प्रो. पुष्पेश पन्त
माननीय अध्यक्ष महोदय, श्रीमान मुख्य अतिथि तथा सभागार में उपस्थित गणमान्य देवियो और सज्जनो! मैं आपका सादर नमन करता हूं क्षमा याचना के साथ। बहुत मन होने पर भी मैं अचानक रोग ग्रस्त हो शारीरिक अक्षमता के कारण आपके सामने उपस्थित होने में असमर्थ हूं। अनूप भाई को दिए वचन को पूरा नहीं कर पाने का क्षोभ-संताप हमेशा सालता रहेगा। मित्र विनोद पांडे ने मेरा व्याख्यान आपको सुनाने का जिम्मा लिया है।
आज से कुछ वर्ष पूर्व जब ‘बुज्यू’ अर्थात् श्री चन्द्रलाल साह ‘ठुलघरिया’ की स्मृति में पहले स्मारक व्याख्यान का आयोजन नैनीताल में किया गया था तब पहले वक्ता के रूप में मुझे आमंत्रित किया गया था। एक अंतराल के बाद जब इस श्रृंखला को फिर से शुरू किया जा रहा है तो यह अवसर मुझे फिर प्रदान किया गया है। भले ही यह चयन पात्रता के आधार पर नहीं स्नेह वश ही किया गया जान पड़ता है, मैं इसे अपना परम सौभाग्य समझता हूं और इसके लिए भाई अनूप साह तथा आयोजकों का बहुत आभारी हूं।
चन्द्रलाल साह जी, जिन्हें प्यार से सभी बूज्यू कहते थे, एक असाधारण अविस्मरणीय व्यक्तित्व थे-सौम्य, निश्छल और संवेदनशील। उनके बहुआयामी जीवन का वर्णन करते विशेषण कम लगने लगते हैं। वह समाजसेवी थे, अद्भुत जीवट के धनी, युवाओं के लिए प्रेरक, प्रोत्साहक, मार्गदर्शक और उच्च कोटि के पर्वतारोही। इतना ही नहीं आध्यात्म में उनकी गहरी रूचि थी। संक्षेप में वह निष्काम कर्मयोगी थे और जीवन पर्यंत जिज्ञासु साधक।
नैनीताल की एक प्रमुख शिक्षण संस्था चेत राम साह ठुलघरिया इंटर कॉलेज का स्वामित्व और प्रबंधन उनके देशप्रेमी परोपकारी पुरखों ने अंग्रेजों से अपने हाथ में लिया था। बुज्यू ने इसे बहुत सुचारू रूप से चलाया। चंद्रलाल जी श्री अरविंदो के विचारों से प्रभावित थे और अपने जीवन में गांधीवादी थे।
कितनी सारी यादें इस पल ताजा हो रही हैं! उनका खूूबसूरत बंगला ‘हटन कॉटेज’ उस प्रायरी लॉज के ठीक ऊपर था जहां रहकर मैंने नैनीताल में पढ़ाई की। वह दिद्दी याने शिवानी से मिलने अक्सर आते और दोनों के बीच पहाड़ से लेकर शांतिनिकेतन तक की तमाम बातें होती थीं। तब मैं बच्चा ही था और इस वार्तालाप में हिस्सा नहीं ले सकता था। बाद में सरकारी नौकरी से अवकाश ग्रहण करने के बाद मेरे पिता भवाली में बस गए। उन दिनों साह जी भवाली में मशरूम केन्द्र चला रहे थे, स्थानीय तरूणों को स्वरोजगार के लिए उकसाते रहते थे। साह जी के पैर में चक्र था वह यत्र-तत्र, सर्वत्र घूमते रहते थे। अक्सर वह ‘हर्मिटेज’ के बरामदे में मां और पिताजी के साथ बातचीत करने आते थे। तब तक मैंने एमए कर लिया था और यह समझने लगा था कि इस बूढ़े हो चुके व्यक्ति में कितनी असाधारण ऊर्जा थी और उसके ज्ञान का सागर कितना गहरा था!
