तरुण जोशी
उत्तराखंड राज्य के निर्माण में मूल प्रश्न यहां के प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समाज की हकदारी का था। जल, जंगल, जमीन की व्यवस्था यहां के लोगों के हाथ में आए और इन संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हो सके—इसी सोच के साथ उत्तराखंड को एक अलग राज्य बनाने की मुहिम आरंभ की गई थी। लेकिन उत्तराखंड बनने के पश्चात जिस तरह से यहां के प्राकृतिक संसाधनों की खुली लूट आरंभ हुई, उससे उत्तराखंड के निर्माण की मूल अवधारणा ही समाप्त होने की कगार पर आ पहुंची है। पिछले 24 वर्षों में जिस तरह से उत्तराखंड में भूमि की खरीद-फरोख्त बढ़ी है, उससे कई स्थानों पर अब यहां के मूल निवासियों के अल्पसंख्यक होने का खतरा आ खड़ा हुआ है।
पिछले कुछ समय से राज्य के युवाओं द्वारा भूमि कानून की मांग पूरे पर्वतीय क्षेत्र में पुरजोर तरीके से उठाई जा रही है। पिछले लॉकडाउन के समय से ही, जब यहां का युवा वापस गांव लौटा था, तो उसे भूमि के कई सवालों से जूझना पड़ा था। यहीं रहकर कुछ कर सकने के उसके सपनों को भी उस समय धूल-धूसरित होना पड़ा, जब उसने भूमि से जुड़ी समस्याओं को पहचाना। यही कारण है कि जब एक सशक्त भूमि कानून की मांग उठी, तो उसे इस मांग से जुड़ने में समय नहीं लगा। इस मांग के बढ़ते हुए दायरे ने यहां के राजनीतिक दलों पर भी अपना प्रभाव दिखाना प्रारम्भ किया और अब लगभग हर राजनीतिक दल बहुत खुले रूप से न सही, पर किसी न किसी तरह से इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखने के लिए विवश हो रहा है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
32 कलम 36 रकम वाले उत्तराखंड में भूमि पर अंग्रेजों के आगमन से पूर्व “सबे भूमि गोपाल की” का ही सिद्धांत लागू था, जिसका अर्थ होता था कि भूमि का कोई मालिक नहीं है। राजा, जो कि भगवान का प्रतिनिधि माना जाता था, अपने सामंतों के माध्यम से थातों पर अधिकार रखता था और खेती करने वालों से लगान—जो कि अधिकांशतः फसल का एक चौथाई होता था—कर के रूप में वसूल करता था। भूमि प्रबंध के लिए कमीण, सयाणा जैसे पद बनाए गए थे, जो भूमि और लगान का लेखा-जोखा रखते थे। इस पूरे काल में भूमि सिर्फ खेती के लिए उत्पादन का माध्यम ही नहीं थी, बल्कि वह यहां के समाज में व्यक्ति के स्तर को भी निर्धारित करती थी। यह व्यवस्था थोड़े-बहुत परिवर्तनों के साथ शुरू होकर कत्यूरी और चंद शासकों से होकर गोरखा शासन तक चलती रही। इस काल में भूमि से जुड़े हुए नियमों-कानूनों के परिवर्तनों ने यहां के समाज और संस्कृति पर व्यापक असर डाले। दास और कुली बेगार प्रथा से लेकर नाट-नठाली, गयाली-जेठाली तक और छत में खेती करने से लेकर ओता तक इसके कुछ उदाहरण हैं।
