हिमांशु जोशी
उत्तराखंड के पहाड़ों में हर साल एक ऐसी स्मृति गूंजती है, जो न सिर्फ पत्रकारिता की शहादत को सलाम करती है, बल्कि सच की लड़ाई को जिंदा रखने का जज्बा भी जगाती है। इस बार उमेश डोभाल स्मृति समारोह पौड़ी गढ़वाल के सिरोली गाँव में धूमधाम से संपन्न हुआ, जहाँ ग्राउंड लेवल के समाजसेवियों और मीडिया कर्मियों ने अपनी मेहनत का लोहा मनवाया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पुरस्कार किशन चन्द्र जोशी के नाम रहा, तो सोशल मीडिया की दुनिया में प्रेम पंचोली ने बाजी मारी। 1988 में रहस्यमय ढंग से गायब हुए पत्रकार उमेश डोभाल की याद में 1991 से चला आ रहा यह सम्मान, आज भी उस साहसी कलम की गाथा बयां करता है, जिसने माफिया के खिलाफ आवाज उठाई और अपनी जान गंवा दी।
रहस्य का खुलासा: उमेश डोभाल की हत्या के समय क्या घटा था?
उमेश डोभाल के साथी रहे अनूप मिश्र कहते हैं, “शराब या जंगल माफ़िया के ख़िलाफ़ लिखने और बोलने का सीधा अर्थ होता था, अपनी जान जोखिम में डालना। इंटरनेट, मोबाइल, सीसीटीवी, सोशल मीडिया जैसी आधुनिक माध्यम उस दौर में मौजूद नहीं थे, जो अपराधी के दिमाग में डर पैदा करने और उसे सलाखों के पीछे धकेलने में सशक्त हथियार साबित होते।” गढ़वाल कमिश्नरी के मुख्यालय पौड़ी स्थित एक होटल से 25 मार्च 1988 को हुई पत्रकार उमेश डोभाल की गुमशुदगी का मामला तब प्रकाश में आया था, जब अमर उजाला में नियमित रूप भेजे जाने वाले उनके ख़बरों के डिस्पैच कुछ दिनों तक मेरठ नहीं पहुंचे। उमेश जब पौड़ी में मौजूद होते थे, तो उनके ये डिस्पैच पौड़ी से कोटद्वार मुझ तक पहुंचते थे, जो अख़बार की टैक्सी से मेरठ भेज दिए जाते थे। उमेश अक्सर गढ़वाल के दूसरे हिस्सों में भी ख़बरों के सिलसिले में निकल जाया करते थे, इसीलिए शुरू में यही मान लिया गया था कि वो अन्यत्र कहीं चले गए होंगे। उनकी जब कहीं से भी कोई ख़बर नहीं मिली तो सभी की चिंता बढ़ गई। इस बाबत मेरठ से संपादक अतुल माहेश्वरी ने मुझसे संपर्क कर पौड़ी जाकर उनके बारे में पता लगाने को कहा। इसके बाद ही यह बात स्पष्ट हुई कि उमेश डोभाल 25 मार्च को सन-एन-स्नो होटल में रुके थे, तब से उनका कहीं कोई पता नहीं है। पूछताछ के बाद संदेह पुख़्ता होने पर उनकी होटल से गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में दर्ज़ करा दी गई थी। इससे पहले रिपोर्ट दर्ज़ करने में पौड़ी पुलिस कई दिनों तक हीलाहवाली करती रही थी।
धीरे-धीरे जगह-जगह पत्रकार संगठन इस मामले में आंदोलित होने शुरू हो गए और फिर इसका दायरा बढ़ता चला गया। यह आंदोलन राजधानी दिल्ली के बोट क्लब तक जा पहुंचा, जहां आयोजित प्रदर्शन के ज़रिए देशभर से जुटे पत्रकारों ने उमेश डोभाल गुमशुदगी की सीबीआई जांच की मांग को जोरदार ढंग से उठाया।
आख़िरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी जा पहुंचा, इसके बाद ही सीबीआई जांच के आदेश जारी हो पाए। सीबीआई जांच में उमेश डोभाल की गुमशुदगी का सच बदनाम शराब माफ़िया के हाथों हुई हत्या के रूप में सामने आया था। हत्या के षड्यंत्र में मुख्य अभियुक्त समेत कई लोगों की गिरफ्तारियां भी हुईं, सीबीआई कोर्ट में मुकदमा लंबे समय तक चला। पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में न्यायालय द्वारा सभी अभियुक्त दोषमुक्त घोषित कर दिए गए थे।
पत्रकारों के लिए खतरा आज भी बरकरार!” : राजीव लोचन साह
नैनीताल समाचार के सम्पादक राजीव लोचन साह ने मुख्य वक्ता के तौर पर भारत में प्रेस फ्रीडम के बारे में कहा कि साल 1988 में उमेश डोभाल की हत्या हुई थी और आज छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश में पत्रकारों की हत्या में काफी कुछ बदला नहीं है।
15-20 साल पहले देहरादून के टाउनहॉल में नरेंद्र सिंह नेगी का ‘नौछमी नारायण’ बज रहा था तो वहां की बिजली बंद कर दी गई थी। सत्ता हमेशा से अपनी आलोचना नहीं सुनना चाहती, पिछले कुछ सालों से यह चलन बढ़ा है। कुणाल कामरा केस इसका सबसे नया उदाहरण है, उसके खिलाफ रोज़ नए मुकदमें दर्ज हो रहे हैं और तोड़फोड़ करने वालों को कुछ देर ही जेल में बन्द रख कर छोड़ दिया गया था।