साह जी बेहद उदार व्यक्ति थे और अपनी निजी संपत्ति से ही नहीं बल्कि ज्ञान के भंडार का साझा कर भी हर पल सामाजिक ऋण चुकाते रहते थे। उनके जीवनकाल में कुछ लोग उन्हें पीठ पीछे सनकी या खब्ती कहने का लोभ संवरण नहीं कर सकते थे। वास्तव में चंद्रलाल जी दूरदर्शी व्यक्ति थे। स्वप्न दृष्टा होने के साथ-साथ कुशल प्रबंधक भी। जिन विषयों में उनकी रूचि थी जिन्हें वह अपने जीवन का बुनियादी सरोकार समझते थे और जिनके साथ लोगों को जोड़ना चाहते थे वह आज भी हमारे सामने मुंह बाएं खड़े ज्वलंत प्रश्न हैं। हिमालय प्रेम, पर्वतारोहण और पर्यावरण, आम आदमी के लिए बेहतरीन शिक्षा की व्यवस्था, विरासत का संरक्षण, नैनीताल की संकटग्रस्त पारिस्थितिकी और स्वावलंबन आज भी प्रासंगिक हैं। आज के इस भाषण का विषय मैं उन सरोकारों को ही बनाना चाहता हूं। वही बूज्यू की विरासत है जिसका संरक्षण, संवर्धन हमारा कर्तव्य है।
हाल के वर्षों में विकास के नाम पर नैनीताल के पर्यावरण का विनाश बहुत तेजी से हुआ है। पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने के बहाने न्यस्त स्वार्थों ने प्रशासन की मदद से या कम से कम उसकी आंखों में धूल झोंक कर ऐसे नियम अधिनियम लागू करवाये हैं जिन्होंने कानून की धज्जियां उड़ाई है। झील के चारों ओर खड़े पहाड़ बहुत स्थिर नहीं। हर बारिश में डरावना भू-स्खलन होता है और विनाशकारी तांडव का खतरा इस बदनसीब बस्ती के सर पर मंडराता रहता है। अनेक सचेत नागरिकों ने, जिनमें अजय रावत प्रमुख हैं, सर्वोच्य न्यायालय में जनहित याचिकाएँ दायर कराईं और प्रशासन पर अंकुश भी लगाया। पर यह सब पुरानी बातें हैं।
आज उदारीकरण के दौर में आर्थिक कसौटी सब कुछ बन चुकी है। ग्रीन ट्रायब्यूनल नख-दंत विहीन संस्था है और सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल जनहित याचिकाओं के बारे में अपना नजरियां बदल डाला है बल्कि कभी सामरिक तो कभी ‘जनता की भलाई’ वाले तर्क के आधार पर पर्यावरणीय सोच को हाशिए पर पहुंचा दिया है। इसका ताजातरीन उदाहरण नैनीताल से भवाली जाने वाले मोटर मार्ग की शुरूआत पर (लेकब्रिज) पर एक ऐतिहासिक इमारत जनरल पोस्ट आफिस को नेस्तनाबूद कर सड़क के चैड़ीकरण वाला है। फिलहाल यह फैसला स्थगित हो गया है पर पता नहीं बकरे की अम्मा कब तक खैर मना सकती है?