अंग्रेज 1815 में यहां पर आए और आते ही उन्होंने यहां की भूमि व्यवस्था को बदलते हुए अपने यहां के निजी भूमि के सिद्धांत को बंदोबस्ती के माध्यम से लागू करना आरंभ किया। इसके मूल में भूमिधरों से अधिक से अधिक लगान वसूल करने का सिद्धांत छिपा हुआ था और इसके परिणाम भी शीघ्र दिखाई दिए। हर बंदोबस्ती के साथ लगान की धनराशि बढ़ती चली गई। पर अंग्रेजों की नजर भूमि से भी अधिक यहां के जंगलों पर थी और वह जंगल, जो अभी तक खेती करने के लिए खुले हुए थे, धीरे-धीरे सुरक्षित जंगलों में बदले जाने लगे। लोगों का सुरक्षित जंगलों में प्रवेश धीरे-धीरे निषिद्ध कर दिया गया। लोगों के लिए हालांकि “गवर्नमेंट ग्रांट एक्ट” के तौर पर नई जमीन प्राप्त करने के कुछ रास्ते अभी खुले हुए थे, पर पर्वतीय क्षेत्र में कृषि कर्म के लिए जंगलों से जुड़ी व्यवस्था पर सबसे बड़ी चोट वर्ष 1893 में हुई, जब एक शासनादेश के माध्यम से नाप कृषि भूमि के अतिरिक्त समस्त शेष भूमि को वन भूमि घोषित कर दिया गया। इस आदेश ने यहां भूमि और वन के अंतर्संबंध को पूरी तरह बदलकर रख दिया। पर्वतीय क्षेत्र में इस आदेश का असर इतना व्यापक था कि इसके खिलाफ चले आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य को मजबूर कर दिया कि वह वन भूमि को वापस लोगों को लौटाए। लगभग 3000 वर्ग किलोमीटर वन भूमि वापस लोगों के हक ओर प्रबंधन में आई औपनिवेशिक काल में यह जनता के संघर्षों की एक बहुत बड़ी जीत थी।
आजादी के बाद की व्यवस्था
आजादी के पश्चात भूमि व्यवस्था हेतु उत्तर प्रदेश जमीदारी अधिनियम 1950 लाया गया। परंतु उत्तराखंड में इस कानून को लागू नहीं किया गया। टिहरी गढ़वाल सहित उत्तराखंड के लिए एक प्रथक कानून—कुमाऊं जमींदारी उन्मूलन अधिनियम—का निर्माण 1960 में किया गया। इसी तरह जौनसार-भाबर यानी कि चकराता तहसील के लिए भी एक अलग कानून “जौनसार-भाबर जमींदारी उन्मूलन अधिनियम” का निर्माण किया गया। तत्कालीन रूप से इन क्षेत्रों को जमींदारी अधिनियम से बाहर रखने का उद्देश्य इन क्षेत्रों की विशेष भूमि व्यवस्था थी। परंतु व्यवहार में जमींदारी उन्मूलन के भीतर ग्राम समाज को जो ताकत दी गई थी—यानी कि भूमि प्रबंधक समिति, जिसका कार्य जमींदारी उन्मूलन और भूदान से प्राप्त भूमि के वितरण का था—उससे उत्तराखंड को वंचित कर दिया गया और यहां ऐसी भूमि, जो कि लोगों के नाम पर नहीं थी या सीलिंग से बाहर हुई थी, का स्वामित्व राज्य सरकार ने अपने हाथ में ले लिया। लोगों के बीच में प्रचलित शब्द बेनाप या यूपी लैंड का तात्पर्य इसी भूमि से है।
वर्तमान स्थिति
वर्तमान में उत्तराखंड में कृषि भूमि कुल भूमि का लगभग 12 प्रतिशत है। इसे मैदानी और पर्वतीय क्षेत्र के संदर्भ में देखा जाए, तो जहां मैदानी क्षेत्र के जिलों में आधे से अधिक क्षेत्रफल कृषि भूमि के अंतर्गत है, वहीं पर्वतीय क्षेत्र में कृषि भूमि 4 से 6 प्रतिशत के बीच में है। राज्य बनने के पश्चात पर्वतीय क्षेत्र में पलायन तेजी से बढ़ा है। पलायन आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 17 सौ गांव बिल्कुल खाली हो चुके हैं और 10 से कम लोगों वाले गांव की संख्या भी 400 से अधिक हो चुकी है, जिसका सीधा असर कृषि भूमि पर दिखाई दे रहा है। राज्य बनने के पश्चात कृषि भूमि का क्षेत्रफल लगभग 90000 हेक्टेयर घट गया है। राज्य गठन के समय जहां 7.70 लाख हेक्टेयर में खेती हो रही थी, वहीं अब यह घटकर 6.73 लाख हेक्टेयर में आ गई है। पर्वतीय क्षेत्र में विद्युत, सड़क से लेकर ढांचागत सुविधाओं के विस्तार के लिए भी कृषि भूमि का ही उपयोग किया जा रहा है और एक अनुमान है कि कागजों में दर्ज 7 प्रतिशत कृषि भूमि वर्तमान में 5 प्रतिशत के आसपास ही रह गई है।