विजया सती
कभी कोई सांझ माधुर्य का झरना बनकर बह उठती है.
ऐसी ही एक अनौपचारिक सांझ घिर आई थी नवंबर 12 को हल्द्वानी के पंत निवास में, जब लंदन से अपनी जड़ों की ओर बारम्बार लौटते संस्कृति कर्मी ललित मोहन जोशी जी के सौजन्य और स्वर संगम संगीत संस्थान हीरा नगर के सहयोग से, पहले तो कुमाउंनी कविता के शब्द और फिर संगीत के स्वर प्रकृति के खुले आंगन में सहज ही बह चले.
प्रभा पंत, बीना फुलेरा, त्रिभुवन गिरी, दिवा भट्ट, देवसिंह पोखरिया, जगदीश जोशी सरीखे संवेदनशील सिद्धहस्त कवि हृदयों के बीच सुदीप …जैसे नव कवि की अभिव्यक्तियों ने श्रोताओं के अंतरमन को न केवल झंकृत किया बल्कि सोचने को विवश भी कर दिया.
कविताओं और संगीत के स्वरों के केंद्र में स्वाभाविक रूप से पहाड़ रहा, पहाड़ था तो पहाड़ का जनजीवन, पलायन, विस्थापन, बुबू, आमा, इजा और स्त्री भी रही.
कवयित्री प्रभा पंत ने..कैले कि मैं सैंणि छूं..पंक्ति की पुनरावृत्ति करते हुए अगली पंक्तियों में नारी मन की विवश स्थितियों की गहन पड़ताल की, गोपुली के दुखद जीवनांत की पीड़ा को साकार करते हुए, अंततः बाबू को लेकर इजा का अनेकरूपी होना शब्दबद्ध किया, यह कहते हुए कि धरती है तो आकाश भी तो है !
बीना फुलेरा ने पलायन की पीड़ा को आमा की अपलक प्रतीक्षा में अंकित किया तो त्रिभुवन गिरी महोदय के स्वर में यह आग्रह निहित रहा ..
रे मनखा !
मनखै की पीड़ पछाड़िए !
दिवा भट्ट के गीतों की माधुरी ने श्रोता समूह को भीतर-बाहर छंद रस में डुबो दिया ..
मयार मनै में बसे रयो हरियो चौमासा !
जगदीश जोशी जी की कविताओं में कुमाउंनी अतीत के दीदार एक ऐसे अनूठे शब्द संसार के माध्यम से हुए जहां सुख शांति के शत्रुओं को खदेड़ते हुए वीर सैनिक की अंतिम वापसी पर मां के गर्व की दुनिया ने सांस ली..
मयार मोहना घर ऐरो !
इस शाम प्रस्तुत कविताओं का समग्र स्वर उदासी या निराशा का नहीं आशा का रहा. नई पीढ़ी की प्रेरणा देव सिंह पोखरिया जी ने जागरी लोक छंदमय आह्वान किया –
धौंसिया ठोक दे निसान !
फैले दे यस उजास !
सोए हुओं का भाग जगा दे .
कवितामयी शाम के अंत में, देर तक पोखरिया जी की यह पंक्ति गूंजती रही …
के तीसे रौल मयार पहाड़ ?
क्या प्यासा ही रहेगा मेरा पहाड़ ?
समारोह में आदर सहित सुना गया आदरणीय जीवन चन्द्र पंत जी का संबोधन.
इस शाम का दूसरा रंग संगीत के सुरों से निर्मित हुआ.
स्वर संगम संगीत संस्थान के समूह गान गायकों की टोली ने वंदना के स्वर से आरम्भ किया
खोल दे माता शैला भवानी
खोल दे धरम किवाड़ !
गोरी गंगा को भागीरथी को
क्या भलो रेवाड़ !
ललित मोहन जोशी जी की फिल्म से चाय के घूंट की महिमा को आंकते गीत का गायन इस श्रृंखला की दूसरी कड़ी बना.
समारोह के अंत में सरोद वादन की झंकार सूरज डूब जाने के बाद के अंधियारे को उजास से भरती रही.
ऐसे सार्थक आयोजन का एक छोटे शहर में संभव होना शुभ संकेत है, आयोजन में सहयोगी प्रत्येक जन बधाई के पात्र एवं समस्त शुभ कामनाओं के अधिकारी हैं.































