योगेश भट्ट
विधानसभा चुनाव को लेकर उत्तराखंड में सियासी रण की बिसात बिछने लगी है। आम आदमी पार्टी की ‘दस्तक’ और उक्रांद की ‘उछल कूद’ के बीच अंततःमुकाबला सीधे भाजपा और कांग्रेस के बीच होने जा रहा है।
जहां तक मुददों का सवाल है तो पांच साल प्रचंड जनादेश की सरकार चलाने के बाद भाजपा खाली हाथ है । कांग्रेस के पास भी गिनाने के लिए कुछ नहीं है। मुद्दों पर आक्रामक अंदाज में राजनीति करने वाली आम आम आदमी पार्टी भी नहीं है । मुद्दों की नब्ज पकड़ने के बजाय वह जनता की कमजोर नब्ज मुफ्तखोरी दबाकर अपना उल्लू सीधा करने की फिराक में है।
कांग्रेस से आप तक और भाजपा से उक्रांद तक सियासत हर जगह चेहरों की है। भाजपा ने हाल ही में प्रचंड बहुमत की सरकार में चार माह में दो बार नेतृत्व परिवर्तन कर सरकार की कमान तीसरी पीढ़ी के युवा को सौंप कर बड़ा सियासी दांव चला तो जवाब में कांग्रेस ने सामूहिक नेतृत्व के फार्मूले पर हरीश रावत और प्रीतम सिंह की जुगल बंदी में ‘चतुरंगिणी’ सेना उतारी है।
दिवाकर और काशी सिंह ऐरी के बीच झूलने वाली उक्रांद कहीं दूर-दूर तक मुकाबले में नहीं है । वहीं तमाम गुणा गणित के बाद कर्नल अजय कोठियाल के सहारे, मुददों से बेखबर आम आदमी पार्टी सिर्फ प्रचार तंत्र के बूते उत्तराखंड की सत्ता का सपना देख रही है।
जो बिसात बिछ रही है उसमें साफ है कि रण मुददों का नहीं बल्कि सिर्फ समीकरणों का है। जिस तरह आलू और प्याज की सब्जियों के सीमित विकल्प हैं ठीक वही स्थिति उत्तराखंड की सियासत की भी है।
उत्तराखंड की सियासत का एक कड़वा सच यह भी है कि हम लाख क्षेत्रीय विकल्प की बात करें, लेकिन यहां की सियासत में वर्चस्व सिर्फ भाजपा और कांग्रेस का ही है। अभी तक तो बारी-बारी से दोनों ही दल सत्ता में एक दूसरे का विकल्प बनते आए हैं।
आम धारणा है कि दोनों ही दल जन अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे। आमजन में दोनों ही दलों की रीति-नीति के प्रति नाराजगी भी है। नाराजगी क्यों न हो ? बारी-बारी से सत्ता में आने के बावजूद दोनों ही दल दो दशक में राजनैतिक तौर पर इस राज्य की पहचान तक स्थापित नहीं कर पाए।
राज्य की अवधारणा और उसके भविष्य से जुड़ा हर अहम मसला दो दशक बाद भी अधर में लटका है। इसके बावजूद सियासी सच्चाई यह है कि सत्तर फीसदी से अधिक वोट बैंक इन दोनों ही दलों के कब्जे में है ।
सियासत की इस गुफ्तगू में भाजपा और कांग्रेस से पहले बात उन दलों की जिनका उत्तराखंड की सियासत में जिनका अपना तो कोई समीकरण नहीं बनता, मगर सियासी रण के प्रमुख योद्धाओं के समीकरण जरूर बना बिगाड़ देते हैं । पहले बात उक्रांद की..
