(राजशेखर पन्त)
“O, swear not by the moon, th’inconstant moon,
That monthly changes in her circled orb,
Lest that thy love prove likewise variable”
(Romeo & Juliet)
शेक्सपियर का रोमियो-जूलियट बहुत पहले पढ़ा था मैंने, अब तक भूल भी चुका हूं बहुत कुछ, पर इन पंक्तियों को भुला पाना हमेशा ही मुश्किल रहा है मेरे लिए। मुझे लगता है कि एक बहुत बड़ा दोष यूं ही लगा दिया था रोमियो ने चंद्रमा पर, जिसके अस्तित्व की सार्थकता ही उसके अपूर्ण हो कर निरंतन पूर्णता प्राप्त करने के प्रयास में है। बार बार बिखर कर पूर्णता प्राप्त करने का इसका अहर्निश प्रयास, सीमाओं में बंधे रह कर भी निःसीम को स्वयं में समेट लेने की उद्दाम लालसा का प्रतीक ही तो है। …और फिर पूर्णता में तो एक अजीब सा ठहराव है, जिसे प्राप्त कर चिंतन ही नहीं विकास और परिवर्तन भी जड़ हो जाते हैं, किसी गढ़े में ठहरे हुए बरसात के पानी की तरह।
नियति ने भी कुछ ऐसा ही सोचा होगा भीमताल की आधारशिला रखते समय; पूर्णमासी के चंद्रमा की तरह न जाने कितनी बार पूर्णता और ठहराव को प्राप्त करने का प्रयास किया है इस पहाड़ी कस्बे ने, पर हर बार जैसे किसी ग़लती के एहसास ने इसे अपनी यात्रा दोबारा शुरू करने की प्रेरणा दी है। दूज से पूनम का यह सफ़र न जाने कब से चला आ रहा है और शायद इसीलिए यह मध्य हिमालयी बसाहट ज़िंदा भी है।
किंवदंतियां इस स्थान की स्थापना का श्रेय पाण्डुपुत्र भीम को देती हैं। कहते हैं कि प्रागैतिहासिक काल में भीम अपने भाइयों के साथ अज्ञातवास के दौरान यहां आए थे, यहीं उनकी भेंट हिडम्बा से हुई थी। इस क्षेत्र की एक पहाड़ी को आज भी हिडम्बा के नाम से ही जाना जाता है। किसी भी बृहदाकार रचना को भीम से जोड़ने की परंपरा जनश्रुतियां में आम है। मध्यप्रदेश के भीमबेटका शैलाश्रय या फिर गुजरात के भीम और हिडम्बा के नामों से जुड़े वनक्षेत्र इसके अन्य उदाहरण हो सकते हैं। संभव है कि प्रचिलित लोकगाथाओं के अनाम लेखक के लिए भीमताल का संबंध भी पाण्डुपुत्र से जोड़ना एक सहज और स्वाभाविक संयोग रहा हो। स्कन्दपुराण के मानसखंड में यहां स्थित झील ‘भीमसर’ के नाम से उल्लेखित है। इस पुराण की जो प्राचीनतम लिखित प्रति प्राप्त हुई है उसका काल छठी शताब्दी ई. पश्चात का है। इससे इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि भीमसर के आधार पर ही इस स्थान का नाम भीमताल पड़ा होगा। इस क्षेत्र में बहने वाली कलसा नदी के किनारे कुछ बड़ी चट्टानों पर प्रागैतिहासिक कप-मार्क्स का मिलना यहां कभी किसी आदिम सभ्यता के भी फलने-फूलने का प्रमाण है।
महाजनपद काल (600 से 300 ईपू) में भीमताल पांचाल महाजनपद के अहिच्छत्र क्षेत्र की सीमा पर कुणिंद वंश द्वारा शासित स्वतंत्र मध्य-हिमालयी राज्य का हिस्सा रहा होगा। कुणिंद संभवतः पशुपालक समाज से जुड़े पर्वतीय योद्धा थे, जिन्होंने मौर्य साम्राज्य के उद्भव के बावजूद अपनी स्वतंत्रता को बचाये रखा था। अशोक के शिला लेख में इनका अस्पष्ट उल्लेख है। समुद्रगुप्त की विजयगाथा का यशगान करती हरिषेण की प्रशस्ति में उल्लेखित किरातों के कुणिंद होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। समुद्रगुप्त का इन स्थानीय शासकों से युद्ध, जिसमें ये पराजित हुए थे, भीमताल की उपत्यका में ही कहीं लड़ा गया होगा। पर्वतीय राज्य पर गंगा-यमुना के मैदान से आने वाली सेनाओं ने इसी क्षेत्र में पर्वतीय योद्धाओं से निर्णायक लड़ाइयां लड़ी थीं। 1745 ई. में रोहील्लों से निर्णायक युद्ध भी कुमाऊं के प्रवेशद्वार कहे जाने वाले काठगोदाम के पास ही कहीं हुआ था। यह क्षेत्र उस समय बाड़ाखोड़ी कहा जाता था।
कुणिंद कालीन भीमताल का ऐतिहासिक परिदृश्य यद्यपि बहुत स्पष्ट नहीं है पर निश्चित रूप से इस स्वतंत्र और सशक्त रहे राज्य में भीमताल सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण बसाहट थी। पर्वतीय और ट्रांसहिमालयी क्षेत्र को गंगा-यमुना के मैदान से जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग भीमताल से ही गुजरता था। पाणिनी के काल से ही, जिसकी संभावित तिथि पांचवीं शताब्दी ई.पू. है, ट्रांस-हिमालयी व्यापार और सांस्कृतिक संपर्कों के ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। चीन की प्रथम महिला साम्राज्ञी वू-ज़ेटियन (624-705 ई.प.) के काल में तो उन बौद्ध भिक्षुकों और श्रमणों के नाम तक ज्ञात हैं जो चीन गए थे। उन ट्रांसह्यूमेन्ट-पशुचारकों और भोटान्तिक व्यापारियों के काफिलों के अलावा- जिन्हें मुझसे पहले वाली पीढी ने तालाब के किनारे से होकर हल्द्वानी की ओर जाने वाली सड़क पर गुजरते हुए देखा होगा -कौन जाने कभी बौद्ध भिक्षुकों के समूह भी अपने प्रार्थना चक्रों को घुमाते हुए यहां से गुजरे हों। इतने महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग पर नियंत्रण कुणिंद राजवंश के शक्तिशाली होने का सशक्त प्रमाण है। यह उल्लेख भी यहां प्रासंगिक होगा कि कतिपय इतिहासकारों ने कुणिंदों के बौद्ध धर्मावलंबी होने की बात कही है। भीमताल से लेकर जागेश्वर तक के मंदिरों तथा मूर्तिशिल्प में बौद्ध प्रभाव की स्पष्ट छाप है। प्रसिद्ध इतिहासविद श्री यमुनादत्त वैष्णव ‘अशोक’ के अनुसार इस क्षेत्र के शिवालयों से जुड़े एक समाज-विशेष की सांस्कृतिक मान्यताएं भी इंगित करती हैं कि कभी यह समाज बौद्ध धर्म का अनुयायी रहा होगा।
छठी-सातवीं शती ई.प. में कुमाऊं के पहले ऐतिहासिक राजवंश -कत्यूरी राजाओं के उद्भव के साथ ही परिदृश्य कुछ स्पष्ट होने लगता है। भीमताल तब तक निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन चुका था। तराई का वह भाग जिसे काशीपुर कहा जाता है, तब गोविषण नाम का एक सम्पन्न सांस्कृतिक और व्यापारिक नगर था जिसकी सीमाएं सम्राट हर्ष के साम्राज्य से मिलती थीं। गोविषाण के उत्कर्ष ने भीमताल के रास्ते समस्त पर्वतीय क्षेत्र के विकास को प्रभावित किया होगा। यही वह कालखण्ड है जब पहाड़ों में बढ़ते हुए कृषि-अधिशेष ने कला, शिल्प और संस्कृति को महत्वपूर्ण विस्तार दिया था, पर यह लोकमान्यता कि यहां स्थिति भीमेश्वर महादेव के मंदिर का निर्माण भी कत्यूरी काल में हुआ था पूर्ण रूप से निराधार है।
ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी तक कत्यूरी वंश का पराभव लगभग पूर्ण हो चुका था। इनके उत्तराधिकारियों ने जिन्हें परिवर्ती कत्यूरी कहा जाता है छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। द्वाराहाट-बागेश्वर क्षेत्र, जिसे तब बैराठ कहा जाता था ऐसा ही एक राज्य था। राजुला-मालूसाही की प्रसिद्ध प्रेम-कहानी इसी क्षेत्र से जुड़ी है। यद्यपि इस काल का इतिहास आज भी अनिश्चितता के कुहासे में लिपटा है पर इतना ज्ञात है कि अल्मोड़ा में चंद राजा बालो कल्याण चंद द्वारा अपनी राजधानी 1546 में स्थापित करने से दशकों पूर्व उनके एक पूर्वज त्रिलोकी चंद द्वारा छखाता क्षेत्र को जीत कर भीमताल में एक दुर्ग का निर्माण करवाया गया था। यह दुर्ग निश्चित रूप से ढुंगसिल की पहाड़ी पर कहीं स्थित रहा होगा।नौकुचियाताल की ओर जाने वाले रास्ते में ढुंगसिल की पहाड़ी के नीचे, घाटी पर, टापू की शक्ल के गोल से खेतों की एक संरचना है; इसे कुछ वर्षों से पैराग्लाइडर्स के लैंडिंग स्टेशन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। बचपन में मैंने इन खेतों तथा ढुंगसिल की पहाड़ी से, हल चलाने या खुदाई किये जाने के दौरान तराशी हुई शिलाओं तथा ऐसी ही अन्य वस्तुओं के प्रायः निकल आने की कहानियाँ सुनी थीं। चंद राजाओं के शक्तिशाली होने के साथ ही कई अन्य गढ़ियों तथा दुर्गों का निर्माण इस क्षेत्र में हुआ था। राजा भीष्म चंद की असामयिक मृत्यु, जिसे हत्या माना जाता है, इन्हीं गढ़ियों में कहीं हुई थी। कालांतर में राजा भीष्म चंद को स्थानीय देवता ‘भुमियाँ’ अर्थात भूमि के रक्षक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। गावों में लगने वाली जागरों (spirit possession seance) में आज भी भीष्म चंद की हत्या का जिक्र आता है।
इस दौर का एक रोचक वाकया गंगोली क्षेत्र के जजूट गाँव से पन्त परिवार का यहाँ आकर बसना है। गंगोलीहाट के जाह्नवी के नौले में लगे शिलालेख के अनुसार पन्त ब्राह्मण तेरहवीं शताब्दी में गंगोलीहाट आए थे। जजूट के पंतों को पंद्रहवीं शताब्दी में छखाता क्षेत्र के धार्मिक मामलों का प्रमुख बना, अपनी विशेष मुहर दे कर, तत्कालीन राजा द्वारा भीमताल भेजा गया था। किसी भी धार्मिक मामले, विशेषकर गोहत्या इत्यादि से संबंधित प्रकरणों में, इन्हें प्रायश्चित के लिए व्यवस्था देने का अधिकार प्राप्त था। नौकुचिताल के पास राजा द्वारा इस पन्त परिवार को पर्याप्त मात्रा में कृषि भूमि दी गयी थी। नौकुचिताल के ही शिलॉटी गाँव में खूँट गाँव के पंतों ने भी लगभग इसी दौरान बसना शुरू किया था।
सोलहवीं शती में अल्मोड़ा को बालो कल्याणचंद द्वारा राजधानी के रूप में विकसित करने के बाद भीमताल का महत्व बहुत अधिक बढ़ गया था। यह वह दौर था जब मुग़ल शासकों से कुमाऊं के राजाओं के संबंध बढ़ते जा रहे थे। चंद राजाओं द्वारा इसी समय रुद्रपुर और बाजपुर जैसे तराई की बसाहटों की स्थापना की गयी। चंद शासन का स्वर्णकाल था यह और भीमताल राज्य के केंद्र के लिए प्रमुख प्रवेश द्वार बन चुका था। शाहजहां के समकालीन रहे राजा बाजबहादुर चंद की पहुंच मुगल दरबार तक थी तथा भीमताल उनके शासनकाल में चंद साम्राज्य की गतिविधियों का एक प्रमुख केंद्र बन चुका था। तालाब के किनारे बने भीमेश्वर महादेव के मंदिर का निर्माण भी इन्ही बाजबहादुर चंद ने करवाया था। बाजबहादुर चंद के पुत्र उद्योत चंद के जीवन से जुड़ी एक प्रेम कहानी- जिसका संबंध इस मंदिर से है -के सूत्र मुझे वर्षों पूर्व एक बूढ़ी महिला से सुने गए लोकगीत से मिले थे। एक कहानी भी लिखी थी मैंने उस पर, जो संभवतः 82-83 में कभी प्रकाशित हुई थी।
भीमताल तब तक कला और शिल्प के क्षेत्र में भी अपनी पहचान बना चुका था। नल दमयन्ती तालाब से पचास के दशक में विष्णु की एक काले ग्रेनाइट से बनी मूर्ति मिली थी जिसे तालाब के किनारे बने मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया है। स्थानक मुद्रा में बनी यह परिवर्ती गुप्त कालीन मूर्ति और इसके साथ मिली अन्य छोटी मूर्तियां, जिनमे से अधिकांश अब गायब हो गईं हैं, कला शिल्प से जुड़ी एक सम्पन्न परंपरा की ओर इशारा करती हैं। नल दमयन्ती क्षेत्र मूर्ति निर्माण का निश्चित रूप से एक स्थापित केंद्र रहा होगा। इस क्षेत्र से बहने वाले एक बरसाती नाले में खंडित मूर्तियों के छोटे छोटे बहुत से टुकड़े मैंने 80 के दशक में देखे थे। भीमेश्वर महादेव के मंदिर में भी पीपल के वृक्ष के नीचे तथा मंदिर के पश्चिमी हिस्से में कई अनगढ़ तथा खंडित मूर्तियां यूं ही पड़ी रहती थी, गांधार शैली में बने बुद्ध का एक खंडित सर भी मैंने यहां 80 के दशक के प्रारंभिक वर्षों तक देखा था।
एक अन्य जानकारी का साझा किया जाना यहां शायद रोचक होगा। भीमताल की झील का पश्चिमी हिस्सा, जो डैम बनने के बाद पानी में डूबा था, तब खेती की उपजाऊ जमीन हुआ करता था। कुछ दशक पूर्व यहां बड़ी संख्या में टेराकोटा की प्राचीन ईंटे मिली थीं। यह ईंटे अब लोक संस्कृति संग्रहालय में रखी हैं। डॉक्टर मठपाल, जिनके संग्रह में चंद कालीन भूमि व्यवस्था के कुछ दस्तावेज़ भी हैं, ने मुझे बताया था कि इन ईंटों का उपयोग संभवतः अनाज भंडारण के लिए उपयोग में आने वाले कुठारों के निर्माण में किया गया होगा। कृषि-अधिशेष की प्रचुरता ने कला और शिल्प के विकास में तब निश्चित ही भरपूर योगदान दिया था।
17 वीं शती के उत्तरार्ध में भीमताल का गौरव भी चंद वंश में हो रहे अंतर्कलहों के चलते क्षीण होने लगा। तराई भावर तब तक आर्थिक और राजनैतिक हलचलों का केंद्र बन चुका था। 18वीं शताब्दी के चौथे दशक में कटेहर के सरदार अली मुहम्मद खां रोहिल्ला के आक्रमणों के दौरान यहां के मंदिरों और मूर्तियों तथा जन जीवन को व्यापक क्षति पहुचायी गयी थी। भीमताल स्थित पाण्डेगाँव के निवासी पंडित शिवानंद पांडे द्वारा रचित कल्याण चंद्रोदय काव्य में 1638 से 1745 तक के चंद काल के व्यापक परिदृश्य को समेटा गया है। 1745 में भीमताल के पास नज़ीब खान रोहिल्ला, जिसने पानीपत के तीसरे युद्ध में प्रमुख भूमिका निभाई थी, से हुए बाड़ाखोड़ी के युद्ध में रोहील्लों को परास्त करने में पंडित शिवानंद पांडे की प्रमुख भूमिका रही थी। उस समय की एक कचहरी तथा फाँसीघर के खंडहर कुछ समय पूर्व तक पांडेगाँव के पश्चिमी भाग में मौजूद थे। 18वीं शती के अंतिम दशक में कुमाऊं पर गुरखाओं का शासन स्थापित हो गया था। सारे कुमाऊं के साथ भीमताल के लिए भी यह पराभव का समय था।
गुरखाओं ने सन 1790 में कुमाऊं पर आक्रमण किया था। चंद साम्राज्य में व्याप्त राजनैतिक अस्थिरता उस समय अपने चरम पर थी। इस हमले में हार जाने के पश्चात तत्कालीन राजा मोहनचंद ने एक अंतिम प्रयास तब बड़ाखोड़ी की घाटी (वर्तमान गुलाबघाटी-रानीबाग़ क्षेत्र) कहे जाने वाले क्षेत्र पर सेना इकट्ठा करने के पश्चात किया था। भीमताल की उपत्यका पर कहीं लड़े गए इस युद्ध में चंद राजा गुरखाओं से बुरी तरह पराजित हुए थे।
