प्रिय मित्र,
बधाई। जनता के अनवरत संघर्ष के पश्चात् उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व में आ गया है। अन्तरिम विधानसभा में जनता के प्रतिनिधि होने के नाते इस समय आप पर ऐतिहासिक जिम्मेदारी आ पड़ी है। इस संक्रान्ति काल में आप व्यवस्था में कुछ आमूल परिवर्तन कर सकें, जन आकांक्षाओं के अनुकूल कुछ ठोस कदम उठा सकें तो उत्तराखण्ड की अस्सी लाख जनता की किस्मत बदल सकती है। अन्यथा यह नया राज्य उत्तर प्रदेश का एक घटिया सा लघु संस्करण बन कर रह जायेगा। शासन-प्रशासन में भ्रष्टाचार और लेटलतीफी बढ़ती जायेगी, माफिया तंत्र मजबूत होता जायेगा और जन सामान्य की जिन्दगी उसी अनुपात में कठिन होती चली जायेगी तब लोग अफसोस करेंगे कि हमने राज्य माँगा ही क्यों था ? क्यों हमने इतना सुदीर्घ संघर्ष किया ? क्यों चालीस से अधिक शहीदों ने अपने प्राण बलिदान किये ? क्यों मुजफ्फरनगर का अपमानजनक दंश झेला ? इससे बेहतर तो यह होता कि हम उत्तर प्रदेश के भीतर ही रहते।
लेकिन अन्तरिम विधानसभा में जनप्रतिनिधि होने के नाते. आप दृढसंकल्प के साथ कुछ कठोर फैसले ले सकें तो उत्तराखण्ड की तस्वीर बदली जा सकती है और इसे पूरे देश के सामने एक आदर्श राज्य बनाया जा सकता है। यदि आप तत्काल निम्नलिखित कदम उठायें, तो सकारात्मक सोच के तमाम लोग आपके साथ होंगे और एक खुशहाल उत्तराखण्ड की नींव डाली जा सकेगी:-
1. मुजफ्फरनगर के अपराधियों को दण्डित करवायें।
2. गैरसैण को उत्तराखण्ड की राजधानी घोषित करें और राज्य का नाम बदल कर उत्तराखण्ड करें। देहरादून में साज-सज्जा तथा मरम्मत आदि में किया जाने वाले तमाम खर्चों को तत्काल रोकें। यह धनराशि गैरसैण के विकास के लिये सुरक्षित रखें।
3. प्रोटोकॉल व्यवस्था को तत्काल प्रभाव से खत्म करें। समस्त जनप्रतिनिधि बगैर अंगरक्षकों के एकदम सामान्य ढंग से सादे आवासों में रहें। विधायकों को सिर्फ विधानसभा सत्र के दौरान आवास उपलब्ध कराया जाये। अति विशिष्ट व्यक्तियों के साथ गाड़ियों का काफिला चलने की प्रथा समाप्त हों और जन प्रतिनिधि चापलूसों की भीड़भाड़ से बचते हुए उसी सामान्य ढंग से आचरण करें, जैसे जन प्रतिनिधि बनने से पूर्व एक सामान्य व्यक्ति के रूप में करते थे। यह व्यवस्था शपथ ग्रहण समारोह से ही लागू हो।
4. सारे जनप्रतिनिधि तत्काल अपने व अपने परिवार के सभी सदस्यों की आय व सम्पत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करें। जन प्रतिनिधियों के परिजन तथा मित्र सरकारी ठेके न लें, न ऐसे कार्य करें जिनमें उन्हें राजकोष से भुगतान होता हो।
5. लोकपाल की नियुक्ति हो। ग्राम, जिला तथा राज्य स्तर पर जनता की निगरानी समितियाँ बनें, जिन्हें सरकारी कामकाज की समीक्षा-विश्लेषण आदि के व्यापक अधिकार हो।
6. शासन-प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही हो। किसी भी स्तर के अधिकारी या कर्मचारी द्वारा जानकारी या जिम्मेदारी न होने का बहाना बनाने को दण्डनीय अपराध माना जाये। सभी सार्वजनिक कार्य खुले ढंग से हों तथा जनता को उनकी पूरी जानकारी हो। सूचना का अधिकार सुनिश्चित हो ।
