आनंद स्वरूप वर्मा
भ्रष्टाचार और महंगाई से ग्रस्त माहौल के बीच एक नए विकल्प के रूप में आम आदमी पार्टी का उदय भारत के संसदीय इतिहास की एक महत्वपूर्ण परिघटना थी। यह इसलिए भी उल्लेखनीय थी क्योंकि लंबे समय से एक साजिश के तहत सामान्य जन के अराजनीतिकरण की जो ‘राजनीति’ की जा रही थी, उसका मूर्तिमान स्वरूप अब सामने आ गया था। यह परिघटना इस लिहाज से भी ध्यान देने योग्य थी कि अंतरराष्ट्रीय फंडिंग एजेंसियों की मदद से फल-फूल रहे गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) ने जनता के आंदोलनों की धार कुंद करते हुए अब आक्रामक तेवर के साथ राजसत्ता तक अपनी पकड़ मजबूत करने की मुहिम तेज कर दी थी। देशी विदेशी कॉर्पोरेट घरानों की शुभचिंतक इन एजेंसियों के सिपहसालार आम जनता की बदहाली और बेसब्री का फायदा उठाते हुए उसे यह समझने में लगे रहे कि उसे मुसीबत से निजात पाने के लिए किसी ‘विचार’ की जरूरत नहीं है–बस उसे अराजकतावादी दिशाहीन संघर्ष में लग जाना चाहिए। यह पाठ इसलिए पढ़ाया जा रहा था ताकि जनता अपनी बदहाली के स्रोतों (कॉर्पोरेट घरानों, पूंजीवाद आदि) पर प्रहार न कर सके और हवा में तलवार भाँजते हुए अपने दुश्मनों को चैन से रहने दे। ‘आम आदमी पार्टी’ के साथ जिस परिघटना की शुरुआत हुई उसे समझने के लिए इन तथ्यों को ध्यान में रखना जरूरी है।
अभिषेक श्रीवास्तव की पुस्तक ‘आम आदमी के नाम पर’ का पहला संस्करण 2022 में प्रकाशित हुआ। पुस्तक का उपशीर्षक है ‘आम आदमी पार्टी के भ्रष्टाचार विरोध से राष्ट्रवाद तक 10 साल का सफरनामा’। पुस्तक की लंबी प्रस्तावना में ही लेखक ने लिखने के पीछे अपना मंतव्य स्पष्ट कर दिया है। आंदोलन को समर्थन देने के लिए तमाम ऐसे सामान्य लोग सड़क पर आ गए थे ‘जिन्होंने अपनी जिंदगी में न कभी मुट्ठी बांधी थी और न ही एक अदद नारा उछाला था, जिन्हें सियासत में वाम, दक्षिण और लिबरल विचारों का फर्क नहीं पता था, उनकी एक मामूली ख्वाहिश थी कि व्यवस्था में ईमानदारी का राज हो। दैनिक जीवन साफ सुथरा हो…. उम्मीद की किरण की गफलत में सुरंग के उस पार से आती ट्रेन के नीचे जब वे दबे, तो उनकी कराह मोदी-मोदी के भयाक्रांत करने वाले उद्घोष के तले दब गई। आजादी के 65 साल बाद बेहद आम लोगों ने पहली बार अपनी सामूहिक नियति को चुनौती देने की ठानी थी लेकिन नतीजा यह हुआ कि वे नियतिवाद की अंधेरी खोह में और ज्यादा जा धंसे।
177 पन्नों की इस किताब में छोटे-छोटे 23 अध्याय हैं। इनमें अन्ना आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी के गठन तक और फिर 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव से लेकर केजरीवाल द्वारा घोषित दिल्ली मॉडल के बारे में काफी जानकारी मिलती है। पुस्तक में वाराणसी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से मोदी के मुकाबले अरविंद केजरीवाल के चुनाव लड़ने का भी रोचक विवरण मिलता है।
लेखक का कहना है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से लेकर आम आदमी पार्टी वाया इंडिया अगेंस्ट करप्शन तक की राजनीति को समझने के लिए इसके नेतृत्व को समझना निर्णायक है। इसके ठीक उलट, अरविंद केजरीवाल को समझने के लिए उस राजनीतिक–सामाजिक प्रक्रिया को समझना निर्णायक है जिसने उन्हें सार्वजनिक जीवन में एक ज्वालामुखी की तरह पैदा किया, ठोस पहचान दी और फिर अचानक ही तरल बना डाला। यह पुस्तक एक व्यक्ति को उसके समय संदर्भ में रखकर समझने की कोशिश है, साथ ही उसके व्यक्तित्व के भीतर बदलते–बिगड़ते समाज-राजनीति का अक्स देखने की कोशिश भी है।