गुरखा काल भीमताल के लिए अपने अर्जित वैभव को खोने का समय था। इस क्षेत्र के अधिकांश प्रतिष्ठित और संपन्न समाज अपनी संचित संपत्ति को ज़मीन में गाढ़ कर पलायन करने लगे थे तब। उस समय के गढ़े धन के मिलने के क़िस्से अब भी कभी कभार सुनाई देते हैं। भीमताल-हल्द्वानी मोटर मार्ग पर चंदादेवी की ओर कटने वाले एक पुराने रास्ते के शुरू में एक लोहे का फाटक लगा हुआ है। यह जगह संभवतः कूड़ा निस्तारण तथा रिसाइकिलिंग इत्यादि के लिए चिह्नित की गयी है। इसके ठीक ऊपर एक टीलेनुमा पहाड़ी के शिखर पर उन दिनों एक प्रमुख गोरखागढ़ी हुआ करती थी। सामरिक महत्व के चलते ऐसी कई गढ़ियां भीमताल के चारों ओर बनायी गयी थीं। इस गढ़ी में दबे हुए किसी बड़े खजाने का जिक्र मैंने अपने बचपन में सुना था। ढुंगसिल निवासी स्व. श्री धर्मानंद पांडे जी ने, जो मेरे पिताजी के मित्र थे, एक बार नेपाली भाषा में एक चतुष्पदी सुनायी थी। मुझे इतना भर ही याद है अब, कि उसमें संकेतों के माध्यम से इस खजाने का जिक्र करते हुए इसकी सटीक स्थिति बतायी गयी थी।
गुरखाओं को 1815 में ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना से पराजित हो कर काली नदी के उस पार जाना पड़ा था। कंपनी शासन के प्रारंभिक दिनों में सत्ता का केंद्र हौलबाग़ रहा था। भीमताल पर अंग्रेजों का ध्यान शुरुवात में नहीं गया था। वास्तव में अल्मोड़ा में हुए इस निर्णायक युद्ध के लिए कंपनी की सेना का कूच भीमताल मार्ग से न हो कर कोसी नदी के किनारे से होते हुए कटारमल की दिशा में हुआ था। 18वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों में ही काशीपुर-जसपुर क्षेत्र पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो चुका था। इस पृष्ठभूमि में एक बड़े फ़ौजी लश्कर को, जिसमें हाथी भी शामिल थे, नदी के किनारे होते हुए सीधे कटारमल की ओर ले जाना निश्चित ही अधिक सुविधाजनक रहा होगा।
इस दौर में भी बद्रीनाथ की यात्रा पर जा रहे बटोहियों के लिए भीमताल प्रमुख पड़ाव बना रहा। गुरखा काल में रानीबाग़ को नौकुचियाताल-चनौती से जोड़ने वाला मार्ग अधिक प्रचलन में आ चुका था। यह पूरा विस्तार तब एक नव विकसित कृषि क्षेत्र था। इसी मार्ग पर स्थित गढ़ीफेर नाम के एक घुमावदार हिस्से के आसपास ही कहीं गुरखा सामंतों की गढ़ी रही होगी जिसके अवशेष अब नहीं मिलते हैं।
सन 1824-26 के दौरान तत्कालीन कलकत्ता से बिशप रेनाल्ड हैबर इसी मार्ग से नौकुचियाताल होते हुए भीमताल और फिर अन्य पहाड़ी बसाहटों की ओर गया था। अपनी पुस्तक Narrative of a journey through the upper provinces of India में, जिसकी एक शताब्दी से भी अधिक पुरानी एक प्रति मुझे लखनऊ के अमीरुद्दौला पुस्तकालय से मिली थी, उसने चनौती के पास ही कहीं किसी ‘पाइथन रॉक’ और ‘चरसीज डेल’ का जिक्र किया है। इन स्थलों को ढूंढने का निष्फल प्रयास मैंने किया था। बिशप हैबर को अपनी इसी यात्रा के दौरान इस क्षेत्र में जंगली चाय के पौधे मिले थे, जिन्हें देखने के बाद उसने यहां पर चाय की खेती की संभावना पहली बार व्यक्त की थी। 19वीं शताब्दी का तीसरा दशक भीमताल और इसके आसपास के कुछ स्थानों के लिए चाय-बागानों का तोहफ़ा लेकर आया था। एक अत्यंत रोचक घटनाक्रम का साक्षी बनने जा रहा था अब पहाड़ो का प्रवेशद्वार कहा जाने वाला यह कस्बा।
वर्ष 1815 में अल्मोड़ा के निर्णायक युद्ध के बाद कुमाऊं क्षेत्र पर ईस्ट इंडिया कंपनी जिसे जॉन कंपनी भी कहा जाता था, का अधिकार स्थापित हो गया था। गुरखा शासन की अतिशय निरंकुशता और क्रूरता को, जैसा कि प्रायः होता है, जन सामान्य द्वारा शीघ्र ही भुला दिया गया। निश्चय ही यह एक संक्रमण काल था और कुमाऊं के पहले स्थायी कमिश्नर ट्रेल के शासन की उदार निरंकुशता पहाड़ी समाज के लिए एक बड़ी राहत थी। गंगोलीहाट के गुमानी पन्त और पाटिया के कृष्णा कलजुगी की कविताओं में सामान्य होते जनजीवन, बढ़ते व्यापार और स्थायित्व की एक सहज झलक मिलती है। कुमाउनीं भाषा के ये दोनों आदि कवि जॉन कंपनी के शासन के शुरुवाती दौर के साक्षी रहे थे।
पर भीमताल में शासकीय स्तर पर 19वीं शती के दूसरे दशक तक कुछ खास नहीं घटा। तीर्थयात्री, व्यापारी, मलदेशिये (हइलैंडर्स) ओर भोटान्तिक समाज के व्यापारी बेशक यहां से गुजरते रहे होंगे। दो विपरीत छोरों पर स्थित चंदादेवी और विनायक बटोहियों के पड़ाव हुआ करते थे। इन जगहों का दूध, दही, रायता इत्यादि तभी से प्रसिद्ध रहे हैं।
बिशप हैबर की यात्रा और उसके संस्मरणों से, जिसका जिक्र मैं पहले कर चुका हूं, कंपनी का ध्यान भीमताल की ओर गया होगा। सन 1827 में जॉन कंपनी के सहारनपुर स्थित बाग़ीचे के कर्ताधर्ता डा. रॉयल ने भी कुमाऊं में चाय की चीनी प्रजाति से मिलते जुलते जंगली पौधे के मिलने की बात कही थी। यहां की मट्टी को भी उन्होंने चाय की खेती के लिए सर्वथा उपयुक्त बताया था। चार वर्ष बाद उन्होंने इस संभावना का जिक्र भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड विलियम बेंटिक से भी किया। इस घटनाक्रम के बाद 1834 में बनी टी कमेटी ने भीमताल को चाय के उत्पादन के लिए सर्वथा उपयुक्त पाया। तत्कालीन कुमाऊं कमिश्नर ट्रेल ने किन्ही आर. ब्लैकवर्थ की सहायता से भीमताल में मल्लीताल के पास भरतपुर में चार एकड़ का एक भूखंड चयनित कर भरतपुर टी नर्सरी स्थापित की। चाय उत्पादन के क्षेत्र में अंग्रेजों द्वारा आसाम को लगातार दिये जा रहे प्रश्रय के बावजूद भीमताल की भरतपुर नर्सरी ने अपनी सीमित पर महत्वपूर्ण कोशिश को जायज ठहराया। सन 1841 में यहां चाय के 1344 पौधे थे। 1842 में चीन से चाय उत्पादन की व्यवहारिक जानकारी से जुड़े संभवतः 20 व्यक्तियों को यहां लाया गया था। इनके कुछ वंशज आज भी कुमाऊँ में रामगढ़ और कुछ अन्य स्थानों में रह रहे हैं। उल्लेखनीय है कि शेष भारत की तरह पहाड़ी क्षेत्र के लिए भी चाय तब एक नितांत नई चीज थी। चीन के उत्पादकों द्वारा प्रसंस्करित चाय के नमूनों को जांच के लिए लंदन भेजा गया, जहां इसे अत्यंत उच्च कोटि का ठहराया गया। 1844 में डा. जेम्सन सहारनपुर बाग़ीचे के प्रमुख बने और उन्होंने यहां के चाय बागानों पर विशेष ध्यान देना शुरू किया। उन्हीं के प्रयासों से यह निर्णय लिया गया कि भीमताल और उसके आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में चल रहे चाय उत्पादन को प्रायोगिक स्तर से निकाल कर अब व्यापारिक स्तर पर लाया जाना चाहिए।
