राजीव लोचन साह
भारत में आम चुनावों की निष्पक्षता पर पिछले कुछ समय सवाल उठाये जाते रहे हैं। इलैक्ट्रिक वोटिंग मशीनें विश्वसनीय नहीं होतीं, यह बात 2010 में भाजपा के नेता लालकृष्ण अडवाणी ने जी.वी.एल. नरसिम्हा राव द्वारा लिखित एक किताब की भूमिका में लिखी थी। उसके बाद के हर चुनाव में यह मामला उठा। मगर अब भाजपा इसे पराजित विपक्षी दलों, विशेषकर कांग्रेेस का ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोंचे’ बतलाती है। उसके बाद शक की सुई चुनाव आयोग की ओर मोड़ी गयी। यह आरोप लगे कि सत्ताधारी भाजपा ने चुनाव आयोग पर कब्जा कर लिया है। दो साल पहले सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिये बनी समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को रखने का आदेश दिया था, को पलट कर मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर एक और मंत्री को रखने की व्यवस्था कर दी थी। इससे चुनाव आयोग के पक्षपाती हो सकने कीे आशंका को बल मिला था। विगत वर्ष हरियाणा और महाराष्ट्र के विधान सभा चुनावों के अविश्वसनीय परिणामों ने विपक्षी दलों को इस मामले में और आक्रामक कर दिया। अभी 7 अगस्त को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 6 महीने के गहन शोध के बाद एक प्रेस कांफ्रेंस में यह बतलाया कि कैसे कर्नाटक के एक विधानसभा क्षेत्र में एक लाख से अधिक फर्जी मतदाता बनाये गये। चुनाव आयोग द्वारा बिहार में विधान सभा चुनाव से पूर्व कराये जा रहे ‘स्पेशल इंटेंशिव रिवीजन’ को लेकर न सिर्फ विपक्षी दलों ने संसद के भीतर और बाहर हंगामा खड़ा किया, बल्कि अनेक बुद्धिजीवियों ने भी चिन्ता व्यक्त की है। राहुल गांधी के रहस्योद्घाटन के 10 दिन बाद की गई प्रेस कांफ्रेंस में मुख्य चुनाव आयुक्त विश्वसनीय और प्रामाणिक ढंग से अपना पक्ष नहीं रख सके। अब इंडिया गठबंधन द्वारा बिहार में निकाली जा रही ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ में लगातार बढ़ते जा रहे जन समर्थन से यह जाहिर है कि आम जनता भी इस मुद्दे पर बहुत चिन्तित है।

































