अरुण कुमार त्रिपाठी
दशहरे के मौके पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के स्थापना दिवस और गांधी की जयंती पड़ने से समाज विचित्र किस्म की दुविधा में घिर गया है। लेकिन इस दुविधा ने विचार की दो श्रेणियों को आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया है। संयोग से प्रकट हुए इस विरोधाभासी अवसर ने दोनों की तुलना का अनोखा मौका भी दिया है। एक ओर सत्ता के वैभव की चौंधिया देने वाली रोशनी में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जेठ की दुपहरी के झुलसाने वाले सूरज की तरह से तप रहा है, तो दूसरी ओर चौमासा के बादलों के बीच में लुकाछिपी खेल रहे सूरज की तरह से गांधी कहीं कहीं एकाध झलक दिखा जा रहे हैं। यह वही झलक है जिसे पाने और अपनी मां पुतलीबाई को दिखाने के लिए गांधी बचपन में बार बार दौड़ा करते थे। और जब तक मां को जाकर बताते थे कि सूरज दिख गया, तब तक सूरज फिर बादलों में घिर जाता था। फिर मां कहती थीं कि शायद सूरज को यही मंजूर है कि मैं भोजन न करूं।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सत्ता का वैभव आप झंडेवालान जाकर 12-12 मंजिल ऊंची तीन इमारतों के माध्यम से जाकर देख सकते हैं, जो कि दिल्ली के बीचों बीच कई लाख वर्ग फुट जमीन पर अपनी विजय पताका फहरा रहा है। उसी के आसपास वह बाल्मीकि बस्तियां हैं जहां गांधी कभी ठहरा करते थे और संघ की आक्रमकता से असुरक्षित बताए जाने के बाद बिड़ला भवन में शरण ली थी। फिर भी वे बच नहीं पाए। झंडेवालान के वैभव का वर्णन और उस जमीन के अधिग्रहण की पूरी कानूनी और गैर कानूनी प्रक्रिया के बारे में अमृता सिंह ने कारवां में अपनी 47 पेज की स्टोरी में लिखा है। उस स्टोरी का शीर्षक है ‘आरएसएस इग्झिस्ट्स नो व्हैर’ यानी आरएसएस वास्तव में कहीं है नहीं। मतलब आरएसएस एक संस्था के तौर पर पंजीकृत नहीं है। इसलिए वह न तो आयकर देता है और न ही जीएसटी के तहत आता है। उसका काम उसकी आनुषंगिक संस्थाओं से चलता है। वे ही जमीन खरीदती हैं उस पर दफ्तर बनाती हैं और वे ही चलाती हैं लेकिन झंडा आरएसएस का बुलंद होता है।
यह स्तंभकार नब्बे के दशक में एक बार झंडेवालान गया था, सरसंघचालक रज्जू भैया यानी राजेंद्र सिंह का इंटरव्यू लेने। तब वहां का माहौल बहुत सादगी भरा था। रज्जू भैया ने 20 मिनट का समय दिया था लेकिन पौन घंटे बात करते रहे और तब उठे जब उनके सहयोगियों ने कहा कि वे बीमार हैं और उनके मुंह में पानी भर जाता है। इसलिए अब आप इंटरव्यू समाप्त कीजिए। तब हमारे दफ्तर से लोगों ने मजाक उड़ाया था कि अरे आप तो झंडेवालान जाते हैं। लेकिन आज उस स्थान पर प्रवेश पाना आसान नहीं है। कोई भीतर से आप को बुलाए तभी आप जा सकते हैं। आज आरएसएस के दिल्ली स्थित दफ्तर को देखते हुए आप की टोपी गिर सकती है, शायद स्वयं सेवकों की काली टोपी भले न गिरे लेकिन गांधी टोपी तो जरूर गिर जाएगी। काली टोपी और खाकी पैंट का यह रिवाज पिछली सदी के तीस के दशक के इटली के तानाशाह बेनितो मुसोलिनी के बलिला संगठन से प्रेरित है। वह रिश्ता उस समय फिर से प्रगाढ़ होता दिख रहा है जब इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी की पुस्तक ‘आई एम जार्जियाः माइ रूट्स, माइ प्रिंसिपल’ का प्राक्कथन लिखते हुए भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक नरेंद्र मोदी उसे मन की बात बताते हैं और इटली की विरासत और स्त्रीत्व की शक्ति का प्रतीक कहते हैं। ध्यान देने लायक है कि इटली में सत्तासीन मेलोनी की पार्टी ‘ब्रदर्स आफ इटली’ मुसोलिनी की फासीवादी विरासत को ही आगे बढ़ाने का दावा करती है।