राज्य में बाहरी व्यक्तियों के द्वारा जो भूमि की खरीद-फरोख्त की गई है, उसके संबंध में एक अनुमान है कि अभी तक लगभग 100000 हेक्टेयर जमीन स्थानीय लोगों के हाथ से निकलकर बाहरी व्यक्तियों के हाथों में चली गई है। मुक्तेश्वर, कौसानी, रानीखेत, मसूरी जैसे पर्यटक स्थलों तथा हिमालय दर्शन वाले क्षेत्रों को देखते हुए यह अनुमान गलत भी नहीं लगता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में अब बिक्री के लिए भूमि उपलब्ध ही नहीं है। भूमि की बिक्री का यह सिलसिला नया नहीं है। तराई में थारू और बुक्सा जनजाति की जमीनें आजादी के पश्चात धीरे-धीरे उनके हाथों से निकलती चली गई। इसी तरह दलित समुदाय के पास पहले से ही बहुत सारी जमीन उनके हाथों से निकलने का सिलसिला भी लगातार जारी रहा।
स्थिति को महसूस करते हुए तत्कालीन सरकार द्वारा जमींदारी उन्मूलन अधिनियम में संशोधन किए गए थे और यह प्रावधान किया गया था कि 62 नाली से कम जमीन होने पर दलित समुदाय की जमीन सवर्ण व्यक्ति के द्वारा नहीं खरीदी जा सकती है। इसी तरह जनजाति के संबंध में भी 1982 में यह संशोधन किया गया था कि जनजाति के व्यक्ति की जमीन की बिक्री किसी दूसरे को नहीं की जा सकती है। यदि जनजाति के समुदाय के व्यक्ति की जमीन पर किसी अन्य व्यक्ति का कब्जा है, तो उस कब्जे को खाली करवाने की जिम्मेदारी भी जिलाधिकारी को दी गई थी। परंतु इन संशोधनों के बावजूद जनजाति हो या अनुसूचित जाति, इनकी कृषि जमीनों के बिकने का सिलसिला लगातार जारी है।
भू-कानून आंदोलन और संशोधन
उपरोक्त तथ्यों के संज्ञान में वर्तमान में चल रहे भू-कानून आंदोलन को समझने के लिए राज्य बनने के पश्चात भू-कानूनों में किए गए संशोधनों को समझना आवश्यक होगा। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान एक मुख्य मांग धारा 371 को लागू करने के लिए भी थी। यहां की जमीनों और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए पूर्वोत्तर के राज्यों की तर्ज पर यह एक आवश्यक कदम भी था। वर्ष 2003 में तत्कालीन सरकार द्वारा जन भावना के अनुरूप हिमाचल की तर्ज पर भू-कानून में संशोधन हेतु एक विधेयक भी लाया गया था। वर्ष 2003 में तिवारी सरकार द्वारा तत्कालीन मुख्य सचिव श्री आर.एस. तोलिया के निर्देशन में इस संशोधन को लागू करने का प्रयास किया गया। परंतु राज्य में तब तक प्रॉपर्टी डीलर और ठेकेदारों की एक सशक्त जमात बन चुकी थी, जिसने देहरादून, हरिद्वार और उधम सिंह नगर में इस संशोधन का व्यापक विरोध किया।