ऐसा ही एक और किस्सा बरसों से खस्ताहाल जीर्ण-क्षीर्ण मेट्रोपोल होटल का है। आजादी के दो-चार साल बाद ही इसे शत्रु संपत्ति घोषित कर दिया गया था। इसके मालिक राजा साहब महमूदाबाद थे। विडंबना यह है कि वह भले ही बटवारे के बाद बरास्ता अफगानिस्तान और ईरान, इंग्लैड चले गए और बहुत बरस बाद पाकिस्तान पहुंचे। उनके बेटे और पोते भारतीय नागरिक है और भारत में ही रहते रहे। हाल ही में अली महमूदाबाद के एक ट्वीट ने उग्र, रौद्र राष्ट्रवादियों को यह मौका दे दिया, एक तीर से दो शिकार किये जाए। शत्रु संपत्ति को मटियामेट कर यहां एक कार पार्क बना दिया जाए। यह सुझाव कितना मूर्खतापूर्ण है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। आज मेट्रोपोल होटल शत्रु संपत्ति नहीं है। हालांकि महमूदाबाद राजपरिवार सुप्रीम कोर्ट से इस बाबत बरसों से चला आ रहा मुकदमा जीत चुका था पर केन्द्र सरकार ने एक अध्यादेश द्वारा इस फैसले को निरस्त कर दिया और इस संपत्ति का अधिग्रहण कर लिया। अर्थात् आज मेट्रोपोल होटल किसी दुश्मन की जागीर नहीं बल्कि सरकार की संपत्ति है। अक्लमंदी तो इसमें होती कि इस हैरिटेज बिल्डिंग का उसी तरह जीर्णोधार किया जाता जैसा एक बार जल जाने के बाद नैनीताल क्लब का किया गया। शिमला के निकट ‘वाइल्ड फ्लावर हॉल’, जो कभी जनरल किचनर का निवास था, आग लगने के बाद पुनर्निर्माण कर उसका पुराना रूप बरकरार रखा गया और उसको हैरिटेज होटल के रूप में पुनर्जीवित किया गया। यही नुस्खा मरणासन्न मेट्रोपोल के लिए भी कामयाब हो सकता है, जिसमें काम करने के लिए बहुत सारे स्थानीय नागरिकों को रोजगार मिल सकता था।
रही बात कार पार्क की तो अक्लमंदी इसी में है कि नैनीताल में अनगिनत मोटर वाहनों के सैलाब को रोका जाये ताकि एक बार फिर ‘फ्लैट्स’ के मैदान के अच्छे दिन लौटें। निवासी तथा पर्यटक खेल प्रतियोगिताओं के दर्शक बन सकें या खुशगवार मौसम में पॉपलर के पेडों की कतार के साथ चहलकदमी कर सकें। फ्लैट्स के बहुत बडे हिस्से पर भोटिया मार्केट का कब्जा है जिसका नाममात्र का हिस्सा नैनीताल के शरणार्थी तिब्बती नागरिकों के स्वामित्व वाला बचा है। छोले-भटूरे, पूरी-पराठे, हैम बर्गर, सेंडविच, सॉफ्टी की ही दुकानें नहीं, कुछ मोमो की सबसे अधिक बिक्री करने वाली दुकानें भी बाहरी लोग ही चलाते नजर आते हैं।
मोटरगाडियों का दबाव इतना ज्यादा है कि पंगूट तक पहुंचाने वाली संकरी सड़क पर अक्सर जाम लगा रहता है। तल्ली ताल से जो सड़क चिड़ियाघर, बिड़ला मंदिर और रामजे अस्पताल की तरफ या मल्लीताल से राजभवन को जाती है उन पर चलना जान का जोखिम बन गया है। सिर्फ छोटी-बडी मोटर कारांे मिनी बसों का ही जंजाल नहीं, रही सही कसर भाडे़ पर मिलने वाले दोपहिया मोटर साइकलों और स्कूटरों ने पूरी कर दी है। स्नो व्यू तक रहेजा जैसे बड़े बिल्डरों ने अपार्टमेंट्स बना डाले हैं, स्थानीय बिल्डर भी कम नहीं। बहुत सारे ऐतिहासिक भवनों को तोड़-ताड़ कर उनके अहाते में भी फ्लैट या अपार्टमेंट कुकुरमुत्तों की तरह उग आये हैं। आयारपाटा तो घने पेड़ों की चादर के नीचे छुपा रहता है। परंतु वहां भी बहुत निर्माण कार्य हो गया है। सामने वाला शेर का डांडा, लोअर डांडा आदि पूरी तरह पास-पास सटे बहुमंजिला भवनों से घिर चुके हैं। जाहिर है कि हर आदमी अपने घर के दरवाजे तक अपना वाहन ले जाना चाहता है और इस पहाड़ी के पाश्र्व में जो होटल बने हैं उनके कारण भी मोटरों की आमदरफ्त बहुत बढ़ गई है। मोड़ वैसे ही तीखे हैं, चढ़ाई उतनी ही विकट और अधिकांश चालक नौसिखिए।