झंडेवालान से लेकर रायसीना की पहाड़ियों तक फैले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के वैभव, प्रभाव, शक्ति साम्राज्य और गोपनीयता के बरअक्स गांधी का सेवाग्राम का आश्रम( और उनके दूसरे आश्रम) आज भी या तो सादगी के सौंदर्य में डूबे हैं या फिर सादगी और चकाचौंध के बीच संघर्ष करते हुए अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि वहां भी कब्जा करने के चक्कर में बहुत सारी गंदगी व्याप्त हो रही है। यह सब तब हुआ है जब गांधी की विरासत का दावा करने वाली कांग्रेस पार्टी और उसके बाद सामाजिक न्याय व समाजवादी विरासत का दावा करने वाली पार्टियां सत्तर सालों से अधिक समय तक दिल्ली की केंद्रीय सत्ता पर काबिज रहीं। वास्तव में सादगी और नैतिकता का सौंदर्य ही गांधी के कुटीर की शक्ति है। इसीलिए उस कुटीर ने न सिर्फ रायसीना की पहाड़ियों पर खड़ी ब्रिटिश सत्ता की प्रतीक वास्तुकार एडविन लुटियंस द्वारा डिजाइन की गई भव्य इमारत से चल रही ब्रिटिश सत्ता को समाप्त किया, बल्कि बकिंघम पैलेस से चलने वाले ब्रिटिश साम्राज्य का पूरी दुनिया से ही अंत करा दिया। गांधी के उस कुटीर के औचित्य को सिद्ध करने वाला वाक्य उसी कुटीर में दर्ज है—हम इमारतों की ऊंचाई निरंतर बढ़ते हुए देख रहे हैं। लेकिन उससे सभ्यता की नैतिक ऊंचाई एक इंच नहीं बढ़ रही है।
मिट्टी की दीवार, खपरैल की छत से निर्मित यह गांधी कुटीर 1935-36 में मात्र सौ रुपए में निर्मित हुआ था। वह पूरी तरह से स्वदेशी था क्योंकि उसमें प्रयोग होने वाला कोई भी सामान कहीं बाहर से नहीं आया था। मिट्टी, लकड़ी सब कुछ आसपास से ही आया था और वहां बिखरे हुए पत्थर के टुकड़े भी गांधी और उनके साथी सुबह की टहल के समय अपने गमछे और धोती में लपेट कर लाते थे। कांग्रेस पार्टी के लंबे समय तक कोषाध्यक्ष रहे जमनालाल बजाज को गांधी की सख्त हिदायत थी कि इस कुटीर पर अधिक धन नहीं खर्च होना चाहिए। इसी वजह से गांधी के मुख्य कुटीर का प्रवेश द्वार इतना छोटा था कि उसके भीतर प्रवेश करते समय साढ़े छह फुट ऊंचे पठान खान अब्दुल गफ्फार खान का सिर टकराता था। इसलिए बाद में उसे थोड़ी ऊंचाई प्रदान की गई। इस कुटीर में झंडेवालान की तरह से कोई मंदिर नहीं है, लेकिन वहां सर्वधर्म प्रार्थना सुबह शाम होती है।
यहां यह प्रसंग भी उल्लेखनीय है कि 1969 में जब गांधी शताब्दी मनाई गई तो आश्रम के व्यवस्थापकों यानी सर्वसेवा संघ के पदाधिकारियों ने देश के जाने माने वास्तुकारों को बुलाया और कहा कि इस कुटीर को नया रूप कैसे दिया जाए। इन वास्तुकारों में दिल्ली में लोदी एस्टेट को डिजाइन करने वाले जोसेफ एलेन स्टीन, आईआईटी कानपुर को डिजाइन करने वाले अच्युत पुरुषोत्तम कानविंदे, और अमदाबाद आईआईएम का डिजाइन तैयार करने वाले बालकृष्ण विट्ठल दास दोशी शामिल थे। कहते हैं कि जब उन विश्व प्रसिद्ध वास्तुकारों ने गांधी कुटीर को आंख भर कर देखा तो वे रोने लगे। उन्होंने प्रबंधकों से कहा कि यह वास्तुशिल्प इतना सुंदर, सादगीपूर्ण, स्वदेशी, नैतिक और सत्य विचारों से परिपूर्ण है कि हम इससे बेहतर कुछ भी डिजाइन नहीं कर नहीं सकते। यह जैसा है वैसा ही रहने दीजिए। इसका संरक्षण कीजिए लेकिन इसके सौंदर्य को मत खोइए। इसलिए आज भी सरकार और कॉरपोरेट के तमाम दबाव के बावजूद वह कुटीर अपने खुलेपन, सादगी और विचारशीलता के कारण दुनिया भर के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। उसमें किसी तरह का रहस्य नहीं है। उसका कोना कोना हर दर्शक के लिए खुला है।