नेताओं का मारा उक्रांद बेचारा:
उत्तराखंड की सियासत में भाजपा और कांग्रेस का स्वाभाविक विकल्प चार दशक से भी अधिक पुराने एक मात्र क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल को होना चाहिए था। विडंबना यह है कि राज्य की मूल अवधारणा को समझने वाले उक्रांद का नेतृत्व राजनैतिक विकल्प बनने का भरोसा नहीं जीत पाया।
भाजपा जैसे बड़े राष्ट्रीय दल ने जहां राज्य में नेतृत्व तीसरी पीढ़ी के हाथों में सौंपना शुरू कर दिया है, वहीं उक्रांद दशकों बादभी अभी तक काशी सिंह ऐरी और दिवाकर भट्ट से आगे नहीं बढ़ पाया है । उत्तराखंड की सियासत में उक्रांद ऐसी अंधेरी रात बन चुका है जिसकी कोई सुबह नजर नहीं आती।
ऐसा नहीं है कि उक्रांद को मौका नहीं मिला। मौका मिला, राज्य गठन के बाद साल 2002 में पहले आम चुनाव में उक्रांद को चार सीटें भी मिली। उक्रांद का नेतृत्व ईमानदार और सियासी रणनीति मजबूत होती तो यह चार सीटें आज चालीस तक पहुंच सकती थीं।मगर कमजोर और स्वार्थी नेतृत्व के गलत निर्णयों के कारण दल की आम छवि बिगड़ती चली गई।
साल 2007 में हुए आम चुनाव में दल ने तीन सीटें हासिल कर भाजपा के साथ सत्ता में भागेदारी की । सत्ता में भागेदारी पर सवाल उठा तो दल में विभाजन हो गया। किसी भी क्षेत्रीय दल के लिए इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है कि सत्ता के लालच में उसका शीर्ष नेतृत्व उसी दल से चुनाव मैदान में उतर जाए, जिसकी नीति रीतियों का दल विरोध करता रहा हो।
उक्रांद खुद से छल करने वाले ऐसे नेताओं से खुद भले ही न्याय नही कर पाया हो लेकिन जनता ने पूरा न्याय किया। दल से अलग हुए शीर्ष नेता दिवाकर भट्ट कैबिनेट मंत्री रहते हुए 2012 में भाजपा से चुनाव लड़े और हार गए।
जहां तक दल का सवाल है तो विभाजित हो चुका दल उक्रांद (पी) के नाम से चुनाव में उतरा और 2012 में एक सिमट पर सिमट कर रह गया। उक्रांद (पी) से अकेले जीतकर आए प्रीतम पंवार भी कांग्रेस सरकार में शामिल हो गए और पार्टी से खुद को अलग कर लिया।
इसके बाद साल 2017 में तो उक्रांद पूरी तरहसे साफ हो गई। आज राजनैतिक तौर पर उक्रांद हाशिए पर पहुंच चुका है, दल की कमान थामे नेता पुराने ढर्रे पर हैं।
न वे पिछली गलतियों से सबक लेने को तैयार हैं और न नई पीढ़ी को आगे बढ़ाना की उनकी मंशा है।
आज जब भाजपा और कांग्रेस नेतृत्व की कमान युवा हाथों को सौंप रही है, वही उक्रांद ने एक बार फिर से दिवाकर के बाद काशी सिंह ऐरी को अध्यक्ष बना दिया जाता है।
उत्तराखंड की सियासत को ‘विकल्प’ की तलाश है । सियासी तौर पर कोई कहीं भी जुड़ा हो, मगर यह सच है कि आम आदमी में एक छटपटाहट है। हर दूसरा व्यक्ति एक सशक्त विकल्प चाहता है। उक्रांद की नाकामी और कभी उक्रांद से काफी बेहतर स्थिति में रही बसपा के हाशिए पर पहुंचने के बावजूद विकल्प की संभावनाएं अभी भी हैं ।
इसी संभावना को भांपते हुए अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने संभवतः उत्तराखंड में ‘दस्तक’ दी है। मगर आप आम आदमी की उम्मीदों पर खरा उतर पा रही है इसमें संदेह है । आज उत्तराखंड की सियासत से जुड़े तमाम सवालों के साथ एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या आप उत्तराखंड की सियासत मैं आप तीसरा विकल्प बन पाएगी ?