आज यह कल्पना करना कठिन है कि आजादी तक माल रोड पर तीन-चार गाड़ियों को ही चलने की इजाजत थी- लाट साहब, कमिश्नर साहब और सिविल सर्जन की गाड़ी। आवश्यकता पढ़ने पर एम्बुलेंस और पुलिस वाहनों को भी छूट मिलती थी। कुछ वर्ष पहले तल्लीताल में एक दो-मंजिले कार पार्क का निर्माण किया गया था पर उससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा क्योंकि जितने वाहनों की पार्क करने की व्यवस्था है उससे कई गुना ज्यादा गाड़ियां हर रोज नैनीताल पहुंचती है। झील के किनारे माल रोड पर बने होटल अपने रसूखों का लाभ उठा अपनी गाड़ियां अपनी नजर की रखवाली में ही रखना चाहते है।
कभी नैनीताल में दो सीजन होते थे अब बारहों मास शहर का सत्यानाश करने वाले दिहाड़ी पर्यटक दहाड़ते रहते हैं। यह हाल नैनीताल का ही नहीं पड़ौसी भीमताल, नौकुचिया, सातताल, भुवाली, श्यामखेत, रामगढ़, मुक्तेश्वर, कैंची धाम का भी हो चुका है। रानीखेत छावनी होने के कारण कुछ हद तक बरबाद होने से बचा है पर मझखाली और उसके आगे द्वारसौं तक सीढ़ीदार खेतों की हरियाली को मैदानी पहाड़ प्रेमियों के बंगले निगल चुके हैं। यहां के मकान मालिकों तथा उनके शहरी मेहमानों की फरमाइशी भोग विलासी जरूरतें पूरा करने के लिए स्टोर, रेस्त्रां, बेकरी आदि का मकड़जाल फैल चुका है। सड़क किनारे वाली जमीनों की कीमतें बेतहाशा बढ़ी हैं और इनके बगल में ‘होम स्टे’ खुलते बंद होते रहते हैं। पिउड़ा, सतखोल, सोनापानी, फरसाली, तिरछा खेत, ज्योलीकोट कहीं भी रत्ती भर जमीन डेवलपरों की गिद्ध दृष्टि से नहीं बची है।
यह संकट बहुत पहले पैदा हो चुका था। ७० वाले दशक के अंत तक अशुभ संकेत मिलने लगे थे। एमर्जैंसी के बाद बेलगाम प्रशासनिक अंधेरगर्दी और राजनैतिक संरक्षण में विनाशकारी विकास के कदमों की आहट सुनी जा सकती थी। इस दौर में और इसके बाद वाले दशक में नैनीताल के निवासियों ने संघर्ष का रास्ता चुना था। शेखर पाठक और पहाड़ की टीम तथा उमा-शीला यानी उत्तरा, मैत्री और महिला मंच की टोली तथा अन्य संगठनों ने थके हारे शहर के खून को खौलाने की कोशिश की। ‘नैनीताल समाचार’ के संस्थापक संपादक राजीव लोचन साह पहले से ही इस काम में जुटे थे। लोक कवि गिर्दा इन नौजवानों के साथ जुडे़ थे और विश्वम्भरनाथ साह ‘सखा’ भी। कितने ही और व्यक्ति तथा संस्था नाम गिने जा सकते हैं, जो नैनीताल के लिए चितिंत रहे। तब दुष्यंत की गजलें समवेत गाई जाती थीं जुझारू नारों की तरह- ‘कौन कहता है आसमान में छेद नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो!’ थिएटर को जनपक्षधर हथियार के रूप में तराशने का काम जहूर आलम और उनकी युगमंच टीम तथा अन्य संस्थाओं ने बखूबी किया। होली को पुनर्जिवित किया और कायम रखा। पर १९९० वाले उदारीकरण-भूमंडलीकरण के आगमन तक उबाल गुनगुना होने लगा था। यह यादें भी आधा सदी में फैली हैं। पर इनकी रौशनी कायम है।