पर्यावरण रक्षा, दरिद्र नारायण की पूजा और सादगी का यही मॉडल वास्तव में स्वदेशी का मॉडल है। इस मॉडल से भारत विश्व की परमाणु शक्ति और आर्थिक शक्ति भले न बने लेकिन वह नैतिक शक्ति बन सकता है। वह विश्व गुरु भले न बने लेकिन अपना गुरु तो बन ही सकता है। तब उसे किसी विदेशी गुरु की आवश्यकता नहीं रहेगी। अगर रहेगी तो वह साख्यभाव रहेगा दास्य भाव नहीं रहेगा। जैसा भारत और अमेरिका का रिश्ता आजकल हो गया है।
एक अक्तूबर को प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली के अंतरराष्ट्रीय आंबेडकर अध्ययन केंद्र में संघ के महासचिव दत्तात्रेय होसबोले की उपस्थिति में कहा कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उस नदी की तरह है जिसने भारत के हर हिस्से को सिंचित किया है और विकसित भारत के समक्ष जो चुनौतियां दरपेश हैं उससे निपटने का रोडमैप उसके पास है। दो अक्तूबर के दिन नागपुर और दिल्ली से लेकर देश भर के गली मोहल्लों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता नगाड़ा बजाते हुए अपनी उसी शक्ति प्रदर्शन करते दिखे। इस शक्ति से समाज का बीस करोड़ आबादी वाला एक बड़ा तबका भयभीत होता है। भयभीत वे भी होते हैं जो हिंदू समाज में सदियों से दबे कुचले रहे हैं। भयभीत वे नारियां भी होती हैं जिन्होंने आजादी के आंदोलन से लेकर आजाद भारत में लंबे संघर्ष के बाद अपने को पुरुषों के बराबर खड़े होने की हिम्मत दिखाई। भयभीत वह आदिवासी समाज भी होता है जिसके जल जंगल जमीन जैसे संसाधनों को छीन कर और सुरक्षा बलों के सहारे उनका दमन करके अडानी और अंबानी के व्यापार के लिए विकसित भारत का रोडमैप तैयार किया जा रहा है। इसीलिए कर्नाटक के दलित साहित्यकार देवनूर महादेव कहते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का शरीर बहुत बढ़ गया है लेकिन उनका मानसिक विकास नहीं हुआ है।
गांधी विचार के इसी ध्वज को ऊंचा उठाने के लिए देश के कई पत्रकार मित्र और बौद्धिक अभी वाशिंगटन डीसी गए हुए हैं और वहां कई कार्यक्रम कर रहे हैं। इन लोगों में प्रोफेसर अभय कुमार दुबे, शीतल पी सिंह, डॉ राकेश पाठक और अमेरिका में रह रहे प्रोफेसर आशुतोष वार्ष्णेय और महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी शामिल हैं। दूसरी ओर बनारस में राजघाट स्थित ध्वस्त किए गए गांधी विद्या संस्थान के लोग आज बनारस से दिल्ली के राजघाट तक संविधान बचाओ पदयात्रा निकाल रहे हैं। इस पदयात्रा का संचालन उत्तर प्रदेश सर्वोदय मंडल के अध्यक्ष रामधीरज, अशोक भारत, अरविंद अंजुम, जागृति राही और दूसरे लोग शामिल हैं। वे लोग 26 नंवंबर यानी संविधान दिवस के दिन दिल्ली पहुंचेंगे। इस बीच उनकी यात्रा में तमाम सारे लोगों ने शामिल होने का वादा किया है।
जाहिर सी बात है एक ओर कॉरपोरेट हिंदुत्व के शोषक और हिंसक वैभव से लैस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ परत का दर परत गोपनीय संगठन है तो दूसरी ओर गांधी के सत्य और अहिंसा के विचारों से समृद्ध तमाम संसाधन विहीन लेकिन झूठ और दमन के आगे न झुकने वाले लोगों और दरिद्र नारायण का अदम्य साहस है। देखना है यह द्वंद्व हमारी सभ्यता को क्या सबक देता है और किस दिशा में ले जाता है।

































