क्या है भारत माता? क्या है अपना भारत?
पंडित नेहरू की पुण्यतिथि पर राजेन्द्र भट्ट की आज के संदर्भ में प्रासंगिक श्रद्धांजलि
आज 27 मई है – पंडित नेहरू की पुण्यतिथि! आधुनिक भारत के निर्माता! हालांकि उस भारत को, जिसके होने को ही – ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ को आज जैसे ग्रहण ने थोड़ा ढक लिया है – पर हर भ्रम, हर कुरूप ग्रहण की तरह यह ग्रहण भी जाएगा ही।
तीन दशक तक भारत के स्वतन्त्रता संघर्ष में जुटे जवाहरलाल 9 बार जेल गए और करीब 9 साल जेल में बिताए। देश के कोने-कोने में गए। वह बड़े कद के और बड़ी दृष्टि के नेता थे – बहुत बड़ी बौद्धिक, भावनात्मक और रचनात्मक समझ के नेता भी। समझना चाहते थे कि क्या है ‘भारत- – इसकी नदियों-पहाड़ों, शहरों-गांवों, भूगोल के परे। तीन दशक के इस पूरे दौर में – ‘भारत’ को – इसकी आत्मा को, इसके होने को, इसके विचार को समझने की उनकी तड़प, चिंतन आज़ादी के संघर्ष के साथ-साथ चलता रहा। इस दौर में उन्होंने भारत के इतिहास, परंपरा, गौरव-ग्रन्थों, दर्शन, संस्कृति के साथ-साथ ही विश्व इतिहास, साहित्य, संस्कृति, विज्ञान और राजनीति को पढ़ा-समझा। साथ ही देश के कोने-कोने के भारतीय ‘जन’ के साथ- मिट्टी, पानी, पहाड़ों के साथ, जन के सुख-दुख, उल्लास-विषाद के साथ जोड़ कर, देख कर – ‘देश’ को समझा। ये पढ़ाई दोनों तरह की ‘किताबों’ की थी।
9 अगस्त 1942 से 28 मार्च 1945 के दौरान नेहरू अहमदनगर जेल में थे। कैदी जीवन के उस दौर में भी वह एक नए उभरते स्वतंत्र राष्ट्र की अंगड़ाई महसूस कर रहे थे। दूसरे विश्व यद्ध के बाद के बदले विश्व परिदृश्य, राजनीति और अर्थनीति के बीच , पहली बार लोकतान्त्रिक राष्ट्र-राज्य के रूप में उभरने वाले विशाल-महान देश को मन से भी तैयार होना था – अपने स्वरूप को, पहचान को समझना था। विदेशी शासन ने उसकी ज़मीन और शासन पर ही कब्जा नहीं किया था – उसके इतिहास, उसकी संस्कृति, उसकी भारतीय पहचान को भी उपनिवेश बना दिया था। नव-स्वतंत्र भारत के लिए अपनी ही मौलिक खोज करनी ज़रूरी थी, अपनी पहचान, ‘इंडिया के आइडिया’, अपने औचित्य को भी साफ शब्दों में दर्ज करना था। तभी तो भारत का पुख्ता वर्तमान बनता कि भारत के रूप में हम क्या हैं – अंग्रेज़ के चश्मे से नहीं, उनके साजिशी तोहफे में मिले सांप्रदायिक हिन्दू-मुसलमान वाली धुंधले चश्मे से भी नहीं – बल्कि इतिहास, संस्कृति और समग्र जीवन की ईमानदार, विद्वान समझ के चश्मे से।
और इसी वर्तमान की समझ से भारत का भविष्य गढ़ा जाना था। अपनी ‘भारतीय’ पहचान की जड़ों पर मजबूती से खड़े ज्ञान-विज्ञान, समृद्धि से भरपूर और अपने ‘जन’ को न्याय, समता और खुशहाली दिलाते भारत का भविष्य।
इसलिए यह ‘खोज’ ज़रूरी थी। और अप्रैल से अगस्त 1944 के दौरान साढ़े पाँच महीने में नेहरू ने ‘ ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ यानि ‘भारत की खोज’ लिख डाली – जेल से मिले कागजों पर करीब एक हज़ार पृष्ठ की किताब, जो सिंधु सभ्यता से लेकर बीसवीं सदी तक के भारत के इतिहास, संस्कृति, विकास, इसकी मेधा -वेद-उपनिषद-रामायण-महाभारत के सार-तत्व, अशोक-अकबर जैसे सम्राटों, जन-जीवन, उदारताओं-रूढ़ियों – मतलब विराट भारत के विविध पक्षों को समझती-समझाती है।