अरविंद केजरीवाल पर यह आरोप लगता रहा है कि वह भाजपा की बी टीम की तरह काम करते हैं। इस आरोप में कितनी सच्चाई है कहना मुश्किल है लेकिन दोनों के व्यक्तित्व में कुछ ऐसी समानताएं हैं जिन्हें अजब संयोग कहा जा सकता है। लेखक ने एक जगह यह सवाल उठाया है कि क्या नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल एक ही सिक्के के दो पहलू हैं? यह संयोग नहीं है। इसके पीछे तमाम सामाजिक–राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक कारण मौजूद हैँ। भूलना नहीं चाहिए कि इस देश में एक ही वक्त में दोनों नेताओं को समेटे हुए एक विरोधाभासी नारा लगा था–” मोदी फ़ॉर पी एम, केजरीवाल फ़ॉर सी एम”। नारा साकार भी हुआ। देश में मोदी की सरकार बनी और दिल्ली में केजरीवाल की। लेखक हैरान है कि यह कैसे संभव हुआ कि एक ही मतदाता ने एक ही वक्त में दो अलहदा वैचारिकी के वाहक किरदारों को एक साथ चुन लिया? सवाल उठाने के बाद लेखक ने कहा है कि दो ही बातें मुमकिन हो सकती हैं–या तो मतदाता व्यक्तित्व विघटन व मनोविकार का शिकार था या फिर दोनों किरदारों के बीच दिखने वाला विरोध ही आभासी था, गोया ‘तुम भी हम जैसे ही निकले!’
केजरीवाल की पहली सार्वजनिक उपस्थिति का जिक्र करते हुए लेखक ने बताया है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के एक कार्यकर्ता के रूप में 2011 में वह तब देखे गए जब मंच पर अन्ना हजारे के सामने बैठ कर उन्होंने लोकपाल का नारा दिया। दूसरी उपस्थिति में मंच से अन्ना गायब हो गए और वह खुद सत्याग्रह पर बैठे दिखे। उनके इर्द-गिर्द एक प्रभावशाली बौद्धिक जमात इकट्ठा थी जिसने उनकी सार्वजनिक छवि को विश्वसनीयता और ताकत बख्शी– अधिवक्ता प्रशांत भूषण, समाजवादी योगेंद्र यादव, समाजवादी जन परिषद के कुछ जुझारू जमीनी चेहरे, जनांदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय (एनएपीएम) से मेधा पाटकर, किरण बेदी, कैप्टन गोपीनाथ, मीरा सान्याल, एडमिरल रामदास, ललिता रामदास, पूर्व विधि मंत्री शांति भूषण इत्यादि। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2013 में यह सब तकरीबन साथ थे। लोकसभा चुनाव 2014 तक साथ बने रहे।
एक प्रसंग में अत्यंत तीखी आलोचना करते हुए लेखक ने टिप्पणी की है–“विचारधारा के अंत की मुनादी करने वालों की अवैध संतानों के रूप में जनता की कोख से पैदा हुआ आम आदमी पार्टी का काडर अपने बौद्धिक दंभ में सामने वाले की न उम्र देखता था और न ही अनुभव। उसके लिए हर कोई उपयोग का सामान था। जिसे जहां से जैसे भी इस्तेमाल किया जा सके, कर लिया जाना चाहिए। यह निर्ममता और अमानवीयता किसी राजनीतिक प्रोजेक्ट की बाध्यताओं से पैदा होती है। बिल्कुल वैसा ही प्रोजेक्ट, जैसा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ‘हिन्दू राष्ट्र’ का 90 साल पुराना स्वप्न है।”