आप उत्तराखंड में आम आदमी की छटपटाहट को भांपते हुए सरकार बनाने का दावा तो कर रही है, सरकार बना सपने दिखा रही है, मुफ्त का लॉलीपॉप भी पकड़ा रही है, मगर सियासत का अंकगणित फिलवक्त इसके पक्ष में बनता नजर नहीं आ रहा है।
उत्तराखंड की सियासत का अंकगणित यह है कि कम से कम तीस फीसदी वोट हासिल किए बिना सत्ता की चाबी हासिल नहीं की जा सकती। राज्य मैं तीस फ़ीसदी वोट हासिल करना भाजपा और कांग्रेस के अलावा किसी अन्य पार्टी के लिए आसान नहीं है ।
फिलहाल भाजपा के पास तकरीबन पैंतालीस फ़ीसदी वोट है तो कांग्रेस के पास भी तीस फीसदी वोट बना हुआ है । इस लिहाज से आप का सामीकरण सरकार तो दूर विपक्ष की लिए भी आसान नहीं है । उत्तराखंड की सियासत को भले ही विकल्प की दरकार है लेकिन यह सवाल तो बनता है कि आखिर ‘आप’ क्यों ?
आप : सत्ता का ख्वाब दिखाने वाला सॉफ्टवेयर
आमआदमी पार्टी दस्तक तो काफी पहले दे चुकी थी, लेकिन आसन्न विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी ने उत्तराखंड में‘री-लांच’ किया है। ‘रेडी टू ईट’ के इंस्टेंट फार्मूले पर काम करने वाली आम आदमी पार्टी को सक्रिय हुए लगभग एक साल हो गया है।बीते साल भर में प्रचार तंत्र के जरिए पार्टी चर्चा में तो आई है लेकिन आम आदमी तक पहुंच नहीं।
कारपोरेट की तर्ज पर काम करने वाली इस पार्टी में संगठन तो सिर्फ नाम भर का है। पार्टी के लिए सियासत एक इवेंट, चुनाव एक मैनेजमेंट और उम्मीदवार सिर्फ एक प्रोडेक्ट भर है। सीधे-सीधे ‘गिव एंड टेक’, मसलन उत्तराखंडमें तुम हमें सत्ता दो हम तीन सौ यूनिट फ्री बिजली देंगे।
सियासत में यह नई परंपरा है, जिसमें न कोई विचार है न आदर्श और न ही सिद्धांत। शुरूआती दौर में लगा कि आम आदमी पार्टी राजनैतिक शून्यता को खत्म करते हुए एक नया विकल्प बन सकती है, मगर पूरी तरह से प्रचार तंत्र पर निर्भरपार्टी जमीनी हकीकत से कोसों दूर नजर आती है। दिल्ली में आप का फार्मूला जरूर कामकर गया लेकिन दिल्ली और उत्तराखंड में बड़ा फर्क है।
पार्टी यह भूल रही है कि उत्तराखंड दिल्ली नहीं है बल्कि विविधताओं वाला प्रदेश है। यहां संगठन, सिद्धांत, संघर्ष, आदर्श, विचार और व्यक्ति के अपने मायने हैं। हकीकत यह है कि इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों के भरोसे मैदान में उतरी पार्टी राज्य की विविधता,परंपरा, इतिहास, सामाजिक, राजनैतिक मुददों और संस्कृति तक से वाकिफ नहीं है।
दिल्ली में हो सकता है यह आम आदमी की पार्टी हो मगर उत्तराखंड में तो यह सियासी महत्वाकांक्षाएं रखने वाले साधन संपन्न लोगों के लिएसियासी प्लेटफार्म बन कर रह गया है। साधन, संसाधन विहीन लोगों के आप में कोई मायनेनहीं। मायने होंगे भी कैसे ? मायने तो संगठन में होते हैं, विचार में होते हैं। जहां विचार और संगठन दोनों ही सिर्फ ‘सत्ता’ हो वहां तो यह उम्मीद भी नहीं की जानी चाहिए।