चाय उत्पादन तब एक फायदे का सौदा बन चुका था। 1851 में भरतपुर नर्सरी के अतिरिक्त मल्लीताल के आणू और कुआंसार क्षेत्र में 46 एकड़ तथा पास ही के रसिया इलाके में 75 एकड़ में चाय का उत्पादन हो रहा था। यह सब अब भी सरकारी क्षेत्र और संरक्षण में था। सन 1864 में जेम्सन की सिफारिश पर यह बाग़ान निजी उत्पादकों को सौंप दिए गए। भीमताल में उस समय औसतन 2500 पाउंड (1134 kg.) चाय प्रति वर्ष पैदा की जाती थी। 20वीं शती के शुरुवाती दौर में 2800 पाउंड (1214 kg.) चाय प्रति वर्ष उत्पादित हो रही थी। लगभग 60 व्यक्ति इस चाय बाग़ान में कार्यरत थे। भीमताल का यह चाय बाग़ान कर्नल बर्टरैम ओवन जोन्स के पास शायद एक फी-सिंपल (freehold simple estate) एस्टेट के रूप में आया था।
बहुत कुछ और भी घट रहा था तब भीमताल में, पर शायद चाय के क़िस्से को बीच में छोड़ देना अच्छा नहीं लगेगा। हुआ कुछ यूं कि कुछ सामाजिक, राजनैतिक कारणों के चलते, मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी सीमा पर तेजी से बदलते भू-राजनैतिक समीकरणों के कारण चाय का उत्पादन 20वीं सदी के शुरुवाती दौर के बाद फायदेमंद नहीं रह गया था। यहां यह जानना रोचक होगा कि भीमताल में उन दिनों ब्रिक-टी भी बनायी जाती थी जिसका मुख्य आयातक तिब्बत था। इस विषय पर व्यापक चर्चा फिर कभी।
देशी रजवाड़े- खासकर वो जिन्होंने 1857 के संग्राम के दौरान अंग्रेजों की मदद नहीं की थी और जो राजभक्त न समझे जाने के कारण अधिक अंग्रेज़ियत वाले निकटवर्ती हिल-स्टेशन नैनीताल में बसने देने लायक नहीं थे -भी इन दिनों भीमताल में बसने शुरू हो गए थे। जहां आज कुमाऊँ मंडल विकास निगम का टूरिस्ट रेस्ट हाउस है उस स्थान पर राजा लखीमपुर की कोठी थी। उसके पास ही राजा मुरसान के समर हाउस के खंडहरों को मैंने अपने बचपन में देखा था। उन दिनों वर्तमान में हल्द्वानी की ओर जाने वाले मोटर मार्ग, जिसे तब ठंडी सड़क कहा जाता था, के ऊपर बने बंगलों को उनके नंबर, जैसे 6 नंबर, 7 नंबर से जाना जाता था। मेरे पास निश्चित रूप से कह सकने का कोई आधार फिलहाल नहीं है पर ऐसा स्वाभाविक रूप से प्रतीत होता है कि कर्नल जोन्स ने ही ये सभी बंगले, जिनकी कुल संख्या संभवतः 22 थी, अपनी एस्टेट में बनवाये होंगे। 20वीं शती के पूर्वार्ध में जब कि चाय की व्यवसायिक खेती की कहानी भीमताल से कमोबेश सिमट चुकी थी, जोन्स और फिर शायद उसके उत्तराधिकारियों ने इन बंगलो और एस्टेट के हिस्सों को बेचना शुरू किया था। सन 40 के दशक में, जब दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हो रहा था, जोन्स एस्टेट के एक बड़े हिस्से को एस्टेट-बंगलो सहित चेकोस्लोवाकिया से आये फ्रेडरिक स्मेटाचेक सीनियर ने खरीद लिया। सन 1901 से 1929 तक नेपाल के प्रधानमंत्री रहे महाराजा चंद्र शमशेर जंगबहादुर राना के पुत्र जरनल मदन शमशेर जंगबहादुर राना और बलरामपुर की रानी ने भी एस्टेट के कुछ हिस्सों को तभी खरीदा था। सन 1951 में राना वंश को मिले परंपरागत प्रधानमंत्री पद, जो कि सन 1846 से लगातार चला आ रहा था, के छिन जाने के बाद राना परिवार स्थायी रूप से भीमताल में ही बस गया। एस्टेट का एक बड़ा हिस्सा और एस्टेट-बंगलो आज भी स्मेटाचेक परिवार के पास है और इस औपनिवेशिक विरासत को उन्होंने बहुत सहेज कर रखा है।
कर्नल जोन्स की मृत्यु संभवतः भीमताल में ही हुई थी। नल दमयंती तालाब के पास स्थित पुराने कब्रिस्तान में बनी जोन्स की कब्र निश्चित ही कर्नल जोन्स की रही होगी। मैं बचपन में प्रायः इस कब्रिस्तान में जाया करता था पर टॉम्बस्टोन पर उकेरे एपिटाफ की इबारत अब मुझे ठीक से याद नहीं है। गुजरे सालों में फिर कभी उस कब्र को देखने का संयोग नहीं हो सका।
जोन्स एस्टेट वाला क्षेत्र अब एक गाँव में तब्दील हो चुका है जिसे जूनस्टेट कहा जाता है। जून कुमाउनीं भाषा में चाँदनी को कहते हैं। आधुनिकता के तीव्र प्रवाह के साथ बेतहाशा भागते भीमताल में एक द्वीप की तरह ठहरे जोन्स एस्टेट के एस्टेट-बंगलो और उसके आसपास जंगल के गहराते धुंधलके में इधर-उधर छिटके चाय के बेतरतीब झाड़, अतीत की ठंडी चाँदनी को आज भी अपने ज़ेहन में समेटे हुए से प्रतीत होते हैं।
19वीं सदी के उत्तरार्ध की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना यहां तालाब के ऊपर एक अर्धचंद्राकार बांध का बनना थी। यहां यह जानना रोचक होगा कि इस बांध के निर्माण से जुड़ी किसी अधिकारिक और विश्वसनीय जानकारी का स्त्रोत, संबंधित विभाग या फिर किसी अन्य सरकारी महकमे के पास कम से कम मेरी जानकारी में उपलब्ध नहीं है। मैंने इस संबंध में हर संभव प्रयास किये। एक दो सेमिनार्स में, जिनमें शीर्ष अधिकारी भी उपस्थित थे, मेरे इस विषय में जानकारी उपलब्ध किये जाने या फिर किसी विश्वसनीय स्रोत का हवाला दिए जाने के अनुरोध का जवाब प्रायः यही रहा था कि -निश्चित रूप से कुछ कहना मुश्किल है।
निश्चित जानकारी के अभाव में पैदा हुए खालीपन का कपोल-कल्पनाओं और यूं ही लगाए गए अनुमानों से भरा जाना एक सामान्य बात है। शायद इसीलिए इस डैम को लेकर भी बहुत सी रोचक कहानियां सुनी-सुनायी जाती हैं, जिनका कोई विश्वसनीय प्रमाण उपलब्ध नहीं है। कहा जाता है कि निर्माण के दौरान यह डैम बार-बार टूट जाता था। फिर कुछ यूं हुआ कि बांध से जुड़े एक अंग्रेज इंजीनियर ने एक स्थानीय किसान को देखा। आलू के खेत में सिंचाई करने लिए वह एक अर्धचंद्राकार मेढ़ बना कर पानी को रोक रहा था। इसे ध्यान से देखने के बाद उस अंग्रेज को विचार आया कि डैम की बाहरी दीवार को यदि अर्धचंद्राकार बना दिया जाए तो पानी का दबाव सतह पर tengentially पड़ कर स्वयं ही चुक जाएगा। यह भी कहा जाता है बांध की बाहरी दीवार को अर्धचंद्राकार बनाने की सलाह एक स्थानीय व्यक्ति द्वारा सीधे ही उस अंग्रेज इंजीनियर को दी गयी थी। एक कहानी यह भी है कि सीमेंट-कंक्रीट के स्थान पर इस बांध के निर्माण में उरद की दाल की पिट्ठी का उपयोग किया गया है। यह कहा जाना कि कई असफल प्रयासों के बाद इस बांध के टिके रहने के लिए नरबलि भी दी गयी थी- इसके अतीत को एक ठंडा रोमांटिक ट्विस्ट भी दे देता है… यह सब बातें कहने-सुनने में अच्छी लगती हैं, चमत्कृत भी करती हैं। यह सुन-सोच कर कभी-कभी गर्व भी किया जा सकता है कि हमारे पूर्वज अपने सहज ज्ञान में अंग्रेजों से बेहतर थे… पर इन सब दावों का कोई प्रमाण फिलहाल मैं नहीं देख या ढूंढ पाया हूँ। ऐसे ही सोशल मीडिया और क्षेत्रीय प्रेस में कुछ लोगों ने पता नहीं कहाँ से इस बांध का एक नाम भी खोज लिया है -‘विक्टोरिया डैम’। इन सब बातों का कोई निश्चित और प्रामाणिक आधार है, ऐसा मुझे नहीं लगता।
बांध बनने से पूर्व तालाब के पानी का स्तर भीमेश्वर महादेव के मंदिर से थोड़ा नीचे था। मंदिर के पास से ही, भीमताल-बाज़ार की दिशा में तालाब के पानी का प्राकृतिक निकास हुआ करता था। वर्तमान डैम पर जल-निकासी के लिए बने फ्लडगेट्स इसी प्राकृतिक निकास के ऊपर बने हैं।
