अधिकारों के साथ जनजातीय हितों की रक्षा करने में कानून बना कर जुयाल ने चीन के मंसूबों पर पानी फेरते हुए भारतीय गणराज्य में इसकी संप्रभुता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। नेफा में अदभुत काम करने के बाद जुयाल को हिमाचल के किन्नौर जिले का डिप्टी कमिश्नर बनाया गया। यहां के 77 गांव जो 8 से 12000 फीट तक फैले थे। कुसुम रावत लिखती है कि चीन की अंतरराष्ट्रीय सीमा के विवाद के चलते यहां के पशुचारकों ने सीमा क्षेत्र में जाना बंद कर दिया था।
नलनीधर जुयाल जब हिमाचल आए, तब यह केंद्र शासित राज्य था। उन्होंने इस राज्य की प्राकृतिक संपदा और किन्नरों संस्कृति को बचाने के लिए पहले उनकी जमीनें बचाने के लिए विशेष कानून बनाने की पहल की। उनकी इस मनसा को केंद्र द्वारा डेबर कमीशन गठित कर किन्नौर वासियों की समस्याओं को जानने का प्रयास किया। जुयाल ने इस क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की पुरजोर वकालत की और कहा कि इनकी भाषा,संस्कृति और आर्थिकी शेष भाग से अलग है। कमीशन जुयाल के तर्कों से सहमत था, और इस तरह इस क्षेत्र को अनुसूचित जनजाति क्षेत्र घोषित कर दिया गया। बाहरी लोगों द्वारा जमीन के क्रय करने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। इस तरह किन्नौर के आर्थिक विकास के लिए गांव आधारित सूक्ष्म नियोजन कर कृषि और फ्लोद्यान संस्थान खुलवाए। बागवानी और कृषि को प्राथमिकता देते हुए अधिकारियों को सिंचाई बाजार ओर तकनीकी सहायता गांव में ही उपलब्ध कराने के सफल रणनीति बनाई। इस तरह किन्नौर में फल पट्टी का विस्तार कर सेब बादाम और अंगूर की खेती से यह अंचल शेष हिमाचल के लिए भी एक नजीर बन गया। जुयाल अब तक के इतिहास में ऐसे पहले जिलाधिकारी थे,जिन्होंने इस घाटी के संपूर्ण 77 गांवों में पैदल चल कर जनजातियों के बीच लोकप्रियता हासिल की थी। घाटी में बेहतर जल प्रबंधन से उन्होंने काश्तकारों के लिए समृद्धि के नए द्वार खोल दिए थे।
हैरत की बात यह है कि उत्तराखंड गठन के बाद राज्य की सरकार ने अपने इस नायक को राज्य विकास में परामर्श लेने तक नहीं बुलाया। जब कि केंद्र में प्रधानमंत्री इंद्रा गांधी ने इन्हें पर्यावरण मंत्रालय का संयुक्त सचिव बना कर देश के लिए नीति बनाने में इनका सहयोग लिया था।
प्रकृति प्रेमी जुयाल ने पर्यावरण मंत्रालय में रहते हुए देश की पर्यावरण नीति को बनाने में अहम योगदान दिया साथ ही देश के राष्ट्रीय उद्यानों ओर अभ्यारणों को बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। नलिनी जुयाल को आज भी किन्नौर की जनता किस तरह याद करती है, उसके बारे में बाद के आयुक्त जोगेंद्र सिंह की टिपण्णी को लेखिका कुसुम रावत ने कुछ इस तरह लिखा है कि पांच दशकों के बाद भी किन्नौर की जनता इज्जत से याद करती है। जुयाल आज भी उनके लिए लिविंग लीजेंड है। किसी सरकारी अधिकारी के लिए इतना सम्मान और प्यार शायद ही आपने देखा हो।
इस तरह नेफा और हिमाचल में एक कर्मयोगी की तरह जिलाधिकारी के रूप उन्होंने जो पहचान बनाई उसे आज का उत्तराखंड का राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाह जानते तक नहीं है। हिमाचल के आर्थिक विकास की नींव रखने वाला यह महामानव 2018 में इस दुनिया से विदा हो गया। हमारी राज्य सरकार तो इसे श्रद्धांजलि तक नहीं दे सकी। इस विवरण के लिए दून लाइब्रेरी और कुसुम रावत सहित जुयाल फैमिली ट्रेडिशन के सहयोग के किए आभार।

