जब हम मोदी और केजरीवाल को साथ रख कर देखते हैं तो पाते हैं कि दोनों ही अपनी राजनीतिक परियोजना के लिए किसी की भी बलि देने में हिचकते नहीं है। मोदी के मामले में तो यह प्रवृत्ति उन्हें विरासत में मिली है। जनसंघ के दौर में लालकृष्ण आडवाणी ने जो सुलूक बलराज मधोक के साथ किया, मोदी के राज में यही काव्यात्मक न्याय उनके साथ हो गया। केजरीवाल काव्यात्मक न्याय से अभी कोसों दूर हैं, लेकिन प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव वाला अपमानजनक अध्याय इस बात का साक्ष्य है कि एक राजनेता के तौर पर मोदी और केजरीवाल के बीच हद दर्जे की समानताएं हैं। कौन ऊपर है और कौन नीचे, यह केवल वक्त का फेर है।
इस प्रवृत्ति का मनोविश्लेषण करते हुए लेखक ने निष्कर्ष निकाला है कि ‘केजरीवाल के भीतर गहन असुरक्षा–बोध है कि लोग उन्हें कहीं उनके पद से हटा न दें या उनकी जगह कब्जा न कर लें। इस असुरक्षा–बोध को नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व में भी लक्षित किया जा सकता है।’
पुस्तक में एक और दिलचस्प प्रसंग है जब दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार संशोधन कानून 2021 को राज्यसभा ने 24 मार्च को पास किया। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 28 मार्च को इस पर अपनी मोहर लगाई। इसके प्रावधान 27 अप्रैल 2021 को लागू हो गए और इस तरह दिल्ली अरविंद केजरीवाल के हाथ से चली गई।
जिस दिन वे जंतर मंतर पर दिल्ली की जनता से पूछ रहे थे अब मुख्यमंत्री कहां जाएगा, कश्मीर के लोग उन्हें सुन के हंस रहे थे। सोशल मीडिया पर लोगों ने उन्हें याद दिलाया कि कश्मीर के जब दो टुकड़े किए गए और वहां से अनुच्छेद 370 और 35 ए हटाया गया, तब केजरीवाल के संवैधानिक मूल्य कहां चले गए थे। तब उनकी संघीयता कहां सोयी पड़ी थी जो उन्होंने आंख बंद करके कश्मीर पर केंद्र के फैसले का समर्थन कर दिया था? अब, जब अपनी जमीन लुट रही है तो कैसा रोना पीटना!
लेखक का मानना है की अरविंद केजरीवाल की राजनीति का कांटा 10 साल में पूरा एक चक्कर घूम गया है। जो शख्स भ्रष्टाचार के खिलाफ 2011 में दिल्ली की सड़क पर था, उसने सड़क से सदन तक की यात्रा की और 10 साल बाद सब की आंखों के सामने सदन को बचाने का नारा लगा रहा था।
अभिषेक का कहना है कि यह भारतीय इतिहास का अनूठा क्षण है कि दो समरूपी अपवाद एक ही देश-काल में हमारे सामने अपनी पूरी नाटकीयता के साथ उपस्थित हैं और दोनों अपने-अपने तरीके से सवा अरब लोगों की नियति के साथ जुआ खेल रहे हैं। अरविंद केजरीवाल का मैदान भले सिमट गया हो, लेकिन वह खेल में बने हुए हैं… राजनीति अगर संभावनाओं का नाम है तो अरविंद केजरीवाल संभावनाओं की पैदाइश। यह व्यवस्था उन्हें इतनी जल्दी मरने नहीं देगी और वह खुद इतनी जल्दी अपनी राजनीतिक खुदकुशी को गले नहीं लगाएंगे। यह एक जिद्दी धुन है जो आने वाले वक्त में कोई भी शक्ल ले सकती है, लेकिन उस देह के भीतर का खून-पानी बिल्कुल वही होगा जिससे नरेंद्र मोदी ने इस समाज को सींचा है।
पुस्तक दिलचस्प और पठनीय है। अभिषेक श्रीवास्तव के गद्य और उनकी शैली के मुरीद पाठकों को एक नया स्वाद मिलेगा।
[इस पुस्तक का प्रकाशन किया है अनुज्ञा बुक्स ने (1/10206, लेन नं 1E, वेस्ट गोरख पार्क, शाहदरा, दिल्ली 110 032)/ मूल्य 200 रुपये.
पुस्तक का पंजाबी संस्करण भी 2022 में ही प्रकाशित हुआ जिसका अनुवाद हरजोत ने किया
है.]