7. उत्तर प्रदेश की तरह शीर्ष पर भारी प्रशासन के स्थान पर न्यूनतम अधिकारियों वाला एक बहुत छोटा और सादा प्रशासनिक ढाँचा बने। भारतीय प्रशासनिक सेवा के जो अधिकारी स्वेच्छा और सेवा भाव से उत्तराखण्ड में आ रहे हों, उन्हें अंगीकार करें और बाकी के लिये अपना एक प्रादेशिक कैडर विकसित करें। इसके लिये राज्य में लोक सेवा आयोग की तत्काल स्थापना हो।
8. मंडलों (कमिशनरियों) को खत्म कर दें।
9. स्थानान्तरण की औपनिवेशिक प्रणाली बदली जाये। निचले स्तर के अधिकारियों, अध्यापकों, डॉक्टरो आदि को जनता के साथ घनिष्ठ और आत्मीय सम्बंध बनाने के लिये एक ही स्थान पर अधिकतम समय के लिये रखा जाये। सिर्फ राज्य स्तर के अधिकारियों को समय-समय पर स्थानान्तरित किया जाये।
10. उ.प्र. के साथ सम्पत्तियों के बँटवारे में उत्तराखण्ड के हित को कोई नुकसान न हो। राज्य विधेयक में शामिल गंगा बोर्ड और भूमि कानूनों में परिवर्तन न करने जैसी शर्तें खत्म की जायें। 15 अगस्त 1996 (तत्कालीन प्रधानमंत्री देवेगौड़ा द्वारा लालकिले ऐसे राज्य की घोषणा के दिन) के बाद उत्तराखण्ड में मौजूद जिन भूमियों और परिसम्पत्तियों को बेचा गया है, उनके सौदे रद्द कर उन्हें वापस उत्तराखण्ड में लाया जाये।
11. विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन जनसंख्या के आधार पर न होकर क्षेत्रफल के आधार पर हो और इस प्रक्रिया में सांस्कृतिक और भौगालिक परिस्थितियो को ध्यान में रखा जाये। नये जनपदों के गठन के लिये भी यही आधार रहे।
12. उत्तराखण्ड के बाहर के व्यक्ति द्वारा उत्तराखण्ड में भूमि सम्पत्ति खरीदने पर नियंत्रण लगे।
13. उत्तराखण्ड की विशेष परिस्थितियों के अनुरूप महिलाओं, शिल्पकारों और जनजातियों के लिये आरक्षण की व्यवस्था करें।
14. शासन और प्रशासन के लिये जो आवासीय तथा सरकारी कामकाज के भवन बनें, वे स्थानीय वास्तुकला के आधार पर एकदम सीधेसादे हो। फर्नीचर एवं साजसज्जा में तड़क-भड़क तथा फिजूलखर्ची की कुप्रथा समाप्त हो।
15. विश्वबैंक के साथ स्वजल और संयुक्त वन प्रबंधन जैसे जितने करार हुए हैं और जो उत्तराखण्ड राज्य को हस्तान्तरित होने हैं, उन्हें तत्काल रद्द किया जाये। भविष्य में विश्व बैंक जैसी संस्थाओं से कोई भी ऋण विधायिका में और जनता के बीच पर्याप्त बात-बहस के बिना न लिया जाये।
16. संरक्षित वन क्षेत्रों को पुनर्परिभाषित कर वनवासियों के परम्परागत अधिकार उन्हें वापस दिये जायें। वन पंचायत व्यवस्था को अधुनातन और प्रभावी बनाया जाये।
17.. शराब को राजस्व का स्रोत न बनाया जाये। शराब के ठेके बन्द किये जायें और शराब बेचने का अधिकार ग्राम पंचायतों पर छोडा जाये। ग्राम पंचायतों को ही यह अधिकार भी हो कि वह किस सामान को अपने यहाँ बेचने दें और किस पर प्रतिबंध लगायें।
