इस्लाम हुसैन
कुमाऊँ क्षेत्र में रेलवे विकास की कहानी केवल पटरियों और ट्रेनों की नहीं, बल्कि समय पर लिए गए—और न लिए गए—फ़ैसलों की भी कहानी है। आज जब लालकुआं उत्तर भारत के महत्वपूर्ण जंक्शन के रूप में उभर रहा है, तो यह चर्चा एक बार फिर ज़िंदा होती है कि करीब 40 साल पहले हल्द्वानी में प्रस्तावित “न्यू हल्द्वानी रेलवे स्टेशन” अगर बन गया होता, तो कुमाऊँ का रेल नक्शा कैसा होता।
इमरजेंसी खत्म होने के बाद जनता पार्टी की जूतमपैजार से हुई उसकी हार के बाद सत्ता में कांग्रेस का दौर आया, उस दौर में फिर विकास की बातें होने लगी।
तब कुमाऊं डिवीजन का सबसे बड़ा शहर व्यवसाय का सबसे बड़ा केन्द्र हो चुका था यहां से कृषि और वन-उपज बाहर जाते थे, 1880 बाद काठगोदाम को बरेली होते हुए लखनऊ से जोड़ने वाली रेल को बने हुए 100 साल से ज़्यादा हो चुके थे। जो बढ़ती ज़रूरत पूरी नहीं कर रही थी। ख़ासकर दिल्ली और पश्चिमी भारत बम्बई तक कनेक्टिविटी नहीं थी।
उस समय हल्द्वानी के व्यापारियों को अपना माल बम्बई और पश्चिम भारत की मंडियों में भेजने में परेशानी होती थी। तब यहां के आम लोगों और व्यापारियों ने हल्द्वानी तक बड़ी रेल लाइन बिछाने की मांग की। इस मांग के लिए हल्द्वानी में पहाड़ के फल सब्जी और आलू के व्यापारियों ने भी ज़ोर लगाया।
तब तक नारायण दत्त तिवारी जी उत्तर प्रदेश की राजनीति छोड़कर केन्द्र की राजनीति में शामिल हो चुके थे। और यहां की यह मांग पूरी करने के लिए तिवारी जी ने कोशिश करनी शुरू करदी।
उनकी कोशिशों के बाद रामपुर–काठगोदाम ब्रॉडगेज के विस्तार की योजना बनी थी, तब तकनीकी टीमों ने हल्द्वानी शहर के पश्चिम में—जहाँ अब भी बड़े क्षेत्र में फॉरेस्ट लैंड मौजूद है—एक नया स्टेशन बनाने की संभावना देखी गई थी। और उस स्टेशन को न्यू हल्द्वानी रेलवे स्टेशन नाम प्रस्तावित किया गया था।
हल्द्वानी रूद्रपुर के बीच टांडा के जंगल में रेल लाइन क्रास का सम्भावित स्थल भी चिन्हित किया गया था वहां लम्बे टाइम तक रेलवे का बोर्ड भी लगा रहा था।
यह वही ज़मीन थी जहाँ अपेक्षाकृत सीधी पहुँच, अधिक प्लेटफॉर्म क्षमता और यार्ड विस्तार की पर्याप्त जगह थी। तब यह प्रस्तावित किया गया था कि शहर के बाहर रामपुर रोड में फारेस्ट लैंड पर यह रेलवे स्टेशन बनाया जाए। जहां पर्याप्त जगह मिल सकती थी।
परन्तु—शहरी राजनीतिक दबाव, भूमि-हस्तांतरण की जटिलता, लालकुआं से रेलवे के व्यवसायिक हित (कमाई) और बढ़ते शहर के बीच रेलवे इस विकल्प पर आगे बढ़ नहीं सका। तब ऐसा भी कहा गया था कि सेंचुरी मिल के मालिकों ने अपनी फैक्ट्री के माल आने जाने के लिए इस रेलवे लाइन को लालकुआं होकर बनाने के लिए दबाव बनाए था।
जो भी इससे हल्द्वानी को अपेक्षित आधुनिक स्टेशन नहीं मिला, बल्कि लाइन का संचालन-केंद्र लालकुआं की ओर खिसक गया। जिसमें फारेस्ट लैंड की पेचीदगियां और झंझटें थीं और नई रेल परियोजना के बढ़े हुए खर्चे का सवाल भी था।
नई पीढ़ी के एक्टीविस्ट को बताना चाहूंगा कि
संसद के आधिकारिक अभिलेखों में Rampur → (New) Haldwani ब्रॉड-गेज परियोजना का उल्लेख मिलता है 1990 के पैमाने पर यह प्रोजेक्ट सूचीबद्ध था (परियोजना-लंबाई 87 किमी, अनुमानित लागत ~₹56 करोड़ जैसा संसद सूची-शोध में दर्ज)।