वर्ष 1878 में हेस्टिंग्स निर्वाचन क्षेत्र से हाउस आफ़ कॉमन्स के सदस्य रहे फ्रेडरिक नार्थ की पुत्री मैरीएन नार्थ भीमताल आयी थी। उसने भीमेश्वर महादेव के मंदिर की एक आयल पेंटिंग बनायी थी जो कीव गार्डन्स की मैरीएन गैलरी में रखी है। इस पेंटिंग से तालाब के तत्कालीन जलस्तर और पानी की प्राकृतिक निकासी का सही अनुमान लगाया जा सकता है। सैमुअल बॉर्न और जॉन एडवर्ड सैचे द्वारा खींचे गए भीमताल के कुछ पुराने चित्रों में भी इसे देखा जा सकता है। तालाब के पानी के प्राकृतिक निकास द्वार, जहां अब डैम के फ्लडगेट्स बने हैं, से ले कर झील के मध्य में बने टापू, जिसे कुछ दशक पूर्व तक टिपड़ी या टिबड़ी कहा जाता था, तक का हिस्सा पहले सूखा हुआ करता था। टिपड़ी उस समय एक टीलेनुमा संरचना थी जिसमें शिव-मंदिर से जुड़ा समाज-विशेष अपने मृत परिजनों को समाधिस्थ किया करता था। टापू से लेकर वर्तमान प्राइमरी स्कूल के मध्य के विस्तृत भूभाग में धान की खेती हुआ करती थी तब। पुराने लैंड रिकार्ड्स इस तथ्य को पुष्ट करते हैं। लगभग एक-डेढ़ दशक पूर्व तक- जब कि इस तालाब के पानी को मई-जून के महीने में हल्द्वानी की ओर बहा देने की परंपरा 19वीं सदी के एक शासनादेश के अनुपालन में निर्बाध रूप से जारी थी- तालाब अपने पुराने स्वरूप में आ जाया करता था। टापू के लिए तब पैदल रास्ता बन जाता था। 70-80 के दशक में तो पानी की निकासी के दौरान उभरे इस मैदान में एक दो वर्ष तक हरेले के मेले का भी आयोजन किया गया था।
इस बांध को बनाने का विचार कुमाऊं (जिसमें तब गढ़वाल भी शामिल था।) के कमिश्नर सर हैनरी रैमजे को आया था। 1856 में कुमाऊं का कमिश्नर बनाये जाने से पूर्व वह नेपाल में ईस्ट इंडिया कंपनी का रेजिडेंट रह चुका था और पहाड़ की संस्कृति, समाज के साथ साथ यहां की जरूरतों की भी उसे अच्छी समझ थी। उसने तराई-भावर क्षेत्र में निहित खेती और व्यापार की संभावनाओं को पहचान कर, इस क्षेत्र में नहरों का जाल बिछाने की योजना इस उद्देश्य से बनायी कि सिंचित क्षेत्र को बढ़ाया जा सके। इसी क्रम में उसने भीमताल से हल्द्वानी की ओर निरंतर बह रहे पानी को रोक कर नियंत्रित करने की योजना के तहत 1850 के दशक के अंतिम वर्षों में तालाब पर एक मिट्टी के डैम (earthen dam) का निर्माण करवाया। यह डैम जल्दी ही टूट गया। 1870 के दशक में उसने इस प्रयास को दोहराया। यह भी एक अर्दन डैम ही था। अगस्त 1882 में हुई तेज बरसात में इसकी पतली कर्टेन वाल्स टूट गयीं और यह डैम भी बह गया।
विषयांतर के बावजूद यहां पर एक रोचक तथ्य का जिक्र करना मैं जरूरी समझता हूं। रानीबाग़ के चित्रशिला श्मशान में रेत के अंदर गहरा धंसा एक विशाल शिलाखंड है जिसमें कई रंगीन पत्थर जड़े हुए से लगते हैं। इसे ‘जिया रानी’, जो कि 13वीं शती में परिवर्ती कत्यूर राजवंश की एक रानी थीं, का घाघरा माना जाता है। बहुत संभव है कि यह शिलाखंड उन दो बांधों में से किसी एक की कर्टेन वाल का हिस्सा हो जो निर्माण के कुछ समय बाद ही बह गए थे। यह मात्र एक संभावना है और इसका कोई निश्चित आधार या प्रमाण मेरे पास उपलब्ध नहीं है। खैर… वापस मूल विषय पर लौटते हैं।
इस डैम के बारे में विस्तृत जानकारी मुझे ग्रेटर लंदन निवासी माइक क्रीम्स (Mike Chrimes) के एक शोध पत्र -‘आ फॉरगॉटन चैप्टर इन डैम हिस्ट्री: मैंसनरी डैम इन ब्रिटिश इंडिया इन 19th सेंचुरी’ से मिली थी। माइक सिविल इंजीनियरिंग के इतिहास के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त एक विद्वान हैं। यह पत्र उन्होंने ‘थर्ड इंटरनेशनल कांग्रेस ऑन द कंस्ट्रक्शन हिस्ट्री’ -जो कि 20-24 मई 2009 को जर्मनी के कुटबुस शहर में स्थित ब्रैंडनबर्ग यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी में आयोजित की गयी थी -में पढ़ा था।
अगस्त 1882 में भीमताल में बने दूसरे अर्दन डैम के बह जाने के तुरंत बाद ही रैमजे ने एक नए डैम की योजना बनानी शुरू कर दी थी। महाराष्ट्र में बहने वाली मुथा नदी पर वर्ष 1879 में रेंकिंन मानक (Rankine’s criteria), जिसे सुरक्षित डैम डिज़ाइनिंग के लिये प्रयोग किया जाता है, पर आधारित खड़गवासला डैम का निर्माण सफलतापूर्वक कर लिया गया था। 19वीं शताब्दि में इस मानक पर बनने वाला यह भारत का पहला डैम था। स्वाभाविक है रैमजे ने इसके बारे में अवश्य सुना होगा। 150 एकड़ में फैली भीमताल झील पर बनने वाला 500 फिट लंबा, 45 फिट ऊंचा और 30 फिट चौड़ा बांध इस मानक पर बनने वाला दूसरा बांध था। विशाल विंग्स वाले इस डैम का डिज़ाइन फ्रांसिस हैनरी एशहर्स्ट नाम के इंजीनियर ने बनाया था। इसका कांट्रेक्ट कर्नल मायने आर.ई. चीफ इंजीनियर नार्थ वैस्ट प्रॉविंस ने तैयार किया था और इसमें हो रहे काम के निरिक्षण का कार्यभार डोहर्टी नाम के व्यक्ति के पास था।
पुराने अर्दन डैम्स की लीक से हट कर निर्माण के शुरुवाती दौर में यह निश्चय किया गया था कि यह पूरी तरह से एक कंक्रीट डैम होगा। पर बाद में मात्र इसके कोर-क्षेत्र को कंक्रीट से बनाया जाना तय हुआ। सामने की क्षैतिज संरचना और बाहर की दीवारों को पत्थर की चिनाई, जिसे रबल मैसनरी कहते हैं, से बनाया गया।
डैम का कार्य 1884-85 में पूरा हुआ था। जब गर्मियों के मौसम में इसके फ्लडगेट्स खोल दिये जाते थे तब पानी कम हो जाने पर बांध के पास इसके निर्माण के दौरान कंक्रीट बनाने के लिए तैयार किये गए पिट्स की दीवारें स्पष्ट दीखा करती थीं। यहां पर विलो के कुछ पुराने पेड़ों के खूँट भी थे जिन्हें बांध के निर्माण के दौरान काटा गया होगा।
बांध के निर्माण से जुड़ी एक दिलचस्प शख्सियत, जिनका नाम जूणा गिरी था, का उलेख किया जाना भी रोचक होगा। ये बांध के निर्माण-कार्य से जुड़े एक ठेकेदार थे, जिन्होंने अच्छा लाभ कमाया था। अर्जित पैसे का एक बड़ा हिस्सा इन्होंने अपने शौकों के चलते बहुत जल्दी ही गवां भी दिया। इस आशंका से कि डैम का निर्माण कार्य पूरा होने पर तालाब से निकलने वाले पानी का बहाव पूरी तरह बंद हो जायेगा और पनचक्कियां थम जाएंगी- कुछ लोगों ने जूणा गिरी जी से कुछ रास्ता निकालने का अनुरोध किया। कहा जाता है कि उन्होंने डैम की कर्टेन वाल में कुछ छेद जानबूझ कर छोड़ दिये ताकि फ्लडगेट्स के बंद होने के बावजूद भी चक्कियों को चलाने लायक पर्याप्त पानी बहता रहे। अब जब कि कर्टेन वाल्स बहुत कमजोर हो चुकी हैं, पानी का बहाव और तेज हो गया है। भीमेश्वर मंदिर में शिव-शक्ति के दाहिने ओर पड़ा पत्थरों का एक बेतरतीब सा ढेर वास्तव में इन्ही जूणा गिरी की समाधि है। यह बात मुझे बचपन में इस क्षेत्र के मूर्धन्य पंडित स्व. बुद्धिबल्लभ शास्त्री जी ने, जो कि प. मदनमोहन मालवीय जी के मित्र थे, बतायी थी।