बहरहाल उत्तराखंड में यह आम आदमी की पार्टी नहीं बल्कि उन साधन संसाधन संपन्न लोगों कामंच बना है, जिनकी सियासी महत्वकांक्षाएं भाजपा और कांग्रेस में पूरी नहीं हो रही हैं।सही मायने में कहा जाए तो आम आदमी पार्टी सत्ता का ख्वाब दिखाने वाला एक ‘सॉफ्टवेयर’ है और सच्चाई यह है कि सॉफ्टवेयर का प्रचार कितना ही होबिना मजबूत ‘हार्डवेयर’ के वह काम नहीं करता। पार्टी से जुड़े चेहरों में अभी तक सिर्फ सेवानिवृत्त कर्नल अजय कोठियाल एकमात्र वह बड़ा नाम है, जिसे हार्डवेयर माना जा रहा है।
यह ‘हार्डवेयर’ आम आदमी पार्टी के सॉफ्टवेयर के साथ कितने लंबे समय तक कदमताल कर पाएगा यह कहना मुश्किल है। ऐसे में राज्य की सभी 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा करने वाली यह पार्टी नतीजों में कितना बेहतर करेगी, कहा नहीं जा सकता।
हां,इतना जरूर है कि पहले आकलन था कि ‘आप’ उत्तराखंड में कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ेगी । कर्नल कोठियाल के आने के बाद आंकलन यह है कि कुछ सीटों पर आप अब आंशिक रूप से भाजपा को भी प्रभावित कर सकती है।
भूली बिसरी बसपाः
जब हम उत्तराखंड में तीसरी ताकत की बात करते हैं तो आज बसपा को नजरअंदाज कर दिया जाता है। जबकि हकीकत यह है कि भाजपा, कांग्रेस के बाद उत्तराखंड में तीसरा सबसे बड़ा वोट बैंक बसपा का है। विधानसभा में सीटों के लिहाज से बसपा आज हाशिए पर है , फिर भी यह नहीं नकारा जा सकता कि एक समय भाजपा बड़ी सियासी ताकत रह चुकी है।
आज भी उत्तराखंड में बसपा के पास तकरीबन सात फ़ीसदी वोट है। आज भी हरिद्वार और उधमसिंहनगर जिलों में तकरीबन बीस फीसदी वोट बैंक बहुजन समाज पार्टी का है। एक समय ऐसा भी था जब 70 सीटों वाली विधानसभा में सात विधायक बसपा के थे। 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में हरिद्वार जिले की नौ में पांच और उधमसिंहनगर जिले की सात में से दो सीटें बसपा के पास थीं।
इन सात सीटों में से छहसीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थीं। साल 2007 में हुए दूसरे विधानसभा चुनाव में बसपा की ताकत और बढ़ी। इसचुनाव में बसपा के खाते में आठ सीटें आई।
बसपा को नुकसान 2008 में हुए परिसीमन से हुआ।परिसीमन में हरिद्वार और उधमसिंह नगर जिलों में दो दो सीटें बढ़ने के बावजूद साल 2012 में हुए तीसरे विधानसभा चुनाव में बसपा कमजोर पड़ गई।
पार्टी को उधमसिंह नगर की नौ सीटों में से एक भी सीट नहीं मिली जबकि हरिद्वार में 11 में से सिर्फतीन सीटों पर ही बसपा जीत दर्ज कर पाई। राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो बसपा की मजबूती का नुकसान हरिद्वार और उधमसिंनगर में कांग्रेस को रहा है।