यह हर्ष का विषय है कि इधर नैनीताल निवासी, कम से कम उनकी अधेड़ हो रही पीढ़ी, अब अपने पर्यावरण और पर्यटन उद्योग के अदूरदर्शी विकास से उसके नुकसान के प्रति सचेत होने लगी है। अरविंद उप्रेती, ‘नैनीताल नॉसटेलजिया’ नामक साइट के संचालक-प्रबंधक और ‘काफल ट्री’ के अशोक पाण्डे का नाम सबसे पहले याद आता है। इन दोनों को नैनीताल से अटूट प्यार है और यह लगाव इनके हर पोस्ट में झलकता है। बहरहाल बात आगे बढ़ाने से पहले कुछ और बातों का उल्लेख जरूरी है।
अंग्रेजी शब्द ‘नॉस्टेलजिया’ का अनुवाद अक्सर स्मृत्याभास के रूप में किया जाता है। पर कुमाऊंनी के नराई या दिगोलाली का कोई मुकाबला नहीं हो सकता। नराई लगना किसी ऐसे व्यक्ति की कचोटने वाली याद आना है, जो अब साथ या आसपास न हो। नराई जीवित व्यक्ति की ही लग सकती है। नराई फेरने की इच्छा तब तक पूरी नहीं हो सकती जब तक एक बार फिर मुलाकात न हो जाये। दिगोलाली का विस्तार कही अधिक व्यापक है, व्यक्ति के साथ-साथ यह अपनी व्याप्ति में उन स्थानों और प्रियजनों, संगी-साथियों के साथ बिताये क्षणों की भी याद बरबस दिला देती है जो अब हमारी पहुँच के बाहर हैं कुछ उस अंदाज में ‘शहर नया मौसम पुरानी याद लेकर आएगा’। कुल मिलाकर दोनों शब्दों का अर्थ बिछोह, वियोग और अवसाद वाला है। गिर्दा की एक गाँव की शाम वाली कविता में ‘मुश्किल से अम्मा का चूल्हा जला है; गीली है लकड़ी कि गीला धुंआ है‘ में धिनाली को दुहते पलायन से निर्जन हो चुके गाँव में अम्मा की अस्फुट ‘दिगौलाली’ एक न भरने वाला घाव दे जाती है।
यह बात रेखांकित करने की जरूरत है कि जो लोग पर्यावरण के संकट को लेकर चिंतित हैं या जिनके सामने अपनी विरासत के विनाश की त्रासदी मुँह बाये खड़ी है वह देर तक अवसाद ग्रस्त या हताशा की चपेट में विलाप करते नहीं रह सकते। किसी सार्थक विकल्प की तलाश इस समय सबसे विकट चुनौती है। इस सिलसिले में कुछ और बातें उल्लेखनीय हैं। ‘नैनीताल नॉस्टेलजिया’ के अधिकांश सक्रिय सदस्य नैनीताल में अपने बिताये स्कूली जीवन की यादें साझा करते रहते हैं। यह संवाद निश्चय ही कई पीढ़ियों की खाई को पाटता है और महाद्वीपों के बीच भौगोलिक दूरियों को मिटाता पुल बनाता है। यह वह लोग हैं जो अंग्रेजी माध्यम वाले पब्लिक स्कूलों में पढ़े हैं – सेंट जॉजफ, सेंट मेरीज कॉन्वेंट, शेरवुड और आॅल सेंट्स कॉनवेंट। इस सूची के अंत में आप बिड़ला विद्या मंदिर को भी शामिल कर सकते हैं।
हकीकत यह है कि बोर्डर्स के रूप में हॉस्टलों में रहने वाले यह किशोर-किशोरियां हफ्ते में सिर्फ एक दिन कुछ घंटों की रिहाई पर घूमने-फिरने और फिर समय पर लौटने के लिए ‘पेरोल’ जैसी छुट्टी पर निकल सकते थे। इनकी यादों का नैनीताल असली नैनीताल नहीं कहा जा सकता। इन स्कूलों की जाड़ों की छुट्टियां लंबी होती थी और गर्मियों की कम। बारह-तेरह साल की उम्र में स्कूल में दाखिला ले सोलह-सत्रह की वयस तक यह सब आगे की पढ़ाई के लिए नैनीताल से बाहर जाने को विवश थे। सीनियर कैम्ब्रिज की पढ़ाई ग्यारहवीं के बराबर थी। सिर्फ दिल्ली में हायर सेकेन्ड्री वाला इम्तिहान होता था जहां इसके बाद यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया जा सकता था। मेडिकल, इंजिनियरिंग या वकालत आदि की पढ़ाई करने के लिए बारहवीं पास करने पर ही गाड़ी आगे चल सकती थी। हां, फौज का एनडीए वाला इम्तिहान अपने दरवाजे खुले रखता था। लुब्बो-लुबाब यह कि इन अंग्रेजी स्कूलों के भद्र लोक परिवारों के कुल दीपक और कन्या रत्न बहुत मजबूरी में ही बारहवीं की पढ़ाई नैनीताल में करते थे। ऊंचे ओहदों पर काम वाले सरकारी मुलाजिमों की संतानें लखनऊ या इलाहाबाद का रूख करते। इन बच्चों की यादों का नैनीताल सेकलेस, कैपिटल सिनेमा, मॉर्डन बुक डिपो तक सिमटा रहा जान पड़ता है।
इनकी तुलना में कहीं अधिक संख्या में वह छात्र थे जो सरकारी या निजी स्कूलों में पढ़ते थे, गोरखा लाइन वाला हाई स्कूल या डीएसबी डिग्री कॉलेज के कैम्पस में संचालित जीआईसी, प्रताप भैय्या का शहीद सैनिक स्कूल या वालिका विद्यालय। मल्लीताल बाजार में म्युनिसिपल जूनियर हाई स्कूल, कन्या पाठशाला और सबसे लोकप्रिय सीआरएसटी इंटर कॉलेज। नैनीतालवासियों की जाने कितनी पीढ़ियां इन शिक्षण सस्थाओं से पढ़-लिखकर बड़ी हुई। सेना और प्रशासनिक सेवाओं के उच्च पदों पर पहुंची। जाने कितने छात्र-छात्राएं डाक्टर, इंजिनियर और प्रोफेसर पत्रकार बने। इनकी नैनीताल की यादें क्यों अनछुई धुंधलाती रह जाती हैं?
इनकी यादों में खाने-पीने की खास जगहें तल्लीताल, मल्लीताल बाजार की गरीब परवर समोसे टिक्की की दुकानें थीं और खास मौकों पर ‘सेलिब्रेट’ करने के लिए ‘सेकलेस स्विस बेकरी’ के पड़ोस में ही चैधरी जी का ठिया था जो चटपटे आलू के गुटके खाने के लिए दियासलाई की तीलियां फंसा कर देते थे और साधारण कॉफी को ही शक्कर के साथ देर तक फैट कर ‘एसप्रेसो’ में बदल देते थे। साधनविहीन निम्न मध्यवर्गीय छात्रों की तफरीह कम खर्चनशीन थी। कभी दुअन्नी का भुट्टा बांट खा लिया तो कभी पाच-दस पैसे के चना जोर गरम। उस जमाने में कॉलेज में खेल-कूद में भाग लेने वाले बच्चों को, जो किसी टीम के सदस्य थे, पच्चीस पैसे के कूपन मिलते थे जिन्हें कैंटीन में पेस्ट्री, चाय-समोसे के लिए भुनाया जा सकता था। किसे सुध बची है उस बेकरी की जो स्विस नहीं थी पर बहुत मजेदार स्पंज वाली पेस्ट्रियां पैटी और क्रीमरोल बनाती थी। इस माल को एक बड़े से टीन के ट्रंक में भर एक डोटियाल की पीठ पर लदवा सफेद दाढी वाले फकीरनुमा मुसलमान बाबा फेरी लगाते थे। उनके ज्यादा मुकाम अयारपाटा पहाड़ी पर तय थे जहां दोयम तबके के भूरे साहब बसते थे जिनकी संतानें भले ही सेंट जॉजफ, शेरवुड में पढ़ती हों वह रोजमर्रा सैकले की केक-पेस्ट्री को खरीदना-खाना फिजूल-खर्ची समझते थे।
बेकरी के कुशल कारीगर अधिकतर वह मुसलमान या दलित थे जिन्होंने अंग्रेज साहबों के साथ काम करते यह हुनर हासिल किया था। कुछ ने अपने कौशल को और निखारा था उन होटलों में काम करते जो आला दर्जे के थे और गर्मियों भर गाँठ के पूरे पर्यटकों की फरमाइश पूरी करते थे। पड़ोसी भवाली जैसे उनींदे कस्बे तक में एक छोटी अच्छी बेकरी थी जो वहां बसे अमेरिकी, इतालवी और एंग्लो इंडियन नागरिकों की जरूरतें पूरा करती थी। सेनिटोरियम में भी उसके बंधे ग्राहक थे। इन बेकरियों का जिक्र करना जरा विस्तार से इसलिए जरूरी हुआ है कि यदि समय रहते लोगों ने सतर्कता बरती होती तो मेहमाननवाजी के क्षेत्र में स्वरोजगार के बहुत सारे मौके मिल सकते थे। जितनी सरकारी ऋण पोषित योजनाएं हैं वह सिर्फ अनुदान राशि को खाने-पचाने का जरिया भर बन गई और इनको मंजूर कराने की प्रक्रियाँ पर्यटन विभाग, जिला प्रशासन और बैंक तक भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं।