अपनी सौ वर्ष की अपेक्षित उम्र को पूरा कर चुका यह डैम; एक दशक बाद आधी शती का सफर और पूरा कर लेगा। बूढ़ा हो चुका है अब भीमताल को उसकी एक आकर्षक पहचान देने वाला यह बांध। इससे कुछ ही वर्ष पूर्व बने खड़गवासला डैम का पुनर्निर्माण बहुत पहले ही हो चुका है, पर इसके पुनरुद्धार की पहल अभी बाकी है। न जाने कितनी पीढियां इसके ऊपर से गुजर कर उस पार जा चुकी होंगी। मुझे प्रायः लगता है कि पत्थरों से बनी एक निर्जीव संरचना होने के बावज़ूद शायद ढेर सारी यादों को अपने अंतर्मन में छुपाया होगा इसने, बग़ैर किसी के साथ साझा किए। फूचिक ने फांसी पर चढ़ने के मात्र एक दिन पहले पूरी की गयी अपनी आत्मकथा में कहीं लिखा था- संसार के इस नाटक में कोई दर्शक नहीं होता, हर कोई बस अपने चरित्र को जी रहा होता है … कितना सच कहा था उसने…
समय की रेत पर पड़े कुछ निशान अपनी तमाम अहमियत के बावज़ूद कभी-कभी अनदेखे रह जाते हैं। कुछ ऐसा ही हुआ है स्वामी विवेकानंद के द्वारा भीमताल में बितायी गयी एक रात के साथ। स्वामी विवेकानंद द्वारा कुमाऊं की यात्रा तीन बार की गयी थी। 31 मार्च 1988 के Hindustan Times में मैंने एक विस्तृत लेख इस संदर्भ में The Saint in Seclusion शीर्षक से लिखा था। इन तीनों यात्राओं में स्वामी जी का प्रमुख गंतव्य अल्मोड़ा रहा था। स्पष्ट है ट्रैन से काठगोदाम तक पहुंचने के बाद अल्मोड़ा के लिए वे भीमताल होते हुए ही गए होंगे। इनके भीमताल में हुए लघु-प्रवास का ब्यौरा इनकी आयरिश शिष्या सिस्टर निवेदिता (Margaret Elizabeth Noble) द्वारा लिखी गयी एक पतली सी क़िताब Notes of Some Wandering with the Swami Vivekanand से मिलता है। अल्मोड़ा से काठगोदाम की ओर वापस लौटते हुए स्वामी जी अपनी ढाई दिन की पैदल यात्रा के दौरान 11 जून 1898 को दोपहर के वक्त यहां पहुंचे थे, अपने शिष्यों के साथ। सिस्टर निवेदिता ने उस होटल का नाम तो नहीं लिखा है जहां वे सभी ठहरे थे, पर उनके द्वारा दिये गए विवरण से यह लगता है कि तल्लीताल से वर्तमान डाइट (डिस्ट्रिक्ट इंस्टिट्यूट ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग) की ओर जाने वाले रास्ते में स्थित पार्क होटल ही उनका ठिकाना रहा होगा। सत्तर के दशक के शुरुवाती दौर तक इस खूबसूरत होटल के खंडहर वहां विद्यमान थे। यहां प्रवास के दौरान स्वामीजी ने रुद्रपाठ का भावार्थ किया था। संभव है वह पास ही स्थित भीमेश्वर महादेव के मंदिर से परिचित रहे हों। सिस्टर निवेदिता ने शाम के वक्त सूरदास के भजन ‘प्रभुजी मोरे अवगुण चित न धरो’ के गायन का भी उलेख किया है।
19 वीं सदी से बीसवीं सदी में आना भीमताल के लिए संक्रमण का एक महत्वपूर्ण काल था। भवाली, रामगढ़, नैनीताल, रानीखेत, अल्मोड़ा और सुदूर पहाड़ी बसाहटों के लिए मार्ग भीमताल से ही हो कर जाता था। सन 1884 में यहां बन चुके डाक बंगले का उल्लेख करते हुए एच. आर. नेविल ने लिखा है कि यहां लोगों का आना-जाना प्रायः लगा ही रहता था। मुक्तेश्वर के निःसंतान ठेकेदार श्री बच्ची गौड़ द्वारा बनवायी गयीं दो धर्मशालाएं भी यहां क्रमशः वर्तमान नैनीताल बैंक और भीमेश्वर मंदिर के पास बने प्राइमरी स्कूल वाली जगहों पर हुआ करती थीं। ठंडी सड़क, जो अब हल्द्वानी के ओर जाने वाला मोटर मार्ग है, के ऊपर लेक व्यू नाम का एक बड़ा होटल ब्रिटिश मूल के लोगों के लिए था। (1942 के आंदोलन में इसे विद्रोहियों द्वारा जला दिया गया था।) 1857 में अंग्रेजों द्वारा भीमताल की झील में गोल्डन महाशीर मछली डाले जाने के बाद, 20वीं शताब्दी के शुरुवाती सालों में यहां मछली के शिकार का प्रचलन बहुत बढ़ गया था। जिला प्रशासन का इस पर पूरा नियंत्रण था तथा शिकार के लिए लाइसेंस असिस्टेंट कमिश्नर द्वारा दिया जाता था। यात्रियों की बढ़ती संख्या के साथ ही तल्लीताल बाजार में ठेकेदारों द्वारा कुली उपलब्ध कराने का प्रचलन शुरू हुआ। वर्ष 1901 में भीमताल के आसपास के गाँवों में कुली-उतार और बरदाइश प्रथा (ग्रामीणों से अंग्रेजी हुक्मरानों के लिए बेगारी करवाना) के स्थान पर एक विशेष कर (टैक्स) लगाया गया था। उल्लेखनीय है कि ग्रामीणों से बेगारी करवाना उस समय कुमाऊं में आम था और इसके विरुद्ध एक निर्णायक जन आंदोलन 1921 में हुआ था। भीमताल में क्योँ 1901 में ही इस प्रथा के स्थान पर टैक्स की व्यवस्था की गयी थी, यह संभवतः शोध का विषय हो सकता है। संभव है यहां इस प्रथा का मुखर विरोध बागेश्वर में हुए कुली उतार आंदोलन से पहले ही शुरू हो गया हो।
भीमताल में तब तीव्रता से हो रहे बदलावों का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि 20वीं सदी के दूसरे दशक में ही यहां नोटिफिएड एरिया कमेटी गठित कर ली गयी थी। तब भवाली भी भीमताल नोटिफाइड एरिया के अंतर्गत था। उन दिनों तालाब के किनारे विक्टोरियन शैली के लैंप जला करते थे। टेढ़ा हो चुका तब का एक लैम्पपोस्ट हल्द्वानी जाने वाली सड़क पर बने पुल के पास, इस रोड के बनने से पहले तक हुआ करता था। काशीपुर के एक लंगड़े व्यक्ति के पास लैंप जलाने का ठेका था। शाम के वक्त जब वह भागते हुए लैंप जलाया करता था तो स्थानीय बच्चों का एक हूजूम कौतूहल से उसके पीछे दौड़ा करता था। पांडेगांव निवासी स्व.गोपाल दत्त पांडे जी, जो वेटनरी अस्पताल में कंपाउंडर थे, काशीपुर के उस ठेकेदार के बारे में बताया करते थे। सन 1918 में यह नोटिफाइड एरिया कमेटी आपसी विवादों के चलते भंग कर दी गयी। वर्तमान बस स्टैंड उस वक्त घोड़ा स्टैंड हुआ करता था और बाज़ार (डाँठ) की मुख्य इमारत की ऊपरी मंजिल के बरामदे में शाम के वक्त एक गोवानीज़ बैंड अपनी नियमित प्रस्तुति दिया करता था।
वर्ष 1906 की ही एक अन्य महत्वपूर्ण घटना, शिलौटी के प्रसिद्ध विद्वान स्व.रामदत्त ज्योतिर्विद द्वारा रामलीला नाटक का लिखा जाना था। इसी वर्ष उन्होंने भीमताल की पहली रामलीला कमेटी का गठन किया था। (उनके परिवार में पीढ़ियों से बन रहे गणेश मार्तण्ड पंचांग का प्रकाशन भी तभी प्रारंभ हुआ था।) इससे पूर्व कुमाऊं में वर्ष 1860 में अल्मोड़ा के डिप्टी कलेक्टर रहे देवीदत्त जोशी जी द्वारा, जो स्वयं संगीत के मर्मज्ञ थे, रामलीला का लोक-मंचन करवाया जाता था। पारसी थिएटर की शैली से प्रभावित और शास्त्रीय संगीत की विभिन्न राग-रागिनियों में निबद्ध गेय-पदों वाले संवादों में रचा रामदत्त ज्योतिर्विद जी का रामलीला नाटक आज भी कुमाऊं की एक अति विशिष्ट लोक-सांस्कृतिक परंपरा है, जिसका संज्ञान यूनेस्को द्वारा भी लिया गया है। श्री अनवर खां साहब, जो भीमताल के एक अत्यंत प्रतिष्ठित व्यक्ति थे लगभग आजन्म यहां की रामलीला कमेटी के अध्यक्ष रहे। मुझे उनकी धुंधली सी यादें हैं। हम लोग उन्हें दादाजी कहा करते थे।