नेहरू किसी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में नहीं बैठे थे। वह इंटरनेट और सूचना-सुलभता का भी युग नहीं था। समूची स्मृति और अध्ययन उनके बेजोड़ दिमाग में थे। जेल में अपने 12 सहयोगियों-चोटी के नेताओं-विद्वानों से वह सलाह-मशविरा करते थे – इनमें से कुछ का खास तौर से, कृतज्ञता से उन्होंने उल्लेख किया है –मौलाना आज़ाद, आचार्य नरेंद्र देव, मोहम्मद आसफ अली, और गोबिन्द बल्लभ पंत। संभवतः इनके पास कुछ किताबें होंगी। जो पुस्तक बनी – वह विश्व- साहित्य की क्लासिक बनी, इतनी गहरी समझ, इतनी प्रवाहमयी अनुपम भाषा। यह लेख ‘डिस्कवरी’ के विश्लेषण के लिए नहीं है, उसके लिए न यहाँ स्थान है, न इस स्तंभकार की उतनी काबिलीयत है। लेकिन, साढ़े पाँच महीने में, बिना संदर्भ-सामग्री की सुलभता से चार हज़ार साल की सभ्यता-संस्कृति-समाज-देश की इतनी कसी हुए, प्रभावपूर्ण भाषा में ‘खोज’ हो पाई, इस से बरबस उस महामानव के प्रति मन श्रद्धा से भर जाता है। तब समझ में आता है कि नेहरू अपने समय की महानतम प्रतिभाओं – अल्बर्ट आइन्स्टाइन, बर्नार्ड शॉ , रोम्याँ रोलां, बरट्रंड रसेल और भारत के तमाम लेखकों, कवियों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों के मित्र और प्रिय क्यों थे।
इसी ‘खोज’ में एक प्रसंग है ‘भारत माता’ का। उत्तर भारत के एक गाँव में नेहरू की एक जनसभा में, लोग ‘भारत माता की जय’ का नारा लगा रहे थे। अचानक नेहरू जी ने पूछा – कौन है भारत माता? किसकी जय के नारे वे लगा रहे हैं? (जनता जब जोश में होती है, तो आमतौर पर राजनीतिबाज ऐसे जोश कम करने वाले सवाल नहीं पूछते। इसी जोश से तो उन्माद बनता है, जिसमें कुछ ज़िबह होते हैं, कुछ वोट बनते हैं! पर हम नेहरू की बात कर रहे हैं- किसी क्षुद्र राजनीतिज्ञ या राजनीतिबाज की नहीं। इस अचानक सवाल से गाँव के लोग अचंभित हुए। लेकिन इस सवाल ने उन्हें सोचने की ताकत दी, भागीदारी दी। एक किसान ने सुंदर उत्तर दिया – ये ‘धरती’ भारत माता है। नेहरुजी ने फिर पूछा – कौन सी धरती – इस गाँव की, जिले-कस्बे-सूबे की या पूरे देश की? प्रश्नों-उत्तरों के जरिये जन को सचेत-समझदार बनाने का सिलसिला जारी रहा। अनेक उत्तर आए। और फिर नेहरू जी ने कहा – निश्चय ही, ये नदियां, ये पहाड़,ये हमें जीवन देने वाले खेत-खलिहान – हमें प्रिय हैं। पर भारत माता हैं –तुम, हम – भारत के लाखों-करोड़ों लोग। ‘भारत माता की जय’ हमारी जय है। नेहरू जी लिखते हैं, ‘और जैसे-जैसे यह विचार उनके मन में धीरे-धीरे घर करता गया, उनकी आँखों में चमक आ गई – जैसे उन्होंने कोई बड़ी ’खोज’ कर ली हो।‘ सच में, उन्होंने ‘भारत माता’ को खोज लिया था। यह उनकी अपनी भारत माता थी- जिसे वे महसूस कर सकते थे, समझ सकते थे, और अब वह उन्हें ताकत, आत्म-विश्वास और सम्मान दे रही थे।
