डॉ योगेश धस्माना
एक ओर जब देश में औरंगज़ेब की कब्र को लेकर सियासी घमासान मचा है, उस वक्त दून घाटी का झंडा मेला मुगल, सिख और गढ़वाल के पवार राजवंश के बीच सदियों पुराने सद्भाव और सांझी विरासत की कहानी को बयां करता रहा है।
गढ़वाल का राजा फतेहपति शाह 1655-1700 तक और उसके बाद पृथ्वीपति शाह के युग तक गढ़वाल मुगल संबंध परस्पर सद्भाव और समरसता पूर्ण रहे है। यहां तक कि गढ़वाल एक मात्र ऐसी देशी रियासत थी, जो मुगलों को वार्षिक नजराना नहीं देती थी।
फतेह शाह और औरंगजेब के संबंधों पर प्रकाश डालते हुए लेखक और पूर्व सांसद भक्त दर्शन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि औरंगजेब के कहने पर गढ़वाल नरेश ने गुरुराम राय को दून घाटी में पहले खुड़बुड़ा, राजपुर और चमासरी गांव दिए फिर यहीं वे स्थाई रूप से रहने लगे थे। इसके बाद फतेह शाह के पोते प्रदीप शाह ने धामावाला, पंडितवाडी, मिथुवाला सहित चार गांव गुरुराम राय को जागीर के रूप में दे दिए थे। इसी केंद्र बिंदु में झंडा गाड़ कर उन्होंने डेरे की स्थापना की। कालांतर में यहीं से देहरादून और झंडे मेले की स्थापना और शुभारंभ हुआ। सद्भाव की इस परंपरा में तब गुरुराम राय ने इसके महंत के रूप में गढ़वाली व्यक्ति जो आजीवन ब्रह्मचारी रहे, उसको डेरे की गद्दी पर बैठने का अधिकार दिया। यह परंपरा आज तक चली आ रही है। इस तरह गदराज वंश और मुगलों के बीच राजदूतों का भी आदान—प्रदान औरंगजेब के शासन में होता रहा। गुरुराम राय भी अनेक वर्षों तक फतेह शाह के श्रीनगर दरबार में रहे थे।
औरंगजेब के दिल्ली दरबार में पहली बार राजदूत के रूप में पुरिया नैथानी को संभवतः 1668 ईस्वी में जाने का विवरण मिलता है। तब दिल्ली में औरंगज़ेब की बहन रोशन आरा का विवाह था।दिल्ली दरबार में विदाई समारोह में राजदूत पुरिया ने राजा की प्रशंसा के साथ कहा कि उनके ऊपर हिन्दू मंदिरों को तोड़ने और देशी रियासत पर खासकर हिंदू परिवार पर जजिया कर देने के लिए बाध्य किया जा रहा है। इस घटना को सुनकर दिल्ली दरबार के ओर से हिंदू देशी रियासतों पर जजिया कर वसूलने पर रोक लगा दी गई थी। सूत्र बताते हैं, औरंगजेब ने राजपूताना, असम में कामाख्या और महाकाल मंदिरों के जीर्णोद्धार और देवलगढ़ में राज राजेश्वरी मंदिर के पुर्ननिर्माण में आर्थिक सहायता दी थी। इस सहायता से संबंधित पत्र अब राज्य लखनऊ अभिलेखागार में बताया जाता है।
देश के जाने माने इतिहासकार इरफान हबीब के अनुसार शिवाजी जी ने एक पत्र औरंगजेब को लिख कर उससे अकबर की धार्मिक नीति को अपनाने की सलाह दी थी। इतना ही नहीं औरंगजेब के 49 वर्षों के शासन काल में जितने भी यूरोपियन ट्रेवलर्स आए उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया कि भारत में हिंदू मुस्लिम सहित अनेक धर्मों के लोग एक साथ रहते हैं।
मुगल गढ़वाल राजवंशों के बीच सदियों से सामाजिक सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। मुगल शासक शाहजहां के साथ बिशनदास नाम का चित्रकार था। शाहजहां की मृत्यु के बाद जब सत्ता का संघर्ष तेज हुआ तो दारा शिकोह के पुत्र सुलेमान शिकोह को केवल गढ़वाल के राजवंश ने ही 1658 में श्रीनगर में शरण दी थी। तब वह पृथ्वी पति शाह के दरबार में 1 वर्ष 7 माह तक रहे थे। सुलेमान के साथ तब श्यामदास और अपने पुत्र कैहरदास ने भी श्रीनगर दरबार में रह कर कला साधना से पहाड़ी मुगल चित्रकला शैली को जन्म दिया। इसका संपूर्ण विवरण इनके वंशज मौलाराम ने मंगतराम मौलाराम संवाद के रूप में इस कहानी को व्यक्त किया है। आगे चल कर मोलाराम ने श्रीनगर में पहले चित्रकला संस्थान की स्थापना 1780 के आस पास की थी जो तब उतर भारत का पहला कला संस्थान था। 1830 तक यह श्रीनगर में कायम रहा। कला साधकों के प्रयासों से मुगल शैली के साथ जो कला विकसित हुई, उसे कला पार्खियों ने गढ़वाल चित्र कला शैली का नाम देकर आज तक जीवंत रखा है।
मौलाराम जिसने इन चित्रों के माध्यम से गढ़वाल के मध्यकालीन इतिहास को ही जीवंतता नहीं दी बल्कि गढ़वाल मुगल सामाजिक सांस्कृतिक संबंधों के साथ सिख धर्म के गौरवशाली परम्परा में सद्भाव और एकता की अनूठी मिसाल कायम की थी।
यह चित्र मौला राम द्वारा बनाया गढ़वाल का चित्र है।

