भीमताल में बोअर युद्ध के कैदियों के लिए अंग्रेजों द्वारा प्रिजनर्स कैम्प भी इसी दौर में बनाया गया था। द्वितीय बोअर युद्ध 1899 से 1902 के बीच अंग्रेजों और दक्षिण अफ्रीका के बोअर समुदाय- जो मूलतः सन 1652 में ‘केप ऑफ गुड होप’ में बस गए डच, जर्मन और फ़्रांसिसी मूल के सैटलर्स के वंशज थे -के मध्य लड़ा गया था। इस युद्ध के दौरान बंदी बनाए गए 25,000 सैनिकों को दूरस्थ अंचलों में टेंट कॉलोनी बना कर रखा गया था, ताकि किसी तरह से भाग निकलने पर भी इनकी पुनः युद्ध में शामिल हो सकने की कोई संभावना ही न बचे। अहमदनगर, बिलारी, त्रिचनापल्ली इत्यादि जगहों के अलावा भीमताल में मल्लीताल के आणू के मैदान पर, जहां अब विकास-भवन इत्यादि इमारतें बनी हैं, तब बनी टेंट कॉलोनी एक ऐसा ही कैम्प था। बोअर युद्ध की शुरुवात से लेकर 1 दिसंबर 1902 तक यह कैम्प यहां रहा था। तीन कैदियों की मृत्यु भी हुई थी यहां, जिनकी कब्रें पाइंस स्थित क्रिश्चन सिमेट्री में हैं। हिंदी पत्रिका ‘अहा ज़िन्दगी’ के फरवरी 2016 के अंक में प्रकाशित मेरे एक लेख (‘वक्त के पथराये गाल और आंसू की बूंदें’) में इसकी विस्तृत जानकारी है।
इस कैम्प का प्रमुख उत्तरदायित्व मेजर ए. डी जी हाडौ और टी सी बी हॉलैंड के पास था। सेकंड लेफ्टिनेंट बी एच् हॉल, एल लोवेट तथा यॉर्कशायर रेजिमेंट के कुछ अन्य अफसर इनके सहायक थे। नैनीताल स्थित लॉरी एंड कंपनी द्वारा इस कैम्प की एक तस्वीर भी ली गयी थी।
इन युद्ध बंदियों द्वारा भीमताल और भवाली में सार्वजनिक तथा उस दौर में प्रभावशाली रहे परिवारों की व्यक्तिगत परिसंपत्तियों को विकसित करवाया गया था। नौकुचियाताल स्थित कर्नल शार्प की एस्टेट और एस्टेट बंगलौ को -जिसे बाद में मन्स (Manse) नाम दिया गया था, और जो अब ‘परिचय’ के नाम से जाना जाता है- में भी इन कैदियों द्वारा बेगारी की गयी थी। कर्नल शार्प मेरे दादाजी स्व. लीलाधर पन्त जी का घनिष्ठ मित्र था। बोअर वार प्रिजनर्स कैम्प से मेरे दादा जी भी जुड़े हुए थे। संभवतः दैनिक संसाधनों की आपूर्ति का काम था उनके पास। उन दिनों हमारा भीमताल स्थित घर और बाग़ीचा (बद्री भवन) भी निर्माणाधीन था। बोअर कैदियों द्वारा यहां भी ज़मीन को समतल करने का काम किया गया था।
कर्नल शार्प और उसके एस्टेट बंगलो ‘मन्स’ की कहानी भी दिलचस्प है। शार्प पहाड़ी खाने, विशेषकर ‘सिंगल’ खाने का बहुत शौकीन था। अपने लिए पीने का पानी भी वह हमारे बाग़ीचे में स्थित एक जल-स्त्रोत से मंगवाया करता था। उसकी एस्टेट कर्नल ग्राहम, प्रसिद्ध राजनेता स्व. गोविंद बल्लभ पन्त तथा फिर चालिस के दशक के शुरुवाती सालों में चैकोस्लोवाक्या से आये स्मेटाचेक परिवार के पास भी रही। एक कैनेडियन म्यूजिक स्कूल भी रहा था इसमें, जहां ध्रुपद शैली के प्रसिद्ध गायक चंद्रशेखर पन्त जी भी आया करते थे। स्मेटाचेक परिवार के बाद यह एस्टेट नेपाल के राणा परिवार के पास रही। 80 के दशक में इस एस्टेट बंगलो को अपट्रान इंडिया की एक सब्सिडरी यूनिट ने खरीदा। उन दिनों मैं इसी यूनिट में कार्यरत था और इस बंगलो के मूल स्वरूप को छेड़े बिना इसके जीर्णोद्धार की पूरी जिम्मेदारी मुझे दी गयी थी। इसके इतिहास को टटोलने के क्रम में यह जानकारी उन्हीं दिनों जुटाई थी।
पंजाब के जींध रियासत के राजा ने 1922 के आसपास अपना ग्रीष्म कालीन महल यहां बनवाया था। महल से जुड़ी एक खूबसूरत इमारत को, जो कभी एक ब्रिटिश महिला की टूरिस्ट लॉज हुआ करती थी, उन्होंने अपने निवास के लिए खरीद लिया था। रोज़री नाम दिया गया था उसे। राजा कुत्तों के बहुत शौकीन थे और उनके ग्रीष्म कालीन प्रवास के समय काठगोदाम से उनके कुत्ते पालकियों में भीमताल आया करते थे। स्थानीय समाज में राजा की पहचान ‘कुकुरी राज’ के नाम से थी। जींध के राजा की गाड़ियां तत्कालीन समाज के लिए कौतूहल का विषय थीं। इनमें दोनों ओर स्टीयरिंग व्हील्स हुआ करते थे ताकि पहाड़ की पतली सड़को में इन्हें मोड़ने में दिक्कत न हो। मल्लीताल से बिनायक जाने वाली सड़क को राजा ने इन गाड़ियों के लिए सीमेंट से पक्का करवाया था। तीस के दशक में राजा द्वारा भीमेश्वर महादेव के मंदिर का जीर्णोद्धार भी करवाया गया था।
प्रसिद्ध शिकारी और लेखक जिम कॉर्बेट का भीमताल से संबंध भी पिछली शती के शुरुवाती सालों में ही जुड़ा था। बोअर युद्ध के दौरान जिम 23-24 साल का रहा होगा। उसने वॉर कमीशन लेने की असफल कोशिश की थी। उन दिनों वह बंगाल एन्ड नार्थ-वेस्टर्न रेलवेज (बीएनडब्लूआर) के लिए काम करते हुए बिहार के मोकामा-घाट पर कार्यरत था। मोकामा-घाट में अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पण के बावजूद उसका नैनीताल आना-जाना जारी था। इन्ही दिनों उसके छोटे 22 वर्षीय भाई आर्ची की अचानक ही मृत्यु हो गयी, जिसके चलते जिम को अस्थाई रूप से नैनीताल आना पड़ा। पूर्व में मैने अपने दादाजी के बोअर वॉर कैम्प से जुड़े होने की बात कही थी। जिम भी इस बीच एक सप्लायर या फिर ऐसे ही किसी रूप में वॉर कैम्प से जुड़ा रहा था। अपने दादाजी की एक पुरानी डायरी में मुझे इस बात के संकेत मिले थे। एक स्पष्ट सी तस्वीर उन अनौपचारिक संकेतों से बना पाना कठिन है। जिम के किसी भी बायोग्राफर ने उसके बोअर वॉर कैम्प से जुड़े होने की बात नहीं कही है। पर यह एक स्थापित सत्य है कि मोकामा-घाट में अपने काम को जारी रखते हुए उसने नैनीताल और उसके आसपास के क्षेत्रों में अपने लिए कारोबारी ज़मीन तलाशनी शुरू कर दी थी। उल्लेखनीय है कि अपनी विधवा माँ और दो अविवाहित बहिनों की ज़िम्मेदारी अब पूरी तरह से जिम पर थी और रेलवे की नौकरी मात्र से वह इसका निर्वाह नहीं कर सकता था।
1906 में उसने नैनीताल के एक प्रमुख निःसंतान व्यवसायी फ्रेडरिक एडवर्ड जॉर्ज मैथ्यूज की विधवा से उसकी कंपनी एफ. ई. जी. मैथ्यूज़ खरीद ली। मैथ्यूज का नैनीताल में एक बड़ा हार्डवेयर स्टोर हुआ करता था और वह स्वयं एक हाउस एजेंट था। यहां यह बताना विषयांतर नहीं होगा कि फ्रेडरिक मैथ्यूज द्वारा ही नैनीताल की अपर मालरोड में हिंदुस्तानियों के चलने के अधिकार की बहाली की लड़ाई लड़ी गयी थी।