चंद्रलाल जी का जो सपना था वह निजी उद्यमिता पर आधारित था। सतत विकास के साथ अपने सहभागियों को लाभान्वित कर सकने वाला। परजीवी पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला नहीं। मशरूम उगाना हो या मौन पालन, साहसिक पर्यटन हो या अधूरी शिक्षा को स्वाध्याय से पूरा करना यह उनके अपने जीवन के अनुभव पर आधारित सबक थे, जिन्हें हम आज भी भुला नहीं सकते। साह जी स्वावलंबन पर जोर देते थे। इसी की सबसे ज्यादा जरूरत आज हमें हैं। हम सरकार या प्रशासन का मुँह ना ताकते रहें बल्कि खुद पहल करें।
इस सिलसिले में बात समाप्त करने के पहले अनुज अनूप का उल्लेख परमावश्यक है। अनूप ने अनेक माध्यमों से “बुज्यू” की विरासत को न केवल सुरक्षित रखा है बल्कि आगे बढ़ाने का हर यथासंभव प्रयास किया है। पर्वतारोही और फोटोग्राफर के रूप में अनूप ने अंतराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की है और पद्मश्री से सम्मानित हुए है। उनकी फोटोग्राफी के विषय अधिकतर हिमालय, दुर्गम पहाड़ी इलाके के जन-जीवन के चित्र और हम सबके प्यारे शहर नैनीताल शहर की तबाही के दस्तावेज हैं। मुझे याद आ रहा है सुबह-सुबह खींची वह फोटो जब टिफिन टॉप से डोरोथी सीट ढहकर नीचे गिर गई। एक सुंदर पर्यटक स्थल अचानक जानलेवा संकट बन गया, नीचे रहने वालों के लिए। जब कभी अनूप तड़के सवेरे या शाम ढलते अपने घर से निकलते हैं तो लगातार फोटो खींचते रहते हैं, बदलते मौसम के दिलकश नजारों की। वह कोई नादान इंसान ही होगा जो इस नैसर्गिक सौंदर्य के पर्दे के पीछे छिपी इस शहर की मौजूदा जिंदगी की दर्दनाक हकीकत को अनदेखा करता जाये। सबसे उल्लेखनीय योगदान है सीआरएसटी इंटर कॉलेज को निरंतर विकसित करना और उसे एक बहुआयामी सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में प्रतिष्ठित करना। इस संस्था का घंटाघर वाला भवन नैनीताल की सबसे पुरानी इमारतों में एक है और उसकी पहचान है। पर इमारतें सिर्फ पत्थर-चूने से चिरंजीवी नहीं होतीं जब तक उनकी रूह उनमें बसती है तभी तक वह विरासत कहलाने की हकदार होती हैं। इस साझी विरासत का संरक्षण-संवर्धन अकेले अनूप की नहीं हम सभी की जिम्मेदारी है।
अंत में उत्तराखंड के मुख्य सचिव रहे चुके इंदु पाण्डे की कुछ मार्मिक कविता पंक्तियां साझा करना चाहता हूं। प्रसंगवश इंदु की पड़ाई नैनीताल के सरकारी, निजी स्कूलों में ही पूरी हुई। वह सीआरएसटी कौलेज के छात्र रहे हैं- “एक शहर था अपना जिसमें दो रास्ते थे। जो शहर अपना था अब बेगाना है, शायद हम बदल गए या शहर नया है!’
एक बार फिर अनुपस्थिति के लिए क्षमा याचना और आभार दर्ज करते हुए तरुणों से कहना चाहता हूं – अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो!
