18. खनन के पट्टे रद्द किये जायें। खनन करने और करवाने के सारे अधिकार ग्राम पंचायतों को दिया जाये। 19. प्रशासन को पूरी तरह विकेन्द्रीकृत कर संविधान की धारा 243छ व 243ब के अन्तर्गत पंचायती राज निकायों को पूर्ण अधिकार दिया जाये। विकास कार्यों का नब्बे प्रतिशत पैसा बगैर किसी बिचैलिये अधिकारी के सीधे पंचायती राज संस्थाओं को मिले।
20. चकबन्दी के वर्तमान कानूनों को पर्वतीय परिप्रेक्ष्य में संशोधित कर अधुनातन बनाया जाये। क्षेत्र की बढ़ती आबादी को देखते हुए राज्य में निजी स्वामित्व की भूमि में बढ़ोतरी की जाये।
21. ग्राम पंचायतों को न्याय पंचायतों के अधिकार दिये जायें। हर दीवानी मुकदमे और एक स्तर के फौजदारी मुकदमे की पहली सुनवाई ग्राम पंचायत करे। यह कोशिश हो कि यथासम्भव पंचायत स्तर पर ही विवाद सुलझ जायें।
22. पटवारी प्रणाली को और अधिक व्यापक, अधुनातन और साधनसम्पन्न बनाया जाये।
23. उत्तर प्रदेश में लागू कानूनों को नये राज्य में अंगीकार करने से पूर्व उनकी समीक्षा की जाये और उनकी उपयोगिता तय करने के लिये सार्वजनिक बहस चलायी जाये।
24. उत्तराखण्ड में कार्यरत स्वयंसेवी संस्थाओं के लिये निर्णय कार्यान्वयन तथा प्रबंधन में स्थानीय समाज की पूरी भागीदारी होना तथा अपने कामकाज और हिसाब-किताब में पूरी पारदर्शिता बरतना अनिवार्य किया जाये।
25. शिक्षा विकेन्द्रित हो। बुनियादी शिक्षा में पाठ्यक्रम स्थानीय स्तर पर बने और ग्राम पंचायत की उसमें भागीदारी हो। माध्यमिक स्तर तक शिक्षा निःशुल्क हो और उसमें श्रम तथा व्यावहारिकता पर पूरा जोर हो। समस्त पब्लिक स्कूलों और निजी उच्च शिक्षण संस्थाओं में तीस प्रतिशत स्थान स्थानीय निर्धन, अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के लिये आरक्षित हों। तथाकथित अंग्रेजी मीडियम स्कूलों पर कठोर निगरानी तथा नियंत्रण हो ।
26. बड़ी परियोजनायें, बड़े उद्योग स्थापित करने तथा पर्यटन की योजनायें शुरू करने से पूर्व स्थानीय समाज की स्वीकृति ली जाये। इन योजनाओं में स्थानीय जनता की सीधी भागीदारी हो तथा यह सुनिश्चित कर लिया जाये कि इनसे स्थानीय पर्यावरण, परम्पराओं, मान्यताओं, आधारभूत संरचना (इन्फ्रास्ट्रक्चर) आदि पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। पंचायतों को अपने क्षेत्र में स्थापित परियोजना पर कर लगाने का अधिकार हो।
27. विश्व बैंक के दबाव से पिछले कुछ समय से समाज के कमजोर वर्गों के लिये सस्ती शिक्षा, सस्ता स्वास्थ्य, सस्ती बिजली, सस्ता पानी जैसी सुविधायें खत्म कर इन चीजों को बाजार की वस्तुयें बनाया जा रहा है। नये राज्य में कमजोर वर्गों के लिये इन सुविधाओं को बहाल कर ईमानदारी से लागू किया जाये।
28. उत्तराखण्ड से बाहर, देश तथा विदेश में रहने वाले विद्वानों विशेषज्ञों और उद्यमियों को भागीदारी के लिये खुले हृदय से ससम्मान आमंत्रित किया जाये ताकि उनकी जानकारी व पूँजी नये राज्य के नवनिर्माण में काम आ सके।
उत्तराखण्ड समन्वय समिति द्वारा दिनांक 8 नवम्बर 2000 को मसूरी में जारी
(यह पत्र राज्य गठन के दौरान नैनीताल समाचार के 15 नवम्बर 2000 के अंक में पहली बार प्रकाशित हुआ था)






