एक निश्चित वोट बैंक होने के बाद भी बसपा की स्थिति राज्य में दिनों दिन बिगड़ती जा रही है। राज्य में संगठन की हालत यह है कि बीस साल में अब तक 17 बार प्रदेश अध्यक्ष और 13 बार प्रदेश प्रभारी बदल चुके हैं।
कभी किंग मेकर की भूमिका में रहने वाली बसपा के पास विधायक तो दूर, जिला पंचायत तक में प्रतिनिधित्व नहीं है। समीकरण अब बदल चुके हैं, बसपा को पुनर्जीवन के लिए करिश्माई नेतृत्व की दरकार है जो फिलहाल उसके पास नहीं है ।
कुल मिलाकर उत्तराखंड की सियासत मैं भी विकल्प की दरकार बरकरार है।
कुल मिलाकर भाजपा और कांग्रेस के बीच सत्ता की सांप सीढ़ी का खेल ही उत्तराखंड की ‘नियति’ है। चलिए, इस खेल पर एक नजर डालते हैं।
साल 2000 में जब उत्तराखंड बना तो राज्य में भाजपा की अंतरिम सरकार बनी। भाजपा को भरोसा था कि पहले आम चुनाव में जनता उसे पलकों पर बैठाएगी लेकिन नतीजे अप्रत्याशित रहे।
साल 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 36 सीटें मिली तो तकरीबन सवा साल की अंतरिम सरकार में दो मुख्यमंत्री देने वाली भाजपा को जनता ने 19 सीटों पर समेट दिया।
कांग्रेस खुद नतीजों पर भरोसा नहीं कर पाई थी। उस चुनाव में बसपा को सात और उक्रांद को चार के अलावा एनसीपी को भी एक सीट मिली जबकि तीन सीटें निर्दलीयों के नाम रही।
पहली निर्वाचित सरकार कैसे चली और कैसी रही इस पर फिर कभी, परंतु यहां यह बताना जरूरी है कि अंतरिम सरकार से लगा राजनैतिक अस्थिरता का रोग पहली निवार्चित सरकार को भी लग चुका था। पूर्ण बहुमत की इस सरकार में पूरे साल राजैनतिक अस्थिरता रही ।
यह बात अलग है उत्तराखंड के सियासी इतिहास में अभी तक एक मात्र यही सरकार ऐसी रही जिसमें पांच साल तक नेतृत्व परिवर्तन नहीं हुआ। बहरहाल विकास के लिए जानी जाने वाली सरकार के प्रति नाराजगी रही होगी कि साल 2007 में दूसरे विधानसभा चुनाव में सत्ताधारी कांग्रेस को बड़ी हार का सामना करना पड़ा।
इस चुनाव में भाजपा को 69 सीटों में से 34 सीटें मिली जबकि कांग्रेस 36 से लुढ़क कर 21 सीटों पर आ गई। उक्रांद के तीन विधायकों और तीन निर्दलीयों का समर्थन हासिल कर भाजपा ने सरकार बनायी।
भाजपा की इस सरकार में पांच साल में दो बार नेतृत्व परिवर्तन हुआ। पूरे कार्यकाल के दौरान राजनैतिक अस्थिरता बनी रही और नतीजा यह रहा कि तमाम कोशिशों के बावजूद साल 2012 में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई।
खुद मुख्यमंत्री भुवन चंद खंडूरी को कोटद्वार विधान सभा सीट पर हार का सामना करना पड़ा। भाजपा और कांग्रेस में से किसी को भी पूर्ण बहुमत हासिल नहीं हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस को 32 सीटें और सत्ताधारी भाजपा को 31 सीटें हासिल हुई।
