राजीव लोचन साह
पहलगाम में आतंकी हमले के सात महीने और आॅपरेशन सिन्दूर के रूप में पड़ौसी देश पाकिस्तान के साथ युद्ध जैसी स्थिति पैदा होने के मात्र छः महीने बाद देश पर एक और आतंकी हमला हो गया। भारत के लिये यह अत्यन्त चिन्ताजनक स्थिति है। देश की राजधानी में, जहाँ राष्ट्रपति, संसद, सरकार, सर्वोच्च न्यायालय से लेकर सेना के मुख्यालय हैं, ऐसा हमला होने से यह भय लगने लगा है कि यह महादेश अब कहीं भी सुरक्षित नहीं है। यह हमारी सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी है। इससे भी चिन्ताजनक बात यह है कि हमारी केन्द्र सरकार ने इस घटना को पर्याप्त गम्भीर ढंग से नहीं लिया। प्रधानमंत्री इस घटना की अगली सुबह भूटान यात्रा पर चले गये और वहीं से उन्होंने इस घटना में मारे गये लोगों के प्रति अपनी संवेदना जाहिर की। गृहमंत्री घटनास्थल पर काफी देर से गये और उन्होंने भी इस घटना के बारे में अपनी स्पष्ट राय जाहिर करना उचित नहीं समझा। जब गोदी मीडिया के अधिकांश न्यूज चैनल ‘सूत्रों’ के हवाले से सही-गलत सूचनायें दे रहे थे, सरकार द्वारा चुप्पी साध ली गई थी। घटना के दो दिन के बाद कैबिनेट बैठक कर यह बतलाया गया कि यह वास्तव में एक आतंकी हमला था। इतनी बड़ी घटना के बावजूद कोई सर्वदलीय बैठक कर पूरे देश को विश्वास में लेने का प्रयास नहीं किया गया। यह भी नहीं बताया जा रहा है कि इतनी बड़ी चूक होने की जिम्मेदारी किसकी है। 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई में आतंकी हमला होने पर केन्द्रीय गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हुए तत्काल अपने पद से त्यागपत्र दिया था। पर इस वर्ष सात महीने के भीतर देश पर दो-दो बड़े हमले हो जाने पर भी कोई अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आॅपरेशन सिन्दूर के बाद देश को आश्वस्त किया था कि पाकिस्तान की कमर तोड़ दी गई है। अब देश में हुई कोई भी आतंकवादी घटना देश पर युद्ध थोपे जाने के बराबर मानी जायेगी। मगर ऐसा तो कहीं होता हुआ नहीं दिख रहा है।






