पर्वतीय क्षेत्र, जिसके हित में यह संशोधन किया जा रहा था, वह इस कानून के संबंध में लगभग मौन रहा। क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दलों समेत यहां मौजूद संगठनों ने इस संशोधन के पक्ष में आवाज नहीं उठाई, जिस कारण सरकार द्वारा इस कानून के कई प्रावधानों को शिथिल करते हुए लागू किया। फिर भी इस संशोधन में 500 वर्ग मीटर की सीमा निश्चित की गई, यानी कि “2003 से पूर्व यहां के भूमिधर नहीं रहे व्यक्ति यहां 500 वर्ग मीटर से अधिक भूमि नहीं खरीद सकते थे।” कालांतर में खंडूरी सरकार द्वारा इस सीमा को ढाई सौ वर्ग मीटर तक सीमित कर दिया गया। हालांकि इस संशोधन के खिलाफ भी आवाज उठाई गई। यहां तक कि इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई तथा उच्च न्यायालय द्वारा इसे खारिज भी कर दिया गया था। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने यथास्थिति कायम रखी। इस संशोधित कानून में कई सारे छेद छोड़े गए थे, जिनका फायदा उठाकर यहां जमीनों की खरीद-फरोख्त जारी रही। शहरी क्षेत्र को तो पूरी तरह से इस संशोधन से मुक्त रखा गया था।वर्ष 2014 में केंद्रीय सरकार द्वारा लाए जा रहे नए भू-कानून का संपूर्ण देश में व्यापक विरोध हुआ था। तब से यह नीति अपना ली गई थी कि प्रत्येक राज्य अपने स्तर से भू-कानून में संशोधन कर ले। इसी क्रम में वर्ष 2018 में उत्तराखंड ने अपनी नई कृषि नीति लागू की, जिसमें कारपोरेट खेती को आगे बढ़ाने का प्रावधान था। इसके साथ ही वर्ष 2018 में राज्य में उद्योगपतियों की एक समिट भी हुई, जिसमें कथित रूप से सवा लाख करोड़ के पूंजी निवेश के प्रस्ताव पूंजीपतियों द्वारा दिए गए। उपरोक्त कारपोरेट खेती और उद्योग दोनों के लिए ही भूमि की आवश्यकता थी, तो तत्कालीन त्रिवेंद्र सरकार द्वारा भू-कानून में पुनः संशोधन करते हुए समिट से 2 दिन पूर्व धारा 143 में पहला संशोधन किया गया, जिसके अंतर्गत कतिपय चीजों जैसे पर्यटन, उद्योग, शिक्षा आदि के लिए कृषि भूमि को गैर-कृषि में बदलने के कानूनी प्रावधान समाप्त कर दिए गए। यह उद्योगपतियों को पहला तोहफा था। दूसरा तोहफा धारा 154 में संशोधन करके दिया गया, जिसके अंतर्गत उद्योग, शिक्षा, पर्यटन के लिए भूमि खरीदने की सारी सीमाएं समाप्त कर दी गई।वर्ष 2018 में लागू इस संशोधन का कुछ छिटपुट रूप में छोड़कर कोई व्यापक विरोध नहीं हुआ। इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि वर्तमान भू-आंदोलन राजनीतिक दलों द्वारा आसन्न चुनाव को देखते हुए किया जा रहा है, ताकि लोगों की भावनाओं को मतों में बदला जा सके। इस बात में किसी हद तक सच्चाई भी हो सकती है, परंतु युवाओं ने जिस तरह से इस आंदोलन को समर्थन दिया है, उससे आशा तो जगती है। इसे आंदोलन को एक निश्चित दिशा देते हुए व्यापक किए जाने की आवश्यकता है। वर्तमान में इस आंदोलन की एकमात्र मांग नए भू-कानून की है, जो कि इस तथ्य पर आधारित है कि राज्य में बाहरी व्यक्तियों द्वारा असीमित मात्रा में जमीनें खरीदी जा रही हैं। परंतु सिर्फ इस मांग से राज्य की भू-समस्या सुलझने वाली नहीं है। इसके लिए समझ और मांगों को विस्तृत करते हुए एक व्यापक जन आंदोलन की ओर बढ़ा जाना चाहिए।