कांग्रेस ने तीन निर्दलीय विधायकों और उत्तरांखंड क्रांति दल (पी) के एक विधायक के समर्थन से सरकार बनाई। इस सरकार के कार्यकाल में प्रदेश ने राजनैतिक अस्थिरता का चरम देखा। इस दौर में उत्तराखंड की सियासत एक काला अध्याय लिखा गया।
नेतृत्व परिवर्तन हुआ, बगावत हुई, राष्ट्रपति शासन लगा, न्यायालय से सरकार की बहाली हुई, स्टिंग आपरेशन सामने आए, विधायकों की खरीद-फरोख्त के आरोप लगे, और भी बहुत कुछ हुआ।
यही वह दौर था जब अपनी ही सरकार में कांग्रेस छिन्न-भिन्न हुई, पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष समेत तमाम बड़े नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हुए।
अब राज्य में राजनैतिक अस्थिरता बड़ा मुददा बन चुका था। सियासत और सिस्टम दोनों इससे बुरी तरह प्रभावित हो चुके थे। साल 2017 में भाजपा ने एक ओर इस राजनैतिक अस्थिरता को मुददा बनाया और दूसरी ओर मोदी को चुनाव का चेहरा।
नतीजे इस बार भाजपा के पक्ष में रहे, जनता ने स्पष्ट और बड़ा जनादेश दिया। कुल 70 सीटों में से भाजपा को 57 सीटों पर जीत हासिल हुई। कांग्रेस मात्र 11 सीटों पर सिमट कर रह गई तो वहीं बसपा और उक्रांद का पूरी तरह से सफाया हो गया।
नियति देखिए, प्रचंड बहुमत की सरकार के बावजूद राजनैतिक अस्थिरता ने उत्तराखंड का पीछा नहीं छोड़ा। इस सरकार में पहले त्रिवेंद्र सिंह रावत फिर तीरथ सिंह रावत और इसके बाद पुष्कर सिंह धामी को सरकार की कमान सौंपी गई।
अब बात 2022 की। सत्ता की सांप सीढ़ी के खेल में अदल-बदल के लिहाज से 2022 में बारी तो कांग्रेस की है, लेकिन कांग्रेस की राह पहले जैसी आसान नहीं है। हालांकि जनादेश के लिहाज से तो भाजपा सरकार कटघरे में हैं।
अंदरूनी सर्वेक्षणों में भी भाजपा की स्थिति बंहद चिंताजनक बताई जा रही है। मगर इस सबके बीच भाजपा के लिए सुकून यह है कि कांग्रेस फिलवक्त बेहद कमजोर स्थिति में है। अगर सरकार में रहते हुए भाजपा बहुत अच्छा प्रदर्शन नही कर पाई है तो यह भी उतना ही सच है कि विपक्ष के तौर पर कांग्रेस की भूमिका भी प्रभावी नहीं रही।
यह तो साफ है कि उत्तराखंड में सियासी रण चेहरों और समीकरणों का है। भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधे मुकाबले में भाजपा मजबूत स्थिति में तो है मगर अजेय नहीं है। आम मतदाता का भी भाजपा से भरोसा दरक रहा है।
हालात गंभीर हैं, इसका अंदाजा प्रदेश संगठन से लेकर भाजपा हाईकमान को भी है। संभवत: इसी कारण पार्टी हाईकमान ने पांच साल में तीन बार मुख्यमंत्री बदलने का जोखिम उठाया। वह भी यह जानते हुए कि मुख्यमंत्री बदलने के सियासी प्रयोग को जनता खारिज करती आई है।
फिलहाल उत्तराखंड की सत्ता में वापसी करना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। एक बड़ा सवाल तो यही है कि क्या इस बार मुख्यमंत्री बदलने का यह प्रयोग कामयाब हो पाएगा ?