लेकिन उस दौर में भी यह भारत माता बेहद उदास थी। तब वह ज्यादातर गांवों में बसती थी। प्रख्यात हिन्दी कवि सुमित्रानन्दन पंत ने जनवरी 1940 में, इसी भारत माता पर कविता लिखी। पंत जी का जन्मदिन -20 मई भी अभी गुजरा है। यहाँ स्थान-सीमा की वजह से कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं पर आप गूगल सर्च कर पूरी कविता पढिए, और सड़कों पर जो भारत माता आज लू के थपेड़े खाती बेघर होकर निकाल पड़ी है, उससे इसकी छवि को मिलाइए। आपका मध्य-वर्गीय अहंकार टूटेगा, मन निर्मल होगा। विदेशी अत्याचारी, निर्मम शासन के दौर में उदास भारत माता के कई बिम्ब हैं इसमें-
भारत माता ग्राम वासिनी
खेतों में फैला है श्यामल धूल भरा मैला सा अंचल
गंगा यमुना में आँसू जल
मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी
दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन
अधरों में चिर नीरव रोदन
——-नत मस्तक तरुतल निवासिनी
और इस कविता की यह पंक्ति आज से सीधे जोड़ती है—
‘वह अपने घर में प्रवासिनी।‘
आज भी सड़कों पर भारत माता निकल पड़ी है – वहाँ भी दैन्य है, चुपचाप आँसू हैं, आज भी वह ‘तरु-तल’ -पेड़ के नीचे कहीं बैठी है, बल्कि आज तो वह छांव भी नहीं दिखती। और सबसे करुण है – विदेशी राज न होने के बावजूद – स्वराज में बेघर कर दी गई है – वह अपने घर में प्रवासिनी हो गई है। उस भारत माता के साथ एक उम्मीद थी। वह गांधी बाबा को मानने वाला देश था। सुमित्रानंदन पंत की वह भारत माता अपने बच्चों को अहिंसा के दूध का अमृत पिला रही थी, उनका ‘जन मन भय’ हर रही थी।
आज स्थिति ज्यादा निराशाजनक है। न गांधी करीब हैं, न नेहरू। अहिंसा का अमृत नहीं है, हिंसा का धमकियों का, हर विरोध पर मार-पीट, जेल-हिरासत, हिन्दू-मुस्लिम, कब्रिस्तान-श्मसान का विष फैला है। इस प्रवासिनी माँ के लिए भी मन में भय ही भय है। बालकनी वाले उन्माद में थाल बजा रहे हैं और बेघर भारत माता के थूक-पसीने-भूख, उसके मजहब, जाति की वजह से भयभीत हैं। बेघर भारतमाता पिटने-भूखे रहने, भटकायी जाने से भयभीत है। भय ही भय । हिंसा ही हिंसा। विष ही विष। शासकों का उन्माद ही उन्माद।
और आज के एक समर्थ कवि ने लिखा है – (कुछ अंश दिए हैं, बाकी और ज्यादा विचलित करने वाले हैं। नाम नहीं पता -क्षमा याचना!)
सूरत से इलाहाबाद पैदल/ जा रही है भारत माता/ मर गया है संविधान /और मर गए हैं देश के भाग्य विधाता/
गोद में संतान अपनी/ लिए अविरल चल रही है/ एक कुछ समान भी है। चल रही बस चल रही है
ऐसे विराट देश में/ फूल बरसाते हें विमान/ —-यह पैदल क्यों जाती है?/क्या जल गई है सारे वाहन?
मर गए हैं प्रश्न/ मर गए हैं उत्तर/—-मर गई हैं सरकारें/ —-कैसे कैसे प्रधान छली/कैसे मुखिया मंतरी सारे
मर गई है नीति सब/ बस बच गया है ढोंग।
पर यह देश हजारों साल से टिका है। पुख्ता है, मजबूत है। ये राम का है, रहीम का भी है, भक्तों-सूफियों का है, तो नास्तिकों, सत्ताओं के चाकर न होने पर गर्व करने वालों का भी है। और भारत माता, जैसा सुमित्रानंदन पंत की कविता में है – अमृत पिलाती है, भय हरती है। तो आज भी हम जहरीले लोगों से क्यों डरें? हमारी माता के पास तो सदियों से प्रेम, सद्भाव,उदारता और करुणा का अमृत कोश है। यह देश भारत माता का है, पूरा देश उसका है। वह प्रवासिनी न हो, बेघर न हो – ऐसी हमारी चेतना जागे। इस देश को बचाने का और कोई विकल्प भी तो नहीं है।