लोकसभा / राजसभा के लिखित प्रश्न-उत्तर में स्पष्ट उल्लेख है कि Rampur→New Haldwani के लिए DPR (Detailed Project Report) की फ़ैसला/अनुरोध की स्थितियाँ (‘DPR furnished / DPR contract’) उठी थीं — यानी 1990-1994 के दौर में आधिकारिक DPR तैयार करवाने/मांगने का रिकॉर्ड संसद में मौजूद है।
संसद-के रिकार्ड (1990) में Rampur–New Haldwani को 87 km का प्रोजेक्ट का ब्योरा है और वहाँ Lalkua/Kathgodam संबंधी gauge-conversion का भी जिक्र है — इससे साफ पता चलता है कि योजना के दो हिस्से थे
1. Rampur → New Haldwani (greenfield/new broad-gauge)
2. Lalkua–Kathgodam के gauge-conversion works।
उस दौर में नारायण दत्त तिवारी जी हर सभा भाषणों में और अखबारों में इसकी चर्चा होती रहती थी। जन चर्चाओं में लोग Rampur से Lal-Kuan/Lalkuan/ Rudrapur/ Bilaspur चर्चा होती रहती थी।
संसद में जिस शब्द का इस्तेमाल हुआ वह था “New Haldwani” (नया हल्द्वानी) — यह सामान्यत: तब उपयोग होता है जब रेल-विभाग किसी नए स्टेशन या शहर के अलग हिस्से में नया जंक्शन/टर्मिनल प्रस्तावित करता है, न कि मौजूदा छोटे स्टेशन-इम्प्रूवमेंट के लिए। (स्रोत: संसदीय प्रश्न-उत्तर)।
किसी प्रोजेक्ट में नए स्टेशन को शामिल करने का मतलब ही यह होता था कि मौजूदा रेलवे स्टेशन से अलग उसी शहर या इलाके में नया रेलवे स्टेशन बनाया जाना है इसलिए ‘New Haldwani’ का मतलब ही यही था कि यह रेलवे स्टेशन या तो सीधा रूद्रपुर से जुड़ेगा जिसमें लालकुआं नहीं होगा या फिर रेल लाइन लालकुआं से फिर डायवर्ट होकर हल्द्वानी शहर में आएगी।
उस दौर में जो न्यू हल्द्वानी रेलवे स्टेशन की जो सम्भावित लोकेशन बताई जाती थी वो आज की मण्डी के आसपास उत्तराखंड ओपन यूनिवर्सिटी तक बताई जाती थी। तिवारी जी ने अपने भाषणों और प्रेस कांफ्रेंस में यह बात दोहराई थी।
बाद में इसके बड़े हुए खर्चे और वनभूमि के झंझटों के कारण इसको वाया लालकुआं जोड़ दिया गया, जिसमें फिर रेलवे का व्यवसायिक दृष्टिकोण हावी रहा तब लालकुआं लकड़ी और गौला की रेत बजरी बोल्डर ढुलान का केन्द्र बन गया था। फिर सेंचुरी पल्प फैक्टरी का बिजनेस भी था जिसके लिए ब्राडगेज रेलवे लाइन और स्टेशन ज़रूरी था।
यह बात भी महत्वपूर्ण है कि उस वक्त फारेस्ट लैंड कुछ ज़्यादा ही “पवित्र भूमि” मानी जाती थी।
उत्तराखंड बनने के बाद इस “पवित्र वन” भूमि से 50 लाख एकड़ से ज्यादा सार्वजनिक उपयोग के लिए ली जा चुकी है।
उधर उत्तराखंड के विकास के मुद्दे पर काम करने वाले एक्टीविस्ट और राजनैतिक कार्यकर्ता वन कानून को खत्म करने की मांग करते हैं, वनपशुओं से आए दिन होने वाली वारदातों को रोकने के लिए हथियार उठाने की पैरवी भी कर चुके हैं।
तो हल्द्वानी स्टेशन की कथित सुरक्षा और रेल सेवाओं के मद्देनजर क्या यह सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए कि हल्द्वानी में गौला नदी से बहुत दूर शहर के पश्चिमी हिस्से में आने वाले 100 सालों के लिए न्यू हल्द्वानी रेलवे स्टेशन बनाया जाए, आखिर बुलेट ट्रेन भी चलानी है न।





