कॉर्बेट ने इन्हीं दिनों भीमताल में तल्लीताल जाने वाली सड़क के ऊपर एक एस्टेट खरीद कर गरनी लॉज के नाम से एक फिशिंग लॉज बनवाया था। मेरे बचपन के मित्र श्री विनोद गुणवंत जी के पिताजी स्व. श्री अम्बादत्त गुणवंत जी ने, जिन्हें मैं ताऊजी कहता था, इस बंगले की मूल रजिस्ट्री मुझे 80 के दशक में कभी दिखायी थी। जहां तक मुझे याद है यह फिशिंग लॉज कॉर्बेट ने अपनी बहिन मैगी (मार्गरेट विन्फ्रेड कॉर्बेट) के नाम से लिया था। इस रजिस्ट्री के चित्र मेरे तस्वीरों के संग्रह में आज भी कहीं होंगे। तब यह बंगलो एक लंबे अरसे से गुणवंत परिवार के पास हुआ करता था। स्थानीय समाज में इसका नाम गनी-लॉज प्रचिलित था। जिम के पहले जीवनीकार और किसी ज़माने में हिंदुस्तान टाइम्स के स्तंभ रहे प्रसिद्ध लेखक स्व. डी सी काला जी ने मुझे बताया था कि जिम स्वयं इस बंगले में कभी नहीं रहा। संयुक्त प्रांत के गवर्नर रहे मेलकॉम हैले के साथ मछली के शिकार के लिए की गयी भीमताल की अनेक यात्राओं के दौरान भी वह डाकबंगले में ही रुकना पसंद करता था। इस फिशिंग लॉज की देखरेख श्री खीम सिंह नाम के एक व्यक्ति द्वारा की जाती थी जो पूर्व में नैनीताल यॉट क्लब में कार्यरत थे। खीमसिंह जी कार्बेट के बचपन के मित्र थे और कॉर्बेट को उन दिनों तालाब से छोटी-छोटी मछलियां पकड़ने के लिए ज़रूरी सामान मुहैया करवाने के अलावा उसके साथ खाने-पीने की चीजें भी साझा किया करते थे। डी सी कालाजी ने सत्तर के दशक में खीम सिंह जी के पुत्र श्री चतुर सिंह जी से भीमताल में हुई एक मुलाकात का रोचक ज़िक्र अपनी किताब में किया है।
किरायेदारों से लगातार होते रहने वाले विवादों के चलते कार्बेट ने इस फिशिंग लॉज को बेच दिया था। पर भीमताल से कॉर्बेट के संबंधों में पूर्णविराम लगना अभी शेष था। प्रथम विश्वयुद्ध की शुरुवात के दौरान कॉर्बेट को कैप्टन का पद (वॉर कमीशन) दिया गया, इस ज़िम्मेदारी के साथ कि वह फ्रांस, बेल्जियम और अन्य यूरोपीय देशों के लिए लेबर कोर का गठन करेगा। जिम की फौज को 70th कुमाऊं कंपनी कहा गया। इस कंपनी के लिए जिम ने भीमताल, नैनीताल, अल्मोड़ा इत्यादि के गांवों में घर-घर जा कर 500 सैनिकों की भर्ती की थी। भीमताल के गांवों से भी बहुत से लोग उसके साथ फ़्लैंडर्स, बेल्जियम तथा बाद में वज़ीरिस्तान के युद्ध के लिए गए थे। भीमताल के भाँकर गांव के निवासी स्व. मनोरथ सुयाल जी, जो कभी कॉर्बेट के सैनिक रहे थे, से मैंने इस लड़ाई के बहुत से वाकये सुने थे। उस समय उनकी उम्र 90-92 वर्ष की रही होगी, पर ‘सन 14’ की ‘कारपेट’ साहब के साथ लड़ी गयी लड़ाई के किस्से वह बहुत उत्साह से सुनाया करते थे। अंग्रेजी पत्रिका Governance Now के अक्टूबर 2014 के अंक में छपा मेरा एक विस्तृत लेख Of the forgotten soldiers of Corbett’s 70th Kumaon Company इस विषय पर विस्तृत जानकारी देता है।
द्वितीय विश्वयुद्ध में जिम को लेफ्टिनेंट कर्नल का पद दे कर सिविल पायनियर फ़ोर्स के गठन का उत्तरदायित्व दिया गया। स्वयं मेरे पिताजी (स्व. चंद्र दत्त पन्त) इस फ़ोर्स का हिस्सा रहे थे। कॉर्बेट, जो कि मेरे दादा जी का अच्छा मित्र था तथा प्रायः भीमताल स्थित हमारे घर पर आया करता था, ने स्वयं दादा जी से पिताजी को, जो तब 18-19 वर्ष के रहे होंगे, इस फ़ोर्स में भर्ती करने का आग्रह इस आश्वासन के साथ किया था कि 20-21 वर्ष की आयु पूरी करने पर वह उन्हें कमीशन दिला देगा। साप्ताहिक हिंदुस्तान में (17-23 नवंबर, 1991) कॉर्बेट के ऊपर छपे अपने एक लेख में उन्होंने इस घटनाक्रम की विस्तृत चर्चा की है। पायनियर फ़ोर्स के शुरुवाती दिनों में मेरे दादा कॉर्बेट के सहायक रहे थे। भीमताल में तब बहुत से युवाओं ने पायनियर फ़ोर्स को जॉइन किया था। इसका आफिस तब जींध-एस्टेट में, जहां अब एस.ओ. एस. का परिसर है, कहीं हुआ करता था। पिताजी ने इस लेख में अल्मोड़ा से आयी एक महिला, जो कॉर्बेट को भीमेश्वर मंदिर के पास इंतज़ार करते हुए मिली थी, के साथ हुए उसके वार्तालाप और उसके आग्रह पर उसके बेटे को अत्यंत कठोर नियमों के बावजूद तत्काल डिस्चार्ज देने संबंधी एक अत्यंत रोचक घटना का जिक्र किया है। तल्लीताल अस्पताल से गायब हुए पायनियर फ़ोर्स के एक बीमार सिपाही के शव के तालाब के किनारे मिलने पर, कॉर्बेट द्वारा यह कहते हुए डॉक्टर को तत्काल बर्खास्त कर देने -कि तुम्हारी लापरवाही ने मेरे एक बच्चे को मार दिया है, -का भी एक वाक़या उस लेख में है। पायनियर फ़ोर्स का मुख्यालय बाद में बरेली के पास इज़्ज़त नगर स्थानांतरित हो गया था। सिविल पायनियर फ़ोर्स कॉर्बेट की भीमताल से जुड़ी कहानी का आख़िरी पन्ना है। दिसंबर 1947 में वह हमेशा के लिए केन्या चला गया था।
प्रसिद्ध हिंदी लेखक सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन ‘अज्ञेय’ भी भीमताल में 1942-43 के आसपास अपनी एक महिला मित्र के साथ ठहरे थे। उनके उस समय लिखे गए पत्रों में भीमताल का व्यापक उल्लेख मिलता है। उनके जीवनीकार अक्षय मुकुल (Writer, Rebel, Soldier, Lover -The many lives of Agyeya) ने भीमताल में उनके द्वारा ज़मीन खरीदे जाने का भी उल्लेख किया है। अज्ञेय द्वारा अपने प्रसिद्ध रोमांटिक उपन्यास ‘नदी के द्वीप’ का एक बड़ा हिस्सा भीमताल में ही लिखा गया था।
द्वितीय विश्वयुद्ध से कुछ पहले ही भीमताल की एक गायिका, जो मल्लीताल-बाज़ार के ऊपर कहीं रहा करती थी अपनी एक विशेष पहचान बना चुकी थी। चंदाबाई नाम था उसका। उसके गीतों के रिकार्ड्स उस वक्त एच.एम.वी. ने बनाये थे। जींध एस्टेट में कैम्प करने वाले यूरोपीय और ऑस्ट्रेलियन सैनिक, जिन्हें तब गोरा या टॉमी कहा जाता था, चंदाबाई के बड़े प्रशंसक हुआ करते थे। बहुत ढूंढ-खोज के बाद मैंने 90 के दशक में कभी उससे मुलाकात की थी। उस वक्त वह भीमताल छोड़ कर कहीं और बस गयी थी। बेतरतीब झुर्रियों से ढका उसका चेहरा, अतीत की न जाने कितनी यादों को ढो रहा था तब भी। उसके संकोच और संशयों के चलते मैंने उससे विदा लेने के बाद बहुत दूर से टैलीलेंस की मदद से उसका एक पोट्रेट लिया था। बाद में वह एक लेख के साथ सप्ताहिक हिंदुस्तान और हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित हुआ था।
भविष्य वर्तमान बन कर हमेशा से ही अतीत के कुहासे में खो जाने के लिए अभिशप्त रहा है। भीमताल की यह कथा यात्रा इसी व्यतीत की एक पड़ताल भर है। पिछली पीढ़ियों से जो कुछ सुना था, कुरेद-कुरेद कर पूछा था कभी, या फिर पढ़ा था इधर-उधर, उन्ही सूत्रों को जोड़ कर 6 किस्तों में समेटी इस क़िस्सागोई का ताना-बाना बुना है। अतीत से निकल कर वर्तमान में कदम रखना किसी पुराने विक्टोरियन पब की बोहिमियन फिज़ा से बाहर आने पर अचानक ही फ्लड लाइट्स की चकाचौंध से सराबोर किसी डिस्कोथीक में ज़बरन धकियाये जाने जैसा है। चुंधियाती हैं आँखे, और संयत होने में कुछ वक्त लगता है।
भीमताल के वर्तमान और भविष्य की संभावनाओं पर कभी कुछ ज़रूर लिखुंगा, पर कब ??? कह नहीं सकता….

