समाधान के सुझाव
पर्वतीय क्षेत्र की भूमि की समस्या को हल करने के लिए कुछ बिंदुओं पर क्रमवार कार्य करने की आवश्यकता होगी। वर्ष 1918 में उत्तर प्रदेश जमीदारी उन्मूलन की धारा 143 और 154 में किए गए संशोधनों को तत्काल निरस्त किया जाए।
राज्य बनने के पश्चात बाहरी व्यक्तियों द्वारा खरीदी गई जमीन तथा सरकार द्वारा दी गई जमीन पर सरकार एक श्वेत पत्र जारी करे।
उन क्षेत्रों को चिन्हित किया जाए, जहां पर सबसे ज्यादा भूमि की खरीद-फरोख्त हुई है। ऐसे क्षेत्रों में भूमि की खरीद-फरोख्त को तत्काल कानून में संशोधन कर रोका जाए।
वर्ष 1893 के शासनादेश को तत्काल निरस्त किया जाए। यह कार्य सर्वोच्च न्यायालय में और भारत सरकार दोनों के ही माध्यम से किया जाए। ऐसा होने पर पर्वतीय क्षेत्र को लगभग 15 प्रतिशत खेती की जमीन प्राप्त होगी और पर्वतीय क्षेत्र में जमीन बढ़कर 20 प्रतिशत हो जाएगी। इस भूमि का उपयोग भूमिहीन लोगों में भूमि वितरण में किया जाए। सरकार को भी विकास कार्यों के लिए भूमि की उपलब्धता इस माध्यम से हो जाएगी।
भूमि की सही स्थिति का पता करने के लिए वर्ष 2004 में होने वाला बंदोबस्त, जो किया ही नहीं गया, उसे पुनः आरंभ किया जाए।
मैदानों की तरह पर्वतीय क्षेत्र में भी चकबंदी आरंभ की जाए।
वन पंचायतों, वन ग्रामों, गोठ-खत्तों सहित सभी दलित बस्तियों में वन अधिकार अधिनियम 2006 तत्काल लागू किया जाए, तथा इनके निवासियों को इस कानून के दायरे में लाते हुए भूमि पर मालिकाना हक प्रदान किया जाए।
सरकार द्वारा पूर्व में महिलाओं को उत्तराधिकार में प्राप्त जमीन पर बराबरी के हक देने का निर्णय लिया गया था। इस संबंध में एक कमेटी का भी गठन किया गया था। ओर भूमि कानून में संशोधन भी किए गए।सरकार द्वारा दिए गए इस निर्णय को तत्काल लागू किया जाए और महिलाओं को भी उत्तराधिकार में प्राप्त जमीन पर बराबर का हकदार बनाया जाए।
चलते – चलते
हालिया संशोधन और विश्लेषण
21 फरवरी 2025 को राज्य सरकार द्वारा विधानसभा में ध्वनि मत से भू-कानून में संशोधन को मंजूरी दी गई। यह मंजूरी बगैर किसी बहस या चर्चा के लागू हो गई। मुख्यमंत्री के अनुसार भू-कानून में संशोधन का उद्देश्य राज्य में जमीन की अंधाधुंध खरीद पर रोक लगाना, स्थानीय संसाधनों को सुरक्षित करना और भूमाफियाओं पर नकेल कसना था। वर्तमान सरकार पिछले तीन वर्षों से तथाकथित रूप से पूरी शिद्दत के साथ भू-कानून में संशोधन के लिए प्रयासरत थी। वर्ष 2022 में मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में इस हेतु समिति गठित की गई थी। इस समिति ने 5 सितंबर 2022 को अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कुल 30 सिफारिशें की थीं। सरकार ने समिति की रिपोर्ट के अध्ययन के लिए प्रवर समिति का गठन किया। तत्पश्चात राज्य के कई स्थानों पर लोगों से सुझाव भी लिए गए। सैकड़ों लोगों ने अपने स्तर से कई सुझाव दिए भी। परंतु इन सब सुझावों और कमेटी के आधार पर जो निकलकर आया, वह कुछ इस प्रकार है।