राजीव लोचन साह ने आगे कहा कि हम नैनीताल समाचार में ‘सौल कठोल’ नाम से स्तम्भ निकालते थे, उसमें ‘कैसे कैसे मुख्यमंत्री’ नाम से हमने व्यंग्य लिखा, वो खूब चर्चित हुआ, तब उसकी फोटोस्टेट की प्रतियां वितरित की गई।
जब 1977 में नैनीताल समाचार शुरू हुआ तब पत्रकारिता इतनी व्यापक नहीं थी, साप्ताहिक, पाक्षिक अखबार ही आते थे। वही सूचना देते थे, सालों पहले ‘अल्मोड़ा अखबार’ बन्द करने पर वहां की जनता ने पैसा इकट्ठा कर ‘शक्ति’ अखबार निकाला। तिलाड़ी कांड की खबर छापने पर उत्तराखंड के एक सम्पादक जेल चले गए थे पर उन्होंने अपने पत्रकार का नाम नहीं बताया।
सांस्कृतिक प्रयासों को सम्मान, पहाड़ में अनूठा कार्य
समारोह में साहित्यकार महावीर रवांल्टा, कवि हर्ष काफर, कला एवं संस्कृति के रक्षक समीर शुक्ला, पौड़ी के दगड्या ग्रुप और चामी के टीनएजर्स क्लब को भी अलग-अलग श्रेणियों में सम्मानित किया गया। ट्रस्ट द्वारा प्रतिवर्ष प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सोशल मीडिया के युवा पत्रकारों को उनके विगत वर्षों में किये गये कार्यों के आधार पर पुरस्कार दिया जाता है। इसमें 11 हजार रूपये, प्रशस्ति पत्र व अंगवस्त्र भेंट किया जाता है। इस वर्ष इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पुरस्कार न्यूज 18 के किशन जोशी को दिया गया और सोशल मीडिया पुरस्कार प्रेम पंचोली को दिया गया।
दगड्या ग्रुप के फाउंडर आशीष नेगी कहते हैं कि ग्रुप में एकेश्वर गांव के बच्चों के साथ पिछले सात सालों से शिक्षा, संस्कृति पर कार्य किया जाता है। बच्चों के लिए थिएटर, आर्ट क्राफ्ट की 15 वर्कशॉप आयोजित की जा चुकी हैं। वह कहते हैं, “हम इस दूरस्थ क्षेत्र में भी फ़िल्म फेस्टिवल आयोजित कर रहे हैं, इसमें हमने ऑस्कर विनिंग डॉक्यूमेंट्री ‘द एलिफेंट व्हिसपर्स’ के सिनेमेटोग्राफर करन थपलियाल को भी बुलाया था।” वह कहते हैं, “हम कुछ बच्चों की पढ़ाई-लिखाई का पूरा ख़र्च उठा रहे हैं और साथ ही बच्चों के लिए पुस्तकालय भी खोले गए हैं। हाल ही में पौड़ी में एक नया पुस्तकालय खोला गया है। खास बात है, यह कोई एनजीओ नहीं है, यह समाज के लिए बेहतर करने का एक छोटा सा प्रयास है।”
चामी गांव में बच्चों के लिए शिक्षा के साधन आसानी से उपलब्ध न होते देख सरकारी नौकरी से रिटायर अरुण कुकसाल ने ‘चामी टीनएजर्स क्लब’ बनाया। इसमें उनके नौकरी के पुराने साथी उनकी आर्थिक मदद करते हैं। गांव के मिलन केंद्र में चलने वाले क्लब की संरक्षिका गांव की ही रिंकी बिष्ट को बनाया गया है। रिंकी बीकॉम पढ़ी हैं और वह क्लब के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती हैं। रिंकी कहती हैं, “क्लब में बच्चों के लिए कम्प्यूटर, किताबें रखी हैं। बच्चे यहां स्कूल के बाद पढ़ते और खेलते भी हैं।” लगभग 50 बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च अरुण कुकसाल अपने साथियों की मदद से उठाते हैं। होली में इन बच्चों के द्वारा गांव में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया था, जिसमें शामिल होकर गांव के सभी लोग बहुत खुश थे।
महिलाओं और नरेंद्र सिंह नेगी ने समारोह को बनाया यादगार
कार्यक्रम की खास बात सिरोली गांव की महिलाओं की भागीदारी रही। समारोह के जुलूस से लेकर पोस्टर प्रदर्शनी तक हर चरण में उनकी उपस्थिति ने समारोह को विशेष बनाया। गांव की सड़क से समारोह स्थल तक, महिलाओं ने सांस्कृतिक और सामाजिक पहलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।
समारोह के अंत में मशहूर लोक गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने प्रेस की आज़ादी पर अपनी चिंता व्यक्त की और समारोह को अपने मशहूर गीतों से सजाया। उनके स्वरों ने श्रोताओं को झूमने पर मजबूर कर दिया।