हालांकि बदलाव और संक्रमण के दौर में स्थितियां इस बार कुछ अलग हैं। भाजपा ने प्रदेश में पुष्कर धामी के रूप में तीसरी पीढ़ी को सरकार का नेतृत्व सौंप कर बड़ा सियासी दांव चला है
। जहां तक चेहरे का सवाल है तो मोदी का आज भी कोई विकल्प नहीं है और रही बात समीकरणों की तो उसके लिए भाजपा सरकार और संगठन दोनों मोर्चों पर किलेबंदी में जुटी है। भाजपा की किलेबंदी और समीकरण कांग्रेस की रणनीति के आगे कितने कामयाब होते हैं यह एक अलग विषय है।
अब आते हैं मुद्दे पर, मुद्दा है राजनैतिक अस्थिरता। उत्तराखंड में राजनीतिक अस्थिरता भाजपा की कमजोर नब्ज है। राजनीतिक अस्थिरता से राजकाज तो प्रभावित होता ही है, तमाम और सवाल भी उठते हैं। विपक्षी कांग्रेस तो कह ही चुकी है कि भाजपा खिलौनों की तरह मुख्यमंत्री बदलती है।
राजनीतिक अस्थिरता होगी तो सवाल तो उठेंगे ही। राज्य में 40 फीसदी से अधिक वोट हासिल करने वाली भाजपा का नेतृत्व आखिर कमजोर क्यों है ? क्यों पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदलने पड़े ? क्यों प्रचंड बहुमत की सरकार राजनीतिक स्थिरता नहीं दे पाई ? क्यों राज्य में नेतृत्व नहीं उभर पा रहा है ? चाहकर भी इन सवालों से बचा नहीं जा सकता। ये सवाल आम जनता या मतदाता को ही नहीं, भाजपा के कैडर को भी विचलित कर रहे हैं।
उत्तराखंड में भाजपा ने बीते चार महीनों में चार बड़े बदलाव की किए। चुनावी साल में त्रिवेंद्र को हटाकर तीरथ को मुख्यमंत्री बनाया, संगठन की कमान बंशीधर भगत से हटाकर मदन कौशिक को सौंपी, तीरथ को चार महीने पूरे करने से पहले ही हटाकर युवा चेहरे पुष्कर धामी को मुख्यमंत्री बनाया और हरिद्वार से सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को हटाकर अजय भट्ट को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया।
पार्टी में इन फैसलों पर न सवाल उठे और न कोई विरोध हुआ। आलोचना, सहमति और असहमति से इतर इन चार फैसलों से यह तो साफ है कि भाजपा में पद और व्यक्ति का कोई महत्व नहीं। महत्व सिर्फ संगठन और दायित्व का ही है। मगर दूसरी और राज्य के नेताओं की नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठे। यह भी स्पष्ट हुआ कि राज्य का नेतृत्व कमजोर और अपरिपक्व है।
मुख्यमंत्रियों को बदलना भाजपा के लिए कोई नया नहीं है। उत्तराखंड में तो भाजपा ने अपने हर शासनकाल में चुनाव पूर्व मुख्यमंत्री बदलने का प्रयोग किया है। दिलचस्प यह है कि मुख्यमंत्री बदलने के सियासी प्रयोग को हर बार जनता ने खारिज किया है।
तकरीबन ढाई दशक पहले भाजपा ने दिल्ली में भी पांच साल में तीन बार मुख्यमंत्री बदलने का प्रयोग किया तो वहां भी नाकाम रहा। तब दिल्ली में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री मदन लाल खुराना ने जैन डायरी में आने पर जब नैतिक तौर पर इस्तीफा दिया तो भाजपा ने पहले साहिब सिंह वर्मा और फिर लोकप्रिय नेता सुषमा स्वराज दिल्ली की कमान सौंपी। उस वक्त सुषमा स्वराज को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने के बावजूद दिल्ली में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा।
अब तो स्थितियां बदली हुई हैं। देश का सबसे बड़ा राजनीतिक और विश्व का सबसे अधिक प्राथमिक सदस्यता वाला यह दल बदलाव और संक्रमण के दौर में है। संगठन बदलाव के दौर में है। जो भाजपा के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ वह अब हो रहा है।
अब रणनीतिक तौर पर भाजपा रक्षात्मक नहीं बल्कि आक्रामक है। अभी तक भाजपा नीति, रीति, विचार, सिद्धांत, राजनीतिक शुचिता, स्वच्छता और बूथ मैनेजमेंट के जरिए घर घर पहुंचने के लिए जानी जाती थी। अब भाजपा तमाम वर्जनाओं को तोड़ते हुए काफी आगे निकल चुकी है।
बदलाव का पार्टी को लाभ भी हुआ तो नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। अब बदलती भाजपा ने अपना कुनबा तेजी से बढ़ाया है। देश के तमाम राज्यों में सत्ता भी हासिल की है। उत्तराखंड, असम, पश्चिम बंगाल में ऐसे-ऐसे प्रयोग हुए जिनकी भाजपा में एक वक्त कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। जिनका भाजपा के मातृ संगठन आरएसएस से तो दूर, कभी भाजपा तक से जुड़ाव नहीं रहा, उन्हें पार्टी में शामिल कर महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे जाते हैं।
उत्तराखंड को ही लें, कांग्रेस सरकार के जिस मुख्यमंत्री को भाजपा भ्रष्टाचार के मुद्दे पर कटघरे में खड़ी करती रही उसे ही पार्टी में शामिल कर लिया गया। जिन मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप रहे, उन्हें ही अपनी सरकार में शामिल कर लिया गया। नुकसान यह रहा कि राज्यों में मजबूत नेतृत्व नहीं उभर पाया।
राज्यों में मौजूदा राजनीतिक अस्थिरता कहीं न कहीं इसी का दुष्परिणाम हैं। पार्टी में आंतरिक कलह और गुटबाजी चरम पर पहुंच चुकी है। पार्टी के लिए समर्पित रहे नेता और कार्यकर्ता कहीं न कहीं उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। हाशिए पर खड़े पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं में निराशा घर कर गई है। कुल मिलाकर जो सियासी रोग और खामियां दूसरे दलों में थीं उनमें भाजपा भी जकड़ने लगी है।
भाजपा को आसन्न चुनौतियों से पार पाने के लिए चौकन्ना रहने की जरूरत है। उत्तराखंड में पिछले दिनों सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के दौरान उतार-चढ़ाव के बाद भाजपा ने मनोवैज्ञानिक बढ़त तो ली है। खेल चेहरों का है । पुष्कर सिंह धामी को कमान सौंप कर भाजपा हाईकमान ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। कांग्रेस भले ही यह कह रही हो कि भाजपा खिलौनों की तरह मुख्यमंत्री बदल रही है लेकिन हकीकत यह है कि धामी ‘एक्सीडेंटल’ नहीं बल्कि ‘रणनीतिक’ मुख्यमंत्री हैं।
धामी के जरिए भाजपा ने अभी तक कांग्रेस के लिए मुफीद माने जा रहे कुमाऊं और तराई में हरीश रावत के लिए बड़ी चुनौती खड़ी की है। वहीं दूसरी ओर हरिद्वार से तेजतर्रार नेता मदन कौशिक को कैबिनेट मंत्री के दायित्व से मुक्त कर संगठन की कमान सौंपकर और युवा नेता धन सिंह रावत को मजबूत कर क्षेत्रीय के साथ ही जातिगत संतुलन साधने की कोशिश की है।
बता दें कि 2022 के लिए भाजपा ने 60 सीटों का लक्ष्य रखा है। यह टारगेट बड़ा इसलिए है क्योंकि 57 सीटों पर तो भाजपा अभी है ही। ऐसा नहीं है कि भाजपा के लिए यह आसान है और सब कुछ भाजपा की रणनीति के मुताबिक संभव है।
भाजपा में भी दिक्कतें हैं। कुर्सी का संघर्ष, खेमेबंदी, सरकार और संगठन की रस्साकसी, नेताओं और कार्यकर्ताओं की नाराजगी यहां भी बराबर है। कभी दो ध्रुवों में बंटी भाजपा में अब कई छोटे-बड़े ‘मठ’ स्थापित हो चुके हैं। सियासत के पुराने बरगद यहां भी नई पौध के आड़े आ रहे हैं, मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए भाजपा की अंदरूनी कलह तो जगजाहिर है ही।
फिलहाल भाजपा में किलेबंदी जारी है। नए मुख्यमंत्री पर कम ओवरों में बड़ा लक्ष्य हासिल करने के लिए सधी बल्लेबाजी करने का दबाव है। शुरुआत अच्छी है मगर पूरा दारोमदार धामी के अगले सौ दिनों पर है। धामी सरकार के अगले सौ दिन सिर्फ भाजपा का ही नहीं बल्कि उनका भी सियासी भविष्य तय करेंगे।

