उपरोक्त संशोधन राज्य के पर्वतीय क्षेत्र के 11 जिलों में लागू होंगे, यानी कि हरिद्वार और उधम सिंह नगर इससे बाहर रहेंगे। बाहरी व्यक्तियों के लिए कृषि या बागवानी भूमि खरीद पर रोक लगाते हुए आवासीय भूमि की सीमा 250 वर्ग मीटर तक सीमित की गई है। इस खरीद के लिए शपथ पत्र देना होगा कि इसका उपयोग केवल आवास के लिए होगा। यदि शपथ पत्र में दिए गए उपयोग में बदलाव होता है, तो जमीन सरकार के अधीन कर ली जाएगी।
उद्योग या अन्य किसी उद्देश्यों के लिए जमीन खरीदने की छूट को सीमित किया गया है। पहले 12.5 एकड़ की सीमा को बढ़ाकर 30 एकड़ तक कर दिया गया था। अब पुनः पुरानी सीमा लागू कर दी गई है। इससे ज्यादा जमीन खरीदनी हो, तो उसके लिए भी अनुमति का रास्ता रखा गया है।
यह भी कहा गया कि अब इसे सख्ती से नियंत्रित किया जाएगा तथा जमीन का उपयोग निश्चित उद्देश्य के लिए नहीं होने पर सरकार इसे वापस भी ले सकती है।
उपरोक्त संशोधनों से पर्वतीय क्षेत्र की भू-समस्याओं का कुछ समाधान निकलेगा, ऐसा लगता नहीं है। कृषि और बागवानी के लिए जमीन की खरीद-फरोख्त पर रोक लगाई गई है। परंतु ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जो बताते हों कि बाहरी व्यक्तियों के द्वारा पूर्व में कृषि और बागवानी के लिए पर्वतीय क्षेत्र में कितनी जमीनों की खरीदारी की गई है। पलायन से खाली गांवों में किया तो इसका बिल्कुल उलट जाना था। जहां जमीन बंजर पड़ी है, वहां लोगों को कृषि और बागवानी के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत थी। परंतु सरकार भी जानती है कि कोई भी बाहरी व्यक्ति पर्वतीय क्षेत्र में कृषि और बागवानी के लिए जमीन खरीदने वाला नहीं है। जहां तक सख्ती की बात है, मुख्यमंत्री के अनुसार प्रदेश में औद्योगिक, पर्यटन, शैक्षणिक एवं स्वास्थ्य तथा कृषि के प्रयोजन आदि के लिए सरकार एवं कलेक्टर के माध्यम से कुल 1883 हेक्टेयर भूमि के क्रय की अनुमति प्रदान की गई। इनमें से 599 भू-उपयोग उल्लंघन के प्रकरण रहे। 572 प्रकरणों में न्यायालय में वाद दायर किए गए। 16 प्रकरणों में वाद का निस्तारण करते हुए 9.4760 हेक्टेयर भूमि राज्य सरकार में निहित की गई।
उपरोक्त संशोधन नगरीय क्षेत्र में लागू नहीं होगा, अर्थात नगर निगम, नगर पंचायत, नगर पालिका, छावनी परिषद जैसे नगरीय क्षेत्र में पहले की तरह भूमि की खरीद-फरोख्त की जा सकती है।
उद्योग, चिकित्सा समेत विभिन्न परियोजनाओं के लिए विभिन्न विभागों से प्रमाण पत्र लेकर भूमि खरीद की अनुमति होगी। रसूखदार लोग पहले जिलाधिकारी से ऐसे प्रमाण पत्र प्राप्त कर लेते थे। अब शासन स्तर से ऐसे प्रमाण पत्र प्राप्त करने में उन्हें कुछ असुविधा होगी, ऐसा लगता नहीं।
पूर्व में भी 250 मीटर से अधिक जमीन यहां के स्थाई निवासियों के नाम से खरीदी जा सकती थी। अब भी इस व्यवस्था को चुनौती देने का कोई प्रयास संशोधित कानून में नहीं है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि ये संशोधन एक झुनझुने से अधिक कुछ नहीं हैं